Chapter 8. जित-जित मैं निरखत हूँ | BSEB 10 Hindi Subjective


बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिन्दी (गद्य खंड) | पाठ 8: "जित-जित मैं निरखत हूँ" — पंडित बिरजू महाराज
सम्पूर्ण 50 महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर (साक्षात्कारकर्ता: रश्मि वाजपेयी)

भाग 1: एक-पंक्ति / अति-लघु उत्तरीय प्रश्न (प्रश्न 1 से 30)
1. 'जित-जित मैं निरखत हूँ' पाठ की विधा क्या है?

उत्तर: साक्षात्कार (Interview / बातचीत)।

2. इस पाठ में किसका साक्षात्कार लिया गया है?

उत्तर: सुप्रसिद्ध कथक नर्तक पंडित बिरजू महाराज का।

3. पंडित बिरजू महाराज का साक्षात्कार किसने लिया है?

उत्तर: उनकी सुयोग्य शिष्या तथा रंगकर्म पत्रिका 'नटरंग' की संपादक रश्मि वाजपेयी ने।

4. बिरजू महाराज का जन्म कब और किस दिन हुआ था?

उत्तर: 4 फरवरी 1938 ई०, शुक्रवार को सुबह 8 बजे (बसंत पंचमी के एक दिन पहले)।

5. बिरजू महाराज का जन्म किस अस्पताल में हुआ था?

उत्तर: लखनऊ के जफ़रिन अस्पताल में।

6. बिरजू महाराज किस घराने के वंशज और कौन-सी पीढ़ी के कलाकार हैं?

उत्तर: लखनऊ घराने के सातवीं पीढ़ी के कलाकार।

7. बिरजू महाराज के पिता (बाबूजी) कितने वर्षों तक रामपुर के नवाब के यहाँ रहे?

उत्तर: 22 साल तक।

8. कितने वर्ष की उम्र में नवाब साहब को बिरजू महाराज का नाचना पसंद आ गया था?

उत्तर: छह (6) साल की उम्र में।

9. बिरजू महाराज के बाबूजी ने नौकरी छूटने पर किसे प्रसाद चढ़ाया था?

उत्तर: हनुमान जी को (मिठाई बाँटी थी)।

10. बिरजू महाराज को तालीम (नृत्य की शिक्षा) मुख्य रूप से किससे मिली थी?

उत्तर: अपने पिता (बाबूजी) से।

11. बाबूजी ने बिरजू महाराज से गंडा बाँधने के लिए नज़राने के रूप में कितने रुपये लिए थे?

उत्तर: ₹500 (पाँच सौ रुपये)।

12. बिरजू महाराज के साथ और किस लड़के को एक साथ गंडा बाँधा गया था?

उत्तर: जगत किशोर को।

13. कलकत्ता के एक बड़े प्रोग्राम में बिरजू महाराज को किसके साथ फर्स्ट प्राइज मिला था?

उत्तर: चाचा शंभू महाराज और बाबूजी के साथ नाचने पर।

14. प्रथम पुरस्कार मिलने पर चाचा शंभू महाराज ने क्या कहा था?

उत्तर: "बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे मियाँ सुभान अल्लाह!"

15. बिरजू महाराज के बाबूजी की मृत्यु किस कारण से हुई थी?

उत्तर: लू (सनस्ट्रोक) लगने के कारण।

16. बाबूजी की मृत्यु के समय बिरजू महाराज की उम्र कितनी थी?

उत्तर: साढ़े नौ (9½) साल।

17. बाबूजी का दसवाँ और तेरहवीं करने के लिए बिरजू महाराज ने कितने प्रोग्राम किए?

उत्तर: दो प्रोग्राम किए (जिससे ₹500 इकट्ठे हुए)।

18. बिरजू महाराज ने कानपुर में कितने रुपये में दो ट्यूशन किए?

उत्तर: 25-25 रुपये (कुल ₹50) में।

19. कानपुर में कौन-सा लड़का बिरजू महाराज से डांस सीखता और उन्हें हाईस्कूल की पढ़ाई पढ़ाता था?

उत्तर: सीताराम बागला।

20. 14 साल की उम्र में कपिला जी उन्हें लखनऊ से दिल्ली के किस संस्थान में ले आईं?

उत्तर: संगीत भारती में।

21. संगीत भारती की कमाई से बिरजू महाराज ने बस के पैसे बचाने के लिए क्या खरीदा?

उत्तर: एक साइकिल।

22. संगीत भारती छोड़ने के बाद बिरजू महाराज किस संस्थान से जुड़े?

उत्तर: भारतीय कला केंद्र से।

23. बिरजू महाराज का पहला विदेश दौरा (ट्रिप) किस देश का था?

उत्तर: रूस (जहाँ वे 'कुमारसंभव' बैले लेकर गए थे)।

24. बिरजू महाराज को संगीत नाटक अकादमी अवार्ड किस उम्र में मिला?

उत्तर: 27 साल की उम्र में।

25. बिरजू महाराज का विवाह किस उम्र में हुआ था?

उत्तर: 18 साल की उम्र में।

26. कथक के अलावा बिरजू महाराज को किन वाद्ययंत्रों को बजाने का गहरा शौक था?

उत्तर: सितार, गिटार, बाँसुरी, सरोद, तबला और हारमोनियम।

27. बिरजू महाराज की सबसे प्रमुख और समर्पित शिष्या कौन थीं?

उत्तर: शाश्वती।

28. पाठ में संकलित कविता 'बिरजू महाराज का नृत्य देखते हुए' के रचयिता कौन हैं?

उत्तर: श्रीराम वर्मा।

29. बिरजू महाराज अपनी कला का सबसे बड़ा जज (परीक्षक) किसे मानते थे?

उत्तर: अपनी अम्मा जी को।

30. सुबह के समय होने वाले नृत्य कार्यक्रम को किस राग का कार्यक्रम कहा जाता था?

उत्तर: भैरवी का कार्यक्रम।

भाग 2: लघु उत्तरीय प्रश्न (प्रश्न 31 से 45)
31. बिरजू महाराज के परिवार का रामपुर के नवाब से क्या संबंध था?

उत्तर: उनके बाबूजी 22 वर्षों तक रामपुर नवाब के दरबार में मुख्य नर्तक रहे। छह वर्ष की उम्र में बिरजू महाराज का नाच भी नवाब को पसंद आ गया, जिसके बाद जब भी बुलावा आता, उन्हें वहाँ नाचना पड़ता था।

32. बाबूजी ने नौकरी छूटने पर हनुमान जी को प्रसाद क्यों चढ़ाया?

उत्तर: रामपुर के नवाब के यहाँ चौबीसों घंटे हाजिरी और पाबंदी रहती थी जिससे वे बंधुआ जैसा महसूस करते थे। नौकरी छूटने पर उन्हें लगा कि अब वे खुलकर अपनी कला की साधना कर सकेंगे।

33. बिरजू महाराज से गंडा बाँधते समय बाबूजी ने क्या शर्त रखी थी?

उत्तर: बाबूजी ने कहा कि जब तक शिष्य नज़राना नहीं देगा, गंडा नहीं बाँधा जाएगा। जब बिरजू महाराज ने दो प्रोग्राम करके ₹500 जुटाए, तब बाबूजी ने उन्हें अपना विधिवत शागिर्द बनाया।

34. बाबूजी की मृत्यु के समय परिवार पर क्या आर्थिक संकट आया?

उत्तर: बाबूजी की मृत्यु अचानक लू लगने से हुई। घर में उनका श्राद्ध-कर्म (दसवाँ-तेरहवीं) करने तक के पैसे नहीं थे। 9½ वर्ष के बालक बिरजू महाराज ने दस दिनों के भीतर दो जगह नाचकर ₹500 इकट्ठे किए।

35. कानपुर में बिरजू महाराज और सीताराम बागला के बीच क्या समझौता हुआ था?

उत्तर: सीताराम बागला एक अमीर घर का लड़का था; वह बिरजू महाराज से कथक सीखता था और बदले में उन्हें हाईस्कूल की पढ़ाई पढ़ाता था।

36. संगीत भारती में बिरजू महाराज को क्या कठिनाई महसूस हुई जिसके कारण उन्होंने नौकरी छोड़ी?

उत्तर: संगीत भारती में स्वतंत्र सृजन के अवसर कम थे; वहाँ 8 मिनट का कथक कराकर केवल समूह नृत्य फिट कराने पर जोर दिया जाता था, जिससे क्षुब्ध होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

37. बिरजू महाराज ने साइकिल क्यों खरीदी और वह उनके लिए क्यों अनमोल रही?

उत्तर: संगीत भारती के दिनों में बस के पैसे बचाने और ₹50 की ट्यूशन पढ़ाने दूर जाने के लिए उन्होंने साइकिल खरीदी। वह कठिन संघर्ष के दिनों की याद दिलाती थी, इसलिए उन्होंने उसे कभी नहीं बेचा।

38. बिरजू महाराज 18 वर्ष की उम्र में हुए अपने विवाह को नुकसानदेह क्यों मानते हैं?

उत्तर: उनका मानना था कि इतनी कम उम्र में शादी होने से उन पर परिवार और गृहस्थी का भारी बोझ आ गया, जिसके कारण उन्हें अपनी मर्जी के स्वतंत्र रियाज के बजाय मजबूरन नौकरी करनी पड़ी।

39. बिरजू महाराज अपनी अम्मा से क्या गवाही लेते थे?

उत्तर: जब भी वे नया नृत्य या भाव रचते, तो अम्मा से पूछते थे कि कहीं इसमें कोई गड़बड़ी तो नहीं है और उनका अंग-संचालन बाबूजी जैसा हूबहू उतर रहा है या नहीं। अम्मा हमेशा उनका उत्साहवर्धन करती थीं।

40. लच्छू महाराज के साथ 'मालती माधव' बैले में बिरजू महाराज का क्या योगदान था?

उत्तर: वे लच्छू महाराज के असिस्टेंट थे। परदे के पीछे सारे मूवमेंट्स और एक्शन बिरजू महाराज ही तैयार करते थे, जिसे मंच पर लच्छू महाराज प्रस्तुत करते थे।

41. कलकत्ता सम्मेलन में बिरजू महाराज के जीवन को क्या नया मोड़ मिला?

उत्तर: कलकत्ता की एक बड़ी कॉन्फ्रेंस में उनके अद्भुत कथक प्रदर्शन की अखबारों में जमकर प्रशंसा छपी, जिससे पूरे देश के कला जगत में एक प्रखर नर्तक के रूप में उनकी पहचान स्थापित हुई।

42. बिरजू महाराज के रियाज की दिनचर्या कैसी थी?

उत्तर: वे संगीत भारती के दिनों में सुबह 4 बजे उठते थे, 5 से 8 बजे तक लगातार 3 घंटे कड़ा रियाज करते थे और फिर तैयार होकर 9 बजे से अपनी क्लास लेते थे।

43. बिरजू महाराज ने सितार बजाना क्यों छोड़ दिया?

उत्तर: सितार का मिजराब उँगलियों पर पहनने से हाथों में मोटे निशान (शक्लें) पड़ने लगे थे। उन्हें डर लगा कि इससे मंच पर नृत्य करते समय हाथ-मुद्राओं का सौंदर्य खराब दिखेगा।

44. पुराने समय में नृत्य आयोजनों के मंच की क्या स्थिति होती थी?

उत्तर: उस समय एसी या लकड़ी के स्टेज नहीं होते थे। महफिलों में जमीन पर गलीचा बिछा होता था जिसके नीचे गड्ढे होते थे। नर्तक को गैस बत्ती की गर्मी और पंखा झलने वाले नौकरों के बीच नाचना पड़ता था।

45. शागिर्दों को सिखाने के प्रति बिरजू महाराज का क्या दृष्टिकोण था?

उत्तर: वे अपने बेटे और अन्य शिष्यों में कोई भेदभाव नहीं करते थे। उनका मानना था कि जो भी सीखने आए, उसे अपनी पूरी आत्मा और लगन से संपूर्ण कला सिखानी चाहिए।

भाग 3: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (प्रश्न 46 से 50)
46. 'जित-जित मैं निरखत हूँ' पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: प्रस्तुत पाठ सुप्रसिद्ध कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज के जीवन-संघर्ष, कला-साधना और संस्मरणों पर आधारित एक अंतरंग साक्षात्कार है। लखनऊ घराने की सातवीं पीढ़ी में जन्मे बिरजू महाराज ने मात्र 6 वर्ष की उम्र से नवाबों के दरबार में नाचना शुरू किया। साढ़े नौ वर्ष की अल्पायु में पिता की असमय मृत्यु के बाद उन्होंने अत्यंत विषम आर्थिक परिस्थितियों का सामना किया। श्राद्ध-कर्म के खर्च और परिवार के भरण-पोषण के लिए उन्होंने बचपन में ही ट्यूशन पढ़ाए और मंच पर नृत्य किया। कपिला वात्स्यायन के सहयोग से वे दिल्ली आए और संगीत भारती तथा भारतीय कला केंद्र में अपनी विशिष्ट नृत्य-शैली स्थापित की। उन्होंने देश-विदेश में कथक को प्रतिष्ठा दिलाई और 27 वर्ष की आयु में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त किया। यह पाठ एक महान कलाकार के अदम्य परिश्रम, सादगी और भारतीय शास्त्रीय नृत्य के प्रति समर्पण की प्रेरणादायक गाथा है।

47. बिरजू महाराज के प्रारंभिक जीवन के संघर्षों और पारिवारिक विपन्नता का वर्णन कीजिए।

उत्तर: बिरजू महाराज का बचपन घोर अभावों और संघर्षों के बीच बीता। साढ़े नौ साल की उम्र में जब पिता का लू लगने से देहांत हुआ, तब घर में कफन और तेरहवीं तक के पैसे नहीं थे। बालक बिरजू ने विकट मानसिक वेदना के बीच दो प्रोग्राम करके ₹500 जुटाए। इसके बाद माँ के साथ कानपुर जाकर 25-25 रुपये के दो ट्यूशन पढ़ाए, जहाँ वे तीन मील पैदल चलकर जाते थे। कई बार वे खाना न मिलने पर भूखे रहे। दिल्ली आने पर दफ़्तर के छोटे से कमरे में रहे और बस का किराया बचाने के लिए साइकिल खरीदी। इन तमाम अभावों, पारिवारिक कलह और कम उम्र में शादी की जिम्मेदारियों के बावजूद उन्होंने अपने नृत्य के रियाज को कभी नहीं छोड़ा और अपनी लगन से विश्व-विख्यात नर्तक बने।

48. कथक नृत्य को आधुनिक और लोकप्रिय बनाने में पंडित बिरजू महाराज के योगदान की समीक्षा कीजिए।

उत्तर: बिरजू महाराज ने कथक को महफिलों और दरबारों की संकीर्ण सीमाओं से निकालकर वैश्विक रंगमंच पर प्रतिष्ठित किया:

  • उन्होंने सिद्ध किया कि शास्त्रीय कला जड़ नहीं होती, बल्कि उसमें निरंतर गतिशीलता और समकालीनता होती है।
  • उन्होंने कालिदास के 'कुमारसंभव', 'मालती माधव' और 'गोवर्धन लीला' जैसे पौराणिक व साहित्यिक प्रसंगों पर आधारित भव्य नृत्य-नाटिकाओं (बैले) का सृजन किया।
  • उन्होंने कथक के व्याकरण में नए-नए तोड़े, टुकड़े, तिहाइयाँ और भाव-भंगिमाएँ जोड़ीं।
  • उन्होंने पारंपरिक शुद्धता को बनाए रखते हुए पाश्चात्य और आधुनिक दर्शकों के लिए इसे अत्यधिक सुरुचिपूर्ण और संप्रेषणीय बनाया।

49. 'जित-जित मैं निरखत हूँ' शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: 'जित-जित मैं निरखत हूँ' शीर्षक अत्यंत काव्यात्मक, सार्थक और गंभीर है। इसका अर्थ है—'जहाँ-जहाँ मैं दृष्टि डालता हूँ'। यह शीर्षक बिरजू महाराज के संपूर्ण जीवन-दर्शन को प्रकट करता है। वे जहाँ भी देखते हैं, उन्हें जीवन के प्रत्येक कण—प्रकृति, पत्तियों, हवा के झकोरों, संगीत के सुरों और मानवीय संवेदनाओं में केवल नृत्य और लय ही दिखाई देती है। इसके साथ ही, यह शीर्षक उनकी शिष्या और दर्शकों के उस भाव को भी व्यक्त करता है कि जितनी बार भी महाराज जी के नृत्य और जीवन को देखा जाए, उसमें हर बार कला का एक नया, अप्रतिम और दिव्य रूप प्रकट होता है।

50. निम्नलिखित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
"बजते हुए घुँघरू नहीं, पूरा का पूरा अंतरिक्ष / घूमता चमकते नक्षत्रों का / अंकुरित भाव में सँवर जाते / ज़मीन पर सुरम्य / सूक्ष्म सुरों के गणितरूप अगाध / पैर महज चलते नहीं, भाषाएँ बोलते जहाँ"

उत्तर:

  • प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि श्रीराम वर्मा द्वारा रचित तथा 'जित-जित मैं निरखत हूँ' पाठ में संकलित कविता 'बिरजू महाराज का नृत्य देखते हुए' से उद्धृत हैं।
  • व्याख्या: कवि बिरजू महाराज के अलौकिक नृत्य-कौशल का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जब मंच पर महाराज जी के घुँघरू झंकृत होते हैं, तो ऐसा लगता है मानो केवल घुँघरू नहीं बज रहे, बल्कि संपूर्ण अंतरिक्ष अपने चमकते तारों और नक्षत्रों के साथ गतिमान होकर घूम रहा है। उनके पैरों के संचालन में संगीत के अत्यंत सूक्ष्म सुरों और ताल-मात्राओं का ऐसा सटीक गणितीय संतुलन होता है जो धरती पर एक अपूर्व सौंदर्य रच देता है। उनके पैर केवल फर्श पर कदम नहीं रखते, बल्कि वे मुद्राओं के माध्यम से एक जीवंत, मुखर और अर्थपूर्ण भाषा बोलते हैं जो सीधे दर्शक के हृदय को छू लेती है।

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