Class 10 Hindi (गोधूलि भाग-2: काव्य खंड)
अध्याय 12: मेरे बिना तुम प्रभु (रचयिता: रेनर मारिया रिल्के | हिंदी अनुवाद: धर्मवीर भारती)
कवि भक्त के महत्व को रेखांकित करते हुए स्वयं को ईश्वर का 'जलपात्र' और 'मदिरा' कहता है। जिस प्रकार जल की सत्ता को सुरक्षित रखने और ग्रहण करने के लिए पात्र की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार ईश्वर की कृपा और आस्था को धारण करने के लिए भक्त (मानव) रूपी जलपात्र आवश्यक है।
वहीं मदिरा आनंद और लय-लीनता का प्रतीक है। भक्त की निष्काम भक्ति रूपी मदिरा को पीकर ही ईश्वर आनंदित एवं प्रसन्न होते हैं। यदि भक्त रूपी जलपात्र टूट जाए या भक्ति रूपी मदिरा सूख जाए, तो ईश्वर का आनंद और स्वरूप भी निराधार हो जाएगा।
मुझे खोकर तुम अपना अर्थ खो बैठोगे ?"
आशय: प्रस्तुत पंक्तियों में कवि रिल्के कहते हैं कि ईश्वर का अपना कोई साकार रूप नहीं होता; भक्त ही ईश्वर की पहचान (वेश) और उनके कार्य-कलाप (वृत्ति) का माध्यम है। संसार में ईश्वर की सत्ता, महिमा और अस्तित्व की अनुभूति भक्त के माध्यम से ही संभव होती है। यदि भक्त ही नहीं रहेगा, तो ईश्वर की पूजा-अर्चना करने वाला, उनकी महिमा का बखान करने वाला कोई नहीं होगा। ऐसी स्थिति में ईश्वर स्वयं अपनी महत्ता और अर्थ खो बैठेंगे।
शानदार लबादा प्रभु (ईश्वर) का गिर जाएगा।
कारण: ईश्वर की प्रभुता, सौंदर्य और महत्ता का परिधान (लबादा) वास्तव में भक्त की आत्मीय भक्ति और आस्था है। जब भक्त नहीं रहेगा, तो ईश्वर को पूजने वाला और उनके स्वरूप की रक्षा करने वाला कोई नहीं होगा, जिससे उनका आवरण (महत्ता) समाप्त हो जाएगा।
कवि (भक्त) ईश्वर की कृपा-दृष्टि को अपनी कपोलों (गालों) रूपी नरम शय्या पर विश्राम देकर उन्हें परम सुख और विश्राम प्रदान करता था। इसके अलावा, शाम के समय ढलते सूर्य की रंगीन छटाओं में घुलमिलकर ईश्वर के साथ आनंदमयी लय स्थापित करने का सुख प्रदान करता था।
कवि को इस बात की आशंका है कि यदि उसका (भक्त का) अस्तित्व समाप्त हो गया, तो ईश्वर का क्या होगा। भक्त के अभाव में ईश्वर गृहीन, निर्वासित और बेघर हो जाएँगे। उनके चरणों की पादुका (भक्त) न रहने पर ईश्वर के नंगे पैरों में छाले पड़ जाएँगे और वे लहूलुहान होकर भटकेंगे। कवि को भय है कि भक्त के बिना ईश्वर अपनी पहचान और अर्थ खो देंगे।
यह कविता कवि (भक्त) द्वारा अपने आराध्य प्रभु (ईश्वर) को संबोधित है।
विचार: हम सोचते हैं कि यह संबोधन अत्यंत अनूठा और मानवीय आस्था का प्रतीक है। सामान्यतः भक्त ईश्वर से कृपा और दया की गुहार लगाता है, परंतु यहाँ कवि ने भक्त की महत्ता को ईश्वर के तुल्य (अन्योन्याश्रित) दिखाकर यह स्पष्ट किया है कि भक्त के बिना ईश्वर भी एकाकी और असहाय हैं।
यद्यपि मनुष्य का जीवन क्षणभंगुर और नश्वर है, फिर भी यह कविता मनुष्य को ईश्वर की सत्ता का संवाहक और आधार मानकर उसके जीवन का गौरव बखान करती है। ईश्वर विराट और अमर होते हुए भी भक्त की आस्था और भक्ति पर आश्रित हैं। मनुष्य ही ईश्वर के अस्तित्व को साकार रूप देता है, उनकी पूजा-अर्चना करता है तथा उनकी महिमा का विस्तार करता है। इस प्रकार, नश्वर होकर भी मनुष्य ईश्वर की पहचान का प्रमुख कारण है।
कविता में भक्त और भगवान के बीच अन्योन्याश्रित (एक-दूसरे पर निर्भर) और पावन प्रेम का संबंध दर्शाया गया है।
- एक-दूसरे के पूरक: भगवान जल हैं, तो भक्त जलपात्र है। भगवान मदिरा हैं, तो भक्त उसका आनंद लेने वाला स्रोत है।
- पारस्परिक अस्तित्व: जिस प्रकार बिना भगवान के भक्त का कोई आधार नहीं है, उसी प्रकार बिना भक्त के भगवान भी गृहीन, निरुपाय और अर्थहीन हो जाते हैं।
• पुस्तकालय से रवीन्द्रनाथ की 'गीतांजलि' का हिंदी अनुवाद खोजकर पढ़ें और रिल्के तथा रवीन्द्रनाथ में समानता के सूत्र खोजिए।
उत्तर:
समानता: गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की 'गीतांजलि' और रिल्के की कविताओं में ईश्वर तथा भक्त के बीच गहरा, मधुर और रहस्यात्मक संबंध देखने को मिलता है। दोनों ही कवियों ने ईश्वर को अत्यंत निकट, स्नेही और भक्त के प्रेम पर आश्रित माना है। दोनों की काव्य शैली गीतात्मक और भावपूर्ण है।
• हिंदी में 'रिल्के के पत्र' प्रकाशित हैं। उन्हें पढ़ें।
(यह विद्यार्थियों हेतु स्वयं पढ़ने और पुस्तकालय स्वाध्याय के लिए निर्देश है।)
• रिल्के के बारे में विभिन्न स्रोतों से जानकारी एकत्र कीजिए और उसे लेख के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
लेख: रेनर मारिया रिल्के का जीवन और साहित्य
रेनर मारिया रिल्के का जन्म 4 दिसंबर 1875 को प्राग (ऑस्ट्रिया, वर्तमान जर्मनी) में हुआ था। इनके पिता जोसेफ रिल्के और माता सोफिया थीं। इन्होंने प्राग और म्यूनिख विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा प्राप्त की। रिल्के आधुनिक यूरोप के प्रमुख रहस्यवादी और आस्तिक ईसाई कवियों में गिने जाते हैं। इनकी प्रमुख कृतियों में उपन्यास 'द नोटबुक ऑफ माल्टे लॉरिड्स ब्रिज' तथा कविता संकलन 'लाइफ एण्ड सॉन्ग्स', 'लॉरिस सेक्रिफाइस' आदि प्रसिद्ध हैं। 29 दिसंबर 1926 को इनका निधन हो गया।1. कविता से तत्सम शब्दों का चयन करें एवं उनका स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग करें।
- अस्तित्व: सत्य का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता।
- मदिरा: अत्यधिक मदिरा का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
- चरण: हमें सदैव माता-पिता के चरणों में प्रणाम करना चाहिए।
- सूर्यास्त: शाम के समय सूर्यास्त का दृश्य अत्यंत मनोरम दिखता है।
- आशा/आशंका: अचानक आए बादलों को देखकर बारिश की आशंका बढ़ गई है।
2. कविता में प्रयुक्त क्रियाओं का स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग करें।
- करोगे: तुम कल मेरे साथ विद्यालय चलोगे या क्या करोगे?
- बिखर जाऊँगा: यदि तुमने मेरा साथ छोड़ा तो मैं अंदर से टूटकर बिखर जाऊँगा।
- खोजेगी: खोई हुई वस्तु को पुलिस जल्द ही खोजेगी।
- भटकेंगे: बिना सही मार्गदर्शन के युवा रास्ते से भटकेंगे।
3. कविता से अव्यय पद चुनें।
अव्यय पद: तब, या, मुझे, बिना, कभी, दूर, प्रभु।
4. कविता के विशेष्य पदों को चिह्नित करें।
विशेष्य पद (जिनकी विशेषता बताई गई है):
- लबादा (विशेषण: शानदार)
- शय्या (विशेषण: नर्म)
- गोद (विशेषण: ठंडी)
- सत्य (विशेषण: विराट)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| जलपात्र | पानी रखने का बर्तन |
| वृत्ति | प्रवृत्ति, कर्म-स्वभाव |
| निर्वासित | बेघर |
| पादुका | चप्पल, जूते, खड़ाऊँ आदि |
| लबादा | चोगा / ढीला वस्त्र |
| कपोल | गाल |
| शय्या | बिस्तर |
0 Comments