बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिन्दी (गद्य खंड) | पाठ 7: "परम्परा का मूल्यांकन" — डॉ० रामविलास शर्मा
सम्पूर्ण 50 महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
उत्तर: डॉ० रामविलास शर्मा।
उत्तर: 10 अक्टूबर 1912 ई० में।
उत्तर: उच्चगाँव सानी (उन्नाव जिला, उत्तर प्रदेश) में।
उत्तर: लखनऊ विश्वविद्यालय से (1934 ई० में)।
उत्तर: भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के।
उत्तर: 30 मई 2000 ई० को दिल्ली में।
उत्तर: 'निराला की साहित्य साधना' पर।
उत्तर: 'आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना', 'भारतेन्दु हरिश्चंद्र', 'प्रेमचंद और उनका युग', 'भाषा और समाज' और 'महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण'।
उत्तर: 'परम्परा का मूल्यांकन' नामक पुस्तक से।
उत्तर: जो लोग साहित्य में युग-परिवर्तन करना चाहते हैं, जो लकीर के फकीर नहीं हैं और रूढ़ियाँ तोड़कर क्रांतिकारी साहित्य रचना चाहते हैं।
उत्तर: ऐतिहासिक भौतिकवाद।
उत्तर: साहित्य की परम्परा का।
उत्तर: प्रगतिशील आलोचना का।
उत्तर: जो शोषक वर्गों के विरुद्ध श्रमिक जनता के हितों को प्रतिबिंबित करता है।
उत्तर: सापेक्ष रूप में।
उत्तर: एथेंस की सभ्यता ने।
उत्तर: भारत और ईरान।
उत्तर: इटली की।
उत्तर: कवि टेनीसन ने।
उत्तर: रोमन साम्राज्य का वैभव।
उत्तर: प्राचीन यूनानियों (ग्रीस) की।
उत्तर: शेली और बायरन ने।
उत्तर: अपनी साहित्यिक परम्परा का ज्ञान।
उत्तर: सोवियत संघ (रूस) पर।
उत्तर: टॉलस्टॉय (लियो टॉल्स्टॉय)।
उत्तर: 1917 ई० की क्रांति।
उत्तर: 'रामायण' और 'महाभारत' को।
उत्तर: भारत का।
उत्तर: समाजवादी व्यवस्था में।
उत्तर: तमिलनाडु के लोग रवीन्द्रनाथ की तथा उत्तर भारत के लोग सुब्रह्मण्य भारती की।
उत्तर: जो साहित्यकार रूढ़ियों को तोड़कर क्रांतिकारी साहित्य रचना चाहते हैं और समाज में युग-परिवर्तन के आकांक्षी हैं, उनके लिए परम्परा का ज्ञान अनिवार्य है ताकि वे पूर्ववर्ती ज्ञान के आधार पर नए प्रतिमान गढ़ सकें।
उत्तर: जिस प्रकार समाज को समझने और वर्गहीन समाज बनाने के लिए ऐतिहासिक भौतिकवाद को इतिहास के ज्ञान की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार साहित्य के विकास और प्रगतिशील आलोचना के लिए साहित्य की परम्परा का ज्ञान आवश्यक है।
उत्तर: साहित्य केवल आर्थिक परिस्थितियों या भौतिक साधनों का प्रतिबिंब नहीं होता; मनुष्य की चेतना और भावनाएँ आर्थिक बंधनों से परे स्वतंत्र निर्णय लेती हैं, जिससे साहित्य में एक सापेक्ष स्वाधीनता बनी रहती है।
उत्तर: औद्योगिक उत्पादन (जैसे मशीनें या एटम बम) की हूबहू नकल या पुनर्निर्माण संभव है, किंतु कलात्मक उत्पादन (जैसे शेक्सपियर के नाटक या कालिदास का काव्य) अद्वितीय होता है और उसकी पुनरावृत्ति असंभव है।
उत्तर: अमेरिका के गुलाम-मालिकों ने विश्व संस्कृति को कुछ नहीं दिया, जबकि प्राचीन एथेंस (यूनान) की दास-व्यवस्था के बावजूद वहाँ का साहित्य और कला समूचे यूरोप की संस्कृति का स्थायी आधार बने।
उत्तर: जब दुनिया भर में सामंतवाद कायम था, तब महान कविता के केवल दो ही वैश्विक केंद्र थे—भारत और ईरान, जहाँ सामंती काल में भी अमर और लोकोन्मुख काव्य रचा गया।
उत्तर: राजनीतिक मूल्य और साम्राज्य समय के साथ नष्ट हो जाते हैं (जैसे ब्रिटिश या रोमन साम्राज्य), किंतु शेक्सपियर, मिल्टन, वर्जिल और कालिदास के साहित्यिक मूल्य युगों-युगों तक शाश्वत प्रकाश बिखेरते रहते हैं।
उत्तर: जब किसी राष्ट्र पर संकट आता है (जैसे सोवियत संघ पर हिटलर का आक्रमण), तब साहित्य और सांस्कृतिक परम्परा ही जनता को एकजुट कर स्वाधीनता संग्राम की सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति बनती है।
उत्तर: बंगाल भौगोलिक रूप से बँटकर भी अपनी साझी साहित्यिक परम्परा (रवीन्द्रनाथ, नजरुल) के कारण सांस्कृतिक रूप से एक है, जबकि पंजाब में साहित्य की परम्परा का ज्ञान कम होने से यह एकात्मता कमजोर पड़ी।
उत्तर: वाल्मीकि और व्यास द्वारा रचित ये दोनों महाकाव्य भारत की बहुजातीय और बहुभाषी अस्मिता को एक सूत्र में पिरोते हैं; इनके बिना भारतीय साहित्य की आंतरिक एकता बिखर जाएगी।
उत्तर: समाजवाद पुरानी संस्कृति को नष्ट नहीं करता बल्कि आत्मसात करता है। जब करोड़ों निर्धन और निरक्षर लोग साक्षर होंगे, तो वे वाल्मीकि, व्यास, कालिदास और टैगोर के नए पाठक बनकर संस्कृति को समृद्ध करेंगे।
उत्तर: यूरोप में राष्ट्रीयता अक्सर युद्धों और एक जाति द्वारा दूसरी जाति पर प्रभुत्व से बनी, जबकि भारत में राष्ट्रीयता किसी राजनीतिक दमन से नहीं बल्कि साझा इतिहास, संस्कृति और कवियों की वाणी से स्वतः विकसित हुई।
उत्तर: जो साहित्य दूसरों की अंधी नकल करके रचा जाता है, वह अधम (निम्न) कोटि का होता है और रचनाकार की सांस्कृतिक असमर्थता व मौलिकता के अभाव का प्रमाण होता है।
उत्तर: वे प्रगतिवादी (मार्क्सवादी) चेतना और राष्ट्रप्रेम के समन्वयकारी आलोचक हैं, जिन्होंने भाषाविज्ञान और हिन्दी आलोचना को वैज्ञानिक, तथ्यपरक और पारदर्शी दृष्टि प्रदान की।
उत्तर: यदि कला पूरी तरह नियमों में बंधकर निर्दोष बन जाए तो वह निर्जीव और यांत्रिक हो जाती है; महान कलाकारों की कृतियों में कुछ कमियाँ रहने पर ही आगे के कलाकारों के लिए नया रचने की गुंजाइश बनी रहती है।
उत्तर: प्रस्तुत निबंध में डॉ० रामविलास शर्मा ने समाज, संस्कृति और साहित्य के विकास में परम्परा के महत्व का सांगोपांग विवेचन किया है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि जो रचनाकार समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना चाहते हैं, उनके लिए परम्परा का ज्ञान सबसे अधिक आवश्यक है। साहित्य केवल आर्थिक परिस्थितियों का यांत्रिक प्रतिबिंब नहीं होता, बल्कि वह अपनी सापेक्ष स्वाधीनता बनाए रखता है। भौतिक साम्राज्य (जैसे रोमन या ब्रिटिश) नष्ट हो जाते हैं, किंतु वर्जिल, शेक्सपियर, वाल्मीकि और कालिदास का साहित्य अमर रहता है। भारत जैसे बहुजातीय देश में 'रामायण' और 'महाभारत' राष्ट्रीय एकता के प्राण हैं। लेखक का मानना है कि पूँजीवाद की तुलना में समाजवादी व्यवस्था में ही जनता के साक्षर होने पर साहित्य की परम्परा का पूर्ण, बहुआयामी और वैश्विक विकास संभव है।
उत्तर: डॉ० शर्मा मार्क्सवादी होते हुए भी इस संकीर्ण सोच का खंडन करते हैं कि साहित्य केवल आर्थिक वर्ग-हित या राजनीतिक विचारधारा का औजार है। वे तर्क देते हैं कि आर्थिक जीवन के अलावा मनुष्य एक संवेदनशील प्राणी के रूप में भी जीता है। साहित्य में मनुष्य का इंद्रिय-बोध, उसकी कोमल आदिम भावनाएँ, प्रेम, करुणा और प्रकृति से उसका शाश्वत नाता प्रतिफलित होता है। यही कारण है कि समाज में दास-प्रथा या सामंतवाद समाप्त हो जाने पर भी उस युग में रचा गया वाल्मीकि, होमर या कालिदास का साहित्य आज भी हमें उतना ही भाव-विभोर और आनंदित करता है। अतः साहित्य का मानवीय और संवेदनात्मक पक्ष विचारधारा से कहीं अधिक व्यापक और स्थायी होता है।
उत्तर: लेखक के अनुसार भारत संसार का सबसे अनूठा बहुजातीय और बहुभाषी राष्ट्र है। यहाँ की राष्ट्रीयता किसी एक जाति द्वारा दूसरी जातियों पर सैनिक या राजनीतिक प्रभुत्व कायम करके नहीं बनाई गई, बल्कि यह इतिहास और सांस्कृतिक परम्परा की देन है। इस साझी संस्कृति के निर्माण में महाकवि व्यास (महाभारत) और वाल्मीकि (रामायण) की भूमिका निर्णायक रही है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक भारत की सभी भाषाओं का साहित्य इन्हीं दो महाकाव्यों से जीवन-रस प्राप्त करता है। यदि भारतीय संस्कृति से रामायण और महाभारत को अलग कर दिया जाए, तो संपूर्ण देश की आंतरिक भावात्मक एकता छिन्न-भिन्न हो जाएगी।
उत्तर: प्रस्तुत निबंध का शीर्षक 'परम्परा का मूल्यांकन' सर्वथा सटीक, गंभीर और विचारोत्तेजक है। 'मूल्यांकन' का अर्थ है गुण-दोषों के आधार पर किसी वस्तु का वास्तविक मूल्य तय करना। निबंध में लेखक ने परम्परा को न तो आँख मूँदकर स्वीकार किया है और न ही उसे पुरानी कहकर पूरी तरह नकारा है। उन्होंने शोषक वर्ग की जड़ रूढ़ियों का विरोध करते हुए श्रमजीवी जनता के हितैषी और सौंदर्यपरक साहित्य को सहेजने पर बल दिया है। वे परम्परा को आधुनिक प्रगतिशील साहित्य और समाजवाद के निर्माण की अनिवार्य आधारशिला सिद्ध करते हैं। अतः यह शीर्षक निबंध के केंद्रीय भाव को पूरी प्रामाणिकता के साथ व्यक्त करता है।
उत्तर:
- प्रसंग: प्रस्तुत गद्यांश प्रख्यात प्रगतिशील आलोचक डॉ० रामविलास शर्मा द्वारा रचित वैचारिक निबंध 'परम्परा का मूल्यांकन' से उद्धृत है।
- व्याख्या: लेखक राजनीति और साहित्य के मूल्यों की तुलना करते हुए स्पष्ट करते हैं कि भौतिक सत्ता, राजनैतिक शक्ति और विशाल साम्राज्य नश्वर होते हैं, किंतु महान साहित्यकार की कला शाश्वत और अमर होती है। उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि प्राचीन रोमन साम्राज्य का अपार सैनिक बल, धन-दौलत और वैभव आज इतिहास के पन्नों में दफन हो चुका है, किंतु उसी काल के महाकवि वर्जिल की काव्यात्मक रचनाएँ आज सदियों बाद भी जीवित हैं और पाठकों के हृदय को अपार आनंद से सराबोर कर देती हैं। इसी प्रकार जब ब्रिटिश साम्राज्य का नामलेवा भी नहीं बचेगा, तब भी शेक्सपियर और मिल्टन का साहित्य विश्व संस्कृति के आकाश में जगमगाता रहेगा। यह साहित्य की अमिट शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
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