बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिन्दी (गद्य खंड) | पाठ 6: "बहादुर" — अमरकांत
सम्पूर्ण 50 महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
उत्तर: अमरकांत।
उत्तर: जुलाई 1925 ई० में नगरा, बलिया (उत्तर प्रदेश) में।
उत्तर: इलाहाबाद विश्वविद्यालय से (1947 ई० में)।
उत्तर: 'डिप्टी कलेक्टरी'।
उत्तर: 'जिंदगी और जोंक', 'देश के लोग', 'मौत का नगर', 'मित्र-मिलन' और 'कुहासा'।
उत्तर: 'सूखा पत्ता', 'आकाशपक्षी', 'काले उजले दिन', 'सुखजीवी', 'बीच की दीवार' और 'ग्राम सेविका'।
उत्तर: 'वानर सेना'।
उत्तर: दिलबहादुर।
उत्तर: निर्मला (लेखक की पत्नी) ने।
उत्तर: नेपाल और बिहार की सीमा पर बसे एक पहाड़ी गाँव का (नेपाली गवई गोरखा)।
उत्तर: लगभग बारह-तेरह वर्ष।
उत्तर: ठिगना चकइठ शरीर, गोरा रंग और चपटा मुँह।
उत्तर: भैंस को पीटने के कारण माँ द्वारा की गई बेरहम पिटाई और डाँट से दुखी होकर।
उत्तर: दो रुपये (₹2)।
उत्तर: लेखक के साले साहब।
उत्तर: किशोर।
उत्तर: कपड़े की एक गोल-सी नेपाली टोपी (जो बाईं ओर झुकी रहती थी)।
उत्तर: गोलियाँ, पुराने ताश की गड्डी, खूबसूरत पत्थर के टुकड़े, ब्लेड और कागज की नावें।
उत्तर: जूतों पर पॉलिश, साइकिल की सफाई, कपड़ों की धुलाई-इस्त्री और रात को शरीर की मालिश।
उत्तर: ग्यारह रुपये (₹11)।
उत्तर: साड़ी के खूँट से निकालकर चारपाई पर।
उत्तर: लेखक ने गुस्से में आकर बहादुर के गाल पर एक तमाचा जड़ दिया।
उत्तर: पुलिस के हवाले करने और जेल भेजने की।
उत्तर: सिल (मसाला पीसने वाला सिल-बट्टा)।
उत्तर: अपने कपड़े, बिस्तर, जूते, यहाँ तक कि अपनी पूरी तनख्वाह के पैसे भी छोड़ गया।
उत्तर: साहित्य अकादमी पुरस्कार से।
उत्तर: 'माताजी'।
उत्तर: नौकर न होने के कारण (सभी रिश्तेदारों के यहाँ नौकर थे)।
उत्तर: युद्ध में।
उत्तर: किशोर, निर्मला और स्वयं लेखक को।
उत्तर: बहादुर ने अपनी माँ की प्रिय भैंस की पिटाई कर दी थी। भैंस के भागकर माँ के पास जाने पर माँ ने अनुमान लगाकर बहादुर की डंडे से दुगुनी पिटाई कर दी, जिससे उसका मन माँ से फट गया और वह घर छोड़ भागा।
उत्तर: लेखक के सभी भाई और रिश्तेदार अच्छे पदों पर थे और सबके यहाँ नौकर थे। बहन की शादी में भाभियों को आराम करते और निर्मला को दिन-रात खटते देखकर लेखक ने प्रतिष्ठा व सुविधा के लिए नौकर रखने का निश्चय किया।
उत्तर: निर्मला ने आत्मीयता और औपचारिकता के तहत उसके नाम से 'दिल' शब्द हटाकर उसे केवल 'बहादुर' पुकारना शुरू किया, ताकि वह केवल एक कामकाजी घरेलू नौकर के रूप में पहचाना जाए।
उत्तर: घर में जैसे तोता-मैना पालने जैसा उल्लास छा गया। घर साफ-सुथरा रहने लगा, सभी के कपड़े चकाचक धुलने लगे और परिवार के सदस्यों को हर छोटे-बड़े काम में अपार आराम मिलने लगा।
उत्तर: वह अपनी नेपाली टोपी पहनकर आईने में मुँह देखता, जेब से गोलियाँ, ताश और पत्थर निकालकर खेलता तथा धीमी आवाज में विरह और पहाड़ के लोकगीत गुनगुनाता था।
उत्तर: किशोर रौब-दाब से रहता था। वह अपने सारे निजी काम बहादुर से कराता था और जरा-सी भी गलती होने पर उसे गंदी गालियाँ देता तथा डंडे व हाथों से बेरहमी से पीटता था।
उत्तर: जब निर्मला ने दूसरों की बातों में आकर उसे खुद रोटी सेंकने को कहा, तो उसका स्वाभिमान आहत हुआ। उसने रोते हुए कहा कि उसकी माँ भी घर भर की रोटियाँ बनाकर उसे खिलाती थी, उसने कभी खुद नहीं बनाई।
उत्तर: रिश्तेदार और उसकी पत्नी ने मिठाई और बच्चों के लिए पैसे न लाने की अपनी झेंप व कंजूसी छिपाने के लिए बहादुर पर ₹11 चुराने का झूठा आरोप मढ़ दिया।
उत्तर: बहादुर का मुँह काला पड़ गया और वह निर्भय होकर सिर झुकाए आँसू बहाते हुए बस यही कहता रहा—"मैंने नहीं लिया, बाबूजी।"
उत्तर: रिश्तेदार के सामने अपनी प्रतिष्ठा बचाने और यह सोचकर कि तमाचा मारने से वह सच उगल देगा, लेखक ने उसे मारा; किंतु बाद में उन्हें आत्मग्लानि और भारी लघुता का अनुभव हुआ।
उत्तर: निरंतर होने वाली मार-पीट, गालियों, झूठे चोरी के कलंक और अंत में हाथ से सिल टूट जाने पर फिर से पीटे जाने के डर और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए वह भाग गया।
उत्तर: घर में चूल्हा नहीं जला, बर्तन बिना धुले पड़े रहे, आँगन गंदा रहा और पूरा घर ऐसा वीरान हो गया मानो किसी अपने की मृत्यु पर मातम छाया हो।
उत्तर: क्योंकि बहादुर अपनी तनख्वाह और कपड़े तक छोड़ गया था। उन्हें अपनी क्रूरता, अमानवीय व्यवहार और उस पर लगाए गए झूठे लांछन पर गहरा पश्चाताप हुआ।
उत्तर: उनकी भाषा सहज, फक्कड़, मुहावरेदार और देशज शब्दों से युक्त है, जो बिना किसी बनावट के मध्यवर्ग के अंतर्विरोधों और मानवीय संवेदनाओं को सीधे उजागर करती है।
उत्तर: लेखक को अहसास हुआ कि बहादुर ने दूसरों की मार तो सह ली थी, लेकिन जिस मालिक (बाबूजी) को वह अपना रक्षक मानता था, उनके द्वारा मारा गया तमाचा उसके स्वाभिमानी दिल को तोड़ गया।
उत्तर: 'बहादुर' अमरकांत द्वारा रचित निम्न-मध्यमवर्गीय समाज की मानसिकता और बाल-श्रम के यथार्थ को दर्शाने वाली एक अत्यंत मार्मिक कहानी है। नेपाल से अपनी माँ की मार के डर से भागा बालक दिलबहादुर लेखक के घर घरेलू नौकर बनता है। वह अत्यंत हँसमुख, मेहनती, ईमानदार और सेवाभावी है। उसके आने से घर में सभी को बहुत आराम मिलता है। आरंभ में निर्मला और परिवार उससे स्नेह करते हैं, किंतु धीरे-धीरे अहंकारवश किशोर और निर्मला उस पर अत्याचार करने लगते हैं। एक दिन रिश्तेदार द्वारा ₹11 की चोरी का झूठा आरोप लगाने पर लेखक भी उसे तमाचा मार देते हैं। इस अपमान, अविश्वास और निरंतर प्रताड़ना से दुखी होकर एक दिन बहादुर बिना अपनी तनख्वाह, कपड़े और जूते लिए चुपचाप घर छोड़कर चला जाता है। उसके जाने के बाद पूरा परिवार अपनी गलती और क्रूरता पर पश्चाताप के आँसू बहाता है।
उत्तर: बहादुर कहानी का केंद्रीय और अत्यंत संवेदनशील पात्र है:
- परिश्रमी और हँसमुख: वह सुबह से रात तक बिना थके घर के सारे काम करता और डाँट खाकर भी खिलखिलाकर हँस देता था।
- अगाध ईमानदारी व भोलापन: घर में पड़े पैसे उठाकर मालकिन को देना और अंत में अपना हक (वेतन) भी छोड़कर जाना उसकी निष्कलंक ईमानदारी सिद्ध करता है।
- सच्चा स्वाभिमानी: वह काम की डाँट सह लेता था, किंतु पिता पर दी गई गाली, झूठा कलंक और मालिक का अविश्वास उसका स्वाभिमानी हृदय बर्दाश्त नहीं कर सका।
- मातृ-प्रेम व भावुकता: माँ की मार खाकर भागने के बावजूद वह माँ के लिए पैसे भेजने की बात करता था और रात को अकेले में पहाड़ के विरह गीत गाता था।
उत्तर: कहानी मध्यवर्ग के खोखले अभिमान, दिखावे और संवेदनहीनता की कलई खोलती है। मध्यवर्ग अपनी झूठी प्रतिष्ठा और आराम के लिए गरीब बच्चों को नौकर तो रख लेता है, किंतु उन्हें कभी परिवार का सदस्य नहीं समझ पाता। आरंभ में मीठी बातें करने वाले लोग धीरे-धीरे शोषक बन जाते हैं। छोटी-छोटी गलतियों पर अमानवीय हिंसा करना, नौकरों को 'चोर' और 'नीच' समझना तथा अपने झूठे अहंकार की बलि उन पर चढ़ाना मध्यवर्ग की घिनौनी मानसिकता है। बहादुर का निष्काम त्याग अंततः इस वर्ग को नैतिक रूप से पराजित और लज्जित कर देता है।
उत्तर: कहानी का शीर्षक 'बहादुर' सर्वथा सटीक, सार्थक और प्रतीकात्मक है। कहानी की संपूर्ण घटनाएँ, संवेदना और द्वंद्व बहादुर के इर्द-गिर्द घूमते हैं। वह केवल नाम से ही 'बहादुर' नहीं है, बल्कि अपने आचरण, सहनशीलता, कठिन परिस्थितियों से जूझने की शक्ति और अपने स्वाभिमान की रक्षा करने में भी सच्चा 'बहादुर' सिद्ध होता है। वह शोषक परिवार के सामने गिड़गिड़ाने या चोरी करने के बजाय अपना सब कुछ छोड़कर चुपचाप निकल जाता है और एक मूक नैतिक विजय प्राप्त करता है। अतः यह शीर्षक कहानी की आत्मा को पूर्णतः अभिव्यक्त करता है।
उत्तर:
- प्रसंग: प्रस्तुत गद्यांश कथाकार अमरकांत द्वारा रचित प्रसिद्ध यथार्थवादी कहानी 'बहादुर' के उपसंहार से उद्धृत है।
- व्याख्या: बहादुर के बिना कुछ लिए घर छोड़कर चले जाने के बाद परिवार में छाए सन्नाटे और अपराध-बोध का यह अत्यंत मार्मिक क्षण है। निर्मला पश्चाताप में आँसू बहा रही है और लेखक को अपनी संवेदनहीनता पर गहरा क्षोभ हो रहा है। लेखक के मन में जो 'लघुता' (अपराध-बोध और छोटापन) जागती है, वह उनके झूठे मध्यमवर्गीय अहंकार का टूटना है। जब लेखक आँगन में बहादुर द्वारा छोड़ी गई मासूम चीजों—ताश, कंचे, पत्थर और कागज की नावें—को देखते हैं, तो उन्हें अहसास होता है कि उन्होंने एक निष्पाप, निश्छल बालक की आत्मा को कितनी गहरी चोट पहुँचाई थी। यह पश्चाताप समाज की सोई हुई मानवीय चेतना का विदारक जागरण है।
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