बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिन्दी | पाठ 6: "जनतंत्र का जन्म" — राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर
सम्पूर्ण 50 महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
उत्तर: राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर।
उत्तर: 23 सितंबर 1908 ई० में।
उत्तर: सिमरिया, बेगूसराय (बिहार) में।
उत्तर: 24 अप्रैल 1974 ई० में।
उत्तर: माता का नाम मनरूप देवी और पिता का नाम रवि सिंह था।
उत्तर: मोकामा घाट रेलवे हाई स्कूल से।
उत्तर: पटना कॉलेज से इतिहास विषय में।
उत्तर: भागलपुर विश्वविद्यालय के।
उत्तर: साहित्य अकादमी पुरस्कार।
उत्तर: ज्ञानपीठ पुरस्कार।
उत्तर: 'पद्मविभूषण' से।
उत्तर: राज्य सभा के।
उत्तर: 'प्रणभंग', 'रेणुका', 'हुंकार', 'रसवंती', 'कुरुक्षेत्र', 'रश्मिरथी', 'नीलकुसुम', 'उर्वशी', 'परशुराम की प्रतीक्षा' और 'हरे को हरिनाम'।
उत्तर: 'मिट्टी की ओर', 'अर्धनारीश्वर', 'संस्कृति के चार अध्याय', 'काव्य की भूमिका', 'वट पीपल' और 'शुद्ध कविता की खोज'।
उत्तर: उत्तर छायावाद और राष्ट्रीय भावधारा के।
उत्तर: सुगबुगा उठी।
उत्तर: सोने का ताज।
उत्तर: रथ के पहियों की गड़गड़ाहट की गंभीर ध्वनि।
उत्तर: अत्याचारी शासकों/सामंतों को, क्योंकि जनता आ रही है।
उत्तर: मिट्टी की।
उत्तर: जाड़े-पाले और घोर कष्टों की।
उत्तर: जिसे जब चाहो तब उतारकर दोने में सजा लो (अहसास-विहीन फूल)।
उत्तर: चार खिलौनों में।
उत्तर: भूकम्प (भूडोल) और बवंडर उठते हैं।
उत्तर: महलों (राजप्रासादों) की।
उत्तर: राजाओं का ताज।
उत्तर: भारत में।
उत्तर: तैंतीस कोटि (33 करोड़) जनता के।
उत्तर: सड़कों पर गिट्टी तोड़ते हुए तथा खेतों-खलिहानों में पसीना बहाते हुए।
उत्तर: फावड़े और हल।
उत्तर: इसका आशय है कि सदियों से पराधीन, शोषित और शांत पड़ी भारतीय जनता में स्वतंत्रता और अपने अधिकारों के प्रति नई चेतना और क्रांति की ज्वाला भड़क उठी है।
उत्तर: सदियों से जनता ने बिना कोई विरोध किए हर प्रकार का अत्याचार, भूख, जाड़ा और शोषण मूक रहकर सहन किया है; वह मिट्टी की प्रतिमा की भाँति निष्कपट और सहनशील रही है।
उत्तर: शासक वर्ग का मानना था कि जनता अबोध है और उसे थोड़े-बहुत झूठे वादों, प्रलोभनों या चार खिलौनों (राहत योजनाओं) से आसानी से फुसलाकर शांत रखा जा सकता है।
उत्तर: जनता के क्रोधित होने पर भूडोल और बवंडर आ जाते हैं, राजमहलों की नींवें हिल जाती हैं, राजाओं के मुकुट उड़ जाते हैं और समय की धारा भी जनता की इच्छानुसार मुड़ जाती है।
उत्तर: राजतंत्र की समाप्ति के साथ अब किसी एक राजा का राजतिलक नहीं होगा, बल्कि लोकतंत्र में देश की संप्रभुता और शासन की बागडोर पूरी 33 करोड़ जनता के हाथों में सौंपी जाएगी।
उत्तर: कवि ने वास्तविक देवता देश के मेहनतकश मजदूरों और अन्नदाता किसानों को माना है, जो मंदिरों या तहखानों में नहीं, बल्कि सड़कों पर गिट्टी तोड़ते और खेतों-खलिहानों में धूप-पसीने में काम करते मिलेंगे।
उत्तर: राजतंत्र में राजदंड (सिक्का/दंड) सत्ता का प्रतीक था, किंतु जनतंत्र में किसानों का हल और मजदूरों का फावड़ा ही वास्तविक सत्ता और राष्ट्र-निर्माण का प्रतीक बनेगा।
उत्तर: दिनकर जी जितने श्रेष्ठ कवि थे, उतने ही प्रखर गद्यकार भी थे। 'संस्कृति के चार अध्याय' और 'अर्धनारीश्वर' जैसी कृतियों में उनका गंभीर वैचारिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन प्रकट हुआ है।
उत्तर: उनकी भाषा में ओज, पौरुष, स्पष्टता और राष्ट्रीय भावधारा का प्रवाह है। वे सीधे जन-संवेदना को छूते हैं और भाषा में कुछ भी छिपाते नहीं, बल्कि सब कुछ बेबाक उजागर कर देते हैं।
उत्तर: यह कविता सदियों की गुलामी के बाद स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का शंखनाद करती है और जनता को देश का वास्तविक स्वामी घोषित करती है।
उत्तर: 'धूसरता' (धूल-मिट्टी में सने किसान-मजदूर) अब उपेक्षित नहीं रहेंगे; जनतंत्र में उनकी मेहनत और धूल-धूसरित स्वरूप को स्वर्ण-मुकुट जैसा सर्वोच्च सम्मान मिलेगा।
उत्तर: यह जनता के संगठित प्रतिरोध, क्रांति और शोषक सामंती व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकने के सामूहिक आक्रोश का प्रतीक है।
उत्तर: स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की कुल अनुमानित जनसंख्या लगभग 33 करोड़ थी, और कवि उन सभी देशवासियों को जनतंत्र का वास्तविक शासक घोषित करता है।
उत्तर: दिनकर जी ने अपनी ओजस्वी रचनाओं से स्वतंत्रता आंदोलन में जन-जागरण फूँका और देश की राष्ट्रीय, सांस्कृतिक व जनवादी चेतना को सशक्त स्वर दिया।
उत्तर: यह जनता के अजय संकल्प और प्रकाशमयी सपनों के प्रभाव को दर्शाती है, जिससे आकाश की खिड़कियाँ भी प्रकाशित और दहकती हुई प्रतीत होती हैं।
उत्तर: प्रस्तुत कविता राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित स्वाधीन भारत में जनतंत्र के उदय का ओजस्वी जयघोष है। कवि सदियों से शोषित, मूक और पराधीन जनता के जागरण का शंखनाद करते हैं। जो जनता अब तक मिट्टी की अबोध मूर्ति बनी हर कष्ट सहती थी, आज वही सिंहासन पर बैठने के लिए हुंकार भर रही है। जनता के क्रोध के आगे समय की गति और राजमहलों की सत्ता भी नतमस्तक हो जाती है। कवि घोषणा करते हैं कि अब राजतिलक किसी सामंत या राजा का नहीं, बल्कि देश की तैंतीस करोड़ जनता का होगा। वास्तविक देवता महलों में नहीं, बल्कि खेतों और सड़कों पर पसीना बहाने वाले मजदूर और किसान हैं। हल और फावड़ा ही जनतंत्र का वास्तविक राजदंड बनेगा।
उत्तर: कविता में जनता के दो परस्पर विरोधी लेकिन यथार्थवादी स्वरूप प्रस्तुत किए गए हैं:
- सहनशीलता और मूक रूप: जनता सदियों से जाड़े-पाले और भयंकर शोषण को चुपचाप सहती आई है। उसे दूधमुँही बच्ची या खिलौना समझा गया, जिसे बहलाया जा सके।
- विराट और क्रांतिकारी रूप: जब वही जनता जागती है, तो उसके भीतर भूडोल और बवंडर की शक्ति आ जाती है। उसकी साँसों के वेग से मुकुट उड़ जाते हैं और काल का मार्ग भी मुड़ जाता है।
उत्तर: इस कथन के द्वारा दिनकर जी ने धर्म और सत्ता की पारंपरिक रूढ़िवादिता पर सीधा प्रहार किया है। वे स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर पत्थरों की मूर्तियों, बंद मंदिरों या राजाओं के विलासी राजप्रासादों में कैद नहीं हैं। राष्ट्र का वास्तविक निर्माण करने वाले, धूप और वर्षा में कठोर श्रम करने वाले मजदूर और किसान ही सच्चे ईश्वर (देवता) हैं। श्रम की महत्ता को ईश्वरत्व का दर्जा देकर कवि ने सर्वहारा और श्रमजीवी वर्ग को समाज के सर्वोच्च आसन पर प्रतिष्ठित किया है।
उत्तर: शीर्षक 'जनतंत्र का जन्म' पूर्णतः सटीक, ओजपूर्ण और विषयवस्तु के अनुकूल है। 'जनतंत्र' का अर्थ है जनता का शासन और 'जन्म' का अर्थ है एक नवीन युग का प्रादुर्भाव। यह कविता भारत में सामंती व औपनिवेशिक दासता के अंत और जनता के हाथों में वास्तविक लोकतांत्रिक सत्ता के हस्तांतरण का जीवंत दस्तावेज है। कविता का प्रत्येक पद जनता की शक्ति, उसके अधिकार और लोकतंत्र के नए शिलान्यास को समर्पित है। अतः यह शीर्षक कविता की आत्मा को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करता है।
उत्तर:
- प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता 'जनतंत्र का जन्म' से उद्धृत हैं।
- व्याख्या: कवि अज्ञानी मानव को चेतावनी देते हुए कहते हैं कि तू पूजा की थाल और आरती लेकर मंदिरों, महलों या तहखानों में किसे ढूँढ़ रहा है? सच्चे देवता तो वे मेहनतकश मजदूर और किसान हैं जो चिलचिलाती धूप में सड़कों पर पत्थर तोड़ रहे हैं और खेतों-खलिहानों में अन्न उगा रहे हैं। लोकतंत्र के आगमन के साथ अब शोषण समाप्त होगा; किसानों का हल और मजदूरों का फावड़ा ही इस नए राष्ट्र का राजदंड (सत्ता का प्रतीक) बनेगा। धूल-मिट्टी से सने श्रमजीवी वर्ग का मान-सम्मान स्वर्ण-मुकुट से भी अधिक होगा। अतः हे पुरानी शोषक सत्ता के स्वामियों! समय के बदलते रथ की गड़गड़ाहट सुनो, मार्ग छोड़ो और सिंहासन खाली करो, क्योंकि अब अपने देश पर राज करने जनता आ रही है।
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