बिहार बोर्ड (BSEB) कक्षा 10वीं हिंदी (वर्णिका भाग-2)
अध्याय 5 : धरती कब तक घूमेगी | लेखक : साँवर दइया
संपूर्ण 50 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर (वस्तुनिष्ठ, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय)
उत्तर: साँवर दइया।
उत्तर: राजस्थानी भाषा के।
उत्तर: स्वयं कहानीकार (साँवर दइया) ने।
उत्तर: सीता।
उत्तर: तीन बेटे (कैलास, नारायण और बिज्जू)।
उत्तर: कैलास।
उत्तर: नारायण।
उत्तर: बिज्जू।
उत्तर: राधा।
उत्तर: भँवरी।
उत्तर: पुष्पा।
उत्तर: अपना काला ‘ओढ़ना’ देखकर।
उत्तर: दाल का हलुआ।
उत्तर: कटोरी में रसमलाई।
उत्तर: बिज्जू की पत्नी पुष्पा ने।
उत्तर: ‘माई-माई रोटी दे’ वाला खेल।
उत्तर: तीनों बेटे बारी-बारी से एक-एक महीने माँ को अपने पास रखेंगे।
उत्तर: पचास-पचास (₹50-₹50) रुपये।
उत्तर: डेढ़ सौ (₹150) रुपये।
उत्तर: अपने दो-चार कपड़ों (पूर-पल्लों) की गठरी बाँधी और अंधेरे-अंधेरे ही घर से निकल गई।
उत्तर: भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद बेटों और बहुओं में अपनत्व नहीं था। उसे दो वक्त की रोटी के लिए उपेक्षा और तिरस्कार सहना पड़ता था, जिससे उसका दम घुटता था।
उत्तर: जब उसके पति जीवित थे, तब घर में सुख, शांति और अपनापन था। बच्चों की किलकारियाँ संगीत जैसी लगती थीं और उसे रोटी के लिए किसी के सामने मोहताज नहीं होना पड़ता था।
उत्तर: कैलास ने कहा कि माँ को अकेले रखने का ठेका सिर्फ उसी ने नहीं लिया है, सबने घर से हिस्सा लिया है इसलिए सबका बराबर फर्ज बनता है।
उत्तर: यह निर्णय लिया गया कि तीनों बेटे माँ को बारी-बारी से एक-एक महीना अपने साथ रखेंगे और भोजन कराएंगे।
उत्तर: सीता मूक और स्तब्ध (अर्द्धविक्षिप्त-सी) खड़ी रही। किसी ने भी उसकी इच्छा जानने की कोशिश नहीं की और उसे लगा कि वह बेटों के बीच एक बोझ बन गई है।
उत्तर: राधा ने दाल का हलुआ बनाया था। दाल भुनती देखकर सीता को ऐसा लगा मानो वह स्वयं तवे पर भुनी जा रही हो।
उत्तर: खेल में जब भिखारिन रोटी माँगती है तो कहा जाता है 'यह घर छोड़, दूसरे घर जा'। सीता को भी महीना पूरा होते ही अगला घर पकड़ने का आदेश मिलता था।
उत्तर: भँवरी ने बेटे के जन्मदिन पर सीता को रसमलाई भेजी, तो पुष्पा ने ताना मारा कि जब सीता उनके हिस्से में थी तब रूखी रोटी खिलाई और अब रईसी दिखाई जा रही है।
उत्तर: राधा के बीमार होने पर सीता ने उसके बच्चों के लिए रोटियाँ बनाईं। इस पर भँवरी ने जहरबुझे बोल बोले कि "रोटी तो मेरे यहाँ खाती हैं और गुलामी तुम्हारी करती हैं"।
उत्तर: लड़ाई बहुओं की होती थी लेकिन ताने सीता को दिए जाते थे। वह रोती और सोचती कि मौत भी उसके हाथ में नहीं है, जितनी साँसें लिखी हैं भुगतनी ही पड़ेंगी।
उत्तर: इसका अर्थ है कि इस विशाल संसार और भरे-पूरे परिवार में भी एक बूढ़ी माँ के लिए सिर छिपाने और शांति से रहने भर की जगह नहीं बची थी।
उत्तर: कैलास ने कहा कि माँ का हर महीने इधर-उधर लुढ़कना अच्छा नहीं लगता, इसलिए तीनों बेटे ₹50-₹50 दे दें ताकि वह अपनी रोटी खुद बनाकर खा सके।
उत्तर: नारायण ने कहा "जैसी आपकी मर्जी, मुझे मंजूर है" और बिज्जू ने भी समर्थन करते हुए कहा कि इधर-उधर लुढ़कने से अच्छा है कि माँ अपनी जगह पड़ी रहेगी।
उत्तर: सीता की आँखों के आगे अँधेरा छा गया, दिल रो पड़ा और आँखों में आँसुओं का समंदर भर गया।
उत्तर: सीता ने सोचा कि जब यहाँ भी मेहनत और मजदूरी करके ही खाना है, तो वह बाहर किसी दूसरे के घर बर्तन-भांडे मांजकर मजदूरी कर लेगी और स्वाभिमान से जिएगी।
उत्तर: उसने अपने दो-चार पुराने कपड़ों (पूर-पल्लों) की एक छोटी-सी गठरी बाँधी और निकल पड़ी।
उत्तर: उसकी आँखों से अँधेरा और मन की घुटन समाप्त हो गई थी। उसे खुला आकाश और चौड़ा रास्ता अपनी बाँहें फैलाए नजर आ रहा था।
उत्तर: रोटी केवल भूख का नहीं, बल्कि परिवार में बिखरते मानवीय रिश्तों, संवेदनहीनता और स्वार्थपरकता का प्रतीक बन गई है।
उत्तर: सीता सहनशील, ममतामयी, स्वाभिमानी, धैर्यवान और आत्मसम्मान से जीने वाली भारतीय माँ है।
उत्तर: जिस प्रकार धरती निरंतर बिना रुके घूमती है, उसी प्रकार सीता की जिंदगी भी तीनों बेटों के घरों के बीच चक्रव्यूह की तरह घूम रही थी। अतः यह शीर्षक अत्यंत सटीक है।
उत्तर: यह कहानी एक असहाय और स्वाभिमानी वृद्ध माँ 'सीता' की व्यथा पर केंद्रित है। पति की मृत्यु के बाद उसके तीन बेटे (कैलास, नारायण, बिज्जू) उसे बोझ समझने लगते हैं। पहले वे माँ को एक-एक महीने बारी-बारी से रखने का फैसला करते हैं, जहाँ उसे बहुओं के ताने और अपमान सहना पड़ता है। अंत में, बेटे उसे ₹50-₹50 प्रति माह देकर खुद पकाकर खाने का फरमान सुनाते हैं। इस अपमान से आहत होकर सीता अपने आत्मसम्मान की रक्षा हेतु घर छोड़कर निकल जाती है।
- कैलास (बड़ा बेटा): अधिकार जताने वाला, क्रोधी और संवेदनहीन है। माँ को बोझ समझकर वही दोनों बार बटवारे और पैसों की योजना बनाता है।
- नारायण (मंझला बेटा): वह बड़े भाई की हाँ में हाँ मिलाने वाला और जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति रखने वाला व्यक्ति है।
- बिज्जू (छोटा बेटा): वह प्रायः शांत और मूक दर्शक बना रहता है, लेकिन माँ को लेकर उसकी सोच भी स्वार्थ और कठोरता से भरी है।
उत्तर: तीनों बहुएँ ईर्ष्यालु और कलहप्रिय हैं। वे आपस में एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए लड़ती हैं और इन झगड़ों का शिकार बूढ़ी सास सीता बनती है। रसमलाई या रोटी बनाने जैसी छोटी-छोटी बातों पर वे कटु वचन और ताने बाण चलाकर सीता के आत्मसम्मान को आहत करती हैं।
उत्तर: सीता जिस घर की मालकिन थी, वहीं वह बेगानी हो गई। बच्चों का 'माई-माई रोटी दे' खेल उसकी असल जिंदगी बन गया था। महीना समाप्त होते ही उसे दूसरे बेटे के यहाँ जाना पड़ता था। बेटों के लिए वह प्रेम की पात्र न होकर केवल रोटी की एक बाध्यता बन चुकी थी।
उत्तर: जब बेटों ने सीता को ₹50-₹50 देकर स्वयं चूल्हा चौका करने को कहा, तो सीता को लगा कि यह उसकी ममता और मातृत्व की मजदूरी तय की गई है। उसने सोचा कि जब मेहनत करके ही खाना है, तो बेटों के अहसान और तानों के साए में क्यों जिया जाए। उसने घर छोड़कर भारतीय नारी के स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की।
उत्तर: परिवार में रोटी या धन की कोई वास्तविक कमी नहीं थी। मुख्य समस्या संकीर्ण मानसिकता, स्वार्थ और संस्कारों का अभाव था। तीनों बेटे अपनी माँ को प्रेम और सम्मान से दो निवाले नहीं खिला सके, बल्कि उन्होंने मातृत्व को नफा-नुकसान के तराजू पर तौल दिया।
उत्तर: यह कहानी दर्शाती है कि आधुनिक युग में संयुक्त परिवार किस प्रकार टूट रहे हैं। भौतिकता की अंधी दौड़ में बुजुर्गों को अप्रासंगिक मानकर किनारे कर दिया जाता है। पारिवारिक मूल्यों का ह्रास और संवेदनाहीनता इस कहानी का सबसे मर्मस्पर्शी पक्ष है।
उत्तर: प्रारंभ में जब सीता धरती खुरचती और आकाश की ओर देखती, तो उसे अपनी छाती जैसी ही घुटन दोनों के बीच महसूस होती थी। उसे लगता था कि धरती और आकाश दोनों सिमट गए हैं। परंतु जब वह घर छोड़ती है, तो वही आकाश उसे अनंत और धरती बहुत चौड़ी प्रतीत होती है।
उत्तर: कहानी का अंत यह कड़ा संदेश देता है कि स्वाभिमान और आत्मसम्मान किसी भी रोटी या छत से बढ़कर है। साथ ही यह समाज को सचेत करती है कि यदि संतानों ने अपने बुजुर्ग माता-पिता की उपेक्षा की, तो माँ भी अपने अस्तित्व के लिए विद्रोह कर सकती है।
उत्तर: साँवर दइया ने राजस्थानी परिवेश और ठेठ पारिवारिक संवादों का सजीव चित्रण किया है। उनकी भाषा अत्यंत सरल, मर्मस्पर्शी और प्रतीकात्मक है। वे पात्रों के आंतरिक मनोविज्ञान और सामाजिक विसंगतियों को सीधे हृदय तक पहुँचाने में सफल रहे हैं।
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