Chapter 5. धरती कब तक घूमेगी
कक्षा 10वीं हिंदी (वर्णिका भाग-2) | सम्पूर्ण पाठ्य सारांश एवं महत्वपूर्ण नोट्स
पाठ परिचय (Overview)
- पाठ का नाम: धरती कब तक घूमेगी
- विधा: समकालीन राजस्थानी कहानी
- मुख्य पात्र: सीता (वृद्ध माँ), तीन बेटे (कैलाश, नारायण, बिज्जू), तीन बहुएँ (राधा, भँवरी, पुष्पा)
- केंद्रीय विषय: आधुनिक समाज में संयुक्त परिवारों का विघटन, वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा, स्वार्थ और रोटी के नाम पर बँटवारे की मार्मिक त्रासदी।
लेखक परिचय (Lekhak Parichay)
- लेखक: साँवर दइया
- भाषा: राजस्थानी भाषा के प्रमुख कहानीकार
- स्रोत/संकलन: यह कहानी 'समकालीन भारतीय साहित्य' (अप्रैल-जून 1983 ई०) से साभार संकलित है।
- अनुवाद: इस कहानी का राजस्थानी से हिंदी में अनुवाद स्वयं लेखक (साँवर दइया) ने किया है।
कहानी का सारांश (Summary)
१. सीता की मानसिक दशा
सीता एक वृद्ध और विधवा स्त्री है जिसके तीन बेटे, बहुएँ और पोते-पोतियाँ हैं। भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद वह घर में घुटन, उपेक्षा और बेगानापन महसूस करती है।
२. रोटी और माँ का बँटवारा
पति की मृत्यु के बाद बड़े बेटे कैलाश ने भाइयों (नारायण और बिज्जू) से बात कर तय किया कि माँ बारी-बारी से एक-एक महीना प्रत्येक बेटे के पास खाएगी। महीना पूरा होते ही सीता का ठिकाना बदल जाता था।
३. अपमान और कलह
सीता को लगता है कि उसकी स्थिति बच्चों के खेल 'माई-माई रोटी दे' की भिखारिन जैसी हो गई है। बहुओं के बीच आए दिन तानेबाजी और रसमलाई व भोजन को लेकर होने वाले झगड़ों में सीता को घसीटा जाता था।
४. माहवारी भत्ते का फैसला
पाँच वर्ष तक यह क्रम चलने के बाद, बड़े बेटे कैलाश ने नया प्रस्ताव रखा कि माँ इधर-उधर न भटके, बल्कि तीनों बेटे उसे प्रतिमाह 50-50 रुपये देंगे। सीता 150 रुपये में अपना खाना खुद बनाएगी।
५. घर त्याग और स्वतंत्रता
बेटों के इस फैसले ने सीता के आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुँचाई। उसने सोचा कि जब मेहनत और मजदूरी ही करनी है, तो कहीं भी बर्तन माँजकर पेट भरा जा सकता है। उसने अपनी छोटी सी गठरी बाँधी और सुबह अँधेरे में ही घर छोड़कर निकल पड़ी। घर से निकलते ही उसे लगा कि आकाश अनंत है और चारों ओर खुली हवा है।
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