पाठ 5: भारतमाता
बिहार बोर्ड (BSEB) कक्षा 10वीं हिंदी (गोधूलि भाग-2) | सम्पूर्ण नोट्स
1. पाठ का संक्षिप्त परिचय (Overview)
- कविता: भारतमाता
- कवि: सुमित्रानंदन पंत (प्रकृति के सुकुमार कवि एवं छायावाद के प्रमुख स्तंभ)
- काव्य संकलन: 'ग्राम्या'
- मूल भाव: परतंत्र (गुलाम) भारत की वास्तविक, दीन-हीन और कारुणिक दशा का यथार्थवादी चित्रण। कवि अतीत के काल्पनिक गौरव गान के बजाय तत्कालीन भारत के गाँवों में बसने वाली, शोषित, मूक और पीड़ित जनता के रूप में 'भारतमाता' का यथार्थ स्वरूप प्रस्तुत करते हैं।
2. कवि परिचय (सुमित्रानंदन पंत)
- जन्म: सन् 1900 ई० में अल्मोड़ा जिले के रमणीय स्थल कौसानी (उत्तरांचल/उत्तराखंड) में।
- माता-पिता: जन्म के छह घंटे बाद ही माता सरस्वती देवी का देहांत हो गया। पिता गंगादत्त पंत कौसानी टी एस्टेट में अकाउंटेंट थे।
- शिक्षा: प्रारंभिक शिक्षा गाँव में, तत्पश्चात बनारस से हाईस्कूल की शिक्षा पाई। वे कुछ समय तक कालाकांकर राज्य में रहे और बाद में आजीवन इलाहाबाद में रहे।
- निधन: 29 दिसंबर 1977 ई० को।
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साहित्यिक प्रवृत्ति व विचार:
- पंत जी मूलतः छायावादी कवि हैं, परंतु उनके विचार उदार मानवतावादी थे।
- वे प्रारंभ में प्रकृति-सौंदर्य और फिर मानव-सौंदर्य से अभिभूत हुए। आगे चलकर समाजवाद और श्री अरविंद दर्शन की ओर प्रवृत्त हुए।
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प्रमुख काव्य-कृतियाँ:
- 'उच्छ्वास', 'पल्लव', 'वीणा', 'ग्रंथि', 'गुंजन', 'युगांत', 'युगवाणी', 'ग्राम्या', 'स्वर्णधूलि', 'स्वर्णकिरण', 'युगपथ', 'चिदंबरा'।
- अंतिम काव्य: 'लोकायतन' (जो उनके परिपक्व चिंतन को समेटे हुए है)।
- अन्य विधाएँ: नाटक, आलोचना, कहानी और उपन्यास।
- पुरस्कार एवं सम्मान: 'चिदंबरा' पर 'भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार' प्राप्त हुआ।
3. कविता का भावार्थ (पदवार व्याख्या)
पद 1
"भारतमाता ग्रामवासिनी
खेतों में फैला है श्यामल
धूल-भरा मैला-सा आँचल
गंगा-यमुना में आँसू-जल
मिट्टी की प्रतिमा
उदासिनी !"
खेतों में फैला है श्यामल
धूल-भरा मैला-सा आँचल
गंगा-यमुना में आँसू-जल
मिट्टी की प्रतिमा
उदासिनी !"
भावार्थ: भारतमाता का वास्तविक निवास महलों में नहीं, बल्कि गाँवों में है। खेतों में फैली हरियाली के बीच धूल-धूसरित वातावरण ही भारतमाता का मैला आँचल है। गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों का बहता जल मानो भारतमाता के दुखों के आँसू हैं। परतंत्रता के कारण वह मिट्टी की एक उदास और बेबस प्रतिमा बनकर रह गई है।
पद 2
"दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,
अधरों में चिर नीरव रोदन,
युग-युग के तम से विषण्ण मन
वह अपने घर में
प्रवासिनी !"
अधरों में चिर नीरव रोदन,
युग-युग के तम से विषण्ण मन
वह अपने घर में
प्रवासिनी !"
भावार्थ: भारतमाता की दृष्टि दीनता और लाचारी के कारण झुकी हुई (नत) और अपलक है। उसके होठों पर सदियों से एक शांत (नीरव) और मूक रुदन छाया हुआ है। युगों-युगों की गुलामी के अंधकार से उसका मन अत्यंत खिन्न और दुखी है। वह अपने ही देश (घर) में एक परदेसी (प्रवासिनी) की तरह बेगाना जीवन जीने को विवश है।
पद 3
"तीस कोटि सन्तान नग्न तन,
अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्रजन,
मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,
नत मस्तक
तरु-तल निवासिनी !"
अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्रजन,
मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,
नत मस्तक
तरु-तल निवासिनी !"
भावार्थ: परतंत्रता के उस दौर में भारतमाता की तीस करोड़ संतानों के पास तन ढँकने को वस्त्र नहीं हैं। वे आधे भूखे (अर्ध-क्षुधित), शोषित, निहत्थे, मूर्ख, असभ्य, अशिक्षित और अत्यंत दरिद्र हैं। वे सिर झुकाए पेड़ों के नीचे (तरु-तल) खुले आकाश में जीवन यापन करने को मजबूर हैं।
पद 4
"स्वर्ण शस्य पर-पद-तल लुंठित,
धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित,
क्रन्दन कम्पित अधर मौन स्मित,
राहु ग्रसित
शरदेन्दु हासिनी !"
धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित,
क्रन्दन कम्पित अधर मौन स्मित,
राहु ग्रसित
शरदेन्दु हासिनी !"
भावार्थ: भारत की सोने जैसी उपजाऊ फसलें (स्वर्ण शस्य) विदेशी आक्रांताओं और शोषकों के पैरों तले रौंदी जा रही हैं। धरती के समान अपार धैर्य (सहिष्णुता) रखने वाली भारतमाता का मन आज कुंठित और बेबस है। उसके कांपते होंठों पर रुदन है और मुस्कान गायब है। शरद पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह खिलखिलाने वाली भारतमाता आज गुलामी रूपी राहु द्वारा ग्रसित दिखाई पड़ती है।
पद 5
"चिंतित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित,
नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित,
आनन श्री छाया-शशि उपमित,
ज्ञान मूढ़
गीता प्रकाशिनी !"
नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित,
आनन श्री छाया-शशि उपमित,
ज्ञान मूढ़
गीता प्रकाशिनी !"
भावार्थ: भारतमाता के माथे की भौंहें (भृकुटि) भविष्य की चिंताओं और क्षितिज पर छाए अंधकार से घिरी हैं। उसके झुके हुए नयन बादलों से ढके आकाश के समान अश्रुपूर्ण हैं। उसका मुख-सौंदर्य बादलों से घिरे चंद्रमा (छाया-शशि) की तरह निष्प्रभ हो गया है। जिसने कभी संसार को 'श्रीमद्भगवद्गीता' जैसा महान अमर ज्ञान दिया था, आज उसी भारतमाता की संतानों को अज्ञानी (ज्ञान मूढ़) बनाकर रख दिया गया है।
पद 6
"सफल आज उसका तप संयम,
पिला अहिंसा स्तन्य सुधोपम,
हरती जन-मन-भव, भव-तम-भ्रम,
जग-जननी
जीवन-विकासिनी !"
पिला अहिंसा स्तन्य सुधोपम,
हरती जन-मन-भव, भव-तम-भ्रम,
जग-जननी
जीवन-विकासिनी !"
भावार्थ: कवि आशावादी स्वर में कहते हैं कि आज भारतमाता का वर्षों का तप और संयम सफल होने जा रहा है। वह अपनी संतानों को अहिंसा रूपी अमृतोपम (अमृत तुल्य) दूध पिलाकर उनके मन से भय, सांसारिक अंधकार और भ्रम को दूर कर रही है। संपूर्ण जगत का कल्याण करने वाली यह जग-जननी अब मानवता के नवनिर्माण और नवजीवन का विकास करने में लीन है।
4. पाठ का सारांश (Summary)
'भारतमाता' कविता में छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत ने भारत की पराधीनता और ग्रामीण जीवन की वास्तविक दरिद्रता का मार्मिक चित्रण किया है। कवि बताते हैं कि भारतमाता का सच्चा स्वरूप शहरों में नहीं, बल्कि खेतों और धूल-धूसरित गाँवों में बसता है। तीस करोड़ भूखी, नग्न, शोषित और अशिक्षित संतानों की दुर्दशा देखकर भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी की तरह बेबस है। अंत में कवि गांधीवादी दर्शन (सत्य और अहिंसा) की महत्ता को रेखांकित करते हुए विश्वास प्रकट करते हैं कि भारतमाता अपने अहिंसा रूपी अमृत से अंधकार और भय को मिटाकर पुनः विश्व में जीवन का नव-विकास करेगी।
5. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य (Important One-Liners)
- 'भारतमाता' कविता के रचयिता कौन हैं — सुमित्रानंदन पंत।
- पंत जी का जन्म कब और कहाँ हुआ था — सन् 1900 ई० में कौसानी, अल्मोड़ा (उत्तरांचल) में।
- पंत जी के माता-पिता का नाम क्या था — माता सरस्वती देवी एवं पिता गंगादत्त पंत।
- पंत जी का निधन कब हुआ — 29 दिसंबर 1977 ई० में।
- 'भारतमाता' कविता किस काव्य संग्रह से संकलित है — 'ग्राम्या' से।
- पंत जी को किस रचना पर 'भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार' मिला था — 'चिदंबरा' पर।
- पंत जी का अंतिम काव्य कौन-सा है — 'लोकायतन'।
- प्रकृति के सुकुमार कवि किन्हें कहा जाता है — सुमित्रानंदन पंत को।
- भारतमाता कहाँ निवास करती हैं — गाँवों में (ग्रामवासिनी)।
- भारतमाता का आँचल कैसा है — धूल-भरा और मैला-सा।
- गंगा-यमुना के जल को कवि ने क्या माना है — भारतमाता का आँसू-जल।
- कविता में भारतमाता की कितनी संतानों का उल्लेख है — तीस कोटि (30 करोड़)।
- भारतमाता अपने ही घर में कैसी बनी हुई हैं — प्रवासिनी जैसी।
- भारतमाता की संतानों को कवि ने कैसा बताया है — अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र, मूढ़, असभ्य, अशिक्षित और निर्धन।
- भारतमाता अपने पुत्रों को कैसा दूध (स्तन्य) पिलाती हैं — अहिंसा रूपी अमृत तुल्य (सुधोपम)।
- 'गीता प्रकाशिनी' किसे कहा गया है — भारतमाता को।
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