Class 10 Hindi (गोधूलि भाग-2: काव्य खंड)
अध्याय 8: एक वृक्ष की हत्या (रचयिता: कुँवर नारायण)
I. कविता के साथ (प्रश्न-उत्तर)
प्रश्न 1: कवि को वृक्ष बूढ़ा चौकीदार क्यों लगता था?
उत्तर:
कवि को वृक्ष बूढ़ा चौकीदार इसलिए लगता था क्योंकि वह वृक्ष वर्षों पुराना था और कवि के घर के दरवाजे पर हमेशा एक सतर्क पहरेदार की तरह तैनात रहता था। उसका तना पुराना, खुरदुरा और मैला-कुचैला था, जो पुरानी खाकी वर्दी जैसा दिखता था। सूखी डाल राइफल की तरह लगती थी तथा पत्तों से भरी ऊपरी छतरी पगड़ी जैसी प्रतीत होती थी। धूप, बारिश, गर्मी और सर्दी हर मौसम में वह वृक्ष एक सच्चा एवं वफादार चौकीदार बनकर मुस्तैद रहता था।
कवि को वृक्ष बूढ़ा चौकीदार इसलिए लगता था क्योंकि वह वृक्ष वर्षों पुराना था और कवि के घर के दरवाजे पर हमेशा एक सतर्क पहरेदार की तरह तैनात रहता था। उसका तना पुराना, खुरदुरा और मैला-कुचैला था, जो पुरानी खाकी वर्दी जैसा दिखता था। सूखी डाल राइफल की तरह लगती थी तथा पत्तों से भरी ऊपरी छतरी पगड़ी जैसी प्रतीत होती थी। धूप, बारिश, गर्मी और सर्दी हर मौसम में वह वृक्ष एक सच्चा एवं वफादार चौकीदार बनकर मुस्तैद रहता था।
प्रश्न 2: वृक्ष और कवि में क्या संवाद होता था?
उत्तर:
जब कवि बाहर से घर लौटते थे, तो दूर से ही वह वृक्ष अपनी प्रहरी जैसी उपस्थिति से मानो ललकारता था— "कौन?" तब कवि आत्मीय भाव से जवाब देते थे— "दोस्त!" इसके बाद कवि उसकी ठंडी छाँव में बैठकर कुछ पल विश्राम करते और आत्मीयता का अनुभव करते थे।
जब कवि बाहर से घर लौटते थे, तो दूर से ही वह वृक्ष अपनी प्रहरी जैसी उपस्थिति से मानो ललकारता था— "कौन?" तब कवि आत्मीय भाव से जवाब देते थे— "दोस्त!" इसके बाद कवि उसकी ठंडी छाँव में बैठकर कुछ पल विश्राम करते और आत्मीयता का अनुभव करते थे।
प्रश्न 3: कविता का समापन करते हुए कवि अपने किन अन्देशों का ज़िक्र करता है और क्यों?
उत्तर:
कविता का समापन करते हुए कवि इस बात का अंदेशा (आशंका) व्यक्त करते हैं कि हमारे आस-पास ऐसे अनजाने दुश्मन पनप रहे हैं जो पर्यावरण, सभ्यता और मानवता को नष्ट करने पर तुले हैं। कवि अंदेशा जताते हैं कि घर को लुटेरों से, शहर को नादिरों (अत्याचारियों) से और देश को देश के दुश्मनों से खतरा है। वे चेतावनी देते हैं कि नदियाँ नाला न बन जाएँ, हवा धुआँ न हो जाए, खाना ज़हर न बन जाए, जंगल मरुस्थल न बन जाएँ और मनुष्य स्वयं हिंसक पशु (जंगल) न बन जाए।
कविता का समापन करते हुए कवि इस बात का अंदेशा (आशंका) व्यक्त करते हैं कि हमारे आस-पास ऐसे अनजाने दुश्मन पनप रहे हैं जो पर्यावरण, सभ्यता और मानवता को नष्ट करने पर तुले हैं। कवि अंदेशा जताते हैं कि घर को लुटेरों से, शहर को नादिरों (अत्याचारियों) से और देश को देश के दुश्मनों से खतरा है। वे चेतावनी देते हैं कि नदियाँ नाला न बन जाएँ, हवा धुआँ न हो जाए, खाना ज़हर न बन जाए, जंगल मरुस्थल न बन जाएँ और मनुष्य स्वयं हिंसक पशु (जंगल) न बन जाए।
प्रश्न 4: घर, शहर और देश के बाद कवि किन चीज़ों को बचाने की बात करता है और क्यों?
उत्तर:
घर, शहर और देश को बचाने के बाद कवि निम्नलिखित प्राकृतिक और मानवीय घटकों को बचाने की बात करते हैं:
घर, शहर और देश को बचाने के बाद कवि निम्नलिखित प्राकृतिक और मानवीय घटकों को बचाने की बात करते हैं:
- नदियों को: नाला हो जाने से।
- हवा को: प्रदूषण (धुआँ) हो जाने से।
- खाने को: ज़हरीला (दूषित) हो जाने से।
- जंगल को: मरुस्थल (रेगिस्तान) में तब्दील हो जाने से।
- मनुष्य को: जंगल (संवेदनहीन/हिंसक पशु) हो जाने से।
प्रश्न 5: कविता की प्रासंगिकता पर विचार करते हुए एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
टिप्पणी: 'एक वृक्ष की हत्या' कविता वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक है। आज अंधाधुंध शहरीकरण, औद्योगीकरण और वृक्षों की कटाई के कारण पर्यावरण संतुलन पूरी तरह से बिगड़ चुका है। हवा विषैली हो रही है, नदियाँ प्रदूषित नालों में बदल रही हैं और वैश्विक तापमान (ग्लोबल वॉर्मिंग) बढ़ रहा है। साथ ही, आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में मनुष्य भी अपनी मानवीय संवेदनाएँ खोकर हिंसक और संवेदनहीन होता जा रहा है। यह कविता हमें प्रकृति-रक्षण और मानवीय मूल्यों के संरक्षण के लिए सचेत करती है।
टिप्पणी: 'एक वृक्ष की हत्या' कविता वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक है। आज अंधाधुंध शहरीकरण, औद्योगीकरण और वृक्षों की कटाई के कारण पर्यावरण संतुलन पूरी तरह से बिगड़ चुका है। हवा विषैली हो रही है, नदियाँ प्रदूषित नालों में बदल रही हैं और वैश्विक तापमान (ग्लोबल वॉर्मिंग) बढ़ रहा है। साथ ही, आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में मनुष्य भी अपनी मानवीय संवेदनाएँ खोकर हिंसक और संवेदनहीन होता जा रहा है। यह कविता हमें प्रकृति-रक्षण और मानवीय मूल्यों के संरक्षण के लिए सचेत करती है।
प्रश्न 6: व्याख्या करें –
(क) "दूर से ही ललकारता, 'कौन ?' / मैं जवाब देता, 'दोस्त !'"
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक 'गोधूलि भाग-2' की 'एक वृक्ष की हत्या' शीर्षक कविता से ली गई हैं, जिसके रचयिता आधुनिक कवि कुँवर नारायण हैं।
व्याख्या: इन पंक्तियों में कवि और उनके घर के दरवाजे पर स्थित पुराने वृक्ष के बीच के आत्मीय और जीवंत संबंध को दर्शाया गया है। जब भी कवि बाहर से लौटते थे, तो वह सतर्क वृक्ष किसी प्रहरी की तरह दूर से ही पूछने का अहसास कराता था कि 'कौन आए हो?' और कवि मित्रवत् सहजता से उत्तर देते थे कि 'तुम्हारा दोस्त आया है'।
(ख) "बचाना है – जंगल को मरुस्थल हो जाने से / बचाना है – मनुष्य को जंगल हो जाने से।"
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि कुँवर नारायण द्वारा रचित कविता 'एक वृक्ष की हत्या' से उद्धृत हैं।
व्याख्या: कवि इन पंक्तियों में पर्यावरण संकट और मानवीय मूल्यों के ह्रास की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। वे कहते हैं कि यदि वृक्षों की अंधाधुंध कटाई न रुकी, तो हरे-भरे जंगल रेगिस्तान बन जाएँगे। इसके साथ ही यदि मनुष्य के भीतर दया, प्रेम और संवेदना समाप्त हो गई, तो वह भी जंगल के हिंसक पशु की तरह संवेदनहीन हो जाएगा। अतः प्रकृति और मनुष्यता दोनों को बचाना आवश्यक है।
प्रश्न 7: कविता के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कविता का शीर्षक 'एक वृक्ष की हत्या' अत्यंत सार्थक और विचारोत्तेजक है। कवि ने यहाँ केवल 'वृक्ष का काटा जाना' न लिखकर 'हत्या' शब्द का प्रयोग किया है, जो यह दर्शाता है कि वृक्ष कोई बेजान वस्तु नहीं, बल्कि एक सजीव प्राणी और रक्षक (चौकीदार) था। एक वृक्ष को काटना किसी जीवित व्यक्ति की हत्या करने जैसा ही अपराध और वेदनादायक है। यह शीर्षक सीधे तौर पर पर्यावरण विनाश के प्रति पाठक के मन में तीव्र संवेदना और आक्रोश जगाता है।
कविता का शीर्षक 'एक वृक्ष की हत्या' अत्यंत सार्थक और विचारोत्तेजक है। कवि ने यहाँ केवल 'वृक्ष का काटा जाना' न लिखकर 'हत्या' शब्द का प्रयोग किया है, जो यह दर्शाता है कि वृक्ष कोई बेजान वस्तु नहीं, बल्कि एक सजीव प्राणी और रक्षक (चौकीदार) था। एक वृक्ष को काटना किसी जीवित व्यक्ति की हत्या करने जैसा ही अपराध और वेदनादायक है। यह शीर्षक सीधे तौर पर पर्यावरण विनाश के प्रति पाठक के मन में तीव्र संवेदना और आक्रोश जगाता है।
प्रश्न 8: इस कविता में एक रूपक की रचना हुई है। रूपक क्या है और यहाँ उसका क्या स्वरूप है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
- रूपक का अर्थ: जब उपमेय और उपमान के बीच के भेद को समाप्त करके दोनों को एक मान लिया जाए, तो वहाँ रूपक होता है।
- कविता में स्वरूप: इस कविता में पुराने 'वृक्ष' को एक 'बूढ़े चौकीदार' के रूप में चित्रित किया गया है। उसकी सूखी डाल को 'राइफल', पत्तों/फूलों को 'पगड़ी', खुरदुरी छाल को 'खाकी वर्दी' और तने की दरारों को 'झुर्रियाँ' मानकर वृक्ष का पूर्ण मानवीकरण एवं सांगरूपक (रूपक) रचा गया है।
II. कविता के आस-पास
1. समकालीन कविता की किताबों से पर्यावरण से संबंधित रचनाएँ एकत्र कीजिए। इसमें पुस्तकालय की मदद लीजिए।
उत्तर:
(विद्यार्थी पुस्तकालय से नागार्जुन की 'अकाल और उसके बाद', केदारनाथ सिंह की 'बर्फ़', राजेश जोशी या अन्य समकालीन कवियों की पर्यावरण पर आधारित कविताएँ संकलित कर सकते हैं।)
(विद्यार्थी पुस्तकालय से नागार्जुन की 'अकाल और उसके बाद', केदारनाथ सिंह की 'बर्फ़', राजेश जोशी या अन्य समकालीन कवियों की पर्यावरण पर आधारित कविताएँ संकलित कर सकते हैं।)
2. कुँवर नारायण एक विचारशील कवि हैं। उन्होंने 'आत्मजयी' नाम से एक प्रबंधकाव्य लिखा है। उसकी कथा और विषय-वस्तु के बारे में अपने शिक्षक से जानकारी प्राप्त कीजिए तथा उसे उपलब्ध कर पढ़िए।
उत्तर:
जानकारी: कुँवर नारायण जी द्वारा रचित 'आत्मजयी' कठोपनिषद् के 'नचिकेता' के आख्यान पर आधारित एक प्रसिद्ध प्रबंधकाव्य है। इसमें बालक नचिकेता और उसके पिता वाजश्रवा के बीच का संवाद है। इसकी मुख्य विषय-वस्तु मृत्यु, जीवन के शाश्वत सत्य, आत्म-ज्ञान तथा आधुनिक युग के वैचारिक द्वंद्व और मानवीय संशय की सूक्ष्म अभिव्यक्ति है।
जानकारी: कुँवर नारायण जी द्वारा रचित 'आत्मजयी' कठोपनिषद् के 'नचिकेता' के आख्यान पर आधारित एक प्रसिद्ध प्रबंधकाव्य है। इसमें बालक नचिकेता और उसके पिता वाजश्रवा के बीच का संवाद है। इसकी मुख्य विषय-वस्तु मृत्यु, जीवन के शाश्वत सत्य, आत्म-ज्ञान तथा आधुनिक युग के वैचारिक द्वंद्व और मानवीय संशय की सूक्ष्म अभिव्यक्ति है।
III. भाषा की बात
1. निम्नलिखित अव्ययों का वाक्यों में प्रयोग करें –
- अबकी: अबकी बार परीक्षा में मुझे प्रथम श्रेणी प्राप्त करनी है।
- हमेशा: हमें हमेशा बड़ों का आदर करना चाहिए।
- लेकिन: उसने मेहनत तो बहुत की, लेकिन सफलता न मिल सकी।
- दूर: हमारा घर शहर से काफी दूर है।
- दरअसल: दरअसल बात यह थी कि वह समय पर पहुँच न सका।
- कहीं: रास्ते में कहीं भी पानी की व्यवस्था नहीं थी।
2. कविता से विशेषणों का चुनाव करते हुए उनके लिए स्वतंत्र विशेष्य पद दें –
| विशेषण | विशेष्य पद |
|---|---|
| बूढ़ा | चौकीदार / आदमी |
| पुराना | चमड़ा / वस्त्र |
| सख्त | जान / धातु |
| खुरदुरा | तना / रास्ता |
| सूखी | डाल / लकड़ी |
| ठंडी | छाँव / हवा |
| खाकी | वर्दी |
3. निम्नांकित संज्ञा पदों का प्रकार बताते हुए वाक्य-प्रयोग करें –
| संज्ञा पद | संज्ञा का प्रकार | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|
| घर | जातिवाचक संज्ञा | अपना घर सबको प्यारा लगता है। |
| चौकीदार | जातिवाचक संज्ञा | चौकीदार पूरी रात पहरा देता है। |
| दरवाज़ा | जातिवाचक संज्ञा | शाम होते ही घर का दरवाज़ा बंद कर देना चाहिए। |
| डाल | जातिवाचक संज्ञा | पक्षी पेड़ की डाल पर बैठा है। |
| चमड़ा | द्रव्यवाचक संज्ञा | यह जूता असली चमड़े का बना है। |
| पगड़ी | जातिवाचक संज्ञा | पगड़ी गाँव के बड़े-बुजुर्गों के सम्मान का प्रतीक है। |
| जूता | जातिवाचक संज्ञा | उसका जूता पुराना और फटा हुआ था। |
| बल-बूता | भाववाचक संज्ञा | उसने अपने बल-बूते पर यह सफलता पाई है। |
| बारिश | जातिवाचक/द्रव्यवाचक संज्ञा | तेज बारिश से चारों तरफ पानी भर गया। |
| वर्दी | जातिवाचक संज्ञा | पुलिसकर्मी हमेशा खाकी वर्दी में रहते हैं। |
| दोस्त | जातिवाचक संज्ञा | सच्चा दोस्त संकट में काम आता है। |
| पल | भाववाचक/कालवाचक संज्ञा | समय का हर एक पल कीमती होता है। |
| छाँव | भाववाचक संज्ञा | राहगीर पेड़ की शीतल छाँव में बैठ गया। |
| अन्देशा | भाववाचक संज्ञा | दुर्घटना का अन्देशा होते ही गाड़ी रोक दी गई। |
| नादिरों | जातिवाचक संज्ञा (क्रूर लोग) | समाज को नादिरों के अत्याचार से बचाना होगा। |
| जहर | द्रव्यवाचक संज्ञा | प्रदूषण ने हवा को जहर बना दिया है। |
| मरुस्थल | स्थानवाचक/जातिवाचक संज्ञा | राजस्थान में थार का विशाल मरुस्थल स्थित है। |
| जंगल | समूहवाचक/जातिवाचक संज्ञा | जंगल जंगली जानवरों का प्राकृतिक आवास है। |
4. कविता में प्रयुक्त निम्नांकित पदों के कारक स्पष्ट करें –
| पद / संदर्भ | कारक | विभक्ति / स्पष्टीकरण |
|---|---|---|
| चमड़ा | संबंध कारक | "पुराने चमड़े का बना उसका शरीर" (विभक्ति: का) |
| पाँव | अधिकरण कारक | "पाँवों में फटा-पुराना जूता" (विभक्ति: में) |
| धूप, सर्दी | अधिकरण कारक | "धूप में... सर्दी में" (विभक्ति: में) |
| वर्दी | अधिकरण कारक | "अपनी खाकी वर्दी में" (विभक्ति: में) |
| अन्देशा | अधिकरण कारक | "हमारे अन्देशों में" (विभक्ति: में) |
| शहर | कर्म कारक | "शहर को बचाना है" (विभक्ति: को) |
| नदी | कर्म कारक | "नदियों को नाला हो जाने से" (विभक्ति: को) |
| खाना | कर्म कारक | "खाने को जहर हो जाने से" (विभक्ति: को) |
| मनुष्य | कर्म कारक | "मनुष्य को जंगल हो जाने से" (विभक्ति: को) |
IV. शब्द निधि (शब्दार्थ)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अक्खड़ | विपरीत परिस्थितियों में डटा रहने वाला |
| बल-बूता | शक्ति - सामर्थ्य |
| अन्देशा | आशंका |
| नादिरों | नादिरशाह नामक ऐतिहासिक लुटेरे और आक्रमणकारी की तरह के क्रूर व्यक्ति |
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