बिहार बोर्ड (BSEB) कक्षा 10वीं हिंदी (वर्णिका भाग-2)
अध्याय 4 : नगर | लेखक : सुजाता
संपूर्ण 50 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर (वस्तुनिष्ठ, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय)
उत्तर: सुजाता।
उत्तर: एस० रंगराजन।
उत्तर: 3 मई 1935 ई० को चेन्नई (तमिलनाडु) में।
उत्तर: तमिल भाषा से।
उत्तर: के० ए० जमुना ने।
उत्तर: ‘आधुनिक तमिल कहानियाँ’ (नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया) से।
उत्तर: ‘करैयेल्लान शेणबकप्यू’ और ‘कनावूतु तोलिरशालै’।
उत्तर: पांडिय लोगों की।
उत्तर: प्राचीन मानचित्रों में ‘मथरा’ तथा यूनानियों द्वारा ‘मेदोरा’ कहा गया।
उत्तर: मूनाडिप्पट्टिट गाँव से।
उत्तर: पाप्पाति।
उत्तर: लगभग बारह (12) साल।
उत्तर: एक्यूट केस ऑफ मेनिनजाइटिस (Meningitis)।
उत्तर: सुबह की पहली बस पकड़कर तुरंत शहर के बड़े अस्पताल जाने की।
उत्तर: ‘ऑप्थलमस्कोप’ की सहायता से।
उत्तर: डॉ० धनशेखरन को।
उत्तर: नब्बे (₹90) रुपये।
उत्तर: 48 (अड़तालीस) नंबर वाले कमरे में।
उत्तर: अगली सुबह ठीक साढ़े सात (7:30) बजे।
उत्तर: अपने गाँव के वैद्य जी के पास।
उत्तर: शहर में नलों पर घड़ों की कतारें, बसों का धुआँ, ट्रैफिक पुलिस, मीनाक्षी मंदिर के विशाल गोपुरम और सूखी वैगै नदी का यथार्थ चित्रण किया गया है।
उत्तर: उसे तेज बुखार था। गाँव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर ने मेनिनजाइटिस की गंभीरता को देखते हुए उसे तुरंत बड़े अस्पताल ले जाने की सलाह दी थी।
उत्तर: बारह वर्षीय पाप्पाति स्ट्रेचर पर अचेत पड़ी थी। उसकी नाक में मामूली नगीने चमक रहे थे, माथे पर विभूति का तिलक था और मुँह खुला हुआ था।
उत्तर: बड़े डॉक्टर ने सिर और पलकों की जाँच कर बताया कि यह 'एक्यूट केस ऑफ मेनिनजाइटिस' है और उसे तुरंत एडमिट करने का सख्त आदेश दिया।
उत्तर: अनपढ़ होने के कारण वह अस्पताल की पर्ची, कमरों के नंबर और डॉक्टरों व क्लर्कों के जटिल नियमों के बीच भटकती रही।
उत्तर: उसने बताया कि उसके पति मर चुके हैं और उसे मजदूरी के रूप में रुपये नहीं, बल्कि फसल कटाई के समय धान और बाजरा मिलता है।
उत्तर: वह पढ़ना नहीं जानती थी और अस्पताल की भूलभुलैया व कर्मचारियों की डांट-फटकार के डर से रास्ता भूल गई थी।
उत्तर: बाबू ने कहा कि इस समय अस्पताल में कोई बेड खाली नहीं है, इसलिए वह कल सुबह साढ़े सात बजे आए।
उत्तर: वह लगभग डेढ़ घंटे तक अलग-अलग काउंटरों और कमरों के चक्कर काटती रही, जिससे वह रास्ता भटक गई।
उत्तर: उसने देखा कि कमरा बंद हो चुका था और अंदर स्ट्रेचर पर उसकी बेटी पाप्पाति अकेले आँखें मूँदे बेसुध पड़ी थी।
उत्तर: उसने दरवाजे पर खड़े व्यक्ति से दस मिनट तक मिन्नतें कीं और जब किसी अन्य व्यक्ति ने पैसे दिए, तब दरवाजा खुला और वह अंदर गई।
उत्तर: बड़े डॉक्टर जब वार्ड में पहुँचे, तो उन्हें पता चला कि पाप्पाति को एडमिट ही नहीं किया गया है।
उत्तर: डॉक्टर अत्यधिक क्रोधित हुए और बोले कि "व्हाट नानसेंस! कल सुबह तक वह लड़की मर जाएगी, आई वांट दैट गर्ल एडमिटेड राइट नाउ!"।
उत्तर: क्लर्क ने सफाई दी कि वार्ड में जगह नहीं थी, जबकि बड़े डॉक्टर ने अपने विभाग के रिजर्व बेड पर लड़की को भर्ती करने का आदेश दिया।
उत्तर: अस्पताल के डरावने माहौल, कर्मचारियों की संवेदनहीनता और पाप्पाति से अलग हो जाने के भय ने उसे पूरी तरह डरा दिया था।
उत्तर: उसने पाप्पाति को सीने से लगाया, कंधे पर उसका सिर टिकाया और पीले रंग के साइकिल रिक्शे पर बैठकर बस अड्डे की ओर चल दी।
उत्तर: वह सोच रही थी कि इसे मामूली बुखार ही तो है, गाँव के वैद्य जी को दिखाकर जड़ी-बूटी दिला देगी।
उत्तर: लालफीताशाही, लापरवाही, बेड की कमी और अनपढ़ व गरीब मरीजों के प्रति कर्मचारियों का अमानवीय और रूखा व्यवहार।
उत्तर: बड़ा डॉक्टर कर्तव्यनिष्ठ, मानवीय और चिकित्सा के प्रति गंभीर है, जबकि अन्य कर्मचारी कामचोर और संवेदनहीन हैं।
उत्तर: यह ग्रामीण, अनपढ़ और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की शहरी व्यवस्था के समक्ष बेबसी और लाचारी को दर्शाती है।
उत्तर: 'नगर' सुजाता द्वारा रचित एक यथार्थवादी कहानी है। गाँव की अनपढ़ महिला वल्लि अम्माल अपनी मेनिनजाइटिस से पीड़ित बेटी पाप्पाति को लेकर मदुरै के बड़े अस्पताल पहुँचती है। बड़ा डॉक्टर बीमारी की गंभीरता को देखकर तुरंत भर्ती करने को कहता है, परंतु अस्पताल की कागजी प्रक्रिया, क्लर्कों की लापरवाही और संवेदनहीनता के कारण पाप्पाति को भर्ती नहीं किया जाता। अंततः डरी-सहमी वल्लि अम्माल अस्पताल छोड़कर अपनी बच्ची को गाँव के वैद्य को दिखाने वापस लौट जाती है।
उत्तर: वल्लि अम्माल एक भोली-भाली, अशिक्षित और ममतामयी ग्रामीण माँ है। वह अपनी बेटी से अगाध प्रेम करती है और उसकी जान बचाने के लिए अनजान शहर मदुरै तक आती है। शहरी लालफीताशाही और क्रूर व्यवस्था के बीच वह असहाय महसूस करती है, लेकिन अंत तक अपनी बेटी की रक्षा के लिए संघर्ष करती है।
उत्तर: कहानी में नगर की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोली गई है। अस्पताल में समय पर पर्चियाँ नहीं बनतीं, क्लर्क काम में रुचि नहीं लेते और आपातकालीन रोगियों को भी "कल सुबह आने" की सलाह देकर टाल दिया जाता है। वहाँ मानवीय संवेदनाओं का पूर्ण अभाव देखने को मिलता है।
उत्तर: यह कथन अस्पताल के बड़े डॉक्टर का है। जब उन्हें पता चलता है कि मेनिनजाइटिस जैसी जानलेवा बीमारी से पीड़ित बच्ची को भर्ती करने के बजाय सुबह आने को कहा गया, तो वे व्यवस्था की मूर्खता पर भड़क उठते हैं। यह कथन अस्पताल के निचले स्तर पर व्याप्त अकर्मण्यता और संवेदनहीनता पर गहरा तमाचा है।
उत्तर: वल्लि अम्माल अनपढ़ होने के कारण व्यवस्था को समझ नहीं पाई। उसे लगा कि अस्पताल वाले उसकी बच्ची को उससे छीन लेंगे या मार डालेंगे। डॉक्टरों द्वारा बच्ची को भर्ती न किए जाने और अगले दिन बुलाने की बात से वह घबरा गई और अपनी बच्ची की जान बचाने के लिए गाँव लौटना ही सुरक्षित समझा।
उत्तर: 'नगर' केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि आधुनिक मशीनी, स्वार्थी और अमानवीय जीवनशैली का प्रतीक है। जहाँ गाँव की सहजता के विपरीत शहर में किसी के पास दूसरे के दुख-दर्द को समझने का समय नहीं है। अतः कहानी का शीर्षक पूर्णतः सार्थक और सटीक है।
उत्तर: यदि वल्लि अम्माल पढ़ी-लिखी होती, तो वह कमरा नंबर 48 खोज लेती और बड़े डॉक्टर के आदेश का हवाला देकर पाप्पाति को तुरंत भर्ती करा लेती। अशिक्षा और गरीबी के कारण वह हर कदम पर ठगी गई और अंततः सही इलाज से वंचित रह गई।
उत्तर: कहानी का अंत पाठक को झकझोर देता है क्योंकि पाप्पाति को सही समय पर आधुनिक इलाज नहीं मिल पाता। एक्यूट मेनिनजाइटिस जैसी घातक बीमारी में गाँव के वैद्य के पास लौटना बच्ची की मृत्यु की ओर संकेत करता है, जो व्यवस्था की नाकामी का परिणाम है।
उत्तर: लेखक यह कड़ा संदेश देना चाहते हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को संवेदनशील, पारदर्शी और जनोन्मुखी होना चाहिए। इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों में शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाना अत्यंत अनिवार्य है।
उत्तर: सुजाता की लेखन शैली अत्यंत सूक्ष्म, यथार्थपरक और विवरणात्मक है। उन्होंने मदुरै शहर की हलचल, अस्पताल के तनावपूर्ण माहौल, डॉक्टरों की चिकित्सा शब्दावली और एक ग्रामीण माँ की मानसिक उथल-पुथल को अत्यंत मार्मिक ढंग से पिरोया है।
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