बिहार बोर्ड (BSEB) कक्षा 10वीं हिंदी (वर्णिका भाग-2)
अध्याय 3 : माँ | लेखक : ईश्वर पेटलीकर
संपूर्ण 50 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर (वस्तुनिष्ठ, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय)
उत्तर: ईश्वर पेटलीकर.
उत्तर: गुजराती भाषा के.
उत्तर: प्रसिद्ध कहानी ‘खून की सगाई’ तथा लोकप्रिय उपन्यास ‘काला पानी’ है.
उत्तर: गोपालदास नागर ने.
उत्तर: जन्म से ही पागल और गूँगी.
उत्तर: तीन संतानें (दो पुत्र और एक पुत्री).
उत्तर: चार संतानें (दो पुत्र और दो पुत्रियाँ).
उत्तर: कम्मु.
उत्तर: माँ जी अस्पताल को अपंग जानवरों की 'गौशाला' समझती थीं.
उत्तर: अगहन (अग्रहायण) के महीने में.
उत्तर: चौदह (14) वर्ष की.
उत्तर: कुसुम.
उत्तर: शहर के कन्या विद्यालय में.
उत्तर: लगभग तीन महीने बाद.
उत्तर: अपने बड़े पुत्र को.
उत्तर: मजिस्ट्रेट का ऑर्डर.
उत्तर: बैलगाड़ी और फिर ट्रेन का.
उत्तर: "आज तक आप इसकी माँ थीं, आज से मैं इसकी नई माँ हुई हूँ।"
उत्तर: रात में पौने ग्यारह (10:45) बजे.
उत्तर: माँ जी भी मंगु के वियोग और पुत्र-ममता के चरम पागलपन में मंगु की श्रेणी में मिल गईं (पागल हो गईं).
उत्तर: लोग माँ जी को सलाह देते थे कि मंगु को पागलों के अस्पताल में भर्ती करा दिया जाए ताकि उसकी सही देखभाल हो सके.
उत्तर: माँ जी कहती थीं कि "मैं सगी माँ होकर सेवा नहीं कर सकती, तो अस्पताल के पराए कर्मचारियों को क्या पड़ी है? यह तो अपंग जानवर को गौशाला में भेजने जैसा है।"
उत्तर: बहुओं की शिकायत थी कि माँ जी अपने पोते-पोतियों से प्यार नहीं करतीं और पागल मंगु को चौबीसों घंटे छाती से चिपकाए रखती हैं.
उत्तर: कम्मु कहती थी कि माँ के झूठे लाड़-प्यार ने ही मंगु को अधिक बिगाड़ दिया है; यदि मार-डांट कर आदत डाली जाती तो वह मल-मूत्र का ध्यान रखने लगती.
उत्तर: माँ जी मानती थीं कि जो निस्वार्थ भाव से सेवा करे वही सच्चा सगा है; पुत्र और पुत्री अपने परिवार में मस्त हैं, इसलिए केवल माँ ही मंगु की सच्ची सगी है.
उत्तर: एक ज्योतिषी ने कहा था कि अगहन के महीने में मंगु का पागलपन ठीक हो जाएगा, इसलिए यह महीना माँ जी के लिए आराध्यदेव बन गया था.
उत्तर: माँ जी सोचने लगी थीं कि अगहन में मंगु ठीक हो जाएगी और वह चौदह वर्ष की रूपवती कन्या का विवाह तय कर देंगी.
उत्तर: माँ जी को लगा कि जब पढ़ी-लिखी और सयानी लड़की पागल होने पर विवेक खो देती है, तो जन्म से पागल मंगु का क्या दोष।
उत्तर: गाँव वालों ने कहा कि अस्पताल में कुसुम पूरी तरह ठीक हो गई है, इसलिए मंगु को भी एक बार अस्पताल में भर्ती कराकर देखना चाहिए.
उत्तर: अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सों के दयालु व्यवहार की बात सुनकर माँ जी के मन से अस्पताल के प्रति बैठा डर और पूर्वाग्रह दूर हो गया.
उत्तर: माँ जी को लगता था कि वृद्धावस्था में बहुएँ उसकी सेवा नहीं करेंगी, परंतु अस्पताल भेजने का फैसला करते ही उन्हें लगता कि वे माँ होकर भी पुत्री से ऊब गई हैं।
उत्तर: माँ जी को लगा कि पुत्र अपनी पागल बहन को अस्पताल में धकेलकर जल्दी से जल्दी बोझ से छुटकारा पाना चाहता है.
उत्तर: मंगु नए कपड़े देखकर प्रसन्न थी और माँ की ओर देखकर हँस रही थी, क्योंकि वह अबोध थी और नहीं जानती थी कि उसे कहाँ ले जाया जा रहा है.
उत्तर: यात्रियों ने कहा कि माँ-बाप होकर खाते-पीते घर की लड़की को अस्पताल में लावारिस छोड़ रहे हैं, वहाँ तो जानवरों जैसा हाल होगा।
उत्तर: एक पागल स्त्री के नखरे सहते हुए और उसका मुँह धोते हुए नर्स को देखकर माँ जी को विश्वास हुआ कि यहाँ के कर्मचारी दयालु और सेवाभावी हैं।
उत्तर: उन्होंने कहा कि मंगु बिना खिलाए नहीं खाती, वह रूखी रोटी नहीं खाती और शाम को रोटी दूध या दाल के साथ ही खाती है।
उत्तर: दोनों के चेहरों पर गहरा शोक था; माँ जी की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे और पुत्र के सीने पर अपराधबोध का भारी पत्थर रखा था।
उत्तर: रात में उन्हें मंगु की ठंड, उसके बिस्तर गीला करने और अकेलेपन की चिंता सता रही थी; वे खुद को पापी समझकर तड़प रही थीं।
उत्तर: पुत्र ने संकल्प लिया कि वह जीते-जी मंगु को पालेगा और यदि उसकी पत्नी तैयार नहीं होगी, तो वह स्वयं मंगु का मल-मूत्र धोएगा।
उत्तर: इसका अर्थ है कि मंगु के वियोग, असीम पीड़ा और पुत्र-मोह की पराकाष्ठा में माँ जी का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और वे भी पागल हो गईं।
उत्तर: 'माँ' ईश्वर पेटलीकर की अत्यंत मार्मिक कहानी है। कहानी की नायिका माँ जी अपनी जन्मजात पागल और गूँगी बेटी मंगु से अगाध प्रेम करती हैं और उसे अस्पताल भेजने के सख्त खिलाफ हैं। जब गाँव की कुसुम अस्पताल में ठीक होकर लौटती है, तो माँ जी विवश होकर मंगु को अस्पताल में भर्ती करा देती हैं। परंतु अस्पताल से लौटने के बाद मंगु के वियोग और चिंता में माँ जी स्वयं अपना मानसिक संतुलन खो बैठती हैं और मंगु की तरह ही पागल हो जाती हैं।
उत्तर: माँ जी भारतीय नारी और वात्सल्य की प्रतिमूर्ति हैं। वे अपनी असमर्थ और विक्षिप्त संतान के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर देती हैं। समाज और परिवार के तानों के बावजूद उनका मातृ-स्नेह कभी कम नहीं होता। उनका प्रेम इतना गहरा है कि मंगु का वियोग वे सहन नहीं कर पातीं और अंततः पागल हो जाती हैं।
उत्तर: माँ जी के दो पुत्र और एक अन्य पुत्री थी। पुत्र शहर में कमाते थे और बहुएँ मंगु के कारण माँ से खिंची रहती थीं। बड़ी बेटी कम्मु माँ के लाड़-प्यार को मंगु की आदत बिगड़ने का कारण मानती थी। परिवार में सभी लोग मंगु को एक बोझ समझते थे, जबकि माँ जी के लिए मंगु ही उनके जीवन का केंद्र थी।
उत्तर: कुसुम कहानी का एक महत्वपूर्ण मोड़ (turning point) है। वह शहर में पढ़ते समय पागल हो गई थी, परंतु अस्पताल में रहकर स्वस्थ हो गई। कुसुम के ठीक होने से माँ जी के मन में अस्पताल के प्रति जमी गलतफहमी दूर हुई और उन्होंने भारी मन से मंगु को अस्पताल भेजने का साहस जुटाया।
उत्तर: अस्पताल में प्रवेश करते ही माँ जी का कलेजा काँप उठा। वे डॉक्टरों और नर्सों से एक-एक छोटी बात के लिए गिड़गिड़ाने लगीं कि मंगु को रात में ओढ़ाना, प्यार से खिलाना। जब मंगु को अंदर ले जाया गया, तो माँ जी के मुँह से मर्मवेधी चीख निकल पड़ी और उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली।
उत्तर: अस्पताल के कर्मचारी संवेदनशील, धैर्यवान और सहृदय थे। वे पागलों की हरकतों से खीझते नहीं थे, बल्कि उन्हें प्यार से संभालते थे। मेट्रन ने माँ जी को ढांढस बंधाया और आश्वासन दिया कि वह मंगु की नई माँ बनकर उसकी देखभाल करेगी।
उत्तर: माँ जी की सिसकियों और बेबसी को देखकर पुत्र का हृदय विदीर्ण हो गया। उसे अपनी स्वार्थपरता पर धिक्कार हुआ कि उसने माँ के जीते-जी बहन को अस्पताल में धकेल दिया। उसने प्रण लिया कि वह खुद मंगु की सेवा करेगा और कभी उसे बेसहारा नहीं छोड़ेगा।
उत्तर: कहानी की पूरी धुरी माँ के निस्वार्थ और असीम वात्सल्य के इर्द-गिर्द घूमती है। एक माँ अपनी अक्षम संतान के लिए किस हद तक त्याग और पीड़ा सह सकती है, यह इस पाठ में जीवंत हुआ है। कहानी का अंत माँ के पागलपन के साथ मातृत्व की पराकाष्ठा को छूता है, इसलिए शीर्षक शत-प्रतिशत सार्थक है।
उत्तर: यह कहानी संदेश देती है कि मानसिक रूप से दिव्यांग और असहाय बच्चों को केवल दया नहीं, बल्कि परिवार के सच्चे अपनत्व और प्रेम की आवश्यकता होती है। समाज और परिवार को अपनी संतानों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए और माता-पिता के त्याग का सम्मान करना चाहिए।
उत्तर: ईश्वर पेटलीकर ने ग्रामीण परिवेश और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत सजीव, मनोवैज्ञानिक और कारुणिक चित्रण किया है। उनकी भाषा सहज, मुहावरेदार और पाठकों के हृदय को छू लेने वाली है। संवाद अत्यंत स्वाभाविक और पात्रों की मनोस्थिति के सर्वथा अनुकूल हैं।
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