बिहार बोर्ड कक्षा 10 : वर्णिका (भाग-2)
पाठ 3: माँ
लेखक: ईश्वर पेटलीकर
प्रश्न 1 मंगु के प्रति माँ और परिवार के अन्य सदस्यों के व्यवहार में जो फर्क है उसे अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर: मंगु के प्रति माँ और परिवार के अन्य सदस्यों के दृष्टिकोण व व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर है:
- माँ का व्यवहार: माँ का मंगु के प्रति असीम, निस्वार्थ और ममतामयी व्यवहार है। वह मंगु के जन्मजात पागलपन और गूँगेपन के बावजूद उसकी दिन-रात सेवा करती है, उसे अपने हाथों से खिलाती, नहलाती और अपने पास सुलाती है। माँ का समस्त मातृत्व केवल मंगु पर ही न्योछावर रहता है।
- परिवार के अन्य सदस्यों का व्यवहार: पुत्र, बहुएँ और विवाहित पुत्री मंगु को केवल एक भार (बोझ) समझते हैं। बहुओं को माँ का मंगु के प्रति अत्यधिक स्नेह और अपने बच्चों की उपेक्षा अखरती है। बहन मंगु को माँ के झूठे लाड़-प्यार द्वारा अधिक बिगाड़े जाने का ताना देती है तथा भाई भी उसके मल-मूत्र धोने के झंझट से दूर रहकर उसे अस्पताल भेजने में ही भलाई समझते हैं।
प्रश्न 2 माँ मंगु को अस्पताल में क्यों नहीं भर्ती कराना चाहती ? विचार करें।
उत्तर: माँ मंगु को अस्पताल में इसलिए भर्ती नहीं कराना चाहती क्योंकि:
- गौशाला जैसी मान्यता: माँ का मानना था कि अस्पताल अपंग और लाचार जानवरों की गौशाला की तरह होते हैं, जहाँ केवल औपचारिकता पूरी की जाती है।
- देखभाल का अभाव: माँ सोचती थी कि जब वह सगी माँ होकर भी उसकी उचित सेवा नहीं कर पा रही, तो अस्पताल वालों को क्या पड़ी है? गूँगी मंगु को समय पर खाना खिलाने, पानी पिलाने और रात में गीले बिस्तर से उठाकर सुलाने का ध्यान कोई पराया नहीं रखेगा।
- अस्पताल को मौत का घर समझना: माँ को लगता था कि अस्पताल में भर्ती कराना अपनी संतान को जीते-जी मौत के मुँह में धकेलने के समान है।
प्रश्न 3 कुसुम के पागलपन में सुधार देख मंगु के प्रति माँ, परिवार और समाज की प्रतिक्रिया को अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर: गाँव की कन्या विद्यालय में पढ़ने वाली लड़की कुसुम के अस्पताल जाकर पूरी तरह ठीक होने पर निम्नलिखित प्रतिक्रियाएँ हुईं:
- समाज की प्रतिक्रिया: गाँव के लोगों ने माँ को सुझाव और सलाह दी कि मंगु को भी एक बार अस्पताल में भर्ती कराकर देखना चाहिए, वह भी कुसुम की तरह ठीक हो सकती है।
- माँ की प्रतिक्रिया: माँ का अस्पताल के प्रति अविश्वास दूर हुआ और उनके मन में एक नई आशा जगी। उन्होंने कुसुम को अपने घर बुलाकर अस्पताल की व्यवस्था और परिचारिकाओं के व्यवहार के बारे में पूछताछ की तथा भारी मन से मंगु को अस्पताल भेजने का कठिन निर्णय लिया।
- परिवार की प्रतिक्रिया: मंगु के बड़े भाई ने इस फैसले का तुरंत स्वागत किया और बिना किसी विलंब के मजिस्ट्रेट से ऑर्डर लेकर उसे अस्पताल में भर्ती कराने का सारा प्रबंध कर दिया।
प्रश्न 4 कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर विचार करें।
उत्तर: प्रस्तुत कहानी का शीर्षक 'माँ' अत्यंत उपयुक्त, मार्मिक और सार्थक है। पूरी कथा माँ के असीम वात्सल्य, त्याग, पीड़ा और मानसिक द्वंद्व के इर्द-गिर्द घूमती है। एक माँ अपनी जन्मजात विक्षिप्त संतान के लिए पूरे समाज और परिवार के तानों को सहती है और अंत तक उसकी सेवा करती है। अपनी वृद्धावस्था और विवशता में जब वह बेटी को अस्पताल छोड़ आती है, तो वियोग की असहनीय वेदना में वह स्वयं भी अपनी सुध-बुध खोकर मंगु की तरह पागल हो जाती है। यह कहानी मातृत्व की पराकाष्ठा को दर्शाती है, अतः इसका शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।
प्रश्न 5 मंगु जिस अस्पताल में भर्ती की जाती है, उस अस्पताल के कर्मचारी व्यवहारकुशल हैं या संवेदनशील ? विचार करें।
उत्तर: मंगु जिस अस्पताल में भर्ती की जाती है, वहाँ के डॉक्टर, मेट्रन और परिचारिकाएँ (नर्स) व्यवहारकुशल और संवेदनशील दोनों हैं। वे मानसिक रोगियों के हिंसक और विचित्र व्यवहार से खीझते या मारपीट नहीं करते, बल्कि धैर्य और मुस्कान के साथ उनकी सेवा करते हैं।
माँ के अत्यधिक विलाप और चिंता को देखकर मेट्रन ने उन्हें ढाढ़स बँधाया और कहा कि "आज से मैं इसकी नई माँ हूँ", वहीं डॉक्टर ने भी पुत्र समान व्यवहार करते हुए आश्वस्त किया। परिचारिकाओं ने भी मंगु को प्यार से बहलाकर अपने साथ मिलाया। उनका यह आचरण उनके कर्तव्यनिष्ठ, संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण होने का प्रमाण है।
माँ के अत्यधिक विलाप और चिंता को देखकर मेट्रन ने उन्हें ढाढ़स बँधाया और कहा कि "आज से मैं इसकी नई माँ हूँ", वहीं डॉक्टर ने भी पुत्र समान व्यवहार करते हुए आश्वस्त किया। परिचारिकाओं ने भी मंगु को प्यार से बहलाकर अपने साथ मिलाया। उनका यह आचरण उनके कर्तव्यनिष्ठ, संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण होने का प्रमाण है।
प्रश्न 6 कहानी का सारांश प्रस्तुत करें।
उत्तर: 'माँ' गुजराती कथाकार ईश्वर पेटलीकर द्वारा रचित एक अत्यंत कारुणिक कहानी है। मंगु जन्म से ही पागल और गूँगी लड़की है। उसकी माँ परिवार और गाँव वालों के विरोध के बावजूद उसकी निस्वार्थ सेवा करती है और उसे कभी अस्पताल नहीं भेजना चाहती। परिवार के अन्य सदस्य (पुत्र, बहुएँ और पुत्री) मंगु को केवल एक बोझ मानते हैं।
गाँव की एक अन्य विक्षिप्त लड़की 'कुसुम' जब अस्पताल में रहकर पूरी तरह स्वस्थ हो जाती है, तो माँ के मन में भी अस्पताल के प्रति भरोसा जगता है। अपनी बढ़ती उम्र और बेटों-बहुओं की बेरुखी को देखते हुए माँ भारी मन से मंगु को बड़े अस्पताल में भर्ती करा देती हैं।
अस्पताल के कर्मचारी अत्यंत संवेदनशील होते हैं और माँ को पूरी देखभाल का भरोसा दिलाते हैं, किंतु बेटी को अस्पताल में छोड़कर लौटने के बाद माँ का मातृत्व वियोग की चरम सीमा पर पहुँच जाता है। रात भर वह मंगु की ही चिंता में तड़पती रहती है। सुबह होते-होते मंगु के विरह और गहरी वेदना के कारण माँ स्वयं भी अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है और मंगु की ही श्रेणी में मिलकर पागल हो जाती है। यह कहानी माँ की निःशर्त और असीम ममता का मार्मिक चित्रण है।
गाँव की एक अन्य विक्षिप्त लड़की 'कुसुम' जब अस्पताल में रहकर पूरी तरह स्वस्थ हो जाती है, तो माँ के मन में भी अस्पताल के प्रति भरोसा जगता है। अपनी बढ़ती उम्र और बेटों-बहुओं की बेरुखी को देखते हुए माँ भारी मन से मंगु को बड़े अस्पताल में भर्ती करा देती हैं।
अस्पताल के कर्मचारी अत्यंत संवेदनशील होते हैं और माँ को पूरी देखभाल का भरोसा दिलाते हैं, किंतु बेटी को अस्पताल में छोड़कर लौटने के बाद माँ का मातृत्व वियोग की चरम सीमा पर पहुँच जाता है। रात भर वह मंगु की ही चिंता में तड़पती रहती है। सुबह होते-होते मंगु के विरह और गहरी वेदना के कारण माँ स्वयं भी अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है और मंगु की ही श्रेणी में मिलकर पागल हो जाती है। यह कहानी माँ की निःशर्त और असीम ममता का मार्मिक चित्रण है।
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