Chapter 3. अति सूधो सनेह को मारग है / मो अँसुवानिहिं लै बरसौ | BSEB 10 Hindi Solution


Class 10 Hindi (गोधूलि भाग-2: काव्य खंड)

अध्याय 3: अति सूधो सनेह को मारग है / मो अँसुवानिहिं लै बरसौ (रचयिता: घनानंद)

I. कविता के साथ (प्रश्न-उत्तर)
प्रश्न 1: कवि प्रेममार्ग को 'अति सूधो' क्यों कहता है? इस मार्ग की विशेषता क्या है?
उत्तर:
कवि घनानंद प्रेम के मार्ग को 'अति सूधो' (अत्यंत सीधा और सरल) इसलिए कहते हैं क्योंकि इस मार्ग पर चलने के लिए किसी भी प्रकार की कुटिलता, चतुराई या टेढ़ापन नहीं चाहिए।

विशेषता: प्रेम के मार्ग की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
  • इस मार्ग पर सत्य निष्ठा के साथ अभिमान एवं अहंकार का त्याग करके ही चला जा सकता है।
  • इस पर निष्कपट और निश्छल व्यक्ति ही बिना किसी झिझक के चल सकते हैं।
  • इसमें छल, कपट और चालाकी का कोई स्थान नहीं होता।
प्रश्न 2: 'मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं' से कवि का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
'मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं' से कवि का अभिप्राय अपनी प्रेयसी सुजान की निष्ठुरता और बेरुखी पर व्यंग्य करना है। यहाँ कवि ने 'मन' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया है— एक माप-तौल की इकाई (लगभग 40 शेर) और दूसरा हृदय (मन)। कवि कहते हैं कि सुजान प्रेमी का संपूर्ण 'मन' (हृदय) तो ले लेती हैं, परंतु बदले में उसे तनिक भी (छटाँक भर) प्रेम या सांत्वना नहीं देतीं।
प्रश्न 3: द्वितीय छंद किसे संबोधित है और क्यों?
उत्तर:
द्वितीय छंद ('मो अँसुवानिहिं लै बरसौ') मेघ (बादल) को संबोधित है।

कारण: बादल परोपकारी स्वभाव का होता है जो दूसरों के कल्याण के लिए जल धारण करता है। कवि अपने विरह की पीड़ा और अश्रुओं को मेघ के माध्यम से अपनी निष्ठुर प्रेयसी सुजान के घर के आँगन तक पहुँचाना चाहते हैं ताकि उनकी व्यथा सुजान तक पहुँच सके।
प्रश्न 4: परहित के लिए ही देह कौन धारण करता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
परहित (दूसरों की भलाई) के लिए मेघ (बादल) देह धारण करता है।

स्पष्टीकरण: बादल समुद्र के खारे पानी को अपनी परोपकारी प्रकृति से शीतल, मीठे जल में बदलकर संपूर्ण पृथ्वी को जीवन प्रदान करता है और ताप मिटाता है। वह स्वयं कष्ट सहकर संपूर्ण संसार को शीतलता देता है।
प्रश्न 5: कवि कहां अपने आँसुओं को पहुँचाना चाहता है और क्यों?
उत्तर:
कवि अपने विरह-अश्रुओं को अपनी निष्ठुर प्रेयसी सुजान के आँगन में पहुँचाना चाहता है।

कारण: कवि चाहते हैं कि जब बादल उनके अश्रुओं से युक्त जल को सुजान के आँगन में बरसाए, तो सुजान को कवि के विरह-ताप और आत्मीय प्रेम की वेदना की अनुभूति हो सके।
प्रश्न 6: व्याख्या करें –
(क) "यहाँ एक तैं दूसरो आँक नहीं"
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक 'गोधूलि भाग-2' के 'अति सूधो सनेह को मारग है' शीर्षक सवैये से ली गई है, जिसके रचयिता रीतिमुक्त काव्यधारा के सिरमौर कवि घनानंद हैं।
व्याख्या: कवि प्रेम के अनन्य भाव को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि सच्चे प्रेम के मार्ग पर केवल एक ही निष्ठा और एक ही लक्ष्य (प्रियतम) होता है। यहाँ किसी अन्य विचार, शंका या दूसरे अंक (विकल्प) के लिए कोई स्थान नहीं है। प्रेमी का मन पूरी तरह अपने आराध्य के प्रति समर्पित होता है।
(ख) "कछू मेरियों पीर हिएँ परसी"
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति घनानंद द्वारा रचित द्वितीय छंद 'मो अँसुवानिहिं लै बरसौ' से उद्धृत है।
व्याख्या: कवि बादल से करुण प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे मेघ! तुम तो सर्वत्र जन-कल्याण करते फिरते हो, कभी मेरे हृदय की इस असह्य विरह-पीड़ा और दुख का स्पर्श करके उसे समझो और मेरे इन अश्रुओं को लेकर मेरी प्रेयसी सुजान के आँगन में बरसा दो।
II. कविता के आस-पास
1. घनानंद रीतिमुक्त धारा के कवि हैं। इस धारा के अन्य कवियों की सूची अपने शिक्षक की सहायता से बनाइये और इस धारा की कुछ प्रमुख विशेषताएँ भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
  • रीतिमुक्त धारा के प्रमुख कवि: घनानंद, बोधा, आलम और ठाकुर।
  • रीतिमुक्त काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ:
    • यह काव्यधारा रीतिकालीन शास्त्रीय नियमों, लक्षणों और बाह्य आडंबरों से मुक्त होकर सहज एवं स्वच्छंद प्रेम की अभिव्यक्ति करती है।
    • इसमें बाह्य चेष्टाओं की अपेक्षा आंतरिक विरह-वेदना और हृदय के मनोभावों का प्रधान रूप से चित्रण है।
    • इसमें आत्मपरकता, भावुकता और परिष्कृत ब्रजभाषा का सौंदर्य देखने को मिलता है।
2. कवि सुजान कहकर किसे संबोधित करता है? शिक्षक से मालूम करें।
उत्तर:
कवि 'सुजान' कहकर मूल रूप से दिल्ली के मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीले के दरबार की नर्तकी (नर्तकी सुजान) को संबोधित करता है, जिससे घनानंद अगाध प्रेम करते थे। विराग होने पर जब वे वृंदावन चले गए, तब उनके काव्य में यही 'सुजान' शब्द लौकिक प्रेम से उठकर अलौकिक श्रीकृष्ण (प्रभु) का प्रतीक बन गया।
3. सूफी कवियों से घनानंद की क्या समानता है? शिक्षक की सहायता से मालूम कीजिए।
उत्तर:
  • समानता:
    • सूफी कवियों और घनानंद दोनों के यहाँ 'विरह की व्यथा' (इश्क-ए-हकीकी) काव्य की आत्मा है।
    • सूफियों की तरह घनानंद भी बाह्य दिखावे के स्थान पर निष्कपट, एकनिष्ठ और स्वार्थरहित प्रेम पर बल देते हैं।
    • दोनों के यहाँ प्रेम लौकिक माध्यम (नायिका/सुजान) से शुरू होकर अलौकिक सत्ता (ईश्वर) की ओर अग्रसर होता है।
III. भाषा की बात

1. निम्नलिखित शब्द कविता में संज्ञा अथवा विशेषण के रूप में प्रयुक्त हैं। इनके प्रकार बताएँ –

शब्द पद प्रकार
सूधोगुणवाचक विशेषण
मारगजातिवाचक संज्ञा
नेकुपरिमाणवाचक विशेषण / अव्यय
बाँकगुणवाचक विशेषण
कपटीगुणवाचक विशेषण (तथा संज्ञा रूप)
निशाँकगुणवाचक विशेषण
पाटीजातिवाचक संज्ञा
यथारथगुणवाचक विशेषण / क्रियाविशेषण
जीवनदायकगुणवाचक विशेषण
पीरभाववाचक संज्ञा
हियँजातिवाचक संज्ञा
बिसासीगुणवाचक विशेषण

2. कविता में प्रयुक्त अव्यय पदों का चयन करें और उनका अर्थ भी बताएँ –

अव्यय पद अर्थ
तहाँवहाँ
नेकुतनिक भी / ज़रा-सा
पैपर / परंतु
कहीकहाँ
कबूँकभी
जथातथयथार्थ / जैसे ही

3. निम्नलिखित के कारक स्पष्ट करें –

पद / पदबंध कारक
सनेह को मारगसंबंध कारक (विभक्ति: को/का)
प्यारे सुजानसंबोधन कारक
मेरियों पीरसंबंध कारक (विभक्ति: रियों/की)
हियँअधिकरण कारक (हृदय में / हृदय पर)
अँसुवानिहिंकर्म कारक (अश्रुओं को)
मोसंबंध / कर्म कारक (मेरे / मुझे)
IV. शब्द निधि (शब्दार्थ)
शब्द अर्थ
नेकुतनिक भी / ज़रा-सा
सयानपचतुराई / होशियारी
बाँकटेढ़ापन
आपनपौअहंकार / अभिमान
झिझकैंझिझकते हैं
निशाँकशंकामुक्त / निडर
आँकअंक / चिह्न / गिनती
परजन्यबादल
सुधाअमृत
सरसीरस बरसाओ / सरस करो
परसीस्पर्श करो
बिसासीविश्वासी / कपटी
मन४० शेर की तौल का पैमाना (तथा हृदय)
छटाँकतौल का एक बहुत छोटा पैमाना

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