पाठ 2: प्रेम-अयनि श्री राधिका / करील के कुंजन ऊपर वारौं
बिहार बोर्ड (BSEB) कक्षा 10वीं हिंदी (गोधूलि भाग-2, काव्य खंड) | सम्पूर्ण नोट्स
1. पाठ का संक्षिप्त परिचय (Overview)
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शीर्षक:
- प्रेम-अयनि श्री राधिका (दोहा एवं सोरठा)
- करील के कुंजन ऊपर वारौं (सवैया)
- कवि: रसखान (भक्तिकाल के सगुण धारा के कृष्णभक्त कवि)
- काव्य संकलन: 'रसखान रचनावली'
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मूल भाव:
- प्रथम भाग में: राधा-कृष्ण के प्रेमरूप युगल स्वरूप का अद्वितीय वर्णन। कवि ने राधा को प्रेम का गृह/खजाना और कृष्ण को साक्षात् प्रेमरंग माना है।
- द्वितीय भाग में: भगवान श्रीकृष्ण और उनकी लीलाभूमि ब्रज (गायों, लाठी, कंबली, वनों और कँटीली झाड़ियों) के प्रति कवि का अनन्य और सर्वस्व न्योछावर कर देने वाला समर्पण भाव।
2. कवि परिचय (रसखान)
- मूल वंश व रचनाकाल: रसखान दिल्ली के पठान राजवंश में उत्पन्न हुए थे। इनके ग्रंथ 'प्रेमवाटिका' (1610 ई०) के अनुसार इनका रचनाकाल मुगल बादशाह जहाँगीर का राज्यकाल था।
- ब्रजभूमि आगमन: जब दिल्ली पर मुगलों का आधिपत्य हुआ और पठान वंश पराजित हुआ, तब वे दिल्ली छोड़कर ब्रजभूमि आ गए और कृष्णभक्ति में तल्लीन हो गए।
- दीक्षा: 'दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता' से यह ज्ञात होता है कि गोस्वामी विट्ठलनाथ ने इन्हें 'पुष्टिमार्ग' में दीक्षा दी थी।
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काव्यगत विशेषताएँ:
- रसखान ने कृष्ण का लीलागान पदों में नहीं, बल्कि सवैयों में किया है। वे सवैया छंद में सिद्धहस्त कवि थे।
- रसखान सूफियों का हृदय लेकर कृष्ण की लीला पर काव्य रचते हैं। इनमें उल्लास, मादकता और उत्कटता तीनों का अपूर्व संयोग मिलता है।
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इनकी रचनाओं से अत्यधिक मुग्ध होकर भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कहा था—
"इन मुसलमान हरिजनन पै, कोटिन हिंदू वारिये।"
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प्रमुख ग्रंथ:
- 'प्रेमवाटिका' (प्रेम-निरूपण संबंधी रचनाएँ)
- 'सुजान रसखान' (कृष्ण की भक्ति संबंधी रचनाएँ)
- साहित्यिक स्थान: रसखान संप्रदायमुक्त कृष्णभक्त कवि और हिंदी के अत्यंत लोकप्रिय जातीय कवि हैं।
3. छंदों का सरल भावार्थ (पदवार व्याख्या)
भाग 1: प्रेम-अयनि श्री राधिका (दोहा एवं सोरठा)
"प्रेम-अयनि श्री राधिका, प्रेम-बरन नँदनंद ।
प्रेम-बाटिका के दोऊ, माली-मालिन-द्वन्द्व ॥
मोहन छवि रसखानि लखि अब दृग अपने नाहिं ।
अँचे आवत धनुस से छूटे सर से जाहिं ॥
मो मन मानिक लै गयो चितै चोर नंदनंद ।
अब बेमन मैं का करूँ परी फेर के फंद ॥
प्रीतम नन्दकिशोर, जा दिन तें नैननि लग्यौ ।
मन पावन चितचोर, पलक ओट नहिं करि सकौं ॥"
प्रेम-बाटिका के दोऊ, माली-मालिन-द्वन्द्व ॥
मोहन छवि रसखानि लखि अब दृग अपने नाहिं ।
अँचे आवत धनुस से छूटे सर से जाहिं ॥
मो मन मानिक लै गयो चितै चोर नंदनंद ।
अब बेमन मैं का करूँ परी फेर के फंद ॥
प्रीतम नन्दकिशोर, जा दिन तें नैननि लग्यौ ।
मन पावन चितचोर, पलक ओट नहिं करि सकौं ॥"
भावार्थ:
- कवि कहते हैं कि श्री राधिका जी प्रेम का गृह (अयनि/खजाना) हैं और नंदनंदन (श्रीकृष्ण) साक्षात् प्रेम के रंग (वरन) हैं। ये दोनों प्रेम रूपी वाटिका (बगीचे) के माली और मालिन के युगल रूप हैं।
- श्रीकृष्ण के मनमोहक रूप को देखकर कवि की आँखें अब उनकी अपनी नहीं रहीं; वे कृष्ण के रूप-सौंदर्य में ऐसे खिंचती चली जाती हैं जैसे धनुष से बाण छूटकर तीव्र गति से अपने लक्ष्य की ओर जाता है।
- कवि का मन रूपी बहुमूल्य मणिक (रत्न) उस चितचोर नंदनंदन (कृष्ण) ने चुरा लिया है। अब कवि बिना मन के (बेमन) विवश हो गए हैं और प्रेम के इस अद्भुत फंदे में फँस गए हैं।
- कवि कहते हैं कि हे प्रियतम नंदकिशोर! जिस दिन से आप मेरे नयनों में बसे हैं, उस पवित्र चितचोर कृष्ण से मैं अपनी पलकों की ओट (आड़) भी नहीं कर पाता, अर्थात् उन्हें एक पल के लिए भी अपनी आँखों से ओझल नहीं होने देना चाहता।
भाग 2: करील के कुंजन ऊपर वारौं (सवैया)
"या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर की तजि डारौं ।
आठहुँ सिद्धि नवोनिधि को सुख नन्द की गाइ चराइ बिसारौं ॥
रसखानि कबौं इन आँखिन सौं ब्रज के बनबाग तड़ाग निहारौं ।
कोटिक रौ कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं ॥"
आठहुँ सिद्धि नवोनिधि को सुख नन्द की गाइ चराइ बिसारौं ॥
रसखानि कबौं इन आँखिन सौं ब्रज के बनबाग तड़ाग निहारौं ।
कोटिक रौ कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं ॥"
भावार्थ:
- कवि रसखान कहते हैं कि श्रीकृष्ण की उस लाठी (लकुटी) और कंबली (कामरिया) के बदले, जिसे वे गायें चराते समय धारण करते थे, मैं तीनों लोकों (स्वर्ग, मर्त्य, पाताल) के राज-पाट का सुख भी त्यागने को तैयार हूँ।
- नंदबाबा की गायों को चराने का जो आनंद है, उसके आगे मैं संसार की आठों सिद्धियों और नौ निधियों के परम सुख को भी भूलने (त्यागने) के लिए तैयार हूँ।
- कवि लालसा व्यक्त करते हैं कि हे प्रभु! मुझे वह दिन कब मिलेगा जब मैं अपनी इन आँखों से ब्रजभूमि के वनों, उपवनों (बागों) और सरोवरों (तड़ाग) को निरंतर निहार सकूँ।
- ब्रज की उन कँटीली करील की झाड़ियों और कुंजों में निवास करने के परम सुख के लिए मैं सोने-चाँदी से बने करोड़ों महलों (कलधौत के धाम) के सुख को भी न्योछावर (वार) करने के लिए तत्पर हूँ।
4. पाठ का सारांश (Summary)
प्रस्तुत पाठ में रसखान की अनन्य और निष्काम कृष्ण-भक्ति साकार रूप में प्रकट हुई है। प्रथम भाग में कवि राधा-कृष्ण को प्रेम-वाटिका के माली-मालिन के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं और बताते हैं कि कृष्ण के रूप ने उनके मन को चुरा लिया है। द्वितीय भाग (सवैये) में कवि कृष्ण और उनकी लीलाभूमि ब्रज के प्रति अपना सर्वस्व न्योछावर करने की उत्कट भावना प्रकट करते हैं। कृष्ण की लाठी और कंबली के लिए तीनों लोकों का राज्य, नंद की गायों के लिए अष्टसिद्धि-नवनिधि और ब्रज की करील की झाड़ियों के लिए करोड़ों स्वर्ण-महलों का त्याग करना कवि के अगाध समर्पण को दर्शाता है।
5. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य (Important One-Liners)
- 'प्रेम-अयनि श्री राधिका' और 'करील के कुंजन ऊपर वारौं' के रचयिता कौन हैं — रसखान।
- रसखान किस राजवंश में उत्पन्न हुए थे — दिल्ली के पठान राजवंश में।
- रसखान का रचनाकाल किस मुगल शासक के समय का माना जाता है — जहाँगीर के।
- रसखान को पुष्टिमार्ग में किसने दीक्षा दी थी — गोस्वामी विट्ठलनाथ ने।
- रसखान के दीक्षा की जानकारी किस ग्रंथ से मिलती है — 'दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता' से।
- रसखान किस छंद में विशेष रूप से सिद्धहस्त थे — सवैया छंद में।
- "इन मुसलमान हरिजनन पै, कोटिन हिंदू वारिये" — यह कथन रसखान के लिए किसने कहा था — भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने।
- रसखान के दो प्रमुख ग्रंथ कौन-से हैं — 'प्रेमवाटिका' (1610 ई०) और 'सुजान रसखान'।
- 'प्रेमवाटिका' में किस विषय का निरूपण है — प्रेम-निरूपण का।
- 'सुजान रसखान' में किस विषय की रचनाएँ हैं — कृष्ण की भक्ति संबंधी।
- 'प्रेम-अयनि' का क्या अर्थ है — प्रेम का खजाना / प्रेम का घर (श्री राधिका जी)।
- 'प्रेम-बरन' किसे कहा गया है — नंदनंद (श्रीकृष्ण) को।
- प्रेम-वाटिका के माली और मालिन कौन हैं — श्रीकृष्ण और श्री राधा।
- कवि का मन रूपी माणिक किसने चुरा लिया — चितचोर श्रीकृष्ण (नंदनंदन) ने।
- 'लकुटी' और 'कामरिया' का क्या अर्थ है — लाठी और छोटा कंबल।
- कृष्ण की लाठी और कंबली पर कवि क्या त्यागने को तैयार हैं — तीनों लोकों का राज-पाट (तिहूँ पुर का राज)।
- नंद की गाय चराने के बदले कवि क्या भुलाने को तैयार हैं — आठों सिद्धियाँ और नवों निधियाँ।
- 'तड़ाग' शब्द का क्या अर्थ है — तालाब / सरोवर।
- 'कलधौत के धाम' का क्या अर्थ है — सोने-चाँदी के महल।
- करील के कुंजों (झाड़ियों) के ऊपर कवि क्या न्योछावर करना चाहते हैं — करोड़ों सोने के महल (कोटिक रौ कलधौत के धाम)।
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