बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिन्दी (गद्य खंड) | पाठ 11: "नौबतखाने में इबादत" — यतींद्र मिश्र
सम्पूर्ण 50 महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
उत्तर: यतींद्र मिश्र।
उत्तर: सन् 1977 में अयोध्या, उत्तर प्रदेश में।
उत्तर: लखनऊ विश्वविद्यालय से।
उत्तर: 'यदा-कदा', 'अयोध्या तथा अन्य कविताएँ' और 'ड्योढ़ी पर आलाप'।
उत्तर: 'गिरिजा'।
उत्तर: प्रख्यात नृत्यांगना सोनल मान सिंह के साथ।
उत्तर: 'विमला देवी फाउंडेशन' का।
उत्तर: 'यार जुलाहे' नाम से।
उत्तर: यह व्यक्तिचित्र (संस्मरण) है, जो भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर केंद्रित है।
उत्तर: कमरुद्दीन।
उत्तर: शम्सुद्दीन।
उत्तर: सन् 1916 ई० में डुमराँव (बिहार) के एक संगीत प्रेमी परिवार में।
उत्तर: रीड (नरकट) का।
उत्तर: नरकट (एक प्रकार की घास) से, जो डुमराँव के आसपास की नदियों के कछारों में पाई जाती है।
उत्तर: परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ, पिता पैगंबरबख्श खाँ और माता मिठन थीं।
उत्तर: सादिक हुसैन तथा अलीबख्श।
उत्तर: काशी के पंचगंगा घाट स्थित बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी पर।
उत्तर: रसूलनबाई और बतूलनबाई से।
उत्तर: 'सुषिर-वाद्यों' में।
उत्तर: 'नय'।
उत्तर: सुषिर वाद्यों में शाह (सर्वश्रेष्ठ) होने के कारण।
उत्तर: 'नागस्वरम्'।
उत्तर: एक सच्चे और असरदार 'सुर' की नेमत।
उत्तर: आठवीं तारीख (जिस दिन वे खड़े होकर दालमंडी से फातमान तक 8 किमी पैदल रोते हुए नौहा बजाते जाते थे)।
उत्तर: सुलोचना।
उत्तर: कुलसुम हलवाइन की।
उत्तर: पाँच दिनों तक।
उत्तर: 'आनंदकानन' के नाम से।
उत्तर: "धत्! पगली ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नहीं... मालिक से यही दुआ है कि फटा सुर न बख्शें"।
उत्तर: 21 अगस्त 2006 को, 90 वर्ष की भरी-पूरी आयु में।
उत्तर: डुमराँव बिस्मिल्ला खाँ की जन्मभूमि है और वहाँ की नदियों के कछारों में 'नरकट' घास पाई जाती है, जिससे शहनाई में फूँकने वाली 'रीड' बनाई जाती है।
उत्तर: बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी पर उनके खानदान की पीढ़ियों ने शहनाई बजाई। बिस्मिल्ला खाँ ने 14 वर्ष की उम्र से वहाँ के नौबतखाने में रियाज कर संगीत की साधना की।
उत्तर: उनके घर के रास्ते से गुजरते हुए बिस्मिल्ला खाँ ने ठुमरी, टप्पे और दादरा के बोल सुने, जिससे उनके बाल-मन की स्लेट पर संगीत की पहली वर्णमाला उकेरी गई।
उत्तर: फूँककर बजने वाले सभी सुषिर वाद्यों में शहनाई की मंगलध्वनि, सुरों का लालित्य और मिठास सर्वश्रेष्ठ है, इसलिए इसे 'शाहनेय' कहा गया।
उत्तर: वे खुदा से सिर्फ 'सच्चे सुर की नेमत' माँगते थे, ऐसा सुर जिसमें वह तासीर हो कि सुनने वाले की आँखों से सच्चे मोती जैसे अनगढ़ आँसू छलक पड़ें।
उत्तर: मुहर्रम के पूरे 10 दिनों तक उनके खानदान का कोई भी व्यक्ति न शहनाई बजाता था और न ही किसी संगीत कार्यक्रम में भाग लेता था।
उत्तर: क्योंकि जब कुलसुम खौलते घी में कचौड़ी डालती थी, तो छन से उठने वाली आवाज में खाँ साहब को संगीत के सारे आरोह-अवरोह सुनाई देते थे।
उत्तर: वे काशी से बाहर होने पर हमेशा काशी विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते थे और उसी ओर शहनाई का प्याला घुमाकर बजाते थे।
उत्तर: काशी में संगीत, कला, धर्म और भाईचारे का अनूठा संगम है; यहाँ हनुमान और विश्वनाथ के साथ बिस्मिल्ला खाँ और गंगा की साझी तहजीब बसती है।
उत्तर: उन्होंने कहा कि लुंगी का क्या है, वह फटने पर सिल सकती है, लेकिन यदि एक बार सुर फट गया (बेसुरा हो गया), तो ईश्वर भी उसे माफ नहीं करेगा।
उत्तर: पक्का महाल से मलाई-बरफ बेचने वालों का जाना, कचौड़ी-जलेबी की पुरानी खुशबू का खोना और संगीत व संगतकारों के प्रति घटता आदर उन्हें दुखी करता था।
उत्तर: उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न', 'पद्मविभूषण' और 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' सहित अनेक मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया।
उत्तर: वे कवि और संपादक हैं, जिन्होंने 'विमला देवी फाउंडेशन' तथा 'थाती' व 'सहित' पत्रिकाओं के माध्यम से शास्त्रीय संगीत और लोक-कलाओं का संवर्धन किया।
उत्तर: वे कहते थे कि जिस जमीन ने तालीम और अदब दी, उसे छोड़कर कहाँ जाएँ; उनके लिए शहनाई और काशी से बढ़कर इस धरती पर कोई जन्नत नहीं थी।
उत्तर: अपार ख्याति और भारत रत्न पाने के बाद भी उनका स्वभाव अत्यंत सरल, निरहंकारी और जीवन भर संगीत सीखने के प्रति समर्पित रहा।
उत्तर: प्रस्तुत पाठ में लेखक यतींद्र मिश्र ने भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन, संगीत साधना, धार्मिक सद्भाव और सादगी का सजीव चित्रण किया है। डुमराँव में जन्मे कमरुद्दीन ने काशी के बालाजी मंदिर के नौबतखाने में वर्षों रियाज कर शहनाई को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित किया। वे सच्चे नमाजी मुस्लिम थे, किंतु काशी विश्वनाथ और गंगा मैया के प्रति उनकी अनन्य भक्ति थी। वे मुहर्रम के शोक को पूरे समर्पण से मनाते थे। जीवन भर पुरस्कारों और ऐश्वर्य से दूर रहकर वे केवल 'सच्चे सुर' की इबादत करते रहे। यह पाठ उनकी सादगी, गंगा-जमुनी तहजीब और संगीत के प्रति असीम समर्पण की अमर गाथा है।
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ का व्यक्तित्व भारत की मिली-जुली संस्कृति का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है:
- वे पाँचों वक्त नमाज पढ़ने वाले समर्पित मुस्लिम थे और मुहर्रम में 8 किमी पैदल रोते हुए नौहा बजाते थे।
- साथ ही वे बाबा विश्वनाथ और बालाजी के परम भक्त थे; संकटमोचन मंदिर में नियमित बजाते थे और बाहर रहने पर मंदिर की ओर मुँह करके शहनाई का रुख करते थे।
- वे गंगा मैया को अपनी माँ मानते थे और काशी को स्वर्ग से भी बढ़कर समझते थे।
उत्तर: 'नौबतखाना' प्रवेश द्वार के ऊपर वह स्थान होता है जहाँ मांगलिक वाद्य बजाए जाते हैं, और 'इबादत' का अर्थ ईश्वर की प्रार्थना/उपासना है। बिस्मिल्ला खाँ के लिए शहनाई वादन केवल एक पेशा नहीं था, बल्कि नौबतखाने में बैठकर की जाने वाली खुदा की सच्ची इबादत थी। वे हर धुन और सुर के माध्यम से ईश्वर से साक्षात्कार करते थे। यह शीर्षक खाँ साहब के संगीत को पूजा और अध्यात्म का दर्जा देता है, इसलिए यह पूर्णतः सटीक और सार्थक है।
उत्तर: भारत रत्न मिलने के बाद भी खाँ साहब का जीवन सादगी की मिसाल था। जब उनकी शिष्या ने उन्हें फटी तहमत (लुंगी) न पहनने की सलाह दी, तो उन्होंने सहजता से कहा कि भारत रत्न उनकी शहनाई को मिला है, लुंगी को नहीं। वे ईश्वर से कभी धन-दौलत नहीं माँगते थे, बल्कि केवल एक ही प्रार्थना करते थे कि उनका सुर कभी न फटे। 90 वर्ष की आयु तक वे संगीत के एक समर्पित विद्यार्थी की तरह निरंतर सीखने की ललक बनाए रखे।
उत्तर:
- प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ यतींद्र मिश्र द्वारा रचित व्यक्तिचित्र 'नौबतखाने में इबादत' से उद्धृत हैं। इसमें उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का काशी और अपनी मिट्टी के प्रति अगाध प्रेम प्रकट हुआ है।
- व्याख्या: खाँ साहब कहते हैं कि काशी उनके जीवन की आत्मा है। जहाँ गंगा मैया का पावन तट, बाबा विश्वनाथ का सान्निध्य और बालाजी का वह मंदिर है जहाँ उनके पूर्वज पीढ़ियों से रियाज करते आए हैं, उस पावन भूमि को छोड़कर वे कहीं नहीं जा सकते। जिस काशी ने उन्हें संस्कार, अदब और संगीत की तालीम दी, वही उनके लिए संसार का सबसे बड़ा स्वर्ग (जन्नत) है। यह उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि के प्रति अनन्य कृतज्ञता को दर्शाता है।
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