Class 10 Hindi (गोधूलि भाग-2: काव्य खंड)
अध्याय 1: राम नाम बिनु बिरथे जगि जन्मा / जो नर दुख में दुख नहिं मानै (रचयिता: गुरु नानक)
I. कविता के साथ (प्रश्न-उत्तर)
प्रश्न 1: कवि किसके बिना जगत् में यह जन्म व्यर्थ मानता है?
उत्तर:
कवि गुरु नानक भगवान 'राम के नाम' के स्मरण व जप के बिना संसार में मनुष्य के जन्म को व्यर्थ (निरर्थक) मानते हैं। उनके अनुसार, राम-नाम का जाप किए बिना व्यक्ति का बोलना विश (विष) के समान हो जाता है और वह सांसारिक मोह-माया के भ्रम में उलझकर व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है।
कवि गुरु नानक भगवान 'राम के नाम' के स्मरण व जप के बिना संसार में मनुष्य के जन्म को व्यर्थ (निरर्थक) मानते हैं। उनके अनुसार, राम-नाम का जाप किए बिना व्यक्ति का बोलना विश (विष) के समान हो जाता है और वह सांसारिक मोह-माया के भ्रम में उलझकर व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है।
प्रश्न 2: वाणी कब विष के समान हो जाती है?
उत्तर:
कवि के अनुसार, जब मनुष्य ईश्वर का नाम (राम-नाम) नहीं लेता, तब उसकी वाणी विष के समान हो जाती है। राम-नाम से रहित होकर बोली गई बातें व्यर्थ होती हैं और वे केवल मानसिक भ्रम व भटकाव पैदा करती हैं।
कवि के अनुसार, जब मनुष्य ईश्वर का नाम (राम-नाम) नहीं लेता, तब उसकी वाणी विष के समान हो जाती है। राम-नाम से रहित होकर बोली गई बातें व्यर्थ होती हैं और वे केवल मानसिक भ्रम व भटकाव पैदा करती हैं।
प्रश्न 3: नाम-कीर्तन के आगे कवि किन कर्मों की व्यर्थता सिद्ध करता है?
उत्तर:
नाम-कीर्तन के आगे कवि निम्नलिखित कर्मकांडों और बाह्य दिखावों को व्यर्थ सिद्ध करता है:
नाम-कीर्तन के आगे कवि निम्नलिखित कर्मकांडों और बाह्य दिखावों को व्यर्थ सिद्ध करता है:
- वेद-शास्त्र, पुस्तकों एवं व्याकरण का पाठ व बखान करना।
- संध्याकालीन पूजा-पाठ (संध्या कर्म) करना।
- दंड, कमंडल धारण करना, शिखा (चोटी) बढ़ाना, जनेऊ (सूत) पहनना तथा धोती धारण करना।
- तीर्थ-यात्रा करना और शरीर पर भस्म लगाकर नंगे घूमना।
- बड़ी-बड़ी जटाएँ बढ़ाकर मुकुट की तरह धारण करना।
प्रश्न 4: प्रथम पद के आधार पर बताएँ कि कवि ने अपने युग में धर्म-साधना के कैसे-कैसे रूप देखे थे?
उत्तर:
प्रथम पद के आधार पर कवि ने अपने युग में धर्म-साधना के बाह्य आडंबरों और कर्मकांडों से भरे रूप देखे थे। लोग ईश्वर-भक्ति की आंतरिक अनुभूति को छोड़कर तीर्थ-यात्राओं, कमंडल व दंड धारण करने, भस्म लगाने, जटा बढ़ाने, नग्न रहने और विविध अनुष्ठान करने को ही धर्म समझते थे। कवि ने इन सभी को नाम-कीर्तन के बिना निष्फल और व्यर्थ माना है।
प्रथम पद के आधार पर कवि ने अपने युग में धर्म-साधना के बाह्य आडंबरों और कर्मकांडों से भरे रूप देखे थे। लोग ईश्वर-भक्ति की आंतरिक अनुभूति को छोड़कर तीर्थ-यात्राओं, कमंडल व दंड धारण करने, भस्म लगाने, जटा बढ़ाने, नग्न रहने और विविध अनुष्ठान करने को ही धर्म समझते थे। कवि ने इन सभी को नाम-कीर्तन के बिना निष्फल और व्यर्थ माना है।
प्रश्न 5: हरिरस से कवि का अभिप्राय क्या है?
उत्तर:
'हरिरस' से कवि का अभिप्राय ईश्वर की भक्ति का रस (आनंद) तथा राम-नाम के स्मरण से मिलने वाले परम आनंद से है। जिस प्रकार कोई स्वादिष्ट पेय पीने से तृप्ति मिलती है, उसी प्रकार गुरु की कृपा से मिलने वाले राम-नाम रूपी 'हरिरस' का पान करने से आत्मा अमर, तृप्त और सांसारिक दुखों से मुक्त हो जाती है।
'हरिरस' से कवि का अभिप्राय ईश्वर की भक्ति का रस (आनंद) तथा राम-नाम के स्मरण से मिलने वाले परम आनंद से है। जिस प्रकार कोई स्वादिष्ट पेय पीने से तृप्ति मिलती है, उसी प्रकार गुरु की कृपा से मिलने वाले राम-नाम रूपी 'हरिरस' का पान करने से आत्मा अमर, तृप्त और सांसारिक दुखों से मुक्त हो जाती है।
प्रश्न 6: कवि की दृष्टि में ब्रह्म का निवास कहाँ है?
उत्तर:
कवि की दृष्टि में ब्रह्म का निवास उस मनुष्य के हृदय (घट) में होता है जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, हर्ष-शोक, मान-अपमान तथा सांसारिक आसक्ति से पूरी तरह मुक्त है। जो मनुष्य सुख और दुख को एक समान मानता है, उसी के निष्पाप व निर्मल अंतःकरण में ब्रह्म स्वयं निवास करते हैं।
कवि की दृष्टि में ब्रह्म का निवास उस मनुष्य के हृदय (घट) में होता है जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, हर्ष-शोक, मान-अपमान तथा सांसारिक आसक्ति से पूरी तरह मुक्त है। जो मनुष्य सुख और दुख को एक समान मानता है, उसी के निष्पाप व निर्मल अंतःकरण में ब्रह्म स्वयं निवास करते हैं।
प्रश्न 7: गुरु की कृपा से किस युक्ति की पहचान हो पाती है?
उत्तर:
गुरु की कृपा से ईश्वर से एकाकार (लीनाकार) होने की युक्ति की पहचान हो पाती है। गुरु की कृपा होने पर मनुष्य सांसारिक विकारों और मोह-माया से ऊपर उठ जाता है और जिस तरह पानी में पानी मिलकर एक हो जाता है, उसी प्रकार आत्मा परमात्मा (गोविंद) में लीन हो जाती है।
गुरु की कृपा से ईश्वर से एकाकार (लीनाकार) होने की युक्ति की पहचान हो पाती है। गुरु की कृपा होने पर मनुष्य सांसारिक विकारों और मोह-माया से ऊपर उठ जाता है और जिस तरह पानी में पानी मिलकर एक हो जाता है, उसी प्रकार आत्मा परमात्मा (गोविंद) में लीन हो जाती है।
प्रश्न 8: व्याख्या करें –
(क) "राम नाम बिनु अरुझि मरै।"
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक 'गोधूलि भाग-2' के प्रथम पद 'राम नाम बिनु बिरथे जगि जन्मा' से ली गई है, जिसके रचयिता संत गुरु नानक हैं।
व्याख्या: कवि गुरु नानक कहते हैं कि जो मनुष्य ईश्वर के नाम (राम-नाम) का स्मरण नहीं करता, वह जीवन भर माया-मोह, अहंकार और कर्मकांडों के जाल में ही उलझकर नष्ट हो जाता है। राम-नाम के बिना मुक्ति संभव नहीं है।
(ख) "कंचन माटी जानै।"
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति गुरु नानक देव जी द्वारा रचित द्वितीय पद 'जो नर दुख में दुख नहिं मानै' से उद्धृत है।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि सच्चा साधक वह है जो सुख-दुख में समभाव रखता है। उसके लिए सोना (कंचन) भी मिट्टी के समान मूल्यहीन है। ऐसा व्यक्ति धन, संपत्ति और सांसारिक प्रलोभनों से परे रहकर निष्काम भाव से जीवन जीता है।
(ग) "हरष सोक तें रहै नियारो, नाहि मान अपमाना।"
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ गुरु नानक रचित 'जो नर दुख में दुख नहिं मानै' पद से ली गई हैं।
व्याख्या: इन पंक्तियों में सच्चे ज्ञानी मनुष्य के लक्षणों का वर्णन है। जो व्यक्ति हर्ष (खुशी) और शोक (दुख) दोनों स्थितियों में शांत और अलग (नियारो) रहता है तथा जिसे न मान की चिंता है और न अपमान का भय, वही वास्तव में ईश्वर की कृपा प्राप्त करने योग्य होता है।
(घ) "नानक लीन भयो गोबिंद सो, ज्यों पानी संग पानी।"
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति द्वितीय पद 'जो नर दुख में दुख नहिं मानै' की अंतिम पंक्ति है।
व्याख्या: कवि गुरु नानक कहते हैं कि गुरु की कृपा से जिस मनुष्य को ब्रह्म-ज्ञान की युक्ति मिल जाती है, उसकी आत्मा ईश्वर (गोविंद) में इस तरह एकाकार हो जाती है जैसे पानी में पानी मिलकर अभिन्न हो जाता है।
प्रश्न 9: आधुनिक जीवन में उपासना के प्रचलित रूपों को देखते हुए नानक के इन पदों की क्या प्रासंगिकता है? अपने शब्दों में विचार करें।
उत्तर:
आज के आधुनिक युग में धर्म और उपासना के नाम पर बाह्य आडंबर, दिखावा, अंधविश्वास और संकीर्णता अत्यधिक बढ़ गई है। लोग पूजा-पाठ, वेशभूषा और अनुष्ठानों को ही धर्म समझ बैठे हैं। ऐसे वातावरण में गुरु नानक जी के पद अत्यंत प्रासंगिक हैं। नानक जी बाहरी दिखावों को खारिज करके सच्चे हृदय से ईश्वर-स्मरण, नैतिक आचरण, मानसिक निर्मलता और मानव-मात्र से प्रेम (सद्भाव) पर बल देते हैं। उनके ये पद हमें सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर आत्म-शुद्धि और शांति का सही मार्ग दिखाते हैं।
आज के आधुनिक युग में धर्म और उपासना के नाम पर बाह्य आडंबर, दिखावा, अंधविश्वास और संकीर्णता अत्यधिक बढ़ गई है। लोग पूजा-पाठ, वेशभूषा और अनुष्ठानों को ही धर्म समझ बैठे हैं। ऐसे वातावरण में गुरु नानक जी के पद अत्यंत प्रासंगिक हैं। नानक जी बाहरी दिखावों को खारिज करके सच्चे हृदय से ईश्वर-स्मरण, नैतिक आचरण, मानसिक निर्मलता और मानव-मात्र से प्रेम (सद्भाव) पर बल देते हैं। उनके ये पद हमें सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर आत्म-शुद्धि और शांति का सही मार्ग दिखाते हैं।
II. कविता के आस-पास
1. गुरुनानक के इन पदों से मिलते-जुलते कबीर के दो पद एकत्र करें।
उत्तर:
-
पद 1 (बाह्य आडंबर का विरोध):
"माला तो कर में फिरै, जिभि फिरै मुख माँहि।
मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाँहि।।" -
पद 2 (समभाव और आंतरिक भक्ति):
"मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।
ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में।।"
2. नाम महिमा का बखान करने वाले सगुण भक्त कवियों के कुछ वचन एकत्र कर विचार करें कि दोनों के भावों में कहाँ तक समानता है?
उत्तर:
-
सगुण भक्त (तुलसीदास जी) का वचन:
"राम नाम मनिदीप धरू जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जऊ चाहसि उजिआर।।" - समानता: निर्गुण संत गुरु नानक और सगुण भक्त तुलसीदास दोनों ही मानते हैं कि राम-नाम का जप ही मनुष्य का कल्याण कर सकता है। अंतर केवल यह है कि निर्गुण कवि निराकार ब्रह्म के नाम-स्मरण पर बल देते हैं, जबकि सगुण कवि साकार रूप (श्रीराम) के नाम का आश्रय लेते हैं, परंतु 'नाम की महिमा' के मामले में दोनों के विचार पूर्णतः समान हैं।
3. मध्ययुग के निर्गुण संत कवियों की काल-निर्देश करते हुए एक क्रमवार सूची तैयार करें।
उत्तर:
मध्ययुग के प्रमुख निर्गुण संत कवि (काल-क्रमानुसार):
मध्ययुग के प्रमुख निर्गुण संत कवि (काल-क्रमानुसार):
- कबीरदास: (1398 ई० - 1518 ई०)
- संत रैदास (रविदास): (15वीं शताब्दी)
- गुरु नानक देव: (1469 ई० - 1539 ई०)
- दादू दयाल: (1544 ई० - 1603 ई०)
- मलूकदास: (1574 ई० - 1682 ई०)
- सुंदरदास: (1596 ई० - 1689 ई०)
4. 'गोधूलि भाग-1' में पठित रैदास के पदों के साथ गुरुनानक के इन पदों की तुलना करते हुए एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
टिप्पणी: संत रैदास और गुरु नानक दोनों ही मध्यकालीन निर्गुण भक्तिधारा के प्रमुख संत हैं। दोनों के पदों में बाह्य कर्मकांडों, जाति-पाति और सामाजिक भेदभाव का कड़ा विरोध देखने को मिलता है। रैदास जहाँ प्रभु की दास्य-भक्ति और समरसता पर बल देते हैं ("प्रभु जी तुम चंदन हम पानी"), वहीं गुरु नानक राम-नाम के कीर्तन, गुरु की कृपा और सुख-दुख में समभाव रखते हुए ईश्वर में लीन होने की शिक्षा देते हैं। दोनों का मूल संदेश आंतरिक पवित्रता और सहज प्रेम ही है।
टिप्पणी: संत रैदास और गुरु नानक दोनों ही मध्यकालीन निर्गुण भक्तिधारा के प्रमुख संत हैं। दोनों के पदों में बाह्य कर्मकांडों, जाति-पाति और सामाजिक भेदभाव का कड़ा विरोध देखने को मिलता है। रैदास जहाँ प्रभु की दास्य-भक्ति और समरसता पर बल देते हैं ("प्रभु जी तुम चंदन हम पानी"), वहीं गुरु नानक राम-नाम के कीर्तन, गुरु की कृपा और सुख-दुख में समभाव रखते हुए ईश्वर में लीन होने की शिक्षा देते हैं। दोनों का मूल संदेश आंतरिक पवित्रता और सहज प्रेम ही है।
III. भाषा की बात
1. पद में प्रयुक्त निम्नांकित शब्दों के मानक आधुनिक रूप लिखें –
| पद में प्रयुक्त शब्द | मानक आधुनिक रूप |
|---|---|
| बिरथे | व्यर्थ / बेकार |
| बिखु | विष / ज़हर |
| निहफलु | निष्फल / बिना फल के |
| मति | मति / बुद्धि |
| संधिआ | संध्या / संध्याकालीन उपासना |
| करम | कर्म / कार्य |
| गुरसबद | गुरु का शब्द / गुरु का उपदेश |
| तीरथभगवनु | तीर्थ-भ्रमण / तीर्थ-यात्रा |
| महीअल | महीतल / धरती पर |
| सरब | सर्व / सभी |
| माटी | मिट्टी |
| अस्तुति | स्तुति / प्रशंसा |
| नियारो | न्यारा / अलग |
| जुगति | युक्ति / उपाय |
| पिछानी | पहचानी / पहचान |
2. दोनों पदों में प्रयुक्त सर्वनामों को चिह्नित करें और उनके भेद बताएँ –
| सर्वनाम | संदर्भ (वाक्य) | सर्वनाम का भेद |
|---|---|---|
| तू | सरब जीआ तू | मध्यम पुरुषवाचक सर्वनाम |
| जाके | नाहिं जाके | संबंधवाचक सर्वनाम |
| तिन्ह | तिन्ह यह जुगति | निश्चयवाचक / पुरुषवाचक सर्वनाम |
| सो | सो ज्यों पानी | संबंधवाचक सर्वनाम |
| जेहि | जेहि नर पै | संबंधवाचक सर्वनाम |
3. निम्नलिखित शब्दों के वाक्य-प्रयोग करते हुए लिंग-निर्णय करें –
| शब्द | लिंग | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|
| जग | पुल्लिंग | यह जग परिवर्तनशील है। |
| मुक्ति | स्त्रीलिंग | भक्ति से ही जीव को मुक्ति मिलती है। |
| धोती | स्त्रीलिंग | साधु ने सफेद धोती पहनी है। |
| जल | पुल्लिंग | नदी का जल अत्यंत निर्मल है। |
| भस्म | स्त्रीलिंग/पुल्लिंग | उसने शरीर पर भस्म लगाई है। |
| कंचन | पुल्लिंग | साधक के लिए कंचन मिट्टी समान है। |
| जुगति | स्त्रीलिंग | उसे संकट से निकलने की जुगति मिल गई। |
| स्तुति | स्त्रीलिंग | भक्त ईश्वर की स्तुति कर रहा है। |
4. निम्नलिखित विशेषणों का स्वतंत्र वाक्य प्रयोग करें –
- व्यर्थ: बिना सोचे-समझे बोलना व्यर्थ है।
- निष्फल: बिना मेहनत के सफलता की आशा करना निष्फल प्रयास है।
- नग्न: साधु नग्न अवस्था में तपस्या कर रहा था।
- सर्व: ईश्वर सर्व प्राणियों में विद्यमान हैं।
- न्यारा: उसका आचरण समाज से बिल्कुल न्यारा है।
- सकल: हमें सकल संसार के कल्याण की भावना रखनी चाहिए।
IV. शब्द निधि (शब्दार्थ)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बिरथे | व्यर्थ ही |
| जगि | संसार में |
| बिखु | विष |
| नावै | नाम |
| निहफलु | निष्फल |
| मति | बुद्धि |
| संधिआ | संध्याकालीन उपासना |
| गुरसबद | गुरु का उपदेश |
| अरुझि | उलझकर |
| डंड | वैराग्य का चिह्न/दंड |
| सिखा | चोटी |
| सूत | जनेऊ |
| महीअल | धरती पर |
| कंचन | सोना |
| अस्तुति | प्रार्थना / स्तुति |
| नियारो | अलग |
| परसे | स्पर्श |
| घट | शरीर / हृदय |
| जुगति | उपाय |
| पिछानी | पहचानी |
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