Chapter 1. दही वाली मंगम्मा (कहानी)
कक्षा 10वीं हिंदी (वर्णिका भाग-2) | सम्पूर्ण पाठ्य नोट्स एवं महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
पाठ परिचय (Overview)
- पाठ का नाम: दही वाली मंगम्मा
- विधा: कन्नड़ कहानी (हिंदी अनुवाद)
- मुख्य पात्र: मंगम्मा (दही बेचने वाली स्वाभिमानी ग्रामीण महिला), नंजम्मा (मंगम्मा की बहू), बेटा, पोता, रंगप्पा (गाँव का जुआरी व शौकीन व्यक्ति), कथावाचिका ("माँ जी" / लेखिका)।
- केंद्रीय विषय: पारंपरिक भारतीय ग्रामीण समाज में सास-बहू के बीच अधिकार एवं वर्चस्व की जंग, पारिवारिक अलगाव तथा अंततः समझदारी व वात्सल्य द्वारा परिवार का पुनर्मिलन।/li>
लेखक परिचय (Lekhak Parichay)
- लेखक: श्रीनिवास [मास्ती वेंकटेश अय्यंगार]
- जन्म: 6 जून 1891 ई० (कोलार, कर्नाटक)
- भाषा: कन्नड़ भाषा के प्रमुख कथाकार
- साहित्यिक कद: कन्नड़ साहित्य के प्रतिष्ठित रचनाकार; कविता, नाटक, आलोचना और जीवन-चरित्र में महत्वपूर्ण योगदान।
- पुरस्कार एवं सम्मान: कहानी संकलन 'सण्णा कथेगुलु' के लिए सन् 1968 में 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' तथा सर्वोच्च 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से सम्मानित।
- स्रोत एवं अनुवाद: यह कहानी नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया द्वारा प्रकाशित कहानी संकलन 'कन्नड़ कहानियाँ' से साभार संकलित है। इसका हिंदी अनुवाद बी० आर० नारायण ने किया है।
कहानी का सारांश (Summary)
१. मंगम्मा और उसका व्यवसाय
मंगम्मा अवल्लूर के पास स्थित गाँव वेंकटपुर की रहने वाली थी। वह वर्षों से बंगलूर शहर में आकर 'माँ जी' (कथावाचिका) के घर 'बारी' (प्रतिदिन दही देकर महीने के अंत में पैसे लेने की प्रथा) पर दही पहुँचाया करती थी और अपने सुख-दुख साझा करती थी।
२. सास-बहू का झगड़ा व अलगाव
एक दिन मंगम्मा की बहू नंजम्मा ने अपने बेटे (मंगम्मा के पोते) की किसी बात पर बुरी तरह पिटाई कर दी। मंगम्मा ने जब पोते को बचाने के लिए बहू को टोका ("क्यों री राक्षसी..."), तो दोनों में कहा-सुनी हो गई। बेटे ने अपनी पत्नी का पक्ष लिया, जिससे आहत होकर मंगम्मा ने उसी दिन दोपहर से अपना चूल्हा-चौका अलग कर लिया।
३. मंगम्मा का शौक और रंगप्पा की कुदृष्टि
अलग होने के बाद मंगम्मा ने अपने कमाए पैसों से मखमल का ब्लाउज सिलवाया। गाँव का जुआरी रंगप्पा मंगम्मा के पास पैसे होने की बात जानकर रास्ते में अमराई के कुएँ के पास उसे घेरने लगा, उससे कर्ज माँगा और उसके साथ अनुचित व्यवहार की चेष्टा की। मंगम्मा ने यह बात शहर में 'माँ जी' को बताकर अपने पैसे बैंक में सुरक्षित रखने की प्रार्थना की।
४. बहू की चालाकी और सुलह
जब बहू नंजम्मा को रंगप्पा की नीयत और मंगम्मा के धन का पता चला, तो उसने समझदारी से एक युक्ति निकाली। उसने अपने छोटे बेटे को सिखा-पढ़ाकर दादी (मंगम्मा) के पास रहने के लिए भेज दिया। पोते के मोह में मंगम्मा पिघल गई। बाद में बहू और बेटे ने अपनी गलती मानकर मंगम्मा से माफी माँगी। नंजम्मा ने मंगम्मा को धूप में दही बेचने जाने से रोकते हुए खुद दही बेचने की जिम्मेदारी संभाल ली और पूरा परिवार पुनः एक हो गया।
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