पाठ 1: राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा / जो नर दुख में दुख नहिं मानै
बिहार बोर्ड (BSEB) कक्षा 10वीं हिंदी (गोधूलि भाग-2, काव्य खंड) | सम्पूर्ण नोट्स
1. पाठ का संक्षिप्त परिचय (Overview)
-
शीर्षक:
- राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा (प्रथम पद)
- जो नर दुख में दुख नहिं मानै (द्वितीय पद)
- कवि: गुरु नानक (सिख धर्म के प्रवर्तक एवं निर्गुण भक्तिकवि)
-
मूल भाव:
- प्रथम पद में: बाह्य वेश-भूषा, पूजा-पाठ और कर्मकांडीय पाखंड का खंडन करते हुए सच्चे हृदय से 'राम-नाम' के कीर्तन पर बल दिया गया है, क्योंकि प्रभु-स्मरण ही सांसारिक भवसागर से मुक्ति दिलाता है।
- द्वितीय पद में: सुख-दुख, मान-अपमान, निंदा-स्तुति तथा कंचन-मिट्टी में समभाव (तटस्थ) रहने की प्रेरणा दी गई है। जिस व्यक्ति पर गुरु की कृपा होती है, वह ईश्वर (गोविंद) से उसी प्रकार एकाकार हो जाता है जैसे पानी के साथ पानी मिल जाता है।
2. कवि परिचय (गुरु नानक)
- जन्म: सन् 1469 ई० में तलवंडी ग्राम, जिला लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान) में।
- जन्म-स्थान का नाम: 'ननकाना साहब'।
-
माता-पिता एवं पत्नी:
- पिता: कालूचंद खत्री
- माता: तृप्ता
- पत्नी: सुलखणी
- धर्म प्रवर्तन: इन्होंने 'सिख धर्म' का प्रवर्तन किया।
- भक्ति व विचार: निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासक; वर्णाश्रम व्यवस्था और कर्मकांड का विरोध; हिन्दू-मुसलमान दोनों की समान उपासना और सहज सद्भाव पर बल।
- यात्राएँ: व्यापक देशाटन किया तथा मक्का-मदीना तक की यात्रा की। मुग़ल सम्राट बाबर से भी इनकी भेंट हुई थी।
- भाषा-शैली: पंजाबी के साथ-साथ हिंदी में भी काव्य-रचना की। इनकी हिंदी में ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों का सुंदर मेल है।
- रचनाओं का संकलन: सिखों के 5वें गुरु, गुरु अर्जुनदेव ने सन् 1604 ई० में इनकी रचनाओं का संग्रह किया, जो 'गुरु ग्रंथ साहिब' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
- प्रमुख कृतियाँ: 'जपुजी', 'आसादीवार', 'रहिरास' और 'सोहिला'।
- निधन: सन् 1539 ई० में 'वाह गुरु' कहते हुए अपने प्राण त्याग दिए।
3. पदों का सरल भावार्थ (पदवार व्याख्या)
प्रथम पद: राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा
"राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा ।
बिखु खावै बिखु बोलै बिनु नावै निहफलु मटि भ्रमना ॥
पुसतक पाठ व्याकरण बखाणैं संधिया करम निकाल करै ।
बिनु गुरसबद मुकति कहा प्राणी राम नाम बिनु अरुझि मरै ॥
डंड कमंडल सिखा सूत धोती तीरथ गवनु अति भ्रमनु करै ।
रामनाम बिनु सांति न आवै जपि हरि हरि नाम सु पारि परै ॥
जटा मुकुट तन भसम लगाई वसन छोड़ि तन नगन भया ।
जेते जीअ जंत जल थल महीअल जत्र तत्र तू सरब जीआ ॥
गुरु परसादि राखिले जन कोउ हरिरस नानक झोलि पीआ ॥"
बिखु खावै बिखु बोलै बिनु नावै निहफलु मटि भ्रमना ॥
पुसतक पाठ व्याकरण बखाणैं संधिया करम निकाल करै ।
बिनु गुरसबद मुकति कहा प्राणी राम नाम बिनु अरुझि मरै ॥
डंड कमंडल सिखा सूत धोती तीरथ गवनु अति भ्रमनु करै ।
रामनाम बिनु सांति न आवै जपि हरि हरि नाम सु पारि परै ॥
जटा मुकुट तन भसम लगाई वसन छोड़ि तन नगन भया ।
जेते जीअ जंत जल थल महीअल जत्र तत्र तू सरब जीआ ॥
गुरु परसादि राखिले जन कोउ हरिरस नानक झोलि पीआ ॥"
भावार्थ:
- भगवान के नाम (राम-नाम) के बिना इस संसार में जन्म लेना व्यर्थ (बिरथे) है। प्रभु-नाम के बिना मनुष्य का बोलना और खाना विष के समान हो जाता है और वह व्यर्थ ही सांसारिक मोह-माया में भटक कर नष्ट हो जाता है।
- मनुष्य चाहे कितनी भी पुस्तकें, शास्त्र व व्याकरण पढ़ ले अथवा तीनों पहर (संध्या) कर्मकांड कर ले, गुरु के शब्द (ज्ञान) के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती। राम-नाम के बिना मनुष्य इस संसार के प्रपंचों में उलझकर मर जाता है।
- हाथ में दंड-कमंडल धारण करने, शिखा (चोटी) बढ़ाने, जनेऊ (सूत) और धोती पहनने तथा तीर्थ-यात्राओं में भटकने से कभी आंतरिक शांति नहीं मिलती। केवल 'हरि-नाम' का जप करने से ही प्राणी भवसागर से पार उतरता है।
- सिर पर जटाओं का मुकुट बनाकर, शरीर पर भस्म लगाकर या वस्त्र त्याग कर नग्न हो जाने से ईश्वर नहीं मिलते। जल, थल और आकाश में जितने भी जीव-जंतु हैं, उन सब में ईश्वर ही व्याप्त हैं।
- गुरु नानक कहते हैं कि जिस किसी पर गुरु की कृपा (परसादि) हो जाती है, वह प्रभु-भक्ति के रस (हरिरस) को पूरे मन से छककर (झोली में लेकर) पी लेता है।
द्वितीय पद: जो नर दुख में दुख नहिं मानै
"जो नर दुख में दुख नहिं मानै ।
सुख सनेह अरु भय नहिं जाके, कंचन माटी जानै ॥
नहिं निंदा नहिं अस्तुति जाके, लोभ मोह अभिमाना ।
हरष सोक तें रहै नियारो, नाहि मान अपमाना ॥
आसा मनसा सकल त्यागि कै जग तें रहै निरासा ।
काम क्रोध जेहि परसे नाहिन तेहिं घट ब्रह्म निवासा ॥
गुरु किरपा जेहि नर पै कीन्हीं तिनह यह जुगति पिछानी ।
नानक लीन भयो गोबिंद सो ज्यों पानी सँग पानी ॥"
सुख सनेह अरु भय नहिं जाके, कंचन माटी जानै ॥
नहिं निंदा नहिं अस्तुति जाके, लोभ मोह अभिमाना ।
हरष सोक तें रहै नियारो, नाहि मान अपमाना ॥
आसा मनसा सकल त्यागि कै जग तें रहै निरासा ।
काम क्रोध जेहि परसे नाहिन तेहिं घट ब्रह्म निवासा ॥
गुरु किरपा जेहि नर पै कीन्हीं तिनह यह जुगति पिछानी ।
नानक लीन भयो गोबिंद सो ज्यों पानी सँग पानी ॥"
भावार्थ:
- सच्चा साधक वही है जो विपत्ति या दुख आने पर दुखी होकर विचलित नहीं होता।
- जिसके हृदय में न तो सुख के प्रति मोह (स्नेह) है, न कोई भय है, और जो सोने (कंचन) को भी मिट्टी के समान तुच्छ समझता है।
- जिसके लिए निंदा और प्रशंसा (अस्तुति) दोनों एक समान हैं, जो लोभ, मोह और अहंकार से सर्वथा मुक्त है; तथा जो हर्ष और शोक (सुख-दुख) एवं मान-अपमान से परे तटस्थ रहता है।
- जिसने सांसारिक आशाओं और तृष्णाओं का त्याग कर दिया है और जिसे काम तथा क्रोध स्पर्श तक नहीं कर पाते, उसी व्यक्ति के हृदय (घट) में साक्षात् ब्रह्म का वास होता है।
- जिस मनुष्य पर गुरु की सच्ची कृपा होती है, वही ईश्वर-प्राप्ति की इस युक्ति (रहस्य) को पहचान पाता है। गुरु नानक कहते हैं कि गुरु कृपा से वे गोविंद (ईश्वर) के साथ इस प्रकार एकाकार और लीन हो गए हैं, जैसे पानी के साथ पानी मिलकर एक हो जाता है।
4. पाठ का सारांश (Summary)
प्रस्तुत दोनों पदों में सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी ने बाह्य पाखंडों का खंडन करते हुए आंतरिक शुद्धि और सच्ची भक्ति का मार्ग दिखाया है। प्रथम पद में वे स्पष्ट करते हैं कि जटा बढ़ाना, भस्म लगाना, तीर्थ भ्रमण करना, वस्त्र त्यागना या शास्त्रों का पाठ करना सब व्यर्थ है यदि हृदय में राम-नाम का वास न हो। द्वितीय पद में वे एक आदर्श मनुष्य के लक्षण बताते हैं जो सुख-दुख, कंचन-माटी, निंदा-स्तुति और मान-अपमान में एक समान रहता है। जिस व्यक्ति पर गुरु की कृपा होती है, वह काम-क्रोध से मुक्त होकर ईश्वर में जल और पानी की तरह विलीन हो जाता है।
5. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य (Important One-Liners)
- 'राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा' तथा 'जो नर दुख में दुख नहिं मानै' के रचयिता कौन हैं — गुरु नानक।
- गुरु नानक का जन्म कब और कहाँ हुआ था — सन् 1469 ई० में तलवंडी ग्राम, जिला लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान) में।
- गुरु नानक के जन्म-स्थान को किस नाम से जाना जाता है — 'ननकाना साहब'।
- गुरु नानक के पिता का नाम कालूचंद खत्री, माता का नाम तृप्ता तथा पत्नी का नाम सुलखणी था।
- 'सिख धर्म' का प्रवर्तन किसने किया — गुरु नानक ने।
- गुरु नानक की भेंट किस मुग़ल सम्राट से हुई थी — बाबर से।
- गुरु नानक की रचनाओं का संग्रह सिखों के किस गुरु ने किया — 5वें गुरु, गुरु अर्जुनदेव ने (सन् 1604 ई० में)।
- गुरु नानक की रचनाओं के संग्रह को क्या कहा जाता है — 'गुरु ग्रंथ साहिब'।
- गुरु नानक की प्रमुख रचनाएँ कौन-सी हैं — 'जपुजी', 'आसादीवार', 'रहिरास' और 'सोहिला'।
- गुरु नानक का निधन कब हुआ — सन् 1539 ई० में ('वाह गुरु' कहते हुए)।
- गुरु नानक किस भक्ति धारा के कवि हैं — निर्गुण भक्तिकवि।
- किसके बिना जगत में जन्म लेना व्यर्थ माना गया है — राम-नाम के बिना।
- राम-नाम के बिना मनुष्य की वाणी और भोजन किसके समान हो जाता है — विष (बिखु) के समान।
- 'कंचन' शब्द का क्या अर्थ है — सोना (स्वर्ण)।
- ब्रह्म का निवास कहाँ होता है — जिस मनुष्य को काम और क्रोध स्पर्श नहीं करते (पवित्र अंतःकरण वाले व्यक्ति के हृदय में)।
- 'हरिरस' का क्या तात्पर्य है — ईश्वर की भक्ति का रस / राम-नाम का आनंद।
- नानक गोविंद से किस प्रकार लीन हो गए — जैसे पानी के साथ पानी मिल जाता है।
0 Comments