Chapter 3. सन्धि प्रकरण | BSEB 10 Sanskrit Grammar


सन्धि प्रकरण (Sandhi) - तृतीय अध्याय | व्याकरणवीथीः

व्याकरणवीथीः | तृतीयः अध्यायः

सन्धि

(Phonetic Conjunctions: स्वर, व्यंजन एवं विसर्ग सन्धि)

सन्धि की परिभाषा एवं मुख्य भेद

व्याकरण के संदर्भ में 'सन्धि' शब्द का अर्थ है वर्ण विकार (परिवर्तन)। यह वर्ण विधि है। दो पदों या एक ही पद में दो वर्णों के परस्पर व्यवधानरहित सामीप्य अर्थात् संहिता ('परः संनिकर्षः संहिता') में जो वर्ण विकार (परिवर्तन) होता है, उसे सन्धि कहते हैं।

यथा — विद्या + आलयः = विद्यालयः।
यहाँ पर विद् + आ + आ + लयः में आ + आ की अत्यंत समीपता के कारण दो दीर्घ वर्णों के स्थान पर एक 'आ' वर्ण रूप दीर्घ एकादेश हो गया है।

सन्धि के मुख्यतया तीन भेद होते हैं —

  1. स्वर सन्धि (अच् सन्धि)
  2. व्यंजन सन्धि (हल् सन्धि)
  3. विसर्ग सन्धि
1. स्वर सन्धि (अच् सन्धि)

दो स्वर वर्णों की अत्यंत समीपता के कारण यथाप्राप्त वर्ण विकार को स्वर सन्धि कहते हैं। इसके निम्नलिखित प्रमुख भेद हैं—

i) दीर्घ सन्धि (अकः सवर्णे दीर्घः)
सूत्र: अकः सवर्णे दीर्घः

यदि ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ तथा 'ऋ' स्वरों के पश्चात् ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ या ऋ स्वर आएँ तो दोनों मिलकर क्रमशः आ, ई, ऊ तथा ॠ हो जाते हैं।

नियम सूत्र:
• अ/आ + अ/आ = आ  |  • इ/ई + इ/ई = ई  |  • उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ  |  • ऋ/ॠ + ऋ/ॠ = ॠ

उदाहरण —
  • पुस्तक + आलयः = पुस्तकालयः
  • देव + आशीषः = देवाशीषः
  • दैत्य + अरिः = दैत्यारिः
  • च + अपि = चापि
  • विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
  • गिरि + इन्द्रः = गिरीन्द्रः
  • कपि + ईशः = कपीशः (कपिशः)
  • मही + ईशः = महीशः
  • नदी + ईशः = नदीशः
  • लक्ष्मी + ईश्वरः = लक्ष्मीश्वरः
  • सु + उक्तिः = सूक्तिः
  • भानु + उदयः = भानूदयः
  • पितृ + ऋणम् = पितॄणाम् (पितॄणम्)
ii) गुण सन्धि (आद्गुणः)
सूत्र: आद्गुणः (अदेङ् गुणः)

यदि 'अ' या 'आ' के बाद 'इ' या 'ई' आए तो दोनों के स्थान पर 'ए' एकादेश हो जाता है। यदि 'अ' या 'आ' के बाद 'उ' या 'ऊ' आए तो दोनों के स्थान पर 'ओ' एकादेश हो जाता है। यदि 'अ' या 'आ' के बाद 'ऋ' या 'ॠ' आए तो दोनों के स्थान पर 'अर्' एकादेश हो जाता है।
* अ, ए एवं ओ वर्णों को 'गुण' वर्ण कहा जाता है।

उदाहरण —
  • अ/आ + इ/ई = ए : उप + इन्द्रः = उपेन्द्रः | देव + इन्द्रः = देवेन्द्रः | गण + ईशः = गणेशः | महा + ईशः = महेशः | नर + ईशः = नरेशः | सुर + ईशः = सुरेशः | लता + इव = लतेव | गंगा + इति = गंगेति
  • अ/आ + उ/ऊ = ओ : भाग्य + उदयः = भाग्योदयः | सूर्य + उदयः = सूर्योदयः | नर + उत्तमः = नरोत्तमः | हित + उपदेशः = हितोपदेशः | महा + उत्सवः = महोत्सवः | गंगा + उदकम् = गंगोदकम् | यथा + उचितम् = यथोचितम् | गंगा + ऊर्मिः = गंगोर्मिः | महा + ऊरुः = महोरुः | नव + ऊढा = नवोढा
  • अ/आ + ऋ/ॠ = अर् : देव + ऋषिः = देवर्षिः | ग्रीष्म + ऋतुः = ग्रीष्मर्तुः | वर्षा + ऋतुः = वर्षर्तुः
iii) वृद्धि सन्धि (वृद्धिरेचि)
सूत्र: वृद्धिरेचि (वृद्धिरादैच्)

यदि 'अ' या 'आ' के बाद 'ए' या 'ऐ' आए तो दोनों के स्थान पर 'ऐ' एकादेश हो जाता है। इसी तरह 'अ' या 'आ' के बाद 'ओ' या 'औ' आए तो दोनों के स्थान पर 'औ' एकादेश हो जाता है।
* आ, ऐ एवं औ वर्णों को 'वृद्धि' वर्ण कहते हैं।

उदाहरण —
  • अ/आ + ए/ऐ = ऐ : मम + एव = ममैव | एक + एकम् = एकैकम् | तव + एव = तवैव | अद्य + एव = अद्यैव | लता + एव = लतैव | तथा + एव = तथैव | सदा + एव = सदैव | देव + ऐश्वर्यम् = देवैश्वर्यम् | आत्म + ऐक्यम् = आत्मैक्यम्
  • अ/आ + ओ/औ = औ : जल + ओघः = जलौघः | मम + ओषधिः = ममौषधिः | नव + ओषधिः = नवौषधिः | विद्या + औचित्यम् = विद्यौचित्यम् | आत्म + औत्सुक्यम् = आत्मौत्सुक्यम्
iv) यण् सन्धि (इको यणचि)
सूत्र: इको यणचि

इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) के स्थान पर यण् (य्, व्, र्, ल्) हो जाता है, जब इ/ई, उ/ऊ, ऋ/ॠ तथा ऌ के बाद कोई असमान स्वर आए।

उदाहरण —
  • इ/ई ⟹ य् : यदि + अपि = यद्यपि | इति + आदि = इत्यादि | अति + आचारः = अत्याचारः | इति + अवदत् = इत्यवदत् | नदी + आवेगः = नद्यावेगः | सखी + ऐश्वर्यम् = सख्यैश्वर्यम्
  • उ/ऊ ⟹ व् : सु + आगतम् = स्वागतम् | अनु + अयः = अन्वयः | अनु + एषणम् = अन्वेषणम् | मधु + अरिः = मध्वरिः | वधू + आगमनम् = वध्वागमनम्
  • ऋ/ॠ ⟹ र् : पितृ + आदेशः = पित्रादेशः | पितृ + उपदेशः = पित्रुपदेशः | मातृ + आज्ञा = मात्राज्ञा
  • ऌ ⟹ ल् : ऌ + आकृतिः = लाकृतिः
v) अयादि सन्धि (एचोऽयवायावः)
सूत्र: एचोऽयवायावः

जब ए, ऐ, ओ तथा औ के बाद कोई स्वर आए तो 'ए' को अय्, 'ऐ' को आय्, 'ओ' को अव् तथा 'औ' को आव् आदेश हो जाते हैं। इसे अयादिचतुष्टय कहते हैं।

उदाहरण —
  • ने + अनम् = नयनम् (ए + अ = अय्)
  • शे + अनम् = शयनम् (ए + अ = अय्)
  • नै + अकः = नायकः (ऐ + अ = आय्)
  • भो + अनम् = भवनम् (ओ + अ = अव्)
  • भानो + ए = भानवे (ओ + ए = अव् + ए)
  • पौ + अकः = पावकः (औ + अ = आव्)
  • नौ + इकः = नाविकः (औ + इ = आव् + इ)
  • भौ + उकः = भावुकः (औ + उ = आव् + उ)
vi) पूर्वरूप सन्धि (एङः पदान्तादति)
सूत्र: एङः पदान्तादति

पूर्वरूप सन्धि को अयादि सन्धि का अपवाद कहा जाता है। पद के अन्त में स्थित ए, ओ के बाद यदि ह्रस्व 'अ' आए तो 'ए+अ' के स्थान पर 'ए' तथा 'ओ+अ' के स्थान पर 'ओ' एकादेश हो जाता है। उस विलीन 'अ' का रूप लिपि में अवग्रह चिह्न (ऽ) द्वारा अंकित किया जाता है। उच्चारण में अवग्रह का उच्चारण नहीं होता।

उदाहरण —
  • ते + अपि = तेऽपि
  • हरे + अव = हरेऽव
  • वृक्षे + अपि = वृक्षेऽपि
  • जले + अस्ति = जलेऽस्ति
  • गोपालो (गोपालः) + अहम् = गोपालोऽहम्
  • विष्णो + अव = विष्णोऽव
vii) प्रकृतिभाव (प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्)
सूत्र: प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् | ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम् | अदसो मात्

प्रकृतिभाव का अर्थ है— सन्धि करने का निषेध करना, अर्थात् प्रकृत वर्णों में कोई विकार न करके उन्हें ज्यों का त्यों बनाए रखना। यदि कोई वर्ण प्लुत या प्रगृह्य संज्ञक होता है और उसके बाद स्वर (अच्) आता है, तो सन्धि नहीं होती।

  • (क) ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम्: ईकारान्त, ऊकारान्त तथा एकारान्त द्विवचन रूपों की प्रगृह्य संज्ञा होती है।
    • कवी + इच्छतः = कवी इच्छतः (कवीच्छतः नहीं होगा)
    • विष्णू + इमौ = विष्णू इमौ
    • बालिके + आगच्छतः = बालिके आगच्छतः
  • (ख) अदसो मात्: 'अदस्' शब्द के 'म' के बाद 'ई' या 'ऊ' आए तो प्रगृह्य संज्ञा होती है।
    • अमी + ईशाः = अमी ईशाः | अमू + आसाते = अमू आसाते
  • (ग) प्लुत वर्ण का उदाहरण: एहि कृष्ण ३ अत्र गौश्चरति। (यहाँ सम्बोधन पद 'कृष्ण' में 'अ' प्लुत होने से दीर्घ सन्धि नहीं हुई)।
viii) पररूप सन्धि (एङि पररूपम्)
सूत्र: एङि पररूपम्

अकारान्त उपसर्ग के पश्चात् यदि 'ए' या 'ओ' से प्रारम्भ होने वाली धातु आए तो पूर्व 'अ' और पर 'ए/ओ' दोनों के स्थान पर पररूप एकादेश (ए/ओ) हो जाता है। यह वृद्धि सन्धि का अपवाद है।

उदाहरण —
  • प्र + एजते = प्रेजते (प्रैजते नहीं होगा)
  • उप + ओषति = उपोषति (उपौषति नहीं होगा)
2. व्यंजन सन्धि (हल् सन्धि)

व्यंजन के पश्चात् स्वर या दो व्यंजन वर्णों के परस्पर व्यवधानरहित सामीप्य की स्थिति में जो व्यंजन (हल्) वर्ण में विकार होता है, उसे व्यंजन सन्धि कहते हैं।

i) श्चुत्व सन्धि (स्तोः श्चुना श्चुः)

'स्' या 'त' वर्ग (त्, थ्, द्, ध्, न्) का 'श्' या 'च' वर्ग (च्, छ्, ज्, झ्, ञ्) के साथ योग होने पर 'स्' का 'श्' तथा 'त' वर्ग का 'च' वर्ग में परिवर्तन हो जाता है।

उदाहरण —
  • मनस् + चलति = मनश्चलति | रामस् + शेते = रामश्शेते | मनस् + चञ्चलम् = मनश्चञ्चलम् | हरिस् + शेते = हरिश्शेते
  • सत् + चित् = सच्चित् | सत् + चरित्रम् = सच्चरित्रम् | उत् + चारणम् = उच्चारणम् | सत् + जनः = सज्जनः | उत् + ज्वलम् = उज्ज्वलम् | जगत् + जननी = जगज्जननी
ii) ष्टुत्व सन्धि (ष्टुना ष्टुः)

यदि 'स्' या 'त' वर्ग का 'ष्' या 'ट' वर्ग (ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्) के साथ योग हो तो 'स्' का 'ष्' और 'त' वर्ग का 'ट' वर्ग हो जाता है।

उदाहरण —
  • रामस् + षष्ठः = रामष्षष्ठः | हरिस् + टीकते = हरिष्टीकते
  • तत् + टीका = तट्टीका | यत् + टीका = यट्टीका | उत् + डयनम् = उड्डयनम् | आकृष् + तः = आकृष्टः
iii) जश्त्व सन्धि (झलां जशोऽन्ते)

पद के अन्त में स्थित 'झल्' (वर्गों के 1, 2, 3, 4 वर्ण तथा श्, ष्, स्, ह्) के स्थान पर 'जश्' (उसी वर्ग का तृतीय वर्ण: ग, ज, ड, द, ब) हो जाता है।

उदाहरण —
  • वाक् + ईशः = वागीशः | जगत् + ईशः = जगदीशः | सुप् + अन्तः = सुबन्तः | अच् + अन्तः = अजन्तः
  • दिक् + अम्बरः = दिगम्बरः | दिक् + गजः = दिग्गजः | सत् + धर्मः = सद्धर्मः | अप् + जम् = अब्जम् | चित् + रूपम् = चिद्रूपम्
iv) चर्त्व सन्धि (खरि च)

यदि वर्गों के द्वितीय, तृतीय या चतुर्थ वर्ण के बाद वर्ग का प्रथम/द्वितीय वर्ण या श्, ष्, स् (खर्) आए तो पहले वाला वर्ण अपने ही वर्ग का प्रथम वर्ण (चर्) हो जाता है।

उदाहरण —
  • सद् + कारः = सत्कारः (द् + क् = त्क्)
  • लभ् + स्यते = लप्स्यते (भ् + स् = प्स्)
  • दिग् + पालः = दिक्पालः (ग् + प् = क्प्)
v) अनुस्वार सन्धि (मोऽनुस्वारः)

यदि किसी पद के अन्त में स्थित 'म्' के बाद कोई व्यंजन आए तो 'म्' का अनुस्वार (ं) हो जाता है।

उदाहरण —
  • हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे
  • अहम् + गच्छामि = अहं गच्छामि
vi) परसवर्ण सन्धि (अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः)

अनुस्वार के बाद कोई भी वर्गीय व्यंजन आए तो अनुस्वार के स्थान पर आगे आने वाले वर्ण के वर्ग का पञ्चम वर्ण (अनुनासिक) हो जाता है।

उदाहरण —
  • अं + कितः = अङ्कितः | सं + कल्पः = सङ्कल्पः | कुं + ठितः = कुण्ठितः | अं + चितः = अञ्चितः
  • पदान्त में विकल्प: संस्कृतं पठति / संस्कृत्पठति
vii) लत्व सन्धि (तोरलि)

'त' वर्ग के बाद यदि 'ल्' आए तो तवर्ग के वर्णों का 'ल्' हो जाता है। किन्तु 'न्' के बाद 'ल्' आने पर अनुनासिक 'लँ' (महाँल्लाभः) होता है।

उदाहरण —
  • उत् + लङ्घनम् = उल्लङ्घनम् | तत् + लीनः = तल्लीनः | उत् + लिखितम् = उल्लिखितम् | उत् + लेखः = उल्लेखः
  • महान् + लाभः = महाँल्लाभः | विद्वान् + लिखति = विद्वाँल्लिखति
viii) छत्व सन्धि (शश्छोऽटि) एवं तुगागम (छे च)
  • छत्व (शश्छोऽटि): वर्ग के 1, 2, 3, 4 वर्ण या र्, ल्, व्, ह् के बाद स्थित 'श्' का 'छ' हो जाता है।
    • एतत् + शोभनम् = एतच्छोभनम् | तत् + श्रुत्वा = तच्छ्रुत्वा
  • 'च' का आगम (छे च): ह्रस्व स्वर के पश्चात् 'छ' आए तो 'छ' से पूर्व 'च्' का आगम होता है।
    • तरु + छाया = तरुच्छाया | अनु + छेदः = अनुच्छेदः | परि + छेदः = परिच्छेदः
ix) 'र्' का लोप व दीर्घ होना (रो रि) एवं णत्व विधान
  • रो रि (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः): यदि 'र्' के बाद 'र्' हो तो पूर्व 'र्' का लोप होकर उसका पूर्ववर्ती स्वर दीर्घ हो जाता है।
    • स्वर् + राज्यम् = स्वराज्यम् | निर् + रोगः = नीरोगः | निर् + रसः = नीरसः
  • णत्व विधान (रषाभ्यां नो णः समानपदे): यदि एक ही पद में ऋ, र् या ष् के पश्चात् 'न्' आए तो 'न्' का 'ण्' हो जाता है (अट्-कु-पु-आङ्-नुम् व्यवधानेऽपि)।
    • कृष्ण, विष्णु, स्वर्ण, वर्ण, नराणाम्, ऋषीणाम्।
3. विसर्ग सन्धि

विसर्ग (ः) के पश्चात् स्वर या व्यंजन वर्ण के आने पर विसर्ग के स्थान पर होने वाले परिवर्तन को विसर्ग सन्धि कहते हैं।

i) सत्व विधान (विसर्जनीयस्य सः)

यदि विसर्ग के बाद खर् वर्ण (वर्गों के 1, 2 वर्ण तथा श्, ष्, स्) हों तो विसर्ग का 'स्' हो जाता है। च/छ होने पर 'श्' तथा ट/ठ होने पर 'ष्' हो जाता है।

उदाहरण —
  • नमः + ते = नमस्ते | बालकः + तरति = बालकस्तरति | इतः + ततः = इतस्ततः
  • निः + चलः = निश्चलः | शिरः + छेदः = शिरश्छेदः | धनुः + टङ्कारः = धनुष्टङ्कारः
ii) षत्व नियम एवं नमः/पुरः योग

यदि विसर्ग से पूर्व 'इ' या 'उ' हो तथा बाद में क्, ख् या प्, फ् हो तो विसर्ग का 'ष्' हो जाता है। परन्तु 'नमः' और 'पुरः' के बाद क्/प् आने पर 'स्' होता है।

उदाहरण —
  • निः + कपटः = निष्कपटः | निः + फलः = निष्फलः | दुः + कर्म = दुष्कर्म
  • नमः + कारः = नमस्कारः | पुरः + कारः = पुरस्कारः
iii) उत्व, गुण एवं पूर्वरूप (अतो रोर्प्लुतादप्लुते / हशि च)

1. अतो रोर्प्लुतादप्लुते: ह्रस्व 'अ' के बाद विसर्ग हो तथा बाद में भी ह्रस्व 'अ' हो तो विसर्ग को 'उ', फिर अ+उ को गुण 'ओ' और बाद वाले 'अ' को अवग्रह (ऽ) हो जाता है।
• बालः + अयम् ⟹ बाल् + अ + उ + अयम् ⟹ बालो + अयम् ⟹ बालोऽयम्
• सः + अवदत् = सोऽवदत् | नृपः + अवदत् = नृपोऽवदत् | प्रथमः + अध्यायः = प्रथमोऽध्यायः

2. हशि च: यदि विसर्ग से पूर्व 'अ' हो तथा बाद में वर्गों के तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम वर्ण या य्, र्, ल्, व्, ह् (हश्) हों तो विसर्ग का 'उ' होकर अ+उ = 'ओ' हो जाता है।
• तपः + वनम् ⟹ तप् + अ + र् + वनम् ⟹ तप् + अ + उ + वनम् ⟹ तपोवनम्
• मनः + रथः = मनोरथः | बालः + गच्छति = बालो गच्छति

iv) रुत्व विधान (विसर्ग का 'र्' होना)

यदि विसर्ग से पहले 'अ', 'आ' को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तथा बाद में कोई स्वर या घोष व्यंजन हो तो विसर्ग का 'र्' हो जाता है।

उदाहरण —
  • मुनिः + अयम् = मुनिरयम् (मुन् + इ + र् + अयम्)
  • हरिः + आगच्छति = हरिरागच्छति
  • गुरुः + जयति = गुरुर्जयति

महत्त्वपूर्ण 25 वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर (Objective MCQs)

सन्धि प्रकरण पर आधारित बिहार बोर्ड (BSEB Class 10) स्पेशल बहुविकल्पीय प्रश्न

Q1 दो अत्यंत समीपवर्ती वर्णों के मेल से होने वाले विकार को क्या कहते हैं?
  • (A) समास
  • (B) सन्धि
  • (C) कारक
  • (D) उपसर्ग
उत्तर: (B) सन्धि
व्याख्या: 'परः संनिकर्षः संहिता' — दो वर्णों के व्यवधानरहित सामीप्य में उत्पन्न विकार को सन्धि कहते हैं।
Q2 'अकः सवर्णे दीर्घः' किस सन्धि का विधायक सूत्र है?
  • (A) गुण सन्धि
  • (B) वृद्धि सन्धि
  • (C) दीर्घ सन्धि
  • (D) यण् सन्धि
उत्तर: (C) दीर्घ सन्धि
व्याख्या: अक प्रत्याहार (अ, इ, उ, ऋ, ऌ) के बाद सवर्ण स्वर आने पर दीर्घ एकादेश होता है।
Q3 संस्कृत व्याकरण में 'गुण' वर्ण किन्हें कहा जाता है?
  • (A) आ, ऐ, औ
  • (B) अ, ए, ओ
  • (C) इ, उ, ऋ
  • (D) य्, व्, र्, ल्
उत्तर: (B) अ, ए, ओ
व्याख्या: 'अदेङ् गुणः' सूत्र के अनुसार ह्रस्व 'अ', 'ए' और 'ओ' गुण संज्ञक वर्ण हैं।
Q4 'देवर्षिः' का सही सन्धि-विच्छेद क्या होगा?
  • (A) देव + अर्षिः
  • (B) देव + ऋषिः
  • (C) देवा + ऋषिः
  • (D) देवो + ऋषिः
उत्तर: (B) देव + ऋषिः
व्याख्या: अ + ऋ = अर् (गुण सन्धि, आद्गुणः)।
Q5 'एकैकम्' में कौन-सी सन्धि है?
  • (A) गुण सन्धि
  • (B) वृद्धि सन्धि
  • (C) यण् सन्धि
  • (D) दीर्घ सन्धि
उत्तर: (B) वृद्धि सन्धि
व्याख्या: एक + एकम् = एकैकम् (अ + ए = ऐ, सूत्र: वृद्धिरेचि)।
Q6 'इको यणचि' सूत्र से 'इ' के स्थान पर क्या आदेश होता है?
  • (A) व्
  • (B) य्
  • (C) र्
  • (D) ल्
उत्तर: (B) य्
व्याख्या: असमान स्वर परे होने पर इ/ई को 'य्', उ/ऊ को 'व्', ऋ को 'र्' और ऌ को 'ल्' होता है।
Q7 'स्वागतम्' का सही सन्धि-विच्छेद क्या है?
  • (A) स्वा + गतम
  • (B) सु + आगतम्
  • (C) स्व + आगतम्
  • (D) सो + आगतम्
उत्तर: (B) सु + आगतम्
व्याख्या: सु + आगतम् = स्वागतम् (उ + आ = वा, यण् सन्धि)।
Q8 'पावकः' का सन्धि-विच्छेद क्या होगा?
  • (A) पो + अकः
  • (B) पौ + अकः
  • (C) पा + वकः
  • (D) पव + अकः
उत्तर: (B) पौ + अकः
व्याख्या: 'एचोऽयवायावः' से 'औ' का 'आव्' होकर पौ + अकः = पावकः बनता है।
Q9 'हरेऽव' में कौन-सी सन्धि है?
  • (A) पूर्वरूप सन्धि
  • (B) पररूप सन्धि
  • (C) अयादि सन्धि
  • (D) गुण सन्धि
उत्तर: (A) पूर्वरूप सन्धि
व्याख्या: हरे + अव = हरेऽव (पदान्त 'ए' के बाद ह्रस्व 'अ' आने पर 'एङः पदान्तादति' से पूर्वरूप)।
Q10 'प्रेजते' (प्र + एजते) किस सन्धि का उदाहरण है?
  • (A) वृद्धि सन्धि
  • (B) पररूप सन्धि
  • (C) पूर्वरूप सन्धि
  • (D) यण् सन्धि
उत्तर: (B) पररूप सन्धि
व्याख्या: अकारान्त उपसर्ग के बाद ए/ओ धातु आने पर 'एङि पररूपम्' से पररूप (प्रेजते) होता है।
Q11 'कवी इच्छतः' में सन्धि न होने का क्या कारण है?
  • (A) प्रकृतिभाव (प्रगृह्य संज्ञा के कारण)
  • (B) यण् सन्धि
  • (C) पूर्वरूप सन्धि
  • (D) पररूप सन्धि
उत्तर: (A) प्रकृतिभाव (प्रगृह्य संज्ञा के कारण)
व्याख्या: 'ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम्' से 'कवी' द्विवचन प्रगृह्य संज्ञक है, अतः 'प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्' से प्रकृतिभाव हुआ।
Q12 'स्तोः श्चुना श्चुः' सूत्र किस सन्धि का विधान करता है?
  • (A) ष्टुत्व सन्धि
  • (B) श्चुत्व सन्धि
  • (C) जश्त्व सन्धि
  • (D) चर्त्व सन्धि
उत्तर: (B) श्चुत्व सन्धि
व्याख्या: स्/त-वर्ग का श्/च-वर्ग के साथ योग होने पर श्चुत्व सन्धि होती है (उदा. सत् + जनः = सज्जनः)।
Q13 'तत् + टीका' का सन्धि-युक्त पद क्या होगा?
  • (A) तच्चीका
  • (B) तट्टीका
  • (C) तद्दीका
  • (D) तश्तीका
उत्तर: (B) तट्टीका
व्याख्या: 'ष्टुना ष्टुः' सूत्र से 'त्' का 'ट्' होकर 'तट्टीका' बनता है।
Q14 'जगदीशः' का सन्धि-विच्छेद क्या है?
  • (A) जगत् + ईशः
  • (B) जगद् + ईशः
  • (C) जग + दीशः
  • (D) जगन् + ईशः
उत्तर: (A) जगत् + ईशः
व्याख्या: 'झलां जशोऽन्ते' (जश्त्व सन्धि) से 'त्' का तृतीय वर्ण 'द्' होकर जगदीशः बनता है।
Q15 'सद् + कारः' में चर्त्व सन्धि होने पर क्या रूप बनेगा?
  • (A) सत्कारः
  • (B) सद्कारः
  • (C) सज्कारः
  • (D) सण्कारः
उत्तर: (A) सत्कारः
व्याख्या: 'खरि च' सूत्र से 'द्' अपने वर्ग के प्रथम वर्ण 'त्' में बदलकर 'सत्कारः' बनता है।
Q16 'मोऽनुस्वारः' सूत्र के अनुसार पदान्त 'म्' का क्या हो जाता है?
  • (A) विसर्ग
  • (B) अनुस्वार (ं)
  • (C) न्
  • (D) ण्
उत्तर: (B) अनुस्वार (ं)
व्याख्या: व्यंजन परे होने पर पदान्त म् का अनुस्वार होता है (यथा— हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे)।
Q17 'तोरलि' सूत्र किस सन्धि का नियम बताता है?
  • (A) जश्त्व सन्धि
  • (B) लत्व सन्धि
  • (C) छत्व सन्धि
  • (D) श्चुत्व सन्धि
उत्तर: (B) लत्व सन्धि
व्याख्या: त-वर्ग के बाद 'ल्' आने पर त-वर्ग का 'ल्' हो जाता है (उदा. उत् + लेखः = उल्लेखः)।
Q18 'अनुच्छेदः' में 'च्' का आगम किस सूत्र से हुआ है?
  • (A) छे च
  • (B) तोरलि
  • (C) रो रि
  • (D) शश्छोऽटि
उत्तर: (A) छे च
व्याख्या: ह्रस्व स्वर के बाद 'छ' आने पर 'छे च' से तुक् (च्) का आगम होता है (अनु + छेदः = अनुच्छेदः)।
Q19 'नीरोगः' (निर् + रोगः) में पूर्व स्वर दीर्घ किस सूत्र से हुआ है?
  • (A) रो रि (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः)
  • (B) अकः सवर्णे दीर्घः
  • (C) आद्गुणः
  • (D) वृद्धिरेचि
उत्तर: (A) रो रि (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः)
व्याख्या: र् के बाद र् आने पर पूर्व र् का लोप होकर 'इ' का 'ई' (दीर्घ) हो जाता है।
Q20 'नमस्ते' का सही सन्धि-विच्छेद क्या होगा?
  • (A) नमस् + ते
  • (B) नमः + ते
  • (C) नमो + ते
  • (D) नम + स्ते
उत्तर: (B) नमः + ते
व्याख्या: 'विसर्जनीयस्य सः' सूत्र से विसर्ग के बाद त् आने पर विसर्ग का 'स्' होकर नमस्ते बनता है।
Q21 'निष्कपटः' में विसर्ग का 'ष्' किस नियम से हुआ है?
  • (A) विसर्ग से पूर्व 'इ' तथा बाद में 'क' होने से
  • (B) सत्व नियम से
  • (C) जश्त्व सन्धि से
  • (D) श्चुत्व सन्धि से
उत्तर: (A) विसर्ग से पूर्व 'इ' तथा बाद में 'क' होने से
व्याख्या: इदुदुपधस्य चाप्रत्ययस्य — इ/उ उपधा वाले विसर्ग के बाद क/ख/प/फ आने पर 'ष्' होता है।
Q22 'मनोरथः' का सन्धि-विच्छेद क्या है?
  • (A) मनो + रथः
  • (B) मनः + रथः
  • (C) मनस् + रथः
  • (D) मन + ओरथः
उत्तर: (B) मनः + रथः
व्याख्या: 'हशि च' सूत्र से विसर्ग का उ होकर अ+उ = ओ (मनोरथः) बनता है।
Q23 'सोऽवदत्' का सही सन्धि-विच्छेद क्या होगा?
  • (A) सो + अवदत्
  • (B) सः + अवदत्
  • (C) सा + अवदत्
  • (D) सस् + अवदत्
उत्तर: (B) सः + अवदत्
व्याख्या: 'अतो रोर्प्लुतादप्लुते' सूत्र से विसर्ग को उत्व, गुण तथा पूर्वरूप होकर सोऽवदत् बनता है।
Q24 'मुनिरयम्' में विसर्ग का क्या परिवर्तन हुआ है?
  • (A) विसर्ग का ओ
  • (B) विसर्ग का र् (रुत्व)
  • (C) विसर्ग का स्
  • (D) विसर्ग का लोप
उत्तर: (B) विसर्ग का र् (रुत्व)
व्याख्या: अ/आ से भिन्न स्वर 'इ' के बाद विसर्ग होने पर स्वर परे रहते विसर्ग का 'र्' (मुनिरयम्) होता है।
Q25 'धनुष्टङ्कारः' में कौन-सी सन्धि है?
  • (A) स्वर सन्धि
  • (B) व्यंजन सन्धि
  • (C) विसर्ग सन्धि
  • (D) पररूप सन्धि
उत्तर: (C) विसर्ग सन्धि
व्याख्या: धनुः + टङ्कारः = धनुष्टङ्कारः (विसर्ग के बाद ट् आने पर विसर्ग का ष्)।

महत्त्वपूर्ण 25 लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Subjective Q&A)

सन्धि के नियमों, सूत्रों, अपवादों एवं विच्छेद पर आधारित परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1 'सन्धि' किसे कहते हैं? इसके मुख्य तीन भेद कौन-से हैं?
उत्तर:

दो वर्णों के अत्यंत निकट आने पर उनके मेल से जो विकार (ध्वनि-परिवर्तन) उत्पन्न होता है, उसे सन्धि कहते हैं ('परः संनिकर्षः संहिता')। इसके मुख्य 3 भेद हैं—
1. स्वर सन्धि (अच् सन्धि)   2. व्यंजन सन्धि (हल् सन्धि)   3. विसर्ग सन्धि।

प्रश्न 2 दीर्घ सन्धि का सूत्र लिखकर सोदाहरण नियम स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

सूत्र: अकः सवर्णे दीर्घः
नियम: जब ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ के बाद समान (सवर्ण) ह्रस्व या दीर्घ स्वर आएँ, तो दोनों मिलकर क्रमशः आ, ई, ऊ, ॠ हो जाते हैं।
उदा. विद्या + अर्थी = विद्यार्थी, गिरि + इन्द्रः = गिरीन्द्रः, भानु + उदयः = भानूदयः, पितृ + ऋणम् = पितॄणम्।

प्रश्न 3 गुण सन्धि के नियम को सूत्रों व उदाहरणों सहित समझाइए।
उत्तर:

सूत्र: आद्गुणः
नियम: यदि 'अ' या 'आ' के बाद—
• इ/ई आए तो दोनों के स्थान पर 'ए' होता है (उदा. देव + इन्द्रः = देवेन्द्रः)।
• उ/ऊ आए तो दोनों के स्थान पर 'ओ' होता है (उदा. सूर्य + उदयः = सूर्योदयः)।
• ऋ/ॠ आए तो दोनों के स्थान पर 'अर्' होता है (उदा. महा + ऋषिः = महर्षिः)।

प्रश्न 4 वृद्धि सन्धि किसे कहते हैं? इसके दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

सूत्र: वृद्धिरेचि
नियम: जब 'अ' या 'आ' के बाद 'ए/ऐ' आए तो दोनों मिलकर 'ऐ' तथा 'ओ/औ' आए तो दोनों मिलकर 'औ' हो जाते हैं।
उदाहरण:
1. सदा + एव = सदैव (आ + ए = ऐ)
2. जल + ओघः = जलौघः (अ + ओ = औ)

प्रश्न 5 यण् सन्धि (इको यणचि) के चारों नियमों को एक-एक उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर:

इक् के बाद असमान स्वर आने पर यण् आदेश होता है:
1. इ/ई ⟹ य्: यदि + अपि = यद्यपि
2. उ/ऊ ⟹ व्: अनु + अयः = अन्वयः
3. ऋ/ॠ ⟹ र्: पितृ + आदेशः = पित्रादेशः
4. ऌ ⟹ ल्: ऌ + आकृतिः = लाकृतिः

प्रश्न 6 'अयादिचतुष्टय' क्या है? अयादि सन्धि के चारों आदेशों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

सूत्र: एचोऽयवायावः
स्वर परे होने पर ए, ऐ, ओ, औ के स्थान पर होने वाले चार आदेशों (अय्, आय्, अव्, आव्) को अयादिचतुष्टय कहते हैं:
• ए ⟹ अय्: ने + अनम् = नयनम्
• ऐ ⟹ आय्: नै + अकः = नायकः
• ओ ⟹ अव्: भो + अनम् = भवनम्
• औ ⟹ आव्: पौ + अकः = पावकः

प्रश्न 7 पूर्वरूप सन्धि किसे कहते हैं? इसमें अवग्रह (ऽ) का क्या महत्त्व है?
उत्तर:

सूत्र: एङः पदान्तादति
पदान्त 'ए' या 'ओ' के बाद ह्रस्व 'अ' आने पर 'अ' अपना रूप पूर्ववर्ती ए/ओ में विलीन कर देता है, इसे पूर्वरूप सन्धि कहते हैं। उस लुप्त 'अ' की उपस्थिति दर्शाने के लिए लिपि में अवग्रह चिह्न (ऽ) लगाया जाता है (यथा— हरे + अव = हरेऽव, विष्णो + अव = विष्णोऽव)।

प्रश्न 8 पररूप सन्धि की परिभाषा सोदाहरण लिखिए। यह किस सन्धि का अपवाद है?
उत्तर:

सूत्र: एङि पररूपम्
अकारान्त उपसर्ग के बाद 'ए' या 'ओ' से प्रारम्भ होने वाली धातु आए, तो पूर्व 'अ' और पर 'ए/ओ' मिलकर पररूप (ए/ओ) हो जाते हैं। यह वृद्धि सन्धि का अपवाद है।
उदाहरण: प्र + एजते = प्रेजते, उप + ओषति = उपोषति।

प्रश्न 9 'प्रकृतिभाव' किसे कहते हैं? प्रगृह्य संज्ञा का क्या नियम है?
उत्तर:

सन्धि के नियम प्राप्त होने पर भी सन्धि न करके वर्णों को उनके मूल (प्राकृतिक) रूप में बनाए रखना प्रकृतिभाव कहलाता है ('प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्')।
प्रगृह्य नियम: ईकारान्त, ऊकारान्त तथा एकारान्त द्विवचन रूपों की प्रगृह्य संज्ञा होती है (यथा— कवी इच्छतः, विष्णू इमौ, बालिके आगच्छतः)।

प्रश्न 10 श्चुत्व सन्धि (स्तोः श्चुना श्चुः) को उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:

जब 'स्' या त-वर्ग (त्, थ्, द्, ध्, न्) का 'श्' या च-वर्ग (च्, छ्, ज्, झ्, ञ्) से योग होता है, तो 'स्' का 'श्' और त-वर्ग का च-वर्ग हो जाता है।
उदाहरण:
• रामस् + शेते = रामश्शेते
• सत् + जनः = सज्जनः
• उत् + चारणम् = उच्चारणम्

प्रश्न 11 ष्टुत्व सन्धि (ष्टुना ष्टुः) का क्या नियम है? दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

जब 'स्' या त-वर्ग का 'ष्' या ट-वर्ग (ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्) से योग होता है, तो 'स्' का 'ष्' और त-वर्ग का ट-वर्ग हो जाता है।
उदाहरण:
1. रामस् + षष्ठः = रामष्षष्ठः
2. तत् + टीका = तट्टीका (अथवा उत् + डयनम् = उड्डयनम्)

प्रश्न 12 जश्त्व सन्धि (झलां जशोऽन्ते) किसे कहते हैं? सोदाहरण स्पष्ट करें।
उत्तर:

पद के अंत में स्थित वर्गों के 1, 2, 3, 4 वर्णों के स्थान पर उसी वर्ग का तृतीय वर्ण (ग, ज, ड, द, ब) हो जाता है।
उदाहरण:
• वाक् + ईशः = वागीशः (क् -> ग्)
• अच् + अन्तः = अजन्तः (च् -> ज्)
• जगत् + ईशः = जगदीशः (त् -> द्)
• सुप् + अन्तः = सुबन्तः (प् -> ब्)

प्रश्न 13 चर्त्व सन्धि (खरि च) का नियम उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर:

यदि वर्गों के 2, 3, 4 वर्णों के बाद किसी वर्ग का 1, 2 वर्ण या श्, ष्, स् आए, तो पूर्व वर्ण अपने ही वर्ग का प्रथम वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) बन जाता है।
उदाहरण: सद् + कारः = सत्कारः (द् -> त्), लभ् + स्यते = लप्स्यते (भ् -> प्)।

प्रश्न 14 अनुस्वार सन्धि (मोऽनुस्वारः) का नियम क्या है?
उत्तर:

यदि किसी पद के अंत में 'म्' हो और उसके बाद कोई व्यंजन आए, तो 'म्' का अनुस्वार (ं) हो जाता है। यदि स्वर आए तो 'म्' स्वर में मिल जाता है।
उदाहरण: हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे, अहम् + गच्छामि = अहं गच्छामि।

प्रश्न 15 परसवर्ण सन्धि (अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः) को समझाइए।
उत्तर:

पद के मध्य में स्थित अनुस्वार के बाद यदि कोई वर्गीय व्यंजन आए, तो अनुस्वार के स्थान पर आगे वाले व्यंजन के वर्ग का पंचम वर्ण (अनुनासिक) हो जाता है।
उदाहरण: अं + कितः = अङ्कितः, सं + कल्पः = सङ्कल्पः, कुं + ठितः = कुण्ठितः।

प्रश्न 16 लत्व सन्धि (तोरलि) का नियम सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

'त' वर्ग के बाद यदि 'ल्' आए, तो त-वर्ग के वर्णों का 'ल्' हो जाता है। किन्तु 'न्' के बाद 'ल्' आने पर अनुनासिक 'लँ' बनता है।
उदाहरण:
• उत् + लेखः = उल्लेखः
• तत् + लीनः = तल्लीनः
• विद्वान् + लिखति = विद्वाँल्लिखति

प्रश्न 17 'छे च' सूत्र द्वारा 'च' का आगम कब होता है? दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

ह्रस्व स्वर के पश्चात् यदि 'छ' आए, तो 'छ' से पूर्व 'च्' का आगम (तुगागम) हो जाता है।
उदाहरण:
1. तरु + छाया = तरुच्छाया
2. परि + छेदः = परिच्छेदः (अथवा अनु + छेदः = अनुच्छेदः)

प्रश्न 18 'रो रि' सूत्र द्वारा 'र्' का लोप और पूर्व स्वर का दीर्घ होना स्पष्ट करें।
उत्तर:

यदि 'र्' के बाद 'र्' आए, तो पहले वाले 'र्' का लोप हो जाता है तथा उसके ठीक पहले स्थित अण् (अ, इ, उ) स्वर दीर्घ (आ, ई, ऊ) हो जाते हैं।
उदाहरण:
• निर् + रोगः = नीरोगः (इ -> ई)
• निर् + रसः = नीरसः
• स्वर् + राज्यम् = स्वराज्यम्

प्रश्न 19 णत्व विधान का सामान्य नियम क्या है? दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

यदि एक ही पद में ऋ, र् या ष् के बाद 'न्' आए, तो 'न्' का 'ण्' हो जाता है (चाहे बीच में स्वर, कवर्ग, पवर्ग का व्यवधान ही क्यों न हो)।
उदाहरण: कृष्ण (कृष् + न), विष्णु, नराणाम्, ऋषीणाम्।

प्रश्न 20 विसर्ग सन्धि के सत्व विधान (विसर्जनीयस्य सः) को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

विसर्ग के बाद खर् वर्ण (वर्गों के 1, 2 वर्ण तथा श्, ष्, स्) आने पर विसर्ग का 'स्' हो जाता है।
• यदि त/थ आए -> स् (उदा. नमः + ते = नमस्ते)
• यदि च/छ आए -> श् (उदा. निः + चलः = निश्चलः)
• यदि ट/ठ आए -> ष् (उदा. धनुः + टङ्कारः = धनुष्टङ्कारः)

प्रश्न 21 विसर्ग के षत्व नियम और 'नमस्कारः' में 'स्' होने का कारण बताइए।
उत्तर:

• षत्व नियम: यदि विसर्ग से पूर्व 'इ' या 'उ' हो और बाद में क, ख, प, फ आए तो विसर्ग का 'ष्' होता है (यथा— निः + कपटः = निष्कपटः, निः + फलः = निष्फलः)।
• अपवाद: 'नमः' और 'पुरः' शब्दों के बाद क/प आने पर विसर्ग का 'स्' ही रहता है (यथा— नमः + कारः = नमस्कारः, पुरः + कारः = पुरस्कारः)।

प्रश्न 22 विसर्ग के उत्व और गुण होने का 'हशि च' नियम समझाइए।
उत्तर:

सूत्र: हशि च
यदि विसर्ग से पूर्व ह्रस्व 'अ' हो तथा बाद में वर्गों के तृतीय, चतुर्थ, पंचम वर्ण या य्, र्, ल्, व्, ह् (हश्) हों, तो विसर्ग का 'उ' होकर पूर्व 'अ' के साथ मिलकर 'ओ' बन जाता है।
उदाहरण:
• मनः + रथः = मनोरथः
• तपः + वनम् = तपोवनम्
• बालः + गच्छति = बालो गच्छति

प्रश्न 23 'अतो रोर्प्लुतादप्लुते' सूत्र का कार्य सोदाहरण समझाइए।
उत्तर:

यदि ह्रस्व 'अ' के बाद विसर्ग हो तथा उसके पश्चात् भी ह्रस्व 'अ' आए, तो विसर्ग का 'उ' होकर अ+उ = 'ओ' बनता है तथा बाद वाला 'अ' अवग्रह (ऽ) में बदल जाता है।
उदाहरण:
• सः + अवदत् = सोऽवदत्
• प्रथमः + अध्यायः = प्रथमोऽध्यायः
• बालः + अयम् = बालोऽयम्

प्रश्न 24 विसर्ग के रुत्व (र् होने) का क्या नियम है? दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

यदि विसर्ग से पूर्व 'अ' या 'आ' को छोड़कर कोई अन्य स्वर (इ, उ आदि) हो तथा बाद में कोई स्वर या घोष व्यंजन आए, तो विसर्ग का 'र्' हो जाता है।
उदाहरण:
1. मुनिः + अयम् = मुनिरयम्
2. हरिः + आगच्छति = हरिरागच्छति (अथवा गुरुः + जयति = गुरुर्जयति)

प्रश्न 25 निम्नलिखित पदों का सन्धि-विच्छेद कीजिए:
(क) नाविकः   (ख) दिगम्बरः   (ग) एतच्छोभनम्   (घ) तच्छ्रुत्वा।
उत्तर:

(क) नाविकः = नौ + इकः (अयादि सन्धि)
(ख) दिगम्बरः = दिक् + अम्बरः (जश्त्व सन्धि)
(ग) एतच्छोभनम् = एतत् + शोभनम् (छत्व सन्धि)
(घ) तच्छ्रुत्वा = तत् + श्रुत्वा (छत्व सन्धि)

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