बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) कक्षा 10 — राजनीति विज्ञान
अध्याय 1: लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी (Power Sharing in Democracy)
- युक्तिपरक (Prudential) कारण: यह विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और भाषाई समूहों के बीच टकराव और अशांति को रोकती है।
- नैतिक (Moral) कारण: लोकतंत्र की आत्मा ही जनता की भागीदारी पर टिकी है; जो लोग शासन से प्रभावित होते हैं, उन्हें शासन के निर्णयों में हिस्सेदार बनाना अनिवार्य है।
- सिंहली को देश की एकमात्र राजभाषा घोषित किया गया और तमिल भाषा की उपेक्षा हुई।
- सरकारी नौकरियों और विश्वविद्यालयों में सिंहलियों को प्राथमिकता देने की नीति अपनाई गई।
- संविधान में संशोधन कर राज्य द्वारा बौद्ध धर्म को संरक्षण और बढ़ावा देने का प्रावधान किया गया।
- केंद्रीय मंत्रिमंडल में डच और फ्रेंच भाषी मंत्रियों की संख्या समान रखी गई ताकि कोई एक समुदाय एकतरफा फैसला न ले सके।
- केंद्र सरकार की कई शक्तियाँ राज्य की दो क्षेत्रीय सरकारों को सौंप दी गईं, और दोनों समुदायों के लिए एक अलग 'सामुदायिक सरकार' का गठन किया गया।
- ओवरलैपिंग अंतर: एक अंतर दूसरे अंतर को गहरा करता है (जैसे उत्तरी आयरलैंड में कैथोलिक समुदाय गरीब भी था और सामाजिक रूप से उपेक्षित भी), जिससे हिंसक टकराव बढ़ता है।
- क्रॉस-कटिंग अंतर: एक अंतर दूसरे अंतर को काटता है (जैसे नीदरलैंड्स में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट दोनों में अमीर और गरीब बराबर अनुपात में हैं), जिससे तनाव कम होता है।
- पहचान की चेतना: लोग अपनी पहचान को केवल एकमात्र पहचान मानते हैं या राष्ट्र के साथ जोड़कर देखते हैं।
- राजनीतिक दलों की भूमिका: दल विभिन्न समुदायों की माँगों को शांतिपूर्ण ढंग से उठाते हैं या भड़काऊ रूप से।
- सरकार का रुख: सरकार अल्पसंख्यक या पिछड़े समूहों की उचित माँगों को सत्ता में भागीदारी देकर स्वीकार करती है या बलपूर्वक दबाती है।
- महिलाओं को पुरुषों के समान राजनीतिक अधिकार (मताधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार)।
- शिक्षा, रोजगार, समान काम के लिए समान वेतन और पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार।
- घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा।
- भारतीय समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच के कारण राजनीतिक दल महिलाओं को पर्याप्त चुनावी टिकट नहीं देते।
- महिलाओं के पास स्वतंत्र आर्थिक संसाधनों और पारिवारिक समर्थन की कमी होती है, जिससे वे चुनावी राजनीति में पुरुषों से पिछड़ जाती हैं।
- पुत्र प्राप्ति की सामाजिक लालसा (वंश चलाने और बुढ़ापे का सहारा मानने की रूढ़िवादी सोच)।
- आधुनिक अल्ट्रासाउंड तकनीकों का दुरुपयोग करके की जाने वाली अवैध 'कन्या भ्रूण हत्या'।
- राज्य का कोई अपना आधिकारिक धर्म नहीं होता; वह सभी धर्मों के प्रति तटस्थ और समान आदर रखता है।
- संविधान नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है तथा धर्म के आधार पर किसी भेदभाव का निषेध करता है।
- सकारात्मक: उपेक्षित और पिछड़ी जातियों को लोकतांत्रिक राजनीति के जरिए संगठित होकर सत्ता में अपनी हिस्सेदारी और अधिकार माँगने का मंच मिला।
- नकारात्मक: इसने समाज को संकीर्ण गुटों में बाँट दिया और चुनाव विकास के बजाय जातिगत समीकरणों पर लड़े जाने लगे।
- चुनाव में टिकट देते समय राजनीतिक दल संबंधित क्षेत्र के जातिगत मतदाताओं की संख्या का ध्यान रखते हैं।
- चुनाव प्रचार के दौरान जातिगत भावनाओं को भड़काकर वोट बैंक तैयार किया जाता है।
- सरकार गठन के समय विभिन्न जातियों को खुश करने के लिए जातीय संतुलन साधकर मंत्री बनाए जाते हैं।
आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सत्ता की साझेदारी को मुख्य रूप से चार रूपों में बाँटा जाता है:
- 1. शासन के विभिन्न अंगों के बीच बँटवारा (क्षैतिज वितरण):
सत्ता का विभाजन सरकार के तीनों अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच एक ही स्तर पर किया जाता है। कोई भी एक अंग असीमित शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता। इसे नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances) की व्यवस्था कहते हैं। न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका के असंवैधानिक निर्णयों पर रोक लगा सकती है। - 2. सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच बँटवारा (ऊर्ध्वाधर वितरण):
सत्ता पूरे देश के लिए एक सामान्य केंद्रीय सरकार, प्रांतीय स्तर पर राज्य सरकारों और ज़मीनी स्तर पर स्थानीय निकायों (पंचायतों व नगरपालिकाओं) के बीच ऊपर से नीचे की ओर बाँटी जाती है। इसे संघीय शासन प्रणाली (Federal System) कहते हैं। - 3. विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच बँटवारा:
सत्ता की हिस्सेदारी समाज के भाषाई, धार्मिक, जातीय और कमजोर वर्गों को दी जाती है। जैसे—बेल्जियम में 'सामुदायिक सरकार' का प्रयोग, अथवा भारत में विधायिका और सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जातियों (SC), जनजातियों (ST) और महिलाओं के लिए आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था। - 4. राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और आंदोलनों के बीच बँटवारा:
लोकतंत्र में सत्ता किसी एक दल की बपौती नहीं होती। बहुदलीय व्यवस्था में जब किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलता, तो विभिन्न दल मिलकर गठबंधन सरकार (Coalition Government) बनाते हैं। दबाव समूह (व्यापारी, किसान, छात्र संगठन) भी नीतियों को प्रभावित कर अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता साझा करते हैं।
बेल्जियम और श्रीलंका दोनों ही छोटे देश हैं और दोनों में भाषाई विविधता थी, परंतु दोनों ने इसे संभालने के लिए बिल्कुल विपरीत मार्ग चुने:
- बेल्जियम का मार्ग (सहमति और साझेदारी):
- बेल्जियम के नेताओं ने स्वीकार किया कि शांति के लिए सभी भाषाई समुदायों (डच, फ्रेंच, जर्मन) का सम्मान जरूरी है।
- 1970 से 1993 के बीच संविधान में 4 संशोधन किए गए। केंद्रीय मंत्रिमंडल में दोनों समुदायों के मंत्रियों की संख्या बराबर की गई।
- ब्रुसेल्स में भी दोनों को समान प्रतिनिधित्व मिला और सामुदायिक सरकारों को भाषाई अधिकार दिए गए।
- परिणाम: देश में कोई गृहयुद्ध नहीं हुआ, बेल्जियम टूटा नहीं, और शांति व्यवस्था के कारण ब्रुसेल्स को यूरोपीय संघ का मुख्यालय चुना गया।
- श्रीलंका का मार्ग (बहुसंख्यकवाद और दमन):
- श्रीलंका की सरकार ने 1956 में सिंहली समुदाय के संख्या बल के आधार पर बहुसंख्यकवाद थोपा।
- तमिल भाषा और संस्कृति को दरकिनार किया गया, नौकरियों में भेदभाव हुआ और बौद्ध धर्म को राज्य धर्म बनाया गया।
- तमिलों की क्षेत्रीय स्वायत्तता की शांतिपूर्ण माँगों को सेना के बल पर कुचला गया।
- परिणाम: तमिलों में गहरा अलगाव पनपा, लिट्टे (LTTE) जैसे आतंकी संगठन बने, और कई दशकों तक चले भयानक गृहयुद्ध ने देश के सामाजिक ताने-बाने और अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया।
निष्कर्ष: बेल्जियम का मॉडल यह सिखाता है कि एकता सत्ता बाँटने से मजबूत होती है, जबकि श्रीलंका का उदाहरण बताता है कि जबरन बहुसंख्यकवाद थोपने से देश बिखर जाता है।
लोकतंत्र का शाब्दिक अर्थ ही 'जनता का शासन' है। इसलिए सत्ता किसी एक व्यक्ति या वर्ग में केंद्रित नहीं हो सकती। इसके समर्थन में दो प्रमुख तर्क दिए जाते हैं:
- 1. युक्तिपरक तर्क (Prudential Reasons):
यह तर्क लाभ-हानि की व्यावहारिक गणना पर आधारित है।- सामाजिक टकराव पर रोक: समाज में विभिन्न जातियों, धर्मों और भाषाओं के लोग रहते हैं। यदि किसी बहुसंख्यक वर्ग को सारी ताकत दे दी जाए, तो अल्पसंख्यक वर्ग में असंतोष फैलेगा। सत्ता की साझेदारी टकराव की आशंका को समाप्त करती है।
- राजनीतिक स्थिरता: सामाजिक संघर्ष अंततः हिंसक रूप ले लेता है और राजनीतिक व्यवस्था को अस्थिर कर देता है। सत्ता में हिस्सेदारी देकर सभी को शासन का अंग बनाया जाता है, जिससे देश में शांति और राजनीतिक स्थिरता बनी रहती है।
- राष्ट्र की अखंडता: अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यकों की इच्छा थोपना तात्कालिक रूप से आसान लग सकता है, लेकिन आगे चलकर यह देश की एकता को छिन्न-भिन्न कर देता है।
- 2. नैतिक तर्क (Moral Reasons):
यह तर्क लोकतंत्र के अंतर्निहित मूल्यों और आत्मा पर आधारित है।- लोकतंत्र की स्वाभाविक माँग: लोकतंत्र की परिभाषा ही यही है कि जो लोग शासन व्यवस्था के नियमों से प्रभावित होते हैं, उनकी सहमति और भागीदारी कानून बनाने में होनी चाहिए।
- वैध शासन की गारंटी: वही सरकार वैध और नैतिक मानी जाती है जिसमें देश के सभी नागरिकों को सत्ता में हिस्सेदारी के जरिए अपनी आवाज रखने का अवसर प्राप्त हो।
अतः युक्तिपरक तर्क जहाँ बेहतर परिणामों पर बल देता है, वहीं नैतिक तर्क सत्ता की साझेदारी को स्वयं में अनिवार्य और पवित्र मानता है।
सामाजिक विविधता जब राजनीति में उतरती है, तो वह देश को जोड़ेगी या तोड़ेगी, यह निम्नलिखित तीन कारकों पर निर्भर करता है:
- 1. लोगों द्वारा अपनी पहचान की समझ (People's perception of identities):
यदि नागरिक अपनी पहचान को केवल एक ही दायरे (जैसे केवल अपनी जाति या धर्म) में देखते हैं और उसे अन्य पहचानों से श्रेष्ठ मानते हैं, तो सामंजस्य कठिन हो जाता है। उदाहरणार्थ, उत्तरी आयरलैंड में लोग खुद को केवल 'कैथोलिक' या केवल 'प्रोटेस्टेंट' मानते रहे, जिससे टकराव बढ़ा। इसके विपरीत, जब लोग अपनी पहचान को बहुस्तरीय मानते हैं (जैसे—"मैं पहले भारतीय हूँ, फिर बिहारी या बंगाली"), तो सामाजिक विभाजन खतरनाक नहीं बनते। - 2. राजनीतिक दलों द्वारा माँगों को उठाने का स्वरूप (Representation of demands by political leaders):
यह इस बात पर निर्भर करता है कि राजनेता समुदायों की माँगों को किस तरह पेश करते हैं। यदि माँगें संविधान के दायरे में और दूसरे समुदायों को नुकसान पहुँचाए बिना उठाई जाती हैं, तो उन्हें मानना आसान होता है। परंतु यदि श्रीलंका के सिंहली नेताओं की तरह किसी दूसरे समुदाय की कीमत पर अपनी माँगें रखी जाएँगी, तो देश में अशांति फैलेगी। - 3. सरकार का दृष्टिकोण (Attitude of the Government):
यदि शासन में बैठे लोग विभिन्न सामाजिक समूहों की उचित माँगों को खुले दिल से सुनते हैं और सत्ता में साझेदारी देने को तैयार रहते हैं (जैसे बेल्जियम में हुआ), तो सामाजिक विभाजन कभी देश के लिए खतरा नहीं बनते। लेकिन यदि सरकार श्रीलंका या युगोस्लाविया की तरह बलपूर्वक अल्पसंख्यकों की आवाज दबाने की कोशिश करती है, तो अलगाववाद और विखंडन अवश्यंभावी हो जाता है।
1968 का मेक्सिको ओलंपिक खेल इतिहास का वह क्षण था जहाँ खेल के मैदान का उपयोग रंगभेद और नस्लवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में किया गया:
घटना की पृष्ठभूमि और स्वरूप:
- 200 मीटर दौड़ में अमेरिकी अश्वेत धावक टॉमी स्मिथ ने स्वर्ण पदक और जॉन कार्लोस ने कांस्य पदक जीता।
- पदक समारोह के दौरान जब अमेरिकी राष्ट्रगान बज रहा था, दोनों धावकों ने जूते नहीं पहने थे, केवल काले मोजे पहने थे (जो अमेरिका में अश्वेतों की गरीबी का प्रतीक था)।
- उन्होंने अपने गले में काले मफलर डाले और जब अमेरिकी झंडा फहराया जा रहा था, उन्होंने काले दस्ताने पहने हुए अपनी मुट्ठियाँ तान लीं और सिर झुका लिया। यह 'ब्लैक पावर' (अश्वेत शक्ति) का प्रतीक था।
- रजत पदक विजेता ऑस्ट्रेलियाई श्वेत धावक पीटर नॉर्मन ने भी मानवाधिकार बिल्ला लगाकर उनका समर्थन किया।
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की कार्रवाई:
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) ने इसे खेल भावना का उल्लंघन और राजनीतिकरण मानते हुए दोनों के पदक छीन लिए और उन्हें खेल गाँव से निकाल दिया। स्वदेश लौटने पर उन्हें अपमान, जान से मारने की धमकियाँ और भारी सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा।
वैश्विक प्रभाव और महत्व:
- इस घटना ने अमेरिकी नस्लवाद और अश्वेतों के दमन की सच्चाई को पूरी दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया।
- इसने अमेरिका में चल रहे नागरिक अधिकार आंदोलन (Civil Rights Movement) को अंतरराष्ट्रीय समर्थन दिलाया।
- आगे चलकर सैन जोस स्टेट यूनिवर्सिटी ने स्मिथ और कार्लोस के सम्मान में उनकी उसी मुद्रा वाली 20 फीट ऊँची प्रतिमा स्थापित की। पीटर नॉर्मन के निधन पर स्मिथ और कार्लोस ने उनके ताबूत को कंधा दिया, और ऑस्ट्रेलियाई संसद ने मरणोपरांत नॉर्मन से औपचारिक माफी माँगी।
भारत का संविधान महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देता है, परंतु व्यावहारिक धरातल पर हमारा समाज आज भी एक पुरुष-प्रधान (पितृसत्तात्मक) समाज है जहाँ महिलाओं को कई स्तरों पर विषमता झेलनी पड़ती है:
- 1. शिक्षा के क्षेत्र में असमानता:
लड़कियों की शिक्षा पर आज भी लड़कों की तुलना में कम खर्च किया जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार पुरुषों की साक्षरता जहाँ 82.14% थी, वहीं महिलाओं की साक्षरता मात्र 65.46% थी। ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा तक पहुँचते-पहुँचते अधिकांश लड़कियों की पढ़ाई छुड़वा दी जाती है। - 2. श्रम का लैंगिक विभाजन और अवैतनिक काम:
महिलाएँ घर के भीतर खाना बनाने, बर्तन धोने, पानी भरने और बच्चों की देखभाल जैसे औसतन 7-8 घंटे के कड़े श्रम करती हैं, परंतु इस काम का न तो कोई वेतन मिलता है और न ही समाज में कोई आर्थिक मूल्य आँका जाता है। - 3. समान काम के लिए असमान वेतन:
खेतों, निर्माण स्थलों, कारखानों और यहाँ तक कि सिनेमा और खेल जगत में भी समान घंटों तक बराबर काम करने के बावजूद महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी दी जाती है, जो समान पारिश्रमिक अधिनियम का खुला उल्लंघन है। - 4. कन्या भ्रूण हत्या और गिरता लिंगानुपात:
वंश चलाने के लिए बेटे की चाहत और दहेज के डर से समाज में अजन्मी बच्चियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है। इसके कारण 2011 में 0-6 वर्ष के बच्चों का लिंगानुपात घटकर मात्र 919 प्रति 1000 बालक रह गया था। - 5. घरेलू हिंसा और असुरक्षा:
चारदीवारी के भीतर घरेलू हिंसा, दहेज हत्या, और सार्वजनिक स्थानों पर छेड़छाड़, बलात्कार और तेजाब हमलों का भय महिलाओं की स्वतंत्रता और गरिमा को लगातार आहत करता है।
सांप्रदायिकता वह संकीर्ण सोच है जो यह मानती है कि एक धर्म के लोगों के हित दूसरे धर्म के लोगों से भिन्न और विरोधी हैं। राजनीति में सांप्रदायिकता निम्नलिखित रूपों में अभिव्यक्त होती है:
- 1. दैनिक जीवन में पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता:
यह सांप्रदायिकता का सबसे सामान्य रूप है। इसमें अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानना, अन्य धर्मों के प्रति दुर्भावना रखना, उनके रीति-रिवाजों का उपहास उड़ाना और उनके प्रति संशय का भाव रखना शामिल है। - 2. राजनीतिक लामबंदी और ध्रुवीकरण:
चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल धार्मिक प्रतीकों (पवित्र ग्रंथ, धार्मिक झंडे, नारे), धार्मिक संतों और भावनात्मक अपीलों का इस्तेमाल करते हैं। एक समुदाय के मतदाताओं के मन में दूसरे समुदाय का भय बैठाकर उनका वोट बैंक तैयार किया जाता है। - 3. बहुसंख्यकवाद या अलग राजनीतिक इकाई की माँग:
यदि कोई धार्मिक समुदाय बहुसंख्यक है, तो वह पूरे शासन पर अपना एकाधिकार जमाने का प्रयास करता है (जैसे श्रीलंका में सिंहली बहुसंख्यकवाद)। इसके विपरीत, अल्पसंख्यक समुदाय अपने लिए अलग राजनीतिक स्वायत्तता या कभी-कभी अलग राष्ट्र की माँग करने लगता है (जैसे पंजाब में खालिस्तान या कश्मीर में अलगाववाद की माँगें)। - 4. सांप्रदायिक दंगे और हिंसा:
यह सांप्रदायिकता का सबसे वीभत्स और घिनौना रूप है। जब दो समुदायों के बीच नफरत भड़काकर योजनाबद्ध दंगे कराए जाते हैं। 1947 का भारत-विभाजन इसका सबसे बड़ा त्रासद उदाहरण था, जिसमें लाखों निर्दोष मारे गए। स्वतंत्र भारत में भी 1984 के सिख विरोधी दंगे या 2002 के गुजरात दंगे इसी विकृति के परिणाम थे।
संविधान निर्माताओं को भलीभाँति ज्ञात था कि भारत जैसी विशाल धार्मिक विविधता वाले देश में शांति और लोकतंत्र केवल धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद पर ही टिक सकता है। संविधान में इसके लिए निम्नलिखित ठोस प्रावधान किए गए हैं:
- 1. राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं:
पाकिस्तान (इस्लामी गणराज्य) या श्रीलंका (बौद्ध धर्म) के विपरीत भारत का कोई राजकीय या राष्ट्रीय धर्म नहीं है। राज्य की नजर में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध सब बराबर हैं। - 2. धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28):
संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी अंतरात्मा के अनुसार किसी भी धर्म को मानने, उसका आचरण करने और उसका शांतिपूर्ण प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है। किसी भी व्यक्ति को अपनी इच्छा के विरुद्ध धर्म बदलने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। - 3. धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15):
राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर दुकानों, होटलों, कुओं, तालाबों या सार्वजनिक नौकरियों में कोई भेदभाव नहीं कर सकता। - 4. सरकारी संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा पर पाबंदी (अनुच्छेद 28):
राज्य द्वारा पूर्णतः पोषित या सरकारी सहायता प्राप्त किसी भी शिक्षण संस्थान में कोई विशिष्ट धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती। - 5. सामाजिक सुधार हेतु राज्य का हस्तक्षेप (अनुच्छेद 25(2)):
धर्मनिरपेक्ष होने का अर्थ यह नहीं कि राज्य मूकदर्शक रहेगा। धार्मिक कुप्रथाओं (जैसे छुआछूत, सती प्रथा, तीन तलाक) को समाप्त करने और हिंदू धार्मिक स्थलों को सभी वर्गों के लिए खोलने का अधिकार राज्य के पास सुरक्षित है।
प्राचीन काल से चली आ रही कठोर जाति व्यवस्था में आधुनिक भारत में अभूतपूर्व बदलाव देखे गए हैं:
जाति व्यवस्था में आए प्रमुख परिवर्तन:
- खान-पान और छुआछूत के बंधनों का टूटना: शहरों में होटलों, ढाबों, ट्रेनों और बसों में सभी जातियों के लोग साथ बैठकर भोजन करते हैं और यात्रा करते हैं। अस्पृश्यता का सार्वजनिक रूप से पालन अब कानूनन दंडनीय अपराध है।
- पेशा चुनने की आजादी: पहले जाति जन्म से तय करती थी कि व्यक्ति क्या काम करेगा। आज एक नाई या धोबी का बेटा डॉक्टर, इंजीनियर, IAS अधिकारी या उद्योगपति बन सकता है।
- जातिगत अंतर्विवाह के नियमों में शिथिलता: अंतरजातीय विवाहों की संख्या लगातार बढ़ रही है और समाज उन्हें स्वीकार कर रहा है।
परिवर्तनों के मुख्य कारण:
- आर्थिक विकास और शहरीकरण: शहरों की अनाम जिंदगी में किसी के पास यह जानने का समय नहीं है कि पड़ोस की सीट पर बैठा व्यक्ति किस जाति का है।
- शिक्षा और साक्षरता का प्रसार: आधुनिक वैज्ञानिक और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा ने जातिगत श्रेष्ठता के पाखंड को तोड़ा है।
- संवैधानिक प्रावधान और कानून: संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 ने कानूनी रूप से सभी को समान माना और छुआछूत को समाप्त किया।
- सामाजिक सुधार आंदोलन: ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, महात्मा गांधी, पेरियार और बाबासाहेब आंबेडकर के निरंतर संघर्षों ने वंचित जातियों में आत्मसम्मान जगाया।
सीमा: यद्यपि शहरों में बदलाव तीव्र है, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में विवाह और सामाजिक संबंधों के स्तर पर आज भी जातिगत संकीर्णता काफी हद तक मौजूद है।
यह सच है कि भारतीय राजनीति में जाति एक महत्वपूर्ण तत्व है, परंतु यह मान लेना गलत होगा कि चुनाव केवल जाति के समीकरणों से जीते जा सकते हैं। इसके निम्नलिखित कारण हैं:
- 1. किसी भी संसदीय क्षेत्र में केवल एक जाति का स्पष्ट बहुमत नहीं:
भारत का कोई भी लोकसभा या विधानसभा क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ केवल एक ही जाति के मतदाता 50% से अधिक हों। चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवार को अपनी जाति के अलावा अन्य जातियों और समुदायों का भी विश्वास जीतना पड़ता है। - 2. एक ही जाति के कई प्रत्याशी मैदान में:
जब किसी क्षेत्र में किसी विशेष जाति (जैसे यादव, राजपूत, या कुर्मी) के मतदाताओं की संख्या अधिक होती है, तो लगभग सभी प्रमुख दल उसी जाति का प्रत्याशी खड़ा कर देते हैं। ऐसे में उस जाति का वोट कई टुकड़ों में बँट जाता है और फैसला अन्य जातियों के वोटों से होता है। - 3. जाति के भीतर वर्ग और वैचारिक मतभेद:
एक ही जाति के सभी लोग एक ही दल को आँख मूँदकर वोट नहीं देते। जाति के भीतर भी अमीर-गरीब, युवा-बुजुर्ग और स्त्री-पुरुष के हित अलग-अलग होते हैं। गरीब मतदाता अक्सर रोजगार और मुफ्त राशन को अपनी जाति से ऊपर रखते हैं। - 4. सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency):
यदि केवल जाति से चुनाव जीता जा सकता, तो वर्तमान विधायक या सांसद कभी चुनाव नहीं हारते। लेकिन भारत में अक्सर सत्ताधारी दल चुनाव हार जाते हैं क्योंकि जनता उनके भ्रष्टाचार और खराब प्रदर्शन से नाराज होकर अपनी जाति की सरकार को भी उखाड़ फेंकती है।
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में महिलाओं की आबादी लगभग आधी (48.5%) है, परंतु संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व हमेशा चिंताजनक रहा है:
कम प्रतिनिधित्व के कारण:
- पितृसत्तात्मक सोच: राजनीति को पारंपरिक रूप से पुरुषों का कार्यक्षेत्र माना गया है। राजनीतिक दलों के पुरुष नेता महिलाओं को जिताऊ उम्मीदवार (Winnable Candidate) मानने से कतराते हैं।
- बाहुबल और धनबल का बढ़ता प्रभाव: भारतीय चुनावों में हिंसा, शराब और बेहिसाब काले धन का जो खेल चलता है, उससे सभ्य महिलाएँ चुनावी राजनीति से दूर भागती हैं।
- घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ: पारिवारिक दायित्वों और बच्चों के पालन-पोषण के कारण महिलाएँ राजनीति को पूर्णकालिक समय नहीं दे पातीं।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वाँ संविधान संशोधन) का महत्व:
- यह कानून लोकसभा और राज्यों की सभी विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान करता है।
- इससे संसद में महिला सांसदों की संख्या 80 के आसपास से सीधे बढ़कर लगभग 181 हो जाएगी।
- यह केवल एक चुनावी सुधार नहीं है, बल्कि देश की नीति-निर्माण प्रक्रिया में महिलाओं की प्राथमिकताओं—जैसे महिला सुरक्षा, पोषण, मातृत्व लाभ और बाल विकास—को राष्ट्रीय एजेंडा बनाने का ऐतिहासिक कदम है।
सामाजिक विविधताओं (भाषा, धर्म, जाति, संस्कृति) को अक्सर तनाव का कारण मान लिया जाता है, परंतु लोकतांत्रिक व्यवस्था में ये वरदान साबित होती हैं:
- 1. एकरसता की समाप्ति और सांस्कृतिक संपन्नता:
जिस प्रकार एक ही रंग के फूलों से बना बगीचा नीरस होता है, उसी प्रकार विभिन्न भाषाओं और परंपराओं से मिलकर बना राष्ट्र अधिक सुंदर और समृद्ध होता है। भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी सांस्कृतिक पूँजी है। - 2. उपेक्षित वर्गों की अभिव्यक्ति:
जब विभिन्न सामाजिक समूहों को राजनीति में अपनी बात रखने का अवसर मिलता है, तो समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों की तकलीफें संसद तक पहुँचती हैं। इससे नीतियाँ अधिक संवेदनशील और मानवीय बनती हैं। - 3. तानाशाही पर रोक:
यदि समाज पूरी तरह एकरूप हो, तो सत्ताधारी वर्ग आसानी से निरंकुश बन सकता है। समाज में विभिन्न समूहों की मौजूदगी सत्ता पर नियंत्रण और संतुलन का काम करती है। - 4. शांतिपूर्ण समाधान का अवसर:
विविधताएँ यह सिखाती हैं कि कोई भी समूह हमेशा अपने मनमाने तरीके से नहीं चल सकता। सबको एक-दूसरे के साथ समझौता और संवाद करना पड़ता है, जो नागरिकों में सहिष्णुता और लोकतांत्रिक परिपक्वता पैदा करता है।
यूरोप के इन दोनों देशों के उदाहरण यह स्पष्ट करते हैं कि धार्मिक और जातीय विभाजन किस प्रकार राजनीति को विनाश की ओर धकेल सकते हैं:
| आधार | उत्तरी आयरलैंड का संघर्ष | युगोस्लाविया का संघर्ष |
|---|---|---|
| विभाजन का आधार | ईसाई धर्म के दो संप्रदाय: कैथोलिक (44%) और प्रोटेस्टेंट (53%)। | जातीय और धार्मिक: सर्ब (रूढ़िवादी ईसाई), क्रोएशियाई (कैथोलिक), और बोस्नियाई (मुस्लिम)। |
| राजनीतिक माँग | कैथोलिक आयरलैंड गणराज्य में मिलना चाहते थे; प्रोटेस्टेंट ब्रिटेन के साथ रहना चाहते थे। | प्रत्येक जातीय समूह अपने लिए एक स्वतंत्र, संप्रभु राष्ट्र की माँग कर रहा था। |
| हिंसा का स्वरूप | उग्रवादी गुटों (IRA और ब्रिटिश सेना) के बीच दशकों तक खूनी गुरिल्ला संघर्ष। | बर्बर गृहयुद्ध, जातीय नरसंहार (Ethnic Cleansing), और बड़े पैमाने पर शरणार्थी संकट। |
| अंतिम परिणाम | सकारात्मक समाधान: 1998 में ऐतिहासिक 'गुड फ्राइडे समझौता' हुआ और दोनों ने सत्ता साझा करना स्वीकार किया। | विनाशकारी विघटन: देश गृहयुद्ध की आग में जलकर 6 स्वतंत्र देशों (सर्बिया, क्रोएशिया, बोस्निया, स्लोवेनिया, मोंटेनेग्रो, उत्तर मैसेडोनिया) में बिखर गया। |
निष्कर्ष: उत्तरी आयरलैंड दिखाता है कि बातचीत और सत्ता की साझेदारी से गंभीर से गंभीर धार्मिक खाई को पाटा जा सकता है, जबकि युगोस्लाविया यह चेतावनी देता है कि हठधर्मिता और जातीय वर्चस्व देश का भूगोल मिटा देते हैं।
भारत ने धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को आँख मूँदकर पश्चिम से आयात नहीं किया, बल्कि अपनी ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुसार इसे ढाला है:
- पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता (कठोर अलगाव):
- अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों में धर्म और राज्य के बीच एक पूर्ण और कठोर दीवार (Wall of Separation) होती है।
- राज्य धर्म के मामलों में बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं कर सकता, और धर्म राज्य के मामलों में नहीं।
- यदि किसी धर्म में कोई सामाजिक बुराई (जैसे छुआछूत या लैंगिक भेद) भी हो, तो पश्चिमी राज्य उसमें हस्तक्षेप नहीं करता। सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक प्रतीकों (जैसे हिजाब, पगड़ी, क्रॉस) के प्रदर्शन पर भी पाबंदी लगाई जाती है।
- भारतीय धर्मनिरपेक्षता (सर्वधर्म समभाव और सैद्धांतिक दूरी):
- भारत में राज्य सभी धर्मों का समान सम्मान करता है और किसी एक धर्म का पक्ष नहीं लेता।
- सकारात्मक हस्तक्षेप: भारत में राज्य धर्म से पूर्णतः कटा हुआ नहीं है। यदि धर्म के नाम पर शोषण होता है, तो संविधान राज्य को हस्तक्षेप करने का अधिकार देता है (जैसे अस्पृश्यता का अंत, दलितों का मंदिर प्रवेश, तीन तलाक पर रोक)।
- अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार: भारतीय संविधान अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को बचाने तथा अपने शिक्षण संस्थान खोलने का अधिकार (अनुच्छेद 29-30) देता है।
अतः भारत की धर्मनिरपेक्षता धर्म-विरोधी या शुष्क अलगाववादी नहीं है, बल्कि यह सभी धर्मों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और सामाजिक सुधार की एक गतिशील प्रणाली है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था को निरंकुश होने से बचाने के लिए सत्ता का क्षैतिज वितरण किया जाता है, जिसे भारतीय संविधान में 'नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली' के रूप में बहुत खूबसूरती से लागू किया गया है:
तीनों अंगों की भूमिका और पारस्परिक नियंत्रण:
- 1. विधायिका (संसद/विधानसभा): इसका काम कानून बनाना और देश का बजट पारित करना है। यह कार्यपालिका (मंत्रिपरिषद) से प्रश्न पूछकर, अविश्वास प्रस्ताव लाकर और बहस करके उस पर लगातार नियंत्रण रखती है।
- 2. कार्यपालिका (प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, नौकरशाही): यह कानूनों को लागू करती है। कार्यपालिका न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति करती है, परंतु एक बार नियुक्त होने के बाद न्यायाधीशों को उनकी मर्जी से हटाया नहीं जा सकता।
- 3. न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय): यह संविधान की संरक्षक है। न्यायपालिका को न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) की शक्ति प्राप्त है। यदि विधायिका कोई ऐसा कानून बनाती है या कार्यपालिका कोई ऐसा आदेश देती है जो संविधान के मूल ढाँचे का उल्लंघन करता हो, तो न्यायपालिका उसे शून्य (अवैध) घोषित कर सकती है।
- दूसरी ओर, यदि कोई न्यायाधीश कदाचार का दोषी पाया जाए, तो संसद संविधान के तहत महाभियोग (Impeachment) चलाकर उसे पद से हटा सकती है।
प्रणाली का मूल्यांकन:
यह प्रणाली सुनिश्चित करती है कि सत्ता के तीनों अंगों में से कोई भी एक अंग 'सुपरपावर' न बन सके। 1975 के आपातकाल जैसे संकटों के बावजूद भारतीय लोकतंत्र इसलिए अडिग रहा क्योंकि इस नियंत्रण और संतुलन ने सत्ता के किसी भी मनमाने प्रयोग को समय रहते सीमित कर दिया।
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