Chapter 1. लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी | BSEB 10 Polity Subjective


बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) कक्षा 10 — राजनीति विज्ञान

अध्याय 1: लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी (Power Sharing in Democracy)

भाग 1: 50 एक-पंक्ति प्रश्नोत्तर (One-Liners)
सत्ता में साझेदारी किस शासन व्यवस्था का मूल मंत्र है?
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का।
बेल्जियम किस महाद्वीप का एक छोटा-सा देश है?
यूरोप का (क्षेत्रफल में भारत के हरियाणा राज्य से भी छोटा)।
बेल्जियम की कुल आबादी में डच भाषी लोगों का प्रतिशत कितना है?
59 प्रतिशत (जो फ्लेमिश इलाके में रहते हैं)।
बेल्जियम में फ्रेंच भाषी लोगों की आबादी कितने प्रतिशत है?
40 प्रतिशत (जो वेलोनिआ क्षेत्र में रहते हैं)।
बेल्जियम में जर्मन भाषा बोलने वाले लोगों की आबादी कितनी है?
1 प्रतिशत।
बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में फ्रेंच और डच भाषियों का क्या अनुपात था?
80% फ्रेंच भाषी और 20% डच भाषी।
श्रीलंका किस वर्ष एक स्वतंत्र राष्ट्र बना?
1948 में (भारत की स्वतंत्रता के ठीक एक वर्ष बाद)।
श्रीलंका में सर्वाधिक आबादी किस सामाजिक समूह की है?
सिंहली समुदाय की (लगभग 74 प्रतिशत)।
श्रीलंका में तमिल भाषियों की कुल आबादी कितने प्रतिशत है?
लगभग 18 प्रतिशत।
श्रीलंका के मूल तमिलों को क्या कहा जाता है?
श्रीलंकाई तमिल (लगभग 13 प्रतिशत)।
औपनिवेशिक काल में भारत से बागानों में काम करने लाए गए तमिलों के वंशज क्या कहलाते हैं?
हिंदुस्तानी या भारतीय तमिल (लगभग 5 प्रतिशत)।
श्रीलंका में सिंहली समुदाय के लोग मुख्य रूप से किस धर्म के अनुयायी हैं?
बौद्ध धर्म के।
श्रीलंका में किस वर्ष एक कानून बनाकर सिंहली को एकमात्र राजभाषा घोषित किया गया?
1956 में।
श्रीलंका में गृहयुद्ध (Civil War) का मुख्य कारण क्या था?
सिंहली वर्चस्व वाला बहुसंख्यकवाद और तमिलों की उपेक्षा।
तमिल उग्रवादियों ने किस स्वतंत्र राज्य की माँग को लेकर हथियार उठाए थे?
'तमिल ईलम' (Tamil Eelam - स्वतंत्र तमिल राज्य)।
श्रीलंका में लिट्टे (LTTE) का पूर्ण रूप क्या है?
लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (Liberation Tigers of Tamil Eelam)।
बेल्जियम ने भाषाई विवाद को हल करने के लिए 1970 से 1993 के बीच संविधान में कितने संशोधन किए?
चार संशोधन।
बेल्जियम में संस्कृति, शिक्षा और भाषा से जुड़े मसलों पर फैसले लेने वाली सरकार को क्या कहते हैं?
सामुदायिक सरकार (Community Government)।
यूरोपीय संघ (European Union) का मुख्यालय कहाँ स्थापित किया गया?
बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में।
युगोस्लाविया का विघटन किस आधार पर हुआ था?
धार्मिक और जातीय प्रतिस्पर्धा के आधार पर।
उत्तरी आयरलैंड में किन दो धार्मिक गुटों के बीच हिंसक टकराव था?
प्रोटेस्टेंट (लगभग 53%) और कैथोलिक (लगभग 44%) ईसाइयों के बीच।
मेक्सिको ओलंपिक (1968) में नागरिक अधिकार आंदोलन का प्रतीक कौन बना?
टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस (अश्वेत धावक)।
1968 मेक्सिको ओलंपिक में पदक समारोह के दौरान स्मिथ और कार्लोस ने क्या पहना था?
काले मोजे (बिना जूते) और हाथों में काले दस्ताने वाली मुट्ठियाँ तान रखी थीं।
मेक्सिको ओलंपिक में ऑस्ट्रेलियाई धावक पीटर नॉर्मन ने अश्वेतों का समर्थन कैसे किया था?
अपनी जर्सी पर 'मानवाधिकार बिल्ला' (Human Rights Badge) लगाकर।
अमेरिका में 'नागरिक अधिकार आंदोलन' (Civil Rights Movement) का नेतृत्व किसने किया था?
मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने (1954 से 1968 तक)।
अश्वेत शक्ति आंदोलन (Black Power Movement) अमेरिका में कब उभरा?
1966 में (जो नस्लवाद के खिलाफ अधिक उग्र और आक्रामक आंदोलन था)।
सामाजिक विभाजन के तीन प्रमुख निर्धारक तत्व कौन-से हैं?
लोगों की अपनी पहचान के प्रति चेतना, राजनीतिक दलों द्वारा माँग उठाने का तरीका और सरकार का रुख।
सामाजिक भेद किस आधार पर उत्पन्न होते हैं?
जन्म, लिंग, नस्ल, धर्म, भाषा और व्यक्तिगत पसंद या पेशे के आधार पर।
क्रॉस-कटिंग (परस्पर विरोधी न होकर एक-दूसरे को काटने वाले) सामाजिक अंतर कहाँ पाए जाते हैं?
नीदरलैंड्स में (जहाँ कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट दोनों में अमीर-गरीब समान रूप से बँटे हैं)।
ओवरलैपिंग (एक-दूसरे में गूंथे हुए या परस्पर समाजी) सामाजिक अंतर का उदाहरण कौन-सा देश है?
उत्तरी आयरलैंड (जहाँ कैथोलिक गरीब और प्रताड़ित रहे, जबकि प्रोटेस्टेंट संपन्न थे)।
असम में 'बिहारी बचाओ' या स्थानीय बनाम बाहरी का विवाद किस भावना का परिणाम है?
क्षेत्रवाद या संकीर्ण पहचानवाद का।
मुंबई में मराठी मानुष का मुद्दा उठाकर गैर-मराठियों का विरोध किस संगठन ने किया था?
शिवसेना और बाद में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) ने।
गांधीजी के अनुसार राजनीति किससे धर्मविहीन नहीं होनी चाहिए?
नैतिकता और धर्म (सत्य एवं अहिंसा) से।
सांप्रदायिकता (Communalism) की मूल मान्यता क्या है?
धर्म ही सामाजिक और राजनीतिक समुदाय के निर्माण का एकमात्र आधार है।
धर्मनिरपेक्ष राज्य (Secular State) का क्या अर्थ है?
वह राज्य जिसका कोई अपना आधिकारिक धर्म न हो और जो सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखे।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 'पंथनिरपेक्ष' शब्द किस संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया?
42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा।
भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध करता है?
अनुच्छेद 15।
लैंगिक असमानता (Gender Inequality) का आधार क्या है?
जैविक बनावट नहीं, बल्कि समाज द्वारा तय की गई रूढ़िवादी भूमिकाएँ और पितृसत्तात्मक सोच।
श्रम का लैंगिक विभाजन (Sexual Division of Labour) क्या है?
घर के अंदर के काम महिलाओं द्वारा और बाहर के पैसे कमाने वाले काम पुरुषों द्वारा करने की सामाजिक प्रथा।
नारीवादी आंदोलन (Feminist Movement) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
महिलाओं को पुरुषों के समान व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक अधिकार दिलाना।
भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार लिंगानुपात (प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाएँ) कितना था?
943 महिलाएँ।
बाल लिंगानुपात (0-6 आयु वर्ग) 2011 में गिरकर कितना हो गया था?
919 बालिकाएँ प्रति 1000 बालक।
भारत में कन्या भ्रूण हत्या रोकने हेतु कौन-सा कानून लागू है?
PCPNDT अधिनियम (गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994)।
संसद में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का ऐतिहासिक विधेयक किस नाम से जाना जाता है?
नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम)।
जाति पर आधारित सामाजिक विभाजन केवल किस देश में देखने को मिलता है?
विशेष रूप से भारत में।
वर्ण व्यवस्था में समाज को मूलतः किन चार वर्गों में बाँटा गया था?
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
ज्योतिराव फुले, पेरियार रामास्वामी और डॉ. भीमराव आंबेडकर ने किस बुराई के विरुद्ध संघर्ष किया?
जाति व्यवस्था और सामाजिक छुआछूत के विरुद्ध।
भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद द्वारा अस्पृश्यता (छुआछूत) को पूर्णतः समाप्त और दंडनीय बनाया गया?
अनुच्छेद 17 द्वारा।
'राजनीति में जाति' और 'जाति में राजनीति' का क्या अर्थ है?
राजनीति जातियों को गोलबंद करती है और जातियाँ राजनीतिक लाभ के लिए अपना दायरा बढ़ाती हैं।
सत्ता की साझेदारी का 'युक्तिपरक' (Prudential) तर्क क्या है?
यह सामाजिक समूहों के बीच टकराव और गृहयुद्ध की आशंका को टालता है।
भाग 2: 25 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Short Answer Questions)
1. सत्ता में साझेदारी क्यों आवश्यक है? इसके दो प्रमुख कारण बताइए।
सत्ता में साझेदारी के दो प्रमुख कारण हैं:
  • युक्तिपरक (Prudential) कारण: यह विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और भाषाई समूहों के बीच टकराव और अशांति को रोकती है।
  • नैतिक (Moral) कारण: लोकतंत्र की आत्मा ही जनता की भागीदारी पर टिकी है; जो लोग शासन से प्रभावित होते हैं, उन्हें शासन के निर्णयों में हिस्सेदार बनाना अनिवार्य है।
2. बेल्जियम की जातीय (नृजातीय) जटिलता का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
बेल्जियम की कुल आबादी का 59% हिस्सा फ्लेमिश इलाके में रहता है और डच बोलता है, 40% हिस्सा वेलोनिआ में रहता है और फ्रेंच बोलता है तथा शेष 1% लोग जर्मन बोलते हैं। राजधानी ब्रुसेल्स में स्थिति उल्टी थी—वहाँ 80% लोग फ्रेंच और केवल 20% लोग डच बोलते थे, जिससे तनाव पैदा हुआ।
3. 1956 के कानून द्वारा श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद कैसे थोपा गया?
1956 के अधिनियम के तहत:
  • सिंहली को देश की एकमात्र राजभाषा घोषित किया गया और तमिल भाषा की उपेक्षा हुई।
  • सरकारी नौकरियों और विश्वविद्यालयों में सिंहलियों को प्राथमिकता देने की नीति अपनाई गई।
  • संविधान में संशोधन कर राज्य द्वारा बौद्ध धर्म को संरक्षण और बढ़ावा देने का प्रावधान किया गया।
4. श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद के क्या भयावह परिणाम हुए?
श्रीलंका में तमिलों को बेगानापन महसूस होने लगा। उन्होंने स्वायत्तता और समानता के लिए राजनीतिक संगठन बनाए। जब सरकार ने माँगें ठुकरा दीं, तो लिट्टे (LTTE) जैसे उग्रवादी समूह बने, जिसने देश को खूनी गृहयुद्ध में धकेल दिया। इससे लाखों लोग मारे गए और देश आर्थिक रूप से दशकों पीछे चला गया।
5. बेल्जियम मॉडल की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  • केंद्रीय मंत्रिमंडल में डच और फ्रेंच भाषी मंत्रियों की संख्या समान रखी गई ताकि कोई एक समुदाय एकतरफा फैसला न ले सके।
  • केंद्र सरकार की कई शक्तियाँ राज्य की दो क्षेत्रीय सरकारों को सौंप दी गईं, और दोनों समुदायों के लिए एक अलग 'सामुदायिक सरकार' का गठन किया गया।
6. सामाजिक अंतर कब और कैसे सामाजिक विभाजन का रूप ले लेते हैं?
जब कोई एक सामाजिक अंतर बाकी अन्य अंतरों से अधिक महत्वपूर्ण और गहरा हो जाता है, तब वह सामाजिक विभाजन बन जाता है। उदाहरणार्थ, अमेरिका में श्वेत और अश्वेत का अंतर आर्थिक विपन्नता से जुड़ गया, क्योंकि अश्वेत गरीब, बेघर और भेदभाव के शिकार थे।
7. 'क्रॉस-कटिंग' (Cross-cutting) और 'ओवरलैपिंग' (Overlapping) सामाजिक अंतर में क्या भेद है?
  • ओवरलैपिंग अंतर: एक अंतर दूसरे अंतर को गहरा करता है (जैसे उत्तरी आयरलैंड में कैथोलिक समुदाय गरीब भी था और सामाजिक रूप से उपेक्षित भी), जिससे हिंसक टकराव बढ़ता है।
  • क्रॉस-कटिंग अंतर: एक अंतर दूसरे अंतर को काटता है (जैसे नीदरलैंड्स में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट दोनों में अमीर और गरीब बराबर अनुपात में हैं), जिससे तनाव कम होता है।
8. 1968 के मेक्सिको ओलंपिक में टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस ने क्या विरोध दर्ज कराया था?
200 मीटर दौड़ में स्वर्ण और कांस्य पदक जीतने वाले अमेरिकी धावक टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस ने पदक वितरण के समय बिना जूतों के केवल काले मोजे पहने (गरीबी दर्शाने हेतु) और अमेरिकी राष्ट्रगान के समय काले दस्ताने वाली मुट्ठियाँ ऊपर उठाकर सिर झुका लिया, जिससे पूरे विश्व का ध्यान अमेरिका में अश्वेतों पर हो रहे नस्लभेदी अत्याचारों पर गया।
9. पीटर नॉर्मन कौन थे और उन्हें अपने समर्थन की क्या कीमत चुकानी पड़ी?
पीटर नॉर्मन ऑस्ट्रेलिया के श्वेत धावक थे जिन्होंने मेक्सिको ओलंपिक में रजत पदक जीता था। उन्होंने स्मिथ और कार्लोस के नस्लवाद विरोधी आंदोलन का समर्थन करने के लिए अपनी छाती पर 'मानवाधिकार बिल्ला' लगाया था। इसके लिए उन्हें ऑस्ट्रेलियाई ओलंपिक टीम से बाहर कर दिया गया और लंबे समय तक बहिष्कार झेलना पड़ा।
10. सामाजिक विभाजनों की राजनीति के तीन निर्धारक तत्व कौन-से हैं?
  • पहचान की चेतना: लोग अपनी पहचान को केवल एकमात्र पहचान मानते हैं या राष्ट्र के साथ जोड़कर देखते हैं।
  • राजनीतिक दलों की भूमिका: दल विभिन्न समुदायों की माँगों को शांतिपूर्ण ढंग से उठाते हैं या भड़काऊ रूप से।
  • सरकार का रुख: सरकार अल्पसंख्यक या पिछड़े समूहों की उचित माँगों को सत्ता में भागीदारी देकर स्वीकार करती है या बलपूर्वक दबाती है।
11. श्रम के लैंगिक विभाजन से आप क्या समझते हैं?
यह समाज में काम के बँटवारे का वह अघोषित नियम है जिसके तहत घर के सभी गैर-भुगतान वाले काम (खाना बनाना, सफाई, बच्चों का पालन-पोषण) महिलाओं के जिम्मे मान लिए जाते हैं, और बाहर के सभी आर्थिक व निर्णय लेने वाले काम पुरुषों के अधिकार क्षेत्र में माने जाते हैं।
12. नारीवादी (Feminist) आंदोलन की मुख्य माँगें क्या थीं?
  • महिलाओं को पुरुषों के समान राजनीतिक अधिकार (मताधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार)।
  • शिक्षा, रोजगार, समान काम के लिए समान वेतन और पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार।
  • घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा।
13. भारत में महिलाओं की राजनीतिक स्थिति कमजोर क्यों है? दो कारण बताइए।
  • भारतीय समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच के कारण राजनीतिक दल महिलाओं को पर्याप्त चुनावी टिकट नहीं देते।
  • महिलाओं के पास स्वतंत्र आर्थिक संसाधनों और पारिवारिक समर्थन की कमी होती है, जिससे वे चुनावी राजनीति में पुरुषों से पिछड़ जाती हैं।
14. भारत का समाज 'पितृसत्तात्मक समाज' (Patriarchal Society) कैसे है?
भारतीय समाज में पिता या परिवार के वरिष्ठ पुरुष को ही मुखिया माना जाता है। सभी बड़े आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक निर्णय पुरुषों द्वारा लिए जाते हैं, वंश का नाम पिता से चलता है और संपत्ति पर प्राथमिक अधिकार बेटों को मिलता रहा है।
15. भारत में घटते बाल लिंगानुपात के दो मुख्य कारण क्या हैं?
  • पुत्र प्राप्ति की सामाजिक लालसा (वंश चलाने और बुढ़ापे का सहारा मानने की रूढ़िवादी सोच)।
  • आधुनिक अल्ट्रासाउंड तकनीकों का दुरुपयोग करके की जाने वाली अवैध 'कन्या भ्रूण हत्या'।
16. सांप्रदायिकता लोकतंत्र के लिए किस प्रकार एक गंभीर खतरा है?
सांप्रदायिकता नागरिकों को साझा हितों और राष्ट्रहित के बजाय धार्मिक पहचान के आधार पर बाँट देती है। यह समाज में अविश्वास, दंगे, घृणा और अलगाववाद पैदा करती है, जो लोकतंत्र के मूल आधार (समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व) को नष्ट कर देता है।
17. एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  • राज्य का कोई अपना आधिकारिक धर्म नहीं होता; वह सभी धर्मों के प्रति तटस्थ और समान आदर रखता है।
  • संविधान नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है तथा धर्म के आधार पर किसी भेदभाव का निषेध करता है।
18. गांधीजी के कथन "धर्म को कभी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता" का वास्तविक मंतव्य क्या था?
गांधीजी का आशय किसी संकीर्ण पूजा-पद्धति, कर्मकांड या हिंदू-मुस्लिम से नहीं था। उनके लिए 'धर्म' का अर्थ नैतिक मूल्य, सत्य, अहिंसा और मानवीय कर्तव्य था। उनका मानना था कि बिना नैतिक मूल्यों के राजनीति स्वच्छंद और विनाशकारी हो जाती है।
19. भारत में जाति व्यवस्था के दो सकारात्मक और दो नकारात्मक प्रभाव बताइए।
  • सकारात्मक: उपेक्षित और पिछड़ी जातियों को लोकतांत्रिक राजनीति के जरिए संगठित होकर सत्ता में अपनी हिस्सेदारी और अधिकार माँगने का मंच मिला।
  • नकारात्मक: इसने समाज को संकीर्ण गुटों में बाँट दिया और चुनाव विकास के बजाय जातिगत समीकरणों पर लड़े जाने लगे।
20. राजनीति में जाति किस-किस रूप में प्रकट होती है?
  • चुनाव में टिकट देते समय राजनीतिक दल संबंधित क्षेत्र के जातिगत मतदाताओं की संख्या का ध्यान रखते हैं।
  • चुनाव प्रचार के दौरान जातिगत भावनाओं को भड़काकर वोट बैंक तैयार किया जाता है।
  • सरकार गठन के समय विभिन्न जातियों को खुश करने के लिए जातीय संतुलन साधकर मंत्री बनाए जाते हैं।
21. जाति केवल राजनीति को प्रभावित नहीं करती, बल्कि राजनीति भी जाति को प्रभावित करती है—कैसे?
राजनीति में सत्ता पाने के लिए उप-जातियाँ आपस में मिलकर बड़ा समूह बनाती हैं (जैसे अगड़ा-पिछड़ा या दलित गोलबंदी)। नई प्रकार की राजनीतिक जातियाँ उभरती हैं, और जातियाँ अपने अधिकारों को लेकर पहले से अधिक जागरूक हो जाती हैं।
22. युगोस्लाविया के विखंडन से हमें क्या सीख मिलती है?
युगोस्लाविया से सीख मिलती है कि जब राजनीतिक दल सामाजिक और धार्मिक मतभेदों को सत्ता हथियाने का औजार बना लेते हैं और सत्ता की साझीदारी से इनकार करते हैं, तो देश गृहयुद्ध की आग में जलकर कई टुकड़ों में टूट जाता है।
23. सत्ता की साझेदारी के 'नैतिक' (Moral) तर्क का क्या अर्थ है?
नैतिक तर्क यह मानता है कि लोकतंत्र का जन्म ही लोगों के अधिकारों और उनकी सहभागिता के लिए हुआ है। जनता को यह जानने और तय करने का पूरा हक है कि उन पर शासन कैसे किया जाए। सत्ता की साझीदारी लोकतंत्र की आत्मा है।
24. नगर निगम और पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देने का क्या औचित्य है?
स्थानीय निकायों में महिलाओं को 33% से 50% आरक्षण देने से सत्ता की सीधी पहुँच उन तक हुई है। इससे ज़मीनी स्तर पर महिला नेतृत्व उभरा है और पानी, स्वास्थ्य, स्वच्छता तथा प्राथमिक शिक्षा जैसे पारिवारिक मुद्दे विकास के केंद्र में आए हैं।
25. उत्तरी आयरलैंड की समस्या का समाधान कैसे हुआ?
1998 में ब्रिटेन की सरकार, आयरलैंड गणराज्य और उत्तरी आयरलैंड के प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच 'गुड फ्राइडे समझौता' (Good Friday Agreement) हुआ, जिसके तहत दोनों पक्षों ने हथियार डालकर सत्ता की साझीदारी पर आधारित शांतिपूर्ण शासन स्वीकार किया।
भाग 3: 15 दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Long Answer Questions)
1. सत्ता की साझेदारी के विभिन्न रूपों (Forms of Power Sharing) का विस्तृत वर्णन कीजिए।

आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सत्ता की साझेदारी को मुख्य रूप से चार रूपों में बाँटा जाता है:

  • 1. शासन के विभिन्न अंगों के बीच बँटवारा (क्षैतिज वितरण):
    सत्ता का विभाजन सरकार के तीनों अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच एक ही स्तर पर किया जाता है। कोई भी एक अंग असीमित शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता। इसे नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances) की व्यवस्था कहते हैं। न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका के असंवैधानिक निर्णयों पर रोक लगा सकती है।
  • 2. सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच बँटवारा (ऊर्ध्वाधर वितरण):
    सत्ता पूरे देश के लिए एक सामान्य केंद्रीय सरकार, प्रांतीय स्तर पर राज्य सरकारों और ज़मीनी स्तर पर स्थानीय निकायों (पंचायतों व नगरपालिकाओं) के बीच ऊपर से नीचे की ओर बाँटी जाती है। इसे संघीय शासन प्रणाली (Federal System) कहते हैं।
  • 3. विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच बँटवारा:
    सत्ता की हिस्सेदारी समाज के भाषाई, धार्मिक, जातीय और कमजोर वर्गों को दी जाती है। जैसे—बेल्जियम में 'सामुदायिक सरकार' का प्रयोग, अथवा भारत में विधायिका और सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जातियों (SC), जनजातियों (ST) और महिलाओं के लिए आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था।
  • 4. राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और आंदोलनों के बीच बँटवारा:
    लोकतंत्र में सत्ता किसी एक दल की बपौती नहीं होती। बहुदलीय व्यवस्था में जब किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलता, तो विभिन्न दल मिलकर गठबंधन सरकार (Coalition Government) बनाते हैं। दबाव समूह (व्यापारी, किसान, छात्र संगठन) भी नीतियों को प्रभावित कर अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता साझा करते हैं।
2. बेल्जियम और श्रीलंका द्वारा भाषाई और सामाजिक विविधताओं को संभालने के तरीकों की तुलना कीजिए और उनके परिणामों की विवेचना कीजिए।

बेल्जियम और श्रीलंका दोनों ही छोटे देश हैं और दोनों में भाषाई विविधता थी, परंतु दोनों ने इसे संभालने के लिए बिल्कुल विपरीत मार्ग चुने:

  • बेल्जियम का मार्ग (सहमति और साझेदारी):
    • बेल्जियम के नेताओं ने स्वीकार किया कि शांति के लिए सभी भाषाई समुदायों (डच, फ्रेंच, जर्मन) का सम्मान जरूरी है।
    • 1970 से 1993 के बीच संविधान में 4 संशोधन किए गए। केंद्रीय मंत्रिमंडल में दोनों समुदायों के मंत्रियों की संख्या बराबर की गई।
    • ब्रुसेल्स में भी दोनों को समान प्रतिनिधित्व मिला और सामुदायिक सरकारों को भाषाई अधिकार दिए गए।
    • परिणाम: देश में कोई गृहयुद्ध नहीं हुआ, बेल्जियम टूटा नहीं, और शांति व्यवस्था के कारण ब्रुसेल्स को यूरोपीय संघ का मुख्यालय चुना गया।
  • श्रीलंका का मार्ग (बहुसंख्यकवाद और दमन):
    • श्रीलंका की सरकार ने 1956 में सिंहली समुदाय के संख्या बल के आधार पर बहुसंख्यकवाद थोपा।
    • तमिल भाषा और संस्कृति को दरकिनार किया गया, नौकरियों में भेदभाव हुआ और बौद्ध धर्म को राज्य धर्म बनाया गया।
    • तमिलों की क्षेत्रीय स्वायत्तता की शांतिपूर्ण माँगों को सेना के बल पर कुचला गया।
    • परिणाम: तमिलों में गहरा अलगाव पनपा, लिट्टे (LTTE) जैसे आतंकी संगठन बने, और कई दशकों तक चले भयानक गृहयुद्ध ने देश के सामाजिक ताने-बाने और अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया।

निष्कर्ष: बेल्जियम का मॉडल यह सिखाता है कि एकता सत्ता बाँटने से मजबूत होती है, जबकि श्रीलंका का उदाहरण बताता है कि जबरन बहुसंख्यकवाद थोपने से देश बिखर जाता है।

3. "सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र की आत्मा है।" इस कथन के पक्ष में युक्तिपरक (Prudential) और नैतिक (Moral) तर्कों की समीक्षा कीजिए।

लोकतंत्र का शाब्दिक अर्थ ही 'जनता का शासन' है। इसलिए सत्ता किसी एक व्यक्ति या वर्ग में केंद्रित नहीं हो सकती। इसके समर्थन में दो प्रमुख तर्क दिए जाते हैं:

  • 1. युक्तिपरक तर्क (Prudential Reasons):
    यह तर्क लाभ-हानि की व्यावहारिक गणना पर आधारित है।
    • सामाजिक टकराव पर रोक: समाज में विभिन्न जातियों, धर्मों और भाषाओं के लोग रहते हैं। यदि किसी बहुसंख्यक वर्ग को सारी ताकत दे दी जाए, तो अल्पसंख्यक वर्ग में असंतोष फैलेगा। सत्ता की साझेदारी टकराव की आशंका को समाप्त करती है।
    • राजनीतिक स्थिरता: सामाजिक संघर्ष अंततः हिंसक रूप ले लेता है और राजनीतिक व्यवस्था को अस्थिर कर देता है। सत्ता में हिस्सेदारी देकर सभी को शासन का अंग बनाया जाता है, जिससे देश में शांति और राजनीतिक स्थिरता बनी रहती है।
    • राष्ट्र की अखंडता: अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यकों की इच्छा थोपना तात्कालिक रूप से आसान लग सकता है, लेकिन आगे चलकर यह देश की एकता को छिन्न-भिन्न कर देता है।
  • 2. नैतिक तर्क (Moral Reasons):
    यह तर्क लोकतंत्र के अंतर्निहित मूल्यों और आत्मा पर आधारित है।
    • लोकतंत्र की स्वाभाविक माँग: लोकतंत्र की परिभाषा ही यही है कि जो लोग शासन व्यवस्था के नियमों से प्रभावित होते हैं, उनकी सहमति और भागीदारी कानून बनाने में होनी चाहिए।
    • वैध शासन की गारंटी: वही सरकार वैध और नैतिक मानी जाती है जिसमें देश के सभी नागरिकों को सत्ता में हिस्सेदारी के जरिए अपनी आवाज रखने का अवसर प्राप्त हो।

अतः युक्तिपरक तर्क जहाँ बेहतर परिणामों पर बल देता है, वहीं नैतिक तर्क सत्ता की साझेदारी को स्वयं में अनिवार्य और पवित्र मानता है।

4. सामाजिक विभाजनों के राजनीतिक परिणामों का निर्धारण करने वाले तीन प्रमुख तत्वों की सविस्तार व्याख्या कीजिए।

सामाजिक विविधता जब राजनीति में उतरती है, तो वह देश को जोड़ेगी या तोड़ेगी, यह निम्नलिखित तीन कारकों पर निर्भर करता है:

  • 1. लोगों द्वारा अपनी पहचान की समझ (People's perception of identities):
    यदि नागरिक अपनी पहचान को केवल एक ही दायरे (जैसे केवल अपनी जाति या धर्म) में देखते हैं और उसे अन्य पहचानों से श्रेष्ठ मानते हैं, तो सामंजस्य कठिन हो जाता है। उदाहरणार्थ, उत्तरी आयरलैंड में लोग खुद को केवल 'कैथोलिक' या केवल 'प्रोटेस्टेंट' मानते रहे, जिससे टकराव बढ़ा। इसके विपरीत, जब लोग अपनी पहचान को बहुस्तरीय मानते हैं (जैसे—"मैं पहले भारतीय हूँ, फिर बिहारी या बंगाली"), तो सामाजिक विभाजन खतरनाक नहीं बनते।
  • 2. राजनीतिक दलों द्वारा माँगों को उठाने का स्वरूप (Representation of demands by political leaders):
    यह इस बात पर निर्भर करता है कि राजनेता समुदायों की माँगों को किस तरह पेश करते हैं। यदि माँगें संविधान के दायरे में और दूसरे समुदायों को नुकसान पहुँचाए बिना उठाई जाती हैं, तो उन्हें मानना आसान होता है। परंतु यदि श्रीलंका के सिंहली नेताओं की तरह किसी दूसरे समुदाय की कीमत पर अपनी माँगें रखी जाएँगी, तो देश में अशांति फैलेगी।
  • 3. सरकार का दृष्टिकोण (Attitude of the Government):
    यदि शासन में बैठे लोग विभिन्न सामाजिक समूहों की उचित माँगों को खुले दिल से सुनते हैं और सत्ता में साझेदारी देने को तैयार रहते हैं (जैसे बेल्जियम में हुआ), तो सामाजिक विभाजन कभी देश के लिए खतरा नहीं बनते। लेकिन यदि सरकार श्रीलंका या युगोस्लाविया की तरह बलपूर्वक अल्पसंख्यकों की आवाज दबाने की कोशिश करती है, तो अलगाववाद और विखंडन अवश्यंभावी हो जाता है।
5. 1968 के मेक्सिको ओलंपिक की घटना का उल्लेख करते हुए बताइए कि इसने विश्व स्तर पर नागरिक अधिकारों की लड़ाई को कैसे प्रभावित किया।

1968 का मेक्सिको ओलंपिक खेल इतिहास का वह क्षण था जहाँ खेल के मैदान का उपयोग रंगभेद और नस्लवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में किया गया:

घटना की पृष्ठभूमि और स्वरूप:

  • 200 मीटर दौड़ में अमेरिकी अश्वेत धावक टॉमी स्मिथ ने स्वर्ण पदक और जॉन कार्लोस ने कांस्य पदक जीता।
  • पदक समारोह के दौरान जब अमेरिकी राष्ट्रगान बज रहा था, दोनों धावकों ने जूते नहीं पहने थे, केवल काले मोजे पहने थे (जो अमेरिका में अश्वेतों की गरीबी का प्रतीक था)।
  • उन्होंने अपने गले में काले मफलर डाले और जब अमेरिकी झंडा फहराया जा रहा था, उन्होंने काले दस्ताने पहने हुए अपनी मुट्ठियाँ तान लीं और सिर झुका लिया। यह 'ब्लैक पावर' (अश्वेत शक्ति) का प्रतीक था।
  • रजत पदक विजेता ऑस्ट्रेलियाई श्वेत धावक पीटर नॉर्मन ने भी मानवाधिकार बिल्ला लगाकर उनका समर्थन किया।

अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की कार्रवाई:
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) ने इसे खेल भावना का उल्लंघन और राजनीतिकरण मानते हुए दोनों के पदक छीन लिए और उन्हें खेल गाँव से निकाल दिया। स्वदेश लौटने पर उन्हें अपमान, जान से मारने की धमकियाँ और भारी सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा।

वैश्विक प्रभाव और महत्व:

  • इस घटना ने अमेरिकी नस्लवाद और अश्वेतों के दमन की सच्चाई को पूरी दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया।
  • इसने अमेरिका में चल रहे नागरिक अधिकार आंदोलन (Civil Rights Movement) को अंतरराष्ट्रीय समर्थन दिलाया।
  • आगे चलकर सैन जोस स्टेट यूनिवर्सिटी ने स्मिथ और कार्लोस के सम्मान में उनकी उसी मुद्रा वाली 20 फीट ऊँची प्रतिमा स्थापित की। पीटर नॉर्मन के निधन पर स्मिथ और कार्लोस ने उनके ताबूत को कंधा दिया, और ऑस्ट्रेलियाई संसद ने मरणोपरांत नॉर्मन से औपचारिक माफी माँगी।
6. भारत में महिलाओं के साथ होने वाले विभिन्न प्रकार के भेदभावों और उनकी दयनीय स्थिति का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।

भारत का संविधान महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देता है, परंतु व्यावहारिक धरातल पर हमारा समाज आज भी एक पुरुष-प्रधान (पितृसत्तात्मक) समाज है जहाँ महिलाओं को कई स्तरों पर विषमता झेलनी पड़ती है:

  • 1. शिक्षा के क्षेत्र में असमानता:
    लड़कियों की शिक्षा पर आज भी लड़कों की तुलना में कम खर्च किया जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार पुरुषों की साक्षरता जहाँ 82.14% थी, वहीं महिलाओं की साक्षरता मात्र 65.46% थी। ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा तक पहुँचते-पहुँचते अधिकांश लड़कियों की पढ़ाई छुड़वा दी जाती है।
  • 2. श्रम का लैंगिक विभाजन और अवैतनिक काम:
    महिलाएँ घर के भीतर खाना बनाने, बर्तन धोने, पानी भरने और बच्चों की देखभाल जैसे औसतन 7-8 घंटे के कड़े श्रम करती हैं, परंतु इस काम का न तो कोई वेतन मिलता है और न ही समाज में कोई आर्थिक मूल्य आँका जाता है।
  • 3. समान काम के लिए असमान वेतन:
    खेतों, निर्माण स्थलों, कारखानों और यहाँ तक कि सिनेमा और खेल जगत में भी समान घंटों तक बराबर काम करने के बावजूद महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी दी जाती है, जो समान पारिश्रमिक अधिनियम का खुला उल्लंघन है।
  • 4. कन्या भ्रूण हत्या और गिरता लिंगानुपात:
    वंश चलाने के लिए बेटे की चाहत और दहेज के डर से समाज में अजन्मी बच्चियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है। इसके कारण 2011 में 0-6 वर्ष के बच्चों का लिंगानुपात घटकर मात्र 919 प्रति 1000 बालक रह गया था।
  • 5. घरेलू हिंसा और असुरक्षा:
    चारदीवारी के भीतर घरेलू हिंसा, दहेज हत्या, और सार्वजनिक स्थानों पर छेड़छाड़, बलात्कार और तेजाब हमलों का भय महिलाओं की स्वतंत्रता और गरिमा को लगातार आहत करता है।
7. "सांप्रदायिकता राजनीति में कई रूप धारण कर सकती है।" इस कथन की व्याख्या विभिन्न उदाहरणों के साथ कीजिए।

सांप्रदायिकता वह संकीर्ण सोच है जो यह मानती है कि एक धर्म के लोगों के हित दूसरे धर्म के लोगों से भिन्न और विरोधी हैं। राजनीति में सांप्रदायिकता निम्नलिखित रूपों में अभिव्यक्त होती है:

  • 1. दैनिक जीवन में पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता:
    यह सांप्रदायिकता का सबसे सामान्य रूप है। इसमें अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानना, अन्य धर्मों के प्रति दुर्भावना रखना, उनके रीति-रिवाजों का उपहास उड़ाना और उनके प्रति संशय का भाव रखना शामिल है।
  • 2. राजनीतिक लामबंदी और ध्रुवीकरण:
    चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल धार्मिक प्रतीकों (पवित्र ग्रंथ, धार्मिक झंडे, नारे), धार्मिक संतों और भावनात्मक अपीलों का इस्तेमाल करते हैं। एक समुदाय के मतदाताओं के मन में दूसरे समुदाय का भय बैठाकर उनका वोट बैंक तैयार किया जाता है।
  • 3. बहुसंख्यकवाद या अलग राजनीतिक इकाई की माँग:
    यदि कोई धार्मिक समुदाय बहुसंख्यक है, तो वह पूरे शासन पर अपना एकाधिकार जमाने का प्रयास करता है (जैसे श्रीलंका में सिंहली बहुसंख्यकवाद)। इसके विपरीत, अल्पसंख्यक समुदाय अपने लिए अलग राजनीतिक स्वायत्तता या कभी-कभी अलग राष्ट्र की माँग करने लगता है (जैसे पंजाब में खालिस्तान या कश्मीर में अलगाववाद की माँगें)।
  • 4. सांप्रदायिक दंगे और हिंसा:
    यह सांप्रदायिकता का सबसे वीभत्स और घिनौना रूप है। जब दो समुदायों के बीच नफरत भड़काकर योजनाबद्ध दंगे कराए जाते हैं। 1947 का भारत-विभाजन इसका सबसे बड़ा त्रासद उदाहरण था, जिसमें लाखों निर्दोष मारे गए। स्वतंत्र भारत में भी 1984 के सिख विरोधी दंगे या 2002 के गुजरात दंगे इसी विकृति के परिणाम थे।
8. भारतीय संविधान को एक 'धर्मनिरपेक्ष संविधान' बनाने वाले प्रमुख संवैधानिक प्रावधानों की विवेचना कीजिए।

संविधान निर्माताओं को भलीभाँति ज्ञात था कि भारत जैसी विशाल धार्मिक विविधता वाले देश में शांति और लोकतंत्र केवल धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद पर ही टिक सकता है। संविधान में इसके लिए निम्नलिखित ठोस प्रावधान किए गए हैं:

  • 1. राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं:
    पाकिस्तान (इस्लामी गणराज्य) या श्रीलंका (बौद्ध धर्म) के विपरीत भारत का कोई राजकीय या राष्ट्रीय धर्म नहीं है। राज्य की नजर में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध सब बराबर हैं।
  • 2. धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28):
    संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी अंतरात्मा के अनुसार किसी भी धर्म को मानने, उसका आचरण करने और उसका शांतिपूर्ण प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है। किसी भी व्यक्ति को अपनी इच्छा के विरुद्ध धर्म बदलने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
  • 3. धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15):
    राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर दुकानों, होटलों, कुओं, तालाबों या सार्वजनिक नौकरियों में कोई भेदभाव नहीं कर सकता।
  • 4. सरकारी संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा पर पाबंदी (अनुच्छेद 28):
    राज्य द्वारा पूर्णतः पोषित या सरकारी सहायता प्राप्त किसी भी शिक्षण संस्थान में कोई विशिष्ट धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती।
  • 5. सामाजिक सुधार हेतु राज्य का हस्तक्षेप (अनुच्छेद 25(2)):
    धर्मनिरपेक्ष होने का अर्थ यह नहीं कि राज्य मूकदर्शक रहेगा। धार्मिक कुप्रथाओं (जैसे छुआछूत, सती प्रथा, तीन तलाक) को समाप्त करने और हिंदू धार्मिक स्थलों को सभी वर्गों के लिए खोलने का अधिकार राज्य के पास सुरक्षित है।
9. "जाति व्यवस्था की जड़ें भारतीय समाज में बहुत गहरी हैं, परंतु आधुनिक समय में इसमें कई परिवर्तन आए हैं।" इन परिवर्तनों के कारणों और स्वरूप का विश्लेषण कीजिए।

प्राचीन काल से चली आ रही कठोर जाति व्यवस्था में आधुनिक भारत में अभूतपूर्व बदलाव देखे गए हैं:

जाति व्यवस्था में आए प्रमुख परिवर्तन:

  • खान-पान और छुआछूत के बंधनों का टूटना: शहरों में होटलों, ढाबों, ट्रेनों और बसों में सभी जातियों के लोग साथ बैठकर भोजन करते हैं और यात्रा करते हैं। अस्पृश्यता का सार्वजनिक रूप से पालन अब कानूनन दंडनीय अपराध है।
  • पेशा चुनने की आजादी: पहले जाति जन्म से तय करती थी कि व्यक्ति क्या काम करेगा। आज एक नाई या धोबी का बेटा डॉक्टर, इंजीनियर, IAS अधिकारी या उद्योगपति बन सकता है।
  • जातिगत अंतर्विवाह के नियमों में शिथिलता: अंतरजातीय विवाहों की संख्या लगातार बढ़ रही है और समाज उन्हें स्वीकार कर रहा है।

परिवर्तनों के मुख्य कारण:

  • आर्थिक विकास और शहरीकरण: शहरों की अनाम जिंदगी में किसी के पास यह जानने का समय नहीं है कि पड़ोस की सीट पर बैठा व्यक्ति किस जाति का है।
  • शिक्षा और साक्षरता का प्रसार: आधुनिक वैज्ञानिक और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा ने जातिगत श्रेष्ठता के पाखंड को तोड़ा है।
  • संवैधानिक प्रावधान और कानून: संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 ने कानूनी रूप से सभी को समान माना और छुआछूत को समाप्त किया।
  • सामाजिक सुधार आंदोलन: ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, महात्मा गांधी, पेरियार और बाबासाहेब आंबेडकर के निरंतर संघर्षों ने वंचित जातियों में आत्मसम्मान जगाया।

सीमा: यद्यपि शहरों में बदलाव तीव्र है, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में विवाह और सामाजिक संबंधों के स्तर पर आज भी जातिगत संकीर्णता काफी हद तक मौजूद है।

10. "केवल जाति के आधार पर भारत में चुनाव नहीं जीते जा सकते।" इस कथन के समर्थन में ठोस तर्क प्रस्तुत कीजिए।

यह सच है कि भारतीय राजनीति में जाति एक महत्वपूर्ण तत्व है, परंतु यह मान लेना गलत होगा कि चुनाव केवल जाति के समीकरणों से जीते जा सकते हैं। इसके निम्नलिखित कारण हैं:

  • 1. किसी भी संसदीय क्षेत्र में केवल एक जाति का स्पष्ट बहुमत नहीं:
    भारत का कोई भी लोकसभा या विधानसभा क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ केवल एक ही जाति के मतदाता 50% से अधिक हों। चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवार को अपनी जाति के अलावा अन्य जातियों और समुदायों का भी विश्वास जीतना पड़ता है।
  • 2. एक ही जाति के कई प्रत्याशी मैदान में:
    जब किसी क्षेत्र में किसी विशेष जाति (जैसे यादव, राजपूत, या कुर्मी) के मतदाताओं की संख्या अधिक होती है, तो लगभग सभी प्रमुख दल उसी जाति का प्रत्याशी खड़ा कर देते हैं। ऐसे में उस जाति का वोट कई टुकड़ों में बँट जाता है और फैसला अन्य जातियों के वोटों से होता है।
  • 3. जाति के भीतर वर्ग और वैचारिक मतभेद:
    एक ही जाति के सभी लोग एक ही दल को आँख मूँदकर वोट नहीं देते। जाति के भीतर भी अमीर-गरीब, युवा-बुजुर्ग और स्त्री-पुरुष के हित अलग-अलग होते हैं। गरीब मतदाता अक्सर रोजगार और मुफ्त राशन को अपनी जाति से ऊपर रखते हैं।
  • 4. सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency):
    यदि केवल जाति से चुनाव जीता जा सकता, तो वर्तमान विधायक या सांसद कभी चुनाव नहीं हारते। लेकिन भारत में अक्सर सत्ताधारी दल चुनाव हार जाते हैं क्योंकि जनता उनके भ्रष्टाचार और खराब प्रदर्शन से नाराज होकर अपनी जाति की सरकार को भी उखाड़ फेंकती है।
11. भारतीय राजनीति में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व के कारणों की समीक्षा करते हुए 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के महत्व पर प्रकाश डालिए।

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में महिलाओं की आबादी लगभग आधी (48.5%) है, परंतु संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व हमेशा चिंताजनक रहा है:

कम प्रतिनिधित्व के कारण:

  • पितृसत्तात्मक सोच: राजनीति को पारंपरिक रूप से पुरुषों का कार्यक्षेत्र माना गया है। राजनीतिक दलों के पुरुष नेता महिलाओं को जिताऊ उम्मीदवार (Winnable Candidate) मानने से कतराते हैं।
  • बाहुबल और धनबल का बढ़ता प्रभाव: भारतीय चुनावों में हिंसा, शराब और बेहिसाब काले धन का जो खेल चलता है, उससे सभ्य महिलाएँ चुनावी राजनीति से दूर भागती हैं।
  • घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ: पारिवारिक दायित्वों और बच्चों के पालन-पोषण के कारण महिलाएँ राजनीति को पूर्णकालिक समय नहीं दे पातीं।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वाँ संविधान संशोधन) का महत्व:

  • यह कानून लोकसभा और राज्यों की सभी विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान करता है।
  • इससे संसद में महिला सांसदों की संख्या 80 के आसपास से सीधे बढ़कर लगभग 181 हो जाएगी।
  • यह केवल एक चुनावी सुधार नहीं है, बल्कि देश की नीति-निर्माण प्रक्रिया में महिलाओं की प्राथमिकताओं—जैसे महिला सुरक्षा, पोषण, मातृत्व लाभ और बाल विकास—को राष्ट्रीय एजेंडा बनाने का ऐतिहासिक कदम है।
12. "सामाजिक विविधताएँ किसी भी समाज के लिए खतरा नहीं हैं, बल्कि यह लोकतंत्र को समृद्ध बनाती हैं।" तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।

सामाजिक विविधताओं (भाषा, धर्म, जाति, संस्कृति) को अक्सर तनाव का कारण मान लिया जाता है, परंतु लोकतांत्रिक व्यवस्था में ये वरदान साबित होती हैं:

  • 1. एकरसता की समाप्ति और सांस्कृतिक संपन्नता:
    जिस प्रकार एक ही रंग के फूलों से बना बगीचा नीरस होता है, उसी प्रकार विभिन्न भाषाओं और परंपराओं से मिलकर बना राष्ट्र अधिक सुंदर और समृद्ध होता है। भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी सांस्कृतिक पूँजी है।
  • 2. उपेक्षित वर्गों की अभिव्यक्ति:
    जब विभिन्न सामाजिक समूहों को राजनीति में अपनी बात रखने का अवसर मिलता है, तो समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों की तकलीफें संसद तक पहुँचती हैं। इससे नीतियाँ अधिक संवेदनशील और मानवीय बनती हैं।
  • 3. तानाशाही पर रोक:
    यदि समाज पूरी तरह एकरूप हो, तो सत्ताधारी वर्ग आसानी से निरंकुश बन सकता है। समाज में विभिन्न समूहों की मौजूदगी सत्ता पर नियंत्रण और संतुलन का काम करती है।
  • 4. शांतिपूर्ण समाधान का अवसर:
    विविधताएँ यह सिखाती हैं कि कोई भी समूह हमेशा अपने मनमाने तरीके से नहीं चल सकता। सबको एक-दूसरे के साथ समझौता और संवाद करना पड़ता है, जो नागरिकों में सहिष्णुता और लोकतांत्रिक परिपक्वता पैदा करता है।
13. युगोस्लाविया और उत्तरी आयरलैंड के जातीय-धार्मिक संघर्षों के स्वरूप और उनके परिणामों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कीजिए।

यूरोप के इन दोनों देशों के उदाहरण यह स्पष्ट करते हैं कि धार्मिक और जातीय विभाजन किस प्रकार राजनीति को विनाश की ओर धकेल सकते हैं:

आधार उत्तरी आयरलैंड का संघर्ष युगोस्लाविया का संघर्ष
विभाजन का आधार ईसाई धर्म के दो संप्रदाय: कैथोलिक (44%) और प्रोटेस्टेंट (53%)। जातीय और धार्मिक: सर्ब (रूढ़िवादी ईसाई), क्रोएशियाई (कैथोलिक), और बोस्नियाई (मुस्लिम)।
राजनीतिक माँग कैथोलिक आयरलैंड गणराज्य में मिलना चाहते थे; प्रोटेस्टेंट ब्रिटेन के साथ रहना चाहते थे। प्रत्येक जातीय समूह अपने लिए एक स्वतंत्र, संप्रभु राष्ट्र की माँग कर रहा था।
हिंसा का स्वरूप उग्रवादी गुटों (IRA और ब्रिटिश सेना) के बीच दशकों तक खूनी गुरिल्ला संघर्ष। बर्बर गृहयुद्ध, जातीय नरसंहार (Ethnic Cleansing), और बड़े पैमाने पर शरणार्थी संकट।
अंतिम परिणाम सकारात्मक समाधान: 1998 में ऐतिहासिक 'गुड फ्राइडे समझौता' हुआ और दोनों ने सत्ता साझा करना स्वीकार किया। विनाशकारी विघटन: देश गृहयुद्ध की आग में जलकर 6 स्वतंत्र देशों (सर्बिया, क्रोएशिया, बोस्निया, स्लोवेनिया, मोंटेनेग्रो, उत्तर मैसेडोनिया) में बिखर गया।

निष्कर्ष: उत्तरी आयरलैंड दिखाता है कि बातचीत और सत्ता की साझेदारी से गंभीर से गंभीर धार्मिक खाई को पाटा जा सकता है, जबकि युगोस्लाविया यह चेतावनी देता है कि हठधर्मिता और जातीय वर्चस्व देश का भूगोल मिटा देते हैं।

14. भारत में 'धर्मनिरपेक्षता' का स्वरूप पश्चिमी देशों की धर्मनिरपेक्षता से किस प्रकार भिन्न और अनूठा है?

भारत ने धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को आँख मूँदकर पश्चिम से आयात नहीं किया, बल्कि अपनी ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुसार इसे ढाला है:

  • पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता (कठोर अलगाव):
    • अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों में धर्म और राज्य के बीच एक पूर्ण और कठोर दीवार (Wall of Separation) होती है।
    • राज्य धर्म के मामलों में बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं कर सकता, और धर्म राज्य के मामलों में नहीं।
    • यदि किसी धर्म में कोई सामाजिक बुराई (जैसे छुआछूत या लैंगिक भेद) भी हो, तो पश्चिमी राज्य उसमें हस्तक्षेप नहीं करता। सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक प्रतीकों (जैसे हिजाब, पगड़ी, क्रॉस) के प्रदर्शन पर भी पाबंदी लगाई जाती है।
  • भारतीय धर्मनिरपेक्षता (सर्वधर्म समभाव और सैद्धांतिक दूरी):
    • भारत में राज्य सभी धर्मों का समान सम्मान करता है और किसी एक धर्म का पक्ष नहीं लेता।
    • सकारात्मक हस्तक्षेप: भारत में राज्य धर्म से पूर्णतः कटा हुआ नहीं है। यदि धर्म के नाम पर शोषण होता है, तो संविधान राज्य को हस्तक्षेप करने का अधिकार देता है (जैसे अस्पृश्यता का अंत, दलितों का मंदिर प्रवेश, तीन तलाक पर रोक)।
    • अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार: भारतीय संविधान अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को बचाने तथा अपने शिक्षण संस्थान खोलने का अधिकार (अनुच्छेद 29-30) देता है।

अतः भारत की धर्मनिरपेक्षता धर्म-विरोधी या शुष्क अलगाववादी नहीं है, बल्कि यह सभी धर्मों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और सामाजिक सुधार की एक गतिशील प्रणाली है।

15. सत्ता की साझेदारी के विभिन्न स्तरों को समझाते हुए भारतीय संदर्भ में 'नियंत्रण और संतुलन' (Checks and Balances) की प्रणाली का मूल्यांकन कीजिए।

लोकतांत्रिक व्यवस्था को निरंकुश होने से बचाने के लिए सत्ता का क्षैतिज वितरण किया जाता है, जिसे भारतीय संविधान में 'नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली' के रूप में बहुत खूबसूरती से लागू किया गया है:

तीनों अंगों की भूमिका और पारस्परिक नियंत्रण:

  • 1. विधायिका (संसद/विधानसभा): इसका काम कानून बनाना और देश का बजट पारित करना है। यह कार्यपालिका (मंत्रिपरिषद) से प्रश्न पूछकर, अविश्वास प्रस्ताव लाकर और बहस करके उस पर लगातार नियंत्रण रखती है।
  • 2. कार्यपालिका (प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, नौकरशाही): यह कानूनों को लागू करती है। कार्यपालिका न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति करती है, परंतु एक बार नियुक्त होने के बाद न्यायाधीशों को उनकी मर्जी से हटाया नहीं जा सकता।
  • 3. न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय): यह संविधान की संरक्षक है। न्यायपालिका को न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) की शक्ति प्राप्त है। यदि विधायिका कोई ऐसा कानून बनाती है या कार्यपालिका कोई ऐसा आदेश देती है जो संविधान के मूल ढाँचे का उल्लंघन करता हो, तो न्यायपालिका उसे शून्य (अवैध) घोषित कर सकती है।
  • दूसरी ओर, यदि कोई न्यायाधीश कदाचार का दोषी पाया जाए, तो संसद संविधान के तहत महाभियोग (Impeachment) चलाकर उसे पद से हटा सकती है।

प्रणाली का मूल्यांकन:
यह प्रणाली सुनिश्चित करती है कि सत्ता के तीनों अंगों में से कोई भी एक अंग 'सुपरपावर' न बन सके। 1975 के आपातकाल जैसे संकटों के बावजूद भारतीय लोकतंत्र इसलिए अडिग रहा क्योंकि इस नियंत्रण और संतुलन ने सत्ता के किसी भी मनमाने प्रयोग को समय रहते सीमित कर दिया।

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