मानक हिंदी वर्तनी (Orthography) : नियम एवं प्रयोग
1. वर्तनी : अवधारणा एवं सैद्धांतिक स्वरूप
वर्तनी को उर्दू में 'हिज्जे' तथा अंग्रेजी में 'स्पेलिंग' (Spelling) कहते हैं। किसी भाषा में उच्चरित होने वाले शब्द के वर्णों, स्वरों, व्यंजनों, अनुनासिकता, अनुस्वार तथा मात्राओं के क्रमिक एवं सुव्यवस्थित स्थान-निर्धारण और यथास्थान प्रयोग को ही वर्तनी कहा जाता है।
वर्तनी में शुद्ध तथा अशुद्ध रूपों के चलते कोई विशेष समस्या नहीं होती है; क्योंकि अशुद्ध रूप को व्याकरणिक नियमों के अभ्यास द्वारा सुधारा जा सकता है। वास्तविक समस्या वहाँ उत्पन्न होती है जहाँ एक ही शब्द के दो या अधिक शुद्ध रूप परस्पर विवादास्पद हो जाते हैं। उदाहरणार्थ:
- क्रिया रूपों में विविधता: कोई 'आयेंगे' लिखता है, कोई 'जाएँगे' लिखता है, तो कोई 'जायें' लिखता है।
- विभक्ति की स्थिति को लेकर विवाद: कोई संज्ञा के साथ 'राम को' अलग लिखना सही मानता है, तो कोई 'रामको' मिलाकर लिखता है (जैसे सर्वनाम में 'आपको')।
2. मानक वर्तनी के व्यावहारिक नियम एवं सूत्र
उदाहरण: राम + को = राम को | पेड़ + से = पेड़ से | घर + में = घर में
उदाहरण: आप + की = आपकी | उन + को = उनको | मुझ + से = मुझसे
उदाहरण: मिल + कर = मिलकर | खा + कर = खाकर | पूछ + कर = पूछकर
उदाहरण: खायें (खायेँ नहीं), जायें (जायेँ नहीं), ईंट, गोंद, मैं
उदाहरण: सं + योग = संयोग | सं + रक्षण = संरक्षण | सं + वाद = संवाद | सं + शोधन = संशोधन
3. केंद्रीय हिंदी संस्थान एवं मानक व्याकरण द्वारा स्वीकृत शुद्ध रूप
| व्याकरणिक कोटि | मानक एवं शुद्ध रूप (स्वीकृत उदाहरण) |
|---|---|
| आदरार्थक / विधि क्रियाएँ (ए-कार रूप) | आइए, जाइए, गाइए, दिखाइए, कीजिए, लीजिए, पीजिए, उठिए, बैठिए, बुलाइए, रहिए, चलिए, करिए, पढ़िए आदि। |
| स्त्रीलिंग एवं भाववाचक संज्ञाएँ / विशेषण | नई, विजयी, पढ़ाई, लिखाई, खिंचाई, कमाई आदि। |
| भविष्यत्कालिक क्रियाएँ (य-श्रुति) | जाएगा, पाएगा, खाएगा, करवाएगा आदि। |
| पुल्लिंग बहुवचन एवं भूतकालिक रूप | हुए, लिए, कछुए, कौए आदि। |
| पंचमाक्षर एवं अनुस्वार का वैकल्पिक प्रयोग | दन्त – दंत, पम्प – पंप, चञ्चल – चंचल, कङ्क – कंक आदि (दोनों रूप विकल्प से शुद्ध हैं)। |
| प्रसिद्ध व्यक्तियों के सामासिक नाम | हजारीप्रसाद द्विवेदी, महावीरप्रसाद द्विवेदी, सूरदास, कबीरदास, तुलसीदास, बिहारीलाल आदि ही सही हैं। 'प्रसाद', 'दास' आदि को नाम से अलग करके नहीं लिखना चाहिए। |
| संज्ञा पदों के साथ कारक विभक्तियाँ | राम को, मोहन को, श्याम के लिए, पेड़ से, घर में आदि (पृथक् लिखा जाना सर्वमान्य है)। |
| सर्वनाम पदों के साथ कारक विभक्तियाँ | आपकी, उनको, उसके लिए, आपसे, मुझसे, तुममें आदि (मिलाकर लिखा जाना सर्वमान्य है)। |
| पूर्वकालिक कृदंत क्रिया रूप | मिलकर जाना, पूछकर आना चाहिए, खाकर बैठो, करके बोलो आदि प्रयोग शुद्ध एवं सर्वमान्य हैं। |
| अनुनासिकता (चंद्रबिंदु) का नियम | स्वरगत अनुनासिकता के लिए चंद्रबिंदु (ँ) ही मान्य है; जैसे—हँसना, फँसना, खाँसी, चाँद आदि। |
| शिरोरेखा के ऊपर अनुनासिकता का अंकन | शिरोरेखा के ऊपर मात्रा होने पर चंद्रबिंदु के स्थान पर सुविधा हेतु केवल बिंदु (ं) दिया जाता है, परंतु इसे अनुस्वार कहना ठीक नहीं; जैसे—खायें, जायें, गोंद आदि। |
| अनिवार्य अनुस्वार वाले तत्सम शब्द | संज्ञा, संयत, अंश, संरक्षण, संवाद, संशोधन, संशय आदि (इनमें पंचमाक्षर का संयोग नहीं चल सकता)। |
25 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तरी (Objective Questions with Explanations)
- (A) लिपि
- (B) वर्तनी (हिज्जे)
- (C) व्याकरण
- (D) पदक्रम
- (A) कीजीये
- (B) किजिये
- (C) कीजिए
- (D) कीजियें
- (A) जाएगा
- (B) जाएगॉ
- (C) जायगा
- (D) जावेगा
- (A) संज्ञा के साथ जोड़कर (संयोगात्मक)
- (B) संज्ञा से अलग (वियोगात्मक)
- (C) योजक चिह्न लगाकर
- (D) कोष्ठक में बंद करके
- (A) सदैव अलग करके
- (B) सर्वनाम के साथ मिलाकर (संयुक्त रूप में)
- (C) बिंदु लगाकर
- (D) रेखांकित करके
- (A) मिलाकर
- (B) अलग करके
- (C) नहीं लिखा जाता
- (D) दोनों मिलाकर
- (A) मूल नाम से अलग (उदा. कबीर दास)
- (B) मूल नाम के साथ संयुक्त रूप में (उदा. कबीरदास)
- (C) योजक चिह्न लगाकर (उदा. कबीर-दास)
- (D) केवल आद्याक्षर रूप में
- (A) धातु से अलग हटाकर
- (B) धातु के साथ मिलाकर
- (C) योजक चिह्न के साथ
- (D) केवल बिंदु के रूप में
- (A) क्योंकि ये तद्भव शब्द हैं
- (B) क्योंकि अनुस्वार के बाद अंतःस्थ (य, र, ल, व) या ऊष्म (श, ष, स, ह) वर्ण हैं
- (C) क्योंकि ये विदेशी शब्द हैं
- (D) इनमें पंचमाक्षर लुप्त रहता है
- (A) केवल अनुस्वार (ं)
- (B) चंद्रबिंदु (ँ)
- (C) विसर्ग (ः)
- (D) हलंत (्)
- (A) क्योंकि वह वास्तविक अनुस्वार है
- (B) स्थान के अभाव (मात्रा होने) के कारण चंद्रबिंदु के स्थान पर बिंदु दिया जाता है
- (C) क्योंकि वहाँ पंचमाक्षर है
- (D) यह अशुद्ध रूप है
- (A) केवल 'दन्त'
- (B) केवल 'दंत'
- (C) दोनों रूप विकल्प से शुद्ध हैं
- (D) दोनों अशुद्ध हैं
- (A) आईए, जाईए
- (B) आइए, जाइए
- (C) आयिए, जायिए
- (D) आइऐ, जाइऐ
- (A) नई
- (B) नयाई
- (C) नयि
- (D) नइ
- (A) केवल पहला शुद्ध है
- (B) केवल दूसरा शुद्ध है
- (C) जहाँ दोनों रूप शुद्ध हैं, वहाँ विकल्प से दोनों को स्वीकार करें
- (D) दोनों को अमान्य कर देना चाहिए
- (A) इनमें 'ए' का प्रयोग शुद्ध है
- (B) इनमें 'ये' का प्रयोग होना चाहिए
- (C) इनमें केवल चंद्रबिंदु होना चाहिए
- (D) ये तद्भव नहीं हैं
- (A) चंचल
- (B) संपदा
- (C) संयत
- (D) कंकण
- (A) 'पुस्तक' अशुद्ध है
- (B) संज्ञा 'राम' के साथ विभक्ति 'को' मिलाकर लिखी गई है, जो पृथक् होनी चाहिए
- (C) 'दो' के स्थान पर 'दीजिए' होना चाहिए
- (D) कोई त्रुटि नहीं है
- (A) आप-से
- (B) आपसे
- (C) आपमें
- (D) आप पे
- (A) अनुस्वार
- (B) चंद्रबिंदु (अनुनासिक)
- (C) विसर्ग
- (D) अर्धचंद्र
- (A) स्वर संधि नियम
- (B) पंचमाक्षर के स्थान पर अनुस्वार का वैकल्पिक प्रयोग
- (C) वर्ण विपर्यय
- (D) बलाघात नियम
- (A) किसी भी नियम का पालन न करना
- (B) शुद्ध वैकल्पिक रूपों को उदारतापूर्वक स्वीकार कर भाषा को समृद्ध बनाना
- (C) केवल पुरानी वर्तनी का समर्थन करना
- (D) वर्तनी के सारे नियम समाप्त कर देना
- (A) तुलसी दास
- (B) तुलसी-दास
- (C) तुलसीदास
- (D) तुलसी दाश
- (A) पूछकर आना
- (B) पूछ-कर आना
- (C) पूछी कर आना
- (D) पूछिके आना
- (A) क्योंकि इसके बाद ऊष्म वर्ण 'श' है
- (B) क्योंकि यह विदेशी शब्द है
- (C) क्योंकि यह बहुवचन है
- (D) क्योंकि यह अव्यय है
25 विषयनिष्ठ प्रश्नोत्तर (Subjective Questions with Comprehensive Explanations)
उत्तर: किसी भाषा के शब्दों में प्रयुक्त होने वाले वर्णों, स्वरों, व्यंजनों, मात्राओं और अनुनासिकता के क्रमिक, सटीक एवं नियमबद्ध विन्यास को वर्तनी (हिज्जे / Spelling) कहा जाता है।
महत्व: वर्तनी भाषा की समरूपता, स्पष्टता और संप्रेषणीयता की आधारशिला है। अशुद्ध वर्तनी से न केवल भाषा का सौंदर्य विकृत होता है, अपितु अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है (जैसे—'अलि' = भौंरा, किंतु 'अली' = सखी)।
उत्तर: अशुद्ध वर्तनी को व्याकरण के ज्ञात नियमों के आधार पर सरलता से पहचाना और सुधारा जा सकता है। किंतु समस्या वहाँ गंभीर हो जाती है जहाँ विद्वानों और प्रकाशकों द्वारा एक ही शब्द के दो भिन्न-भिन्न रूपों को शुद्ध मानकर प्रयोग किया जाता है। जैसे—कुछ विद्वान 'जाएँगे' लिखते हैं और कुछ 'जायेंगे'; कुछ 'राम को' अलग लिखते हैं और कुछ 'रामको' मिलाकर। इस द्वैध से शिक्षार्थियों में संशय उत्पन्न होता है।
उत्तर: इस सिद्धांत का तात्पर्य यह है कि जहाँ किसी शब्द की दो वर्तनियाँ व्याकरणिक रूप से पूर्णतः शुद्ध हों (जैसे—'चिह्न' और 'चिन्ह', अथवा 'सिद्धि' और 'सिद्धी'), वहाँ किसी एक रूप को जबरन थोपने या दूसरे को गलत ठहराने के विवाद से बचना चाहिए। रूप का वैविध्य भाषा की विपुलता और ऐतिहासिक समृद्धि का परिचायक है, अतः दोनों को वैकल्पिक रूप से मान्यता दी जानी चाहिए।
उत्तर: आधुनिक मानक हिंदी वर्तनी के अनुसार आदरार्थक या आज्ञार्थक क्रियाओं के अंत में स्वर रूप 'ए' का प्रयोग ही सर्वमान्य है।
शुद्ध रूप: आइए, जाइए, गाइए, दिखाइए, कीजिए, लीजिए, पीजिए, उठिए, बैठिए, बुलाइए, रहिए, चलिए, करिए, पढ़िए आदि। (इनमें 'आईये', 'जाईये' लिखना अमानक माना जाता है)।
उत्तर: स्त्रीलिंग, भाववाचक संज्ञाओं तथा कृदंत रूपों में स्वर रूप 'ई' का प्रयोग ही निर्णयित और सर्वमान्य है।
प्रामाणिक उदाहरण: नई, विजयी, पढ़ाई, लिखाई, खिंचाई, कमाई आदि। ('नयी' के स्थान पर 'नई' को अधिक मानक स्वीकार किया गया है)।
उत्तर: भविष्यत् काल की अन्य पुरुष एकवचन क्रियाओं में 'जाएगा', 'पाएगा', 'खाएगा', 'करवाएगा' आदि रूपों को मानक माना गया है। यहाँ 'जायेगा' या 'पायेगा' की तुलना में 'जाएगा' और 'पाएगा' का प्रयोग आधुनिक हिंदी वर्तनी में अधिक सुसंगत और ग्राह्य है।
उत्तर: भूतकाल के बहुवचन रूपों तथा आकारांत पुल्लिंग के बहुवचन में 'ए' स्वर का प्रयोग शुद्ध है।
उदाहरण: हुए, लिए, कछुए, कौए आदि। (यहाँ 'हुवे', 'लिये', 'कछुवे' या 'कौवे' की तुलना में स्वर रूप अधिक मानक माने गए हैं)।
उत्तर: संस्कृत के तत्सम शब्दों में किसी वर्ग (क, च, ट, त, प वर्ग) के पंचमाक्षर (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) के स्थान पर विकल्प से शिरोरेखा पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग मान्य है। दोनों ही रूप शुद्ध माने जाते हैं:
- दन्त = दंत (त्-वर्ग का पंचमाक्षर 'न्')
- पम्प = पंप (प्-वर्ग का पंचमाक्षर 'म्')
- चञ्चल = चंचल (च्-वर्ग का पंचमाक्षर 'ञ्')
- कङ्क = कंक (क्-वर्ग का पंचमाक्षर 'ङ्')
उत्तर: नियम: संज्ञा पदों के साथ कारक विभक्तियों को सदैव अलग (वियोगात्मक रूप में) लिखा जाना चाहिए। उन्हें संज्ञा के साथ मिलाकर लिखना अशुद्ध है।
उदाहरण:
- राम को (न कि 'रामको')
- पेड़ से (न कि 'पेड़से')
- श्याम के लिए (न कि 'श्यामकेलिए')
उत्तर: नियम: सर्वनाम शब्दों के साथ कारक विभक्तियाँ सदैव मिलाकर (संयोगात्मक रूप में) लिखी जाती हैं।
उदाहरण: आपकी, उनको, आपसे, मुझसे, तुममें, किसका आदि।
विशेष नियम: यदि सर्वनाम के साथ दो विभक्तियाँ हों, तो पहली मिलाकर और दूसरी अलग लिखी जाएगी; जैसे—'उसके लिए', 'उनमें से'।
उत्तर: साहित्यिक एवं ऐतिहासिक व्यक्तियों के नाम में 'प्रसाद', 'दास' या 'लाल' को मूल नाम के साथ संयुक्त रूप में (मिलाकर) ही लिखना चाहिए; जैसे—महावीरप्रसाद द्विवेदी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, तुलसीदास, कबीरदास, सूरदास, बिहारीलाल।
कारण: ये शब्द अलग से कोई उपनाम या जाति नहीं हैं, बल्कि व्यक्ति के मूल नाम के अभिन्न अंग हैं। इन्हें अलग लिखने से व्यक्तिवाचक संज्ञा खंडित हो जाती है।
उत्तर: नियम: पूर्वकालिक क्रिया बनाते समय 'कर' प्रत्यय को मुख्य धातु के साथ अनिवार्यतः मिलाकर लिखा जाता है। इसे अलग लिखना अशुद्ध माना जाता है।
उदाहरण: मिलकर जाना, पूछकर आना, खाकर बैठो, करके बोलो, रोकर कहना आदि।
उत्तर: जब किसी स्वर का उच्चारण मुख और नासिका दोनों से एक साथ होता है (स्वरगत अनुनासिकता), तब वहाँ अनिवार्य रूप से चंद्रबिंदु (ँ) लगाया जाता है।
उदाहरण: हँसना, फँसना, खाँसी, चाँद, आँख, गाँव आदि। यदि यहाँ केवल बिंदु लगाया जाए तो उच्चारण और अर्थ में अशुद्धि आ सकती है (जैसे 'हंस' = जलपक्षी, किंतु 'हँस' = हँसने की क्रिया)।
उत्तर: जब किसी वर्ण पर शिरोरेखा के ऊपर निकलने वाली कोई मात्रा (जैसे—ि, ी, े, ै, ो, औ) लगी हो, तो वहाँ स्थान-लाघव (मुद्रण व लेखन में जगह की कमी) के कारण चंद्रबिंदु (ँ) के स्थान पर केवल बिंदु (ं) दिया जाता है; जैसे—खायें, जायें, ईंट, मैं, गोंद।
अनुस्वार न कहने का कारण: इसे अनुस्वार कहना सर्वथा अनुचित है; क्योंकि यह मूलतः नासिक्य व्यंजन (पंचमाक्षर) नहीं है, बल्कि चंद्रबिंदु (अनुनासिक स्वर) का ही व्यावहारिक स्थानापन्न रूप है।
उत्तर: जब अनुस्वार के ठीक बाद अंतःस्थ व्यंजन (य, र, ल, व) या ऊष्म व्यंजन (श, ष, स, ह) आते हैं, तो वहाँ केवल और केवल अनुस्वार (ं) का प्रयोग ही मान्य होता है। वहाँ पंचमाक्षर का प्रयोग संभव नहीं है।
उदाहरण: संज्ञा, संयत, अंश, संरक्षण, संवाद, संशोधन, संशय, संहार आदि।
(क) रामको कल दिल्ली जाना है।
(ख) आप से मिलकर प्रसन्नता हुई।
उत्तर:
- (क) अशुद्ध: रामको कल दिल्ली जाना है।
शुद्ध रूप: राम को कल दिल्ली जाना है। (संज्ञा से कारक विभक्ति अलग लिखी जाती है)। - (ख) अशुद्ध: आप से मिलकर प्रसन्नता हुई।
शुद्ध रूप: आपसे मिलकर प्रसन्नता हुई। (सर्वनाम के साथ कारक विभक्ति मिलाकर लिखी जाती है)।
उत्तर: संस्कृत के मूल तत्सम रूप में 'ह्' आधा और 'न्' पूरा होता है—चिह्न [चिह् + न]। मुद्रण की सुगमता और बोलचाल में बहुत से लोग इसे 'चिन्ह' भी लिखते हैं। पाठ के अनुसार दोनों ही रूप ग्राह्य हैं और शिक्षार्थियों को इनके वैविध्य को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए, यद्यपि परंपरानुकूल 'चिह्न' अधिक प्रामाणिक माना जाता है।
उत्तर: केंद्रीय हिंदी निदेशालय के मानक वर्तनी नियमों के अनुसार जहाँ 'ए' स्वतंत्र स्वर के रूप में उच्चरित हो, वहाँ स्वर रूप 'किए' और 'लिए' ही मानक हैं। 'किये' या 'लिये' में 'य' श्रुति अनावश्यक है; क्योंकि मूल धातु 'कर' या अव्यय में 'य' का कोई व्युत्पत्तिगत आधार नहीं है।
(पढाई, पढ़ाई, कीजीये, कीजिए, सम्पादक, संपादक, कबीर दास, कबीरदास)
उत्तर:
- पढाई / पढ़ाई $\to$ पढ़ाई (शुद्ध)
- कीजीये / कीजिए $\to$ कीजिए (शुद्ध)
- सम्पादक / संपादक $\to$ संपादक (तथा सम्पादक दोनों विकल्प से शुद्ध, आधुनिक मानक: संपादक)
- कबीर दास / कबीरदास $\to$ कबीरदास (शुद्ध)
उत्तर: 'संशोधन' का विच्छेद सम् + शोधन होता है। यहाँ संधि के नियमानुसार 'म्' के बाद ऊष्म वर्ण 'श' आया है। चूंकि 'श' का कोई अपना नासिक्य पंचमाक्षर नहीं होता, अतः 'म्' अनिवार्य रूप से अनुस्वार (ं) में परिवर्तित हो जाता है। इसे 'सम्शोधन' लिखना वर्तनी की दृष्टि से अशुद्ध है।
उत्तर:
- हंस (अनुस्वार युक्त): यह एक संज्ञा शब्द है, जिसका अर्थ मानसरोवर का प्रसिद्ध पवित्र श्वेत जलपक्षी अथवा जीवात्मा होता है।
- हँस (चंद्रबिंदु युक्त): यह हँसना क्रिया की मूल धातु (आज्ञार्थक रूप) है; जैसे—'सदा हँसते रहो'।
अतः अनुस्वार और चंद्रबिंदु के असावधानीपूर्ण प्रयोग से अर्थ सर्वथा बदल जाता है।
उत्तर: हिंदी व्याकरण में 'खाकर' एक पूर्वकालिक कृदंत (Conjunctive Participle) है। नियम है कि मुख्य क्रिया से पूर्व संपन्न होने वाली क्रिया को प्रकट करने के लिए धातु में 'कर' जोड़कर एक संयुक्त शब्द बनाया जाता है। यदि 'कर' को अलग लिखा जाए तो वह 'करना' क्रिया या 'हाथ/टैक्स' संज्ञा का भ्रम उत्पन्न कर सकता है।
उत्तर: क्रियाओं के अंत में 'ए' स्वर (जैसे—जाए, खाए, नए) आता है, जिसकी मात्रा शिरोरेखा के ऊपर एक डंडी (े) होती है। बहुधा लोग 'जाइऐ' या 'आइऐ' लिख देते हैं जो सर्वथा अशुद्ध है। 'ऐ' का प्रयोग केवल मूल शब्दों (जैसे—ऐनक, ऐसा, ऐतिहासिक) या 'है/हैं' में होता है।
उत्तर: कंप्यूटर, फॉन्ट और की-बोर्ड के आगमन से हिंदी वर्तनी में सरलीकरण और एकरूपता को बल मिला है।
- जटिल संयुक्त वर्णों (जैसे—ङ्क, च्छ, द्ध) के स्थान पर हलंत युक्त रूप (द्ध) अथवा पंचमाक्षर के स्थान पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग बढ़ा है।
- टाइपिंग में सुगमता के कारण 'जाएगा', 'नई', 'कीजिए' जैसे स्वर-प्रधान रूपों को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता मिली है।
उत्तर: भाषा के प्रश्नपत्र में वर्तनी की शुद्धता का प्रत्यक्ष प्रभाव अंकों पर पड़ता है।
- विषयनिष्ठ प्रश्नों (निबंध, संक्षेपण, व्याख्या, पत्र-लेखन) में अशुद्ध वर्तनी होने पर परीक्षक अंक काट लेते हैं।
- शुद्ध वर्तनी से उत्तर प्रभावशाली, पठनीय और प्रामाणिक बनता है, जिससे परीक्षार्थी को शत-प्रतिशत अंक प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
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