रचना-परिचय : शब्द-ज्ञान एवं व्यावहारिक रचना विधाएँ
1. शब्द और उसकी शक्ति
भाषा की समृद्धि उसकी शब्द संपदा पर निर्भर करती है। शब्दों के स्वरूपगत तथा अर्थगत वैविध्य से भाषा का सौंदर्य बढ़ता है और उसकी व्यंजकता में निखार आता है।
वा खाए बौरात नर, या पाए बौराय।।"
उपर्युक्त कथन हिंदी में इसलिए संभव हुआ क्योंकि यहाँ 'कनक' शब्द के दो सर्वथा भिन्न अर्थ होते हैं—स्वर्ण (सोना) और धतूरा।
अर्थ एवं प्रयोग के आधार पर शब्दों के प्रमुख पाँच प्रकार होते हैं:
- अनेकार्थक शब्द: एक ही शब्द के एक से अधिक अर्थ निकलने वाले शब्द।
- श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द: सुनने में समान किंतु अर्थ में सर्वथा भिन्न शब्द।
- विपरीतार्थक शब्द: परस्पर विरोधी या उल्टे अर्थ प्रकट करने वाले शब्द (विलोम)।
- अनेक शब्दों के लिए एक शब्द: वाक्यांश के लिए संक्षेपीकृत एकल शब्द।
- पर्यायवाची शब्द: समान अर्थ ध्वनित करने वाले विभिन्न शब्द।
(i) प्रमुख अनेकार्थक शब्द एवं उनके विविध अर्थ
| शब्द | विभिन्न संदर्भगत अर्थ |
|---|---|
| अंक | संख्या, गोद, चिह्न, नाटक का खंड (अध्याय)। |
| अंबर | आकाश, वस्त्र। |
| अर्क | रस/काढ़ा, सूर्य, अकवन (मदार) नामक औषधीय पौधा। |
| अर्थ | अभिप्राय, निमित्त, धन/संपत्ति, प्रयोजन। |
| अरुण | लाल, सूर्य का सारथी, प्रभात का सूर्य। |
| आम | एक प्रसिद्ध फल, सामान्य/साधारण (जैसे आम आदमी)। |
| कनक | स्वर्ण (सोना), धतूरा, पलाश, गेहूँ। |
| कल | अगला या पिछला दिन, चैन/शांति, यंत्र (मशीन)। |
| कुल | सब/संपूर्ण, वंश, संस्था, समूह/किनारा। |
| खून | रक्त/शोणित, हत्या/कत्ल। |
| गो | धरती, गाय, ज्ञान/इंद्रिय। |
| गुण | विशेषता, धर्म/प्रकृति, रस्सी/धागा। |
| घन | गाढ़ा, बादल, बड़ा, हथौड़ा/लोहे का घन। |
| जलज | कमल, शंख, मोती, मछली। |
| चारा | जानवर का भोजन/घास, उपाय/तदबीर, केंचुआ। |
| तात | पिता, भाई, पूज्य, प्रिय। |
| द्विज | पक्षी, ब्राह्मण, दाँत। |
| पट | किवाड़, पर्दा, वस्त्र, तख्त। |
| पतंग | गुड्डी (उड़ाने वाली), सूर्य, एक कीड़ा (फतिंगा)। |
| पय | दूध, जल। |
| मधु | शराब (मदिरा), शहद, मीठा, वसंत ऋतु। |
| विधि | रीति/तरीका, कानून/नियम, विधाता (ब्रह्मा)। |
| सर | शिर/मस्तक, तालाब/जलाशय, बाण। |
| हार | गले की माला, पराजय/मात। |
| हंस | सूर्य, एक श्वेत जलपक्षी (जो मानसरोवर में रहता है), जीवात्मा। |
| अक्ष | आँख, सर्प, धुरी, पासा। |
| खग | पक्षी, बाण, तारा/ग्रह। |
| गुरु | शिक्षक/आचार्य, ग्रहविशेष (बृहस्पति), भारी/बड़ा। |
| नाग | हाथी, साँप, पर्वत, बादल। |
| मित्र | दोस्त/सखा, सूर्य। |
| दंड | डंडा/लाठी, सजा/जुर्माना, समय का एक मान (घड़ी)। |
2. श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द (युग्म-शब्द)
नाम से स्पष्ट है कि ये शब्द सुनने में एक जैसे लगते हैं परंतु वर्तनी में थोड़े अंतर के चलते इनके अर्थ सर्वथा भिन्न-भिन्न हो जाते हैं। वस्तुतः ये शब्द एक होते नहीं; मात्र सुनने में एक से प्रतीत होते हैं।
| शब्द-युग्म | अर्थ-भेद | शब्द-युग्म | अर्थ-भेद |
|---|---|---|---|
| अंश / अंस | हिस्सा / कंधा | अंत / अंत्य | समाप्ति / अंतिम (नीच) |
| अनु / अणु | पीछे (उपसर्ग) / सूक्ष्मतम कण | अनिल / अनल | हवा / आग |
| आप / आब | तू का आदरसूचक / पानी, आभा (चमक) | आसन्न / आसन | निकट / बैठने की वस्तु (चौकी/वस्त्र) |
| अभिहित / अविहित | उल्लेख किया हुआ (कहा हुआ) / अनुचित (शास्त्र-विरुद्ध) | अनुस्वार / अनुसार | अनुनासिक का बिंदु चिह्न (ं) / अनुकूल (के मुताबिक) |
| कुशासन / कुशासन | कुश का आसन / दोषपूर्ण (बुरा) शासन | कोष / कोस | खजाना (शब्दसंग्रह) / दूरी का एक माप (लगभग 3 किमी) |
| आदी / आदि | अभ्यस्त (आदत वाला), अदरक / आरंभ, वगैरह | — | — |
3. विपरीतार्थक शब्द (विलोम शब्द)
विपरीत यानी किसी शब्द के सर्वथा विरुद्ध या विपरीत भाव व्यक्त करने वाले शब्द विलोम कहलाते हैं।
| मूल शब्द | विपरीतार्थक | मूल शब्द | विपरीतार्थक |
|---|---|---|---|
| अस्त | उदय | अंत | आदि |
| अपना | पराया | अध्यंतर | बाह्य |
| अंधकार | प्रकाश | इहलोक | परलोक |
| अमृत | विष | इष्ट | अनिष्ट |
| आय | व्यय | ईश्वर | जीव |
| आदर | अनादर, तिरस्कार | उदार | कृपण (कंजूस) |
| आदान | प्रदान | उपयोग | दुरुपयोग |
| आविर्भाव | तिरोभाव | इच्छा | अनिच्छा |
| आगमन | निगमन (प्रस्थान) | उदात्त | अनुदात्त |
| अभिज्ञ | अनभिज्ञ | उदयाचल | अस्ताचल |
| आयात | निर्यात | एड़ी | चोटी |
| आकाश | पाताल | ऐतिहासिक | अनैतिहासिक |
| आस्तिक | नास्तिक | उत्थान | पतन |
| अपेक्षा | उपेक्षा | कीर्ति | अपकीर्ति |
| कृतज्ञ | कृतघ्न | कुरूप | सुरूप |
| खुशी | गम | करुण | निष्ठुर |
| जंगम | स्थावर | कृत्रिम | प्रकृत (प्राकृतिक) |
| उत्कर्ष | अपकर्ष | कर्मण्य | अकर्मण्य |
| सगुण | निर्गुण | कोप | कृपा |
| उत्कृष्ट | निकृष्ट | क्रय | विक्रय |
| कनिष्ठ | ज्येष्ठ | सकाम | निष्काम |
| कुटिल | सरल | अग्रज | अनुज |
| गुरु | लघु | अधम | उत्तम |
| गौरव | लाघव | अज्ञ | विज्ञ, प्रज्ञ |
| गमन | आगमन | अथ | इति |
| घात | प्रतिघात | अनुग्रह | विग्रह |
| चोर | साधु | अतिवृष्टि | अनावृष्टि |
| जन्म | मृत्यु, मरण | अवनि | अंबर |
| जागरण | निद्रा | अनुकूल | प्रतिकूल |
| जड़ | चेतन | आर्द्र | शुष्क |
| जल | स्थल | जटिल | सरल |
| आलोक | अंधकार | आधुनिक | प्राचीन |
| तीव्र | मंद | तुच्छ | महान |
| सम्मुख | विमुख | दिवा | रात्रि |
| सार्थक | निरर्थक | दक्षिण | वाम, उत्तर |
| स्वतंत्रता | परतंत्रता | ध्वंस | निर्माण |
| संयोग | वियोग | नूतन | पुरातन |
| सम्मान | अपमान | निरामिश | सामिश |
| सुलभ | दुर्लभ | निर्लज्ज | सलज्ज |
| स्मरण | विस्मरण | निर्दय | सदय |
| संतोष | असंतोष | निरक्षर | साक्षर |
| सौम्य | उग्र, असौम्य | पंडित | मूर्ख |
| सुशील | दुःशील | पक्ष | विपक्ष |
| स्वप्न | जागरण | परुष (कठोर) | कोमल |
| शकुन | अपशकुन | प्रमुख | सामान्य, गौण |
| श्रव्य | दृश्य | प्रलय | सृष्टि |
| शोषक | पोषक | पुरस्कार | दंड, तिरस्कार |
| शुष्क | सिक्त (भीगा) | प्राचीन | नवीन, अर्वाचीन |
| प्रत्यक्ष | परोक्ष | मुनाफा | नुकसान |
| रूपवान | कुरूप | रागी | विरागी |
| लौकिक | अलौकिक | लुप्त | व्यक्त |
| विशिष्ट | साधारण | विस्तृत | संक्षिप्त |
| विशेष | सामान्य | वसन्त | पतझड़ |
| बहिष्कार | स्वीकार, अंगीकार | वृद्धि | ह्रास |
| विधवा | सधवा | विपत्ति | सम्पत्ति |
| वृष्टि | अनावृष्टि | सम | विषम |
| सजीव | निर्जीव, अजीव | — | — |
4. अनेक शब्दों के लिए एक शब्द (वाक्यांश-बोध)
- जो प्रिय बोले – प्रियंवद
- आया हुआ – आगत
- नहीं आया हुआ (जो अभी न आया हो) – अनागत
- जानने की इच्छा – जिज्ञासा (जानने का इच्छुक = जिज्ञासु)
- जिसके समान दूसरा न हो – अद्वितीय
- जिसकी उपमा न मिले – अनुपम
- बायें हाथ से तीर चलाने वाला (सव्य हस्त से धनुष चलाने वाला) – सव्यसाची (अर्जुन)
- रोंगटे खड़े कर देने वाला – रोमांचक / लोमहर्षक
- अन्य का किया उपकार याद रखने वाला – कृतज्ञ
- अन्य का किया उपकार न मानने वाला – कृतघ्न
- ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखने वाला – आस्तिक
- ईश्वर की सत्ता में विश्वास न रखने वाला – नास्तिक
- जिसकी परिमिति (नाप/माप) ज्ञात न हो – अपरिमित
- जिसका अंत न हो – अनंत
- जिसकी कोई सीमा न हो – असीम
- जो पहले कभी न हुआ हो – अभूतपूर्व
- जिसका नाश निश्चित हो – नश्वर
- स्वयं पर अवलंबित रहने वाला – स्वावलंबी
- गुणों को ग्रहण करने वाला – गुणग्राही
- हृदय पिघला देने वाला – हृदयविदारक / हृदयद्रावक
- व्याकरण का ज्ञाता / व्याकरण जानने वाला – वैयाकरण
- जिसकी प्रतिज्ञा दृढ़ हो – दृढ़प्रतिज्ञ
- जल में विचरण करने वाला – जलचर (आकाश में = नभचर, थल पर = थलचर)
- द्वीप पर जन्म लेने वाला – द्वैपायन (महर्षि पराशर पुत्र वेदव्यास)
- नया आया हुआ – नवागत
5. पर्यायवाची शब्द (समानार्थी)
एक ही अर्थ की प्रतीति कराने वाले अनेक शब्दों को पर्यायवाची कहा जाता है।
- अग्नि: अनल, पावक, हुताशन, आग, कृशानु, वह्नि।
- पानी: जल, नीर, पय, वारि, तोय, उदक, अंबु, आब।
- आकाश: गगन, नभ, व्योम, अभ्र, अंतरिक्ष, आसमान।
- पृथ्वी: धरती, मेदिनी, भू, धरा, धरणी, वसुंधरा, अचला।
- समुद्र: उदधि, सागर, जलनिधि, पयोधि, नदीश, अर्णव, रत्नाकर।
- गंगा: सुरसरि, मंदाकिनी, भागीरथी, जाह्नवी, त्रिपथगा, देवनदी।
- चंद्रमा: शशि, सुधांशु, सुधाकर, राकेश, निशापति, इंदु, मयंक।
- सूर्य: दिवाकर, दिनमणि, दिनेश, विभाकर, मार्तंड, भास्कर, रवि, भानु।
- कमल: सरसिज, पंकज, नलिन, राजीव, सरोज, अरविंद, शतदल।
- बिजली: चपला, विद्युत, सौदामिनी, दामिनी, तड़ित, क्षणप्रभा।
- सरस्वती: वीणापाणि, पुस्तकधारिणी, शारदा, ब्राह्मी, वागीश्वरी, भारती।
- पर्वत: भूधर, नग, पहाड़, शैल, गिरि, अद्रि, महीधर।
- नदी: तटिनी, सरिता, सरि, तरंगिणी, निर्झरिणी।
- जंगल: वन, कांतार, अरण्य, कानन, विपिन।
- सिंह: शार्दूल, केहरि, मृगराज, हरि, वनराज, व्याघ्र।
- शंकर: शिव, शंभु, उमापति, त्रिलोचन, महादेव, नीलकंठ, चंद्रशेखर।
- राजा: भूप, भूपति, महीपति, नरेश, नृपति, नृप, सम्राट।
- राक्षस: दनुज, दानव, असुर, निशाचर, दैत्य, यातुधान।
- देवता: देव, सुर, अमर, निर्जर, त्रिदश।
- इन्द्र: महेंद्र, सुरपति, सुरेन्द्र, अमरेंद्र, पुरंदर, शक्र, वासव।
- गणेश: लंबोदर, गजवदन, गजानन, विनायक, महाकाय, एकदंत।
- भौंरा: भ्रमर, भृंग, अलि, मधुप, मधुकर, षट्पद।
- कामदेव: अनंग, मदन, मनमथ, मार, कंदर्प, मनोज, रतिपति।
- हाथी: गज, कुंजर, हस्ती, दन्ती, नाग, करी, द्विरद।
6. मुहावरे एवं कहावतें (लोकोक्तियाँ)
(A) मुहावरे: स्वरूप एवं प्रयोग
मुहावरे व्यंजना प्रधान पदबंध होते हैं। इनमें प्रयुक्त शब्दों के पारंपरिक या अभिधार्थ (मुख्यार्थ) सर्वथा गौण पड़ जाते हैं और एक नया लाक्षणिक अर्थ ध्वनित हो जाता है। उदाहरण के लिए—'कलेजे का टुकड़ा' या 'आँखों का तारा' में कलेजा या आँख का सामान्य अर्थ लुप्त होकर केवल 'अत्यंत प्रिय' का अर्थ रूढ़ हो गया है।
- अंगूठा दिखाना (समय पर धोखा देना, रूखााई पूर्ण इनकार करना): पास में रुपए होने के बावजूद पाँच सौ रुपए के लिए उन्होंने साफ अंगूठा दिखा दिया।
- अंगूठा चूमना (खुशामद में स्तरहीनता तक उतर जाना): अपना काम बनाने के लिए वह मंत्रीजी का अंगूठा चूमता रहता है।
- अकल का दुश्मन (महामूर्ख): अकल का दुश्मन वह जिस डाली पर बैठा था उसे ही काट रहा था।
- अपना उल्लू सीधा करना (स्वार्थ सिद्ध करना): अपना उल्लू सीधा करने के बाद वह साथ छोड़ चलता बना।
- आँखें दिखाना (धमकी देना/क्रोध प्रकट करना): मुझसे ही उधार रुपए लेकर मुझे ही आँखें दिखाते हो!
- आँखें खुलना (असलियत का बोध होना/सचेत होना): प्रायः जीवन में ठोकर लगने के बाद ही आँखें खुलती हैं।
- आँसू पोंछना (दुख में सांत्वना देना): धोखेबाज को विपत्ति के समय आँसू पोंछने वाला भी कोई नहीं मिलता।
- कलेजे पर साँप लोटना (ईर्ष्या से जल उठना): मोहन की अप्रत्याशित तरक्की देखकर श्याम के कलेजे पर साँप लोटने लगा।
- कान खड़े होना (सचेत या सावधान होना): दोनों की गोपनीय बातचीत में अचानक अपना नाम सुनते ही मेरे कान खड़े हो गए।
- दाल में काला होना (स्थिति संदिग्ध होना): वहाँ देर रात जयकुमार को देखकर ही मैं समझ गया था कि दाल में कुछ काला अवश्य है।
- ठंडे बस्ते में डालना (मामले को टाल देना/कार्रवाई न करना): उच्च शिक्षा सुधार समिति की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट को सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
(B) कहावतें (लोकोक्तियाँ): स्वरूप एवं उदाहरण
मुहावरों की भाँति कहावतें भी अन्यार्थव्यंजक होती हैं, परंतु ये पदबंध नहीं बल्कि पूर्ण वाक्य होती हैं। प्रयोग में मुहावरे वाक्य के भीतर स्वाभाविक अंग बन जाते हैं (जैसे लिंग, वचन, कारक के अनुसार बदलते हैं), किंतु कहावतें वाक्य में अलग से स्वतंत्र उद्धरण के रूप में जोड़ी जाती हैं।
- अपनी डफली अपना राग (सामूहिक चेतना व समन्वय का अभाव): जिस परिवार में हर सदस्य अलग-अलग अपनी डफली अपना राग अलापने लगे, उसका चलना मुश्किल होता है।
- अकेला चना भांड नहीं फोड़ता (अकेले व्यक्ति से कोई बड़ा कार्य संभव नहीं होता): गाँव में बढ़ती गुंडागर्दी को सर्वथा नापसंद करने के बावजूद वे क्या कर सकते हैं, अकेला चना भांड नहीं फोड़ता।
- आँख का अंधा नाम नयनसुख (गुण और कर्म के विपरीत नाम होना): वे स्वयं को 'शांतिदूत' कहते हैं परंतु लोगों को आपस में लड़ाते फिरकर 'आँख का अंधा नाम नयनसुख' वाली कहावत चरितार्थ करते हैं।
- उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे (अपराधी का ही आक्रामक हो जाना): स्वयं विलंब से आकर उल्टे मुझ पर ही बिगड़ते हो? ठीक ही कहा गया है—उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे।
- ऊँची दुकान फीके पकवान (केवल बाह्य तड़क-भड़क, वास्तविकता हीन होना): इतने बड़े रईस के यहाँ ऐसा निम्न कोटि का भोजन मिलना 'ऊँची दुकान फीके पकवान' नहीं तो और क्या है?
- ऊँट के मुँह में जीरा (विशाल आवश्यकता की तुलना में नगण्य आपूर्ति): दो करोड़ की बड़ी परियोजना के लिए मात्र पचास हजार का अनुदान ऊँट के मुँह में जीरा ही तो है।
- कोउ नृप होउ हमहिं का हानी (उच्च पदस्थ के परिवर्तन से निर्लिप्त रहना): जिलाधीश खान साहब रहें या लाल साहब आ जाएँ, मुझ छोटे क्लर्क के लिए तो कोउ नृप होउ हमहिं का हानी।
- गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज (दिखावटी संयम या पाखंड रचना): वह रिश्वत तो खुलेआम लेते हैं पर पैरवी करने में कतराते हैं; इसे ही कहते हैं गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज।
- गोद में लड़का, नगर में ढिंढोरा (निकट उपलब्ध वस्तु के लिए दूर-दूर भटकना): 'गोदान' पुस्तक घर की अलमारी में ही रखी थी, लेकिन राम बाबू ने पूरे मोहल्ले में फोन घुमाकर 'गोद में लड़का, नगर में ढिंढोरा' की कहावत सिद्ध कर दी।
7. संक्षेपण (Précis Writing) : सिद्धांत, सूत्र एवं विधि
'संक्षेपण' शब्द का अर्थ है—छोटा या संक्षिप्त करना। संक्षेपण के माध्यम से अधिक से अधिक विचारों, भावों और तथ्यों को कम से कम शब्दों में प्रस्तुत किया जाता है। इसमें मूल की केवल अनिवार्य एवं सारभूत बातों को ही रखा जाता है और अनावश्यक अलंकारों, उदाहरणों तथा विस्तार को छाँट दिया जाता है।
संक्षेपण के तीन अनिवार्य अंग:
- (क) उपयुक्त शीर्षक: जो मूल अवतरण के केंद्रीय भाव को व्यक्त करता हो।
- (ख) संक्षिप्त अंश: मूल पाठ की $\frac{1}{3}$ शब्द-सीमा में अपनी भाषा में लिखा गया सार।
- (ग) शब्द-गणना का उल्लेख: संक्षेपण के अंत में नीचे दाहिनी ओर मूल शब्द संख्या तथा संक्षेपण की शब्द संख्या का स्पष्ट उल्लेख।
संक्षेपण की प्रामाणिक विधि एवं शब्द-गणना नियम:
- दिए गए गद्यांश के शब्दों की वास्तविक गणना कर लें और उसका एक-तिहाई भाग निर्धारित करें।
- गद्यांश को दो-तीन बार ध्यानपूर्वक पढ़ें ताकि उसका मुख्य कथ्य व केंद्रीय संदेश स्पष्ट हो जाए।
- सामासिक शब्दों की गणना: यदि दो शब्द योजक चिह्न (हाइफ़न '-') के साथ जुड़े हों, तो उन्हें एक शब्द माना जाएगा (जैसे: माता-पिता, सुख-दुःख = 1 शब्द)। यदि सामासिक चिह्न नहीं है और पद अलग लिखे हैं, तो उन्हें अलग-अलग शब्द गिना जाएगा।
- संज्ञा एवं कारक-विभक्ति: संज्ञा के साथ विभक्तियाँ अलग लिखी जाती हैं, अतः उन्हें दो शब्द गिना जाएगा (जैसे: 'राम की' = 2 शब्द, 'कमरे में' = 2 शब्द, 'हाथ से' = 2 शब्द)।
- सर्वनाम एवं कारक-विभक्ति: सर्वनाम के साथ विभक्तियाँ मिलाकर लिखी जाती हैं, अतः उन्हें एक शब्द गिना जाएगा (जैसे: 'आपकी' = 1 शब्द, 'मेरी' = 1 शब्द, 'उनकी' = 1 शब्द)।
- परीक्षार्थी को परीक्षा में अंतिम प्रारूप लिखने से पूर्व 'रफ़ कार्य' (Rough draft) अवश्य कर लेना चाहिए।
8. व्यावहारिक लेखन विधाएँ : तुलनात्मक अध्ययन
(i) पल्लवन (Expansion of Ideas)
किसी संक्षिप्त सूक्ति, लोकोक्ति, सूत्र या गूढ़ कथन को सुगठित तर्कों एवं उदाहरणों के माध्यम से विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करने की क्रिया को पल्लवन कहा जाता है।
- पल्लवन गद्यात्मक कथन का भी हो सकता है और पद्यात्मक पंक्ति का भी।
- इसकी कठोर सीमा यह है कि यह प्रायः एक ही अनुच्छेद (पैराग्राफ) में समाप्त होना चाहिए।
- पल्लवन में शीर्षक नहीं दिया जाता।
पल्लवन: कविता में हृदय पक्ष प्रधान होता है, उसमें भावना प्रमुख होती है; इसलिए इसकी सफलता भी हृदय पर प्रभाव डालने में ही है। जरूरी नहीं कि कविता गद्य की तरह विचारों की दुनिया में हमें ले जाए। 'पृथ्वी क्या तुम कोई स्त्री हो'—यह काव्य पंक्ति हमारे भीतर पृथ्वी और स्त्री दोनों के प्रति गहरी संवेदना जगाती है और उसे विस्तार देती है।
(ii) अनुच्छेद (Paragraph Writing)
किसी एक विषय या विचार-प्रवाह के सुगठित लघु वाक्य-समूह को अनुच्छेद (Paragraph) कहा जाता है। इसमें किसी विषय (वस्तु, व्यक्ति या विचार) पर केवल एक ही पैराग्राफ में क्रमबद्ध, सुसंबद्ध और सघन विचार प्रकट किए जाते हैं।
अनुच्छेद: संसार को कर्मभूमि कहा गया है, क्योंकि इसमें सब कुछ कार्य-कारण संबंध से ही संभव होता है। बिना कार्य किए कोई परिणाम संभव नहीं हो सकता है और परिणाम की प्राप्ति ही जीवन का उद्देश्य होता है, चाहे वह परिणाम अर्थ के रूप में प्राप्त हो या यश के रूप में। भाग्य या संयोगवश भी कुछ होता है तो प्रकृति उसमें भी निमित्त के रूप में किसी न किसी कर्म को बीच में खड़ा कर ही देती है। कर्म की प्रधानता इस विश्व की सबसे बड़ी सच्चाई है। इसके सहारे ही विश्व का संचरण संभव हो पाता है।
(iii) भावार्थ (Substance / Essence)
'भाव + अर्थ' के मेल से बने भावार्थ का आशय है—गद्यांश या पद्यांश का आंतरिक भावात्मक अर्थ स्पष्ट करना।
- भावार्थ मूल अवतरण से छोटे आकार में लिखा जाता है।
- इसमें संक्षेपण की भाँति शब्दों की कोई निश्चित $\frac{1}{3}$ सीमा अथवा शीर्षक की बाध्यता नहीं होती।
- इसमें अपनी सरल भाषा में मूल कथ्य या व्यंग्य को स्पष्ट किया जाता है।
(iv) आशय (Purport / Intention)
आशय का शाब्दिक अर्थ 'उद्देश्य' अथवा 'कथ्य' होता है। लेखक उस पंक्ति के माध्यम से क्या कहना चाहता है, उस अंतर्निहित मंतव्य को अपनी भाषा में उजागर करना ही आशय-लेखन है।
- आशय-लेखन को आकार-विस्तार की छूट होती है; अतः यह मूल अवतरण से बड़ा भी हो सकता है।
- इसे ही 'अर्थ-स्पष्टीकरण' भी कहा जाता है।
“मुन्नी उसके पास से दूर हट गई और आँखें तरेरती हुई बोली—कर चुके दूसरा उपाय! सुनूँ, कौन उपाय करोगे? कोई खैरात दे देगा कम्बल? न जाने कितनी बाकी है जो किसी तरह चुकने ही नहीं आती। मैं कहती हूँ, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते? मर-मर कर काम करो, उपज हो तो बाकी दे दो!”
भावार्थ: मुन्नी ने असहमति और तीखे विरोध के साथ दूसरे उपाय की बात पर अविश्वास व्यक्त किया; क्योंकि मुफ्त में कंबल मिलना असंभव था और घर में पैसे बच नहीं रहे थे। लगान और महाजन की देनदारी को अंतहीन समस्या बताते हुए वह खेती को सदा के लिए छोड़ देने का प्रस्ताव करती है, जिससे स्पष्ट है कि तत्कालीन व्यवस्था में कृषक को खेती से कोई लाभ नहीं था।
आशय: मुन्नी हल्कू के खोखले आश्वासनों से रत्ती भर भी सहमत नहीं थी, उल्टे उसने अपना तीव्र आक्रोश दर्ज कराया। वह यथार्थ जानती थी कि घर में कोई अतिरिक्त धन नहीं है और बिना पैसों के कोई उन्हें कंबल दान नहीं करेगा। वर्ष-प्रतिवर्ष हाड़तोड़ परिश्रम के बाद भी पूरी उपज का महाजन के ऋण-ब्याज में समा जाना मुन्नी को व्यथित करता है। यहाँ प्रेमचंद ने भारतीय किसान की उस विवशता को उजागर किया है जहाँ खेती जीवन-यापन का साधन न रहकर कर्ज चुकाने का अंतहीन चक्रव्यूह बन गई थी।
(v) सारांश (Summary)
'सार + अंश' से बना सारांश किसी विस्तृत ग्रंथ, उपन्यास, कहानी या भाषण के मुख्य-मुख्य बिंदुओं का संक्षेप में प्रस्तुत किया गया रूप है। यह सामान्यतः मूल रचना के लगभग एक-तिहाई या उससे भी कम आकार में होता है। इसमें संक्षेपण की भाँति शब्दों की गणितीय सीमा अनिवार्य नहीं होती।
(vi) सप्रसंग व्याख्या (Contextual Explanation)
व्याख्या में पल्लवन की भाँति भाव का विस्तार किया जाता है। व्याख्या की संरचना के तीन अनिवार्य चरण होते हैं:
- संदर्भ एवं प्रसंग निर्देश: रचना और रचनाकार का नाम तथा वह परिस्थिति जहाँ यह कथन कहा गया।
- भाव एवं कथ्य (व्याख्या): उक्ति के अंतर्निहित भाव, व्यंग्य और मंतव्य का सर्वांगीण विस्तार।
- विशेष (शिल्प-सौंदर्य): भाषा, अलंकार, रस, छंद, मुहावरेदार सौंदर्य और तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक यथार्थ का उद्घाटन।
संदर्भ-प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति कथासम्राट मुंशी प्रेमचंद की कालजयी यथार्थवादी कहानी 'पूस की रात' से उद्धृत है। महाजन सहना का बकाया चुकाने के लिए जब हल्कू अपनी पत्नी मुन्नी से पूस की कड़कड़ाती ठंड से बचने हेतु संचित कंबल के रुपए माँगता है, तब मुन्नी किसान जीवन की त्रासद देनदारी पर क्षोभ और आक्रोश व्यक्त करते हुए यह कथन करती है।
व्याख्या: मुन्नी का यह कथन भारतीय किसान की सदियों पुरानी बेबसी पर करारा व्यंग्य है। हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद जो थोड़ी-बहुत बचत हल्कू ने ठंड से अपनी जान बचाने वाले कंबल के लिए की थी, वह भी कर्ज की भेंट चढ़ रही थी। मुन्नी इस अंतहीन शोषण से टूट चुकी है। उसका यह कहना कि 'हमारा जन्म ही बाकी चुकाने के लिए हुआ है' यह सिद्ध करता है कि किसान के जीवन का एकमात्र लक्ष्य केवल जमींदारों और महाजनों का पेट भरना बनकर रह गया था।
विशेष:
- मुन्नी के माध्यम से शोषित किसान वर्ग का सुलगता हुआ आक्रोश और व्यवस्था के प्रति गहरा असंतोष मुखरित हुआ है।
- तत्कालीन सामंती-महाजनी शोषण तंत्र का अत्यंत सजीव, मर्मस्पर्शी एवं यथार्थवादी चित्रण।
- भाषा अत्यंत व्यावहारिक, चुटीली और व्यंग्य प्रधान है।
25 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तरी (Objective Questions with Explanations)
- (A) श्रुतिसमभिन्नार्थक
- (B) अनेकार्थक शब्द
- (C) पर्यायवाची शब्द
- (D) विलोम शब्द
- (A) काढ़ा/रस
- (B) सूर्य
- (C) अकवन (मदार का पौधा)
- (D) आकाश
- (A) पक्षी और ब्राह्मण
- (B) हाथी और सर्प
- (C) सूर्य और चंद्रमा
- (D) सोना और धतूरा
- (A) आग और हवा
- (B) हवा और आग
- (C) जल और भोजन
- (D) धुआँ और रोशनी
- (A) निकट और बैठने की वस्तु
- (B) भोजन और कपड़ा
- (C) दूर और आसन लगाना
- (D) आसान और कठिन
- (A) दूरी की माप और खजाना
- (B) खजाना और दूरी का एक माप
- (C) बर्तन और कमरा
- (D) कोप और किनारा
- (A) स्थावर
- (B) चेतन
- (C) अगम
- (D) चंचल
- (A) पराभव
- (B) तिरोभाव
- (C) अवसान
- (D) विभाव
- (A) अपरुष
- (B) कोमल
- (C) सरल
- (D) कठोर
- (A) वाममार्गी
- (B) सव्यसाची
- (C) धनंजय
- (D) वामहस्त
- (A) द्वीपज
- (B) द्वैपायन
- (C) पाराशर
- (D) अंतरीप
- (A) व्याकरणज्ञ
- (B) व्याकरणशास्त्री
- (C) वैयाकरण
- (D) शब्दवेत्ता
- (A) अनंग
- (B) मनोज
- (C) कंदर्प
- (D) पुरंदर
- (A) भौंरा
- (B) कोयल
- (C) कमल
- (D) पक्षी
- (A) पूर्ण वाक्य
- (B) व्यंजना प्रधान पदबंध
- (C) केवल उपवाक्य
- (D) छंदोबद्ध रचना
- (A) प्रेम प्रकट करना
- (B) समय पर धोखा देना
- (C) खुशामद में स्तरहीनता तक उतर जाना
- (D) विजय प्राप्त करना
- (A) मुहावरा पूर्ण वाक्य होता है, कहावत पदबंध होती है
- (B) मुहावरा पदबंध होता है, जबकि कहावत पूर्ण वाक्य होती है
- (C) दोनों में कोई अंतर नहीं है
- (D) मुहावरे में केवल तत्सम शब्द होते हैं
- (A) राजा की मृत्यु पर शोक न होना
- (B) उच्च पदस्थ के लाभ-हानि से सामान्य जन का निर्लिप्त रहना
- (C) सभी राजाओं का अन्यायी होना
- (D) प्रजा का विद्रोही होना
- (A) आधा ($\frac{1}{2}$)
- (B) एक तिहाई ($\frac{1}{3}$)
- (C) एक चौथाई ($\frac{1}{4}$)
- (D) दो तिहाई ($\frac{2}{3}$)
- (A) दो शब्द
- (B) एक शब्द
- (C) शून्य शब्द
- (D) तीन शब्द
- (A) 1 और 1
- (B) 2 और 2
- (C) 2 और 1
- (D) 1 और 2
- (A) इसमें आकर्षक शीर्षक देना आवश्यक है
- (B) यह प्रायः एक ही अनुच्छेद में होना चाहिए और इसमें शीर्षक नहीं होता
- (C) यह मूल पंक्ति से छोटा होना चाहिए
- (D) इसमें छंदों का प्रयोग अनिवार्य है
- (A) संक्षेपण
- (B) सारांश
- (C) आशय लेखन
- (D) भावार्थ
- (A) दो चरण
- (B) तीन चरण (संदर्भ-प्रसंग, व्याख्या/कथ्य, विशेष)
- (C) चार चरण
- (D) पाँच चरण
- (A) कफ़न
- (B) पूस की रात
- (C) गोदान
- (D) पंच परमेश्वर
25 विषयनिष्ठ प्रश्नोत्तर (Subjective Questions with Comprehensive Answers)
उत्तर: भाषा में वे शब्द जिनके एक ही लिखित रूप से संदर्भ और प्रसंग के अनुसार एक से अधिक भिन्न अर्थ निकलते हैं, उन्हें अनेकार्थक शब्द कहा जाता है।
महत्ता: अनेकार्थक शब्द भाषा की व्यंजना शक्ति, समृद्धि और लाक्षणिक सौंदर्य को बढ़ाते हैं। उदाहरणार्थ—'कनक-कनक तें सौ गुनी मादकता अधिकाय' में 'कनक' के दो अर्थ (सोना और धतूरा) होने के कारण ही यमक अलंकार और अद्भुत काव्य-सौंदर्य की सृष्टि संभव हुई है।
उत्तर: जो शब्द उच्चारण और श्रवण में लगभग एक समान प्रतीत होते हैं, किंतु सूक्ष्म वर्तनी-भेद के कारण जिनके अर्थ सर्वथा भिन्न होते हैं, उन्हें श्रुतिसमभिन्नार्थक (युग्म-शब्द) कहते हैं।
- अंश: इसका अर्थ होता है 'भाग' या 'हिस्सा'।
- अंस: इसका अर्थ होता है 'कंधा'।
- अनिल: इसका अर्थ होता है 'वायु' या 'हवा'।
- अनल: इसका अर्थ होता है 'अग्नि' या 'पावक'।
उत्तर: ये दोनों परस्पर विलोम शब्द हैं:
- कृतज्ञ: जो व्यक्ति दूसरों द्वारा किए गए उपकार, सहायता या भलाई को सदैव याद रखता है और उसका आदर करता है, उसे 'कृतज्ञ' कहते हैं।
- कृतघ्न: जो व्यक्ति दूसरों के किए गए उपकार को सर्वथा भुला देता है या उपकार के बदले अपकार करता है, उसे 'कृतघ्न' (अकृतज्ञ) कहा जाता है।
उत्तर:
- सव्यसाची: 'सव्य' का अर्थ है बायाँ हाथ। जो योद्धा दोनों हाथों से, विशेषकर बायें हाथ से भी दायें हाथ की तरह अचूक तीर चलाने में सक्षम हो, उसे 'सव्यसाची' कहा जाता है (अर्जुन का विशेषण)।
- द्वैपायन: द्वीप में जन्म लेने वाले को 'द्वैपायन' कहा जाता है। महर्षि पराशर के पुत्र वेदव्यास का जन्म यमुना नदी के एक द्वीप पर हुआ था, इसलिए उनका नाम 'कृष्ण द्वैपायन' पड़ा।
उत्तर: मुहावरा ऐसा व्यंजना प्रधान पदबंध है जो अपने सामान्य, शाब्दिक या अभिधात्मक अर्थ को छोड़कर किसी विशेष लाक्षणिक अर्थ में रूढ़ हो जाता है।
गौण होने का कारण: मुहावरे में शब्द अपने मूल अर्थ में प्रयुक्त न होकर प्रतीकात्मक अर्थ ध्वनित करते हैं। उदाहरण के लिए 'आँखों का तारा' में न तो भौतिक आँख से मतलब है और न ही आकाश के तारे से; इसका रूढ़ व्यंग्यार्थ 'अत्यंत प्रिय व्यक्ति' बन जाता है।
उत्तर:
| आधार | मुहावरा | कहावत (लोकोक्ति) |
|---|---|---|
| 1. स्वरूप | यह एक पदबंध (वाक्यांश) होता है। | यह अपने आप में एक पूर्ण वाक्य होती है। |
| 2. वाक्य में प्रयोग | यह वाक्य का स्वाभाविक अंग बनकर लिंग/वचन अनुसार बदलता है (उदा. कान खड़े होना)। | यह स्वतंत्र रूप से उद्धरण के रूप में अंत में प्रयुक्त होती है (उदा. उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे)। |
| 3. उत्पत्ति | यह भाषा की लाक्षणिक शक्ति से उत्पन्न होता है। | यह लोक-जीवन के दीर्घकालिक संचित अनुभवों और घटनाओं पर आधारित होती है। |
(क) कलेजे पर साँप लोटना (ख) ठंडे बस्ते में डालना
उत्तर:
- (क) कलेजे पर साँप लोटना:
अर्थ: ईर्ष्या या डाह से बुरी तरह जल उठना।
वाक्य प्रयोग: निर्धन रमेश के बेटे का सिविल सेवा में चयन देखकर पड़ोसियों के कलेजे पर साँप लोटने लगा। - (ख) ठंडे बस्ते में डालना:
अर्थ: किसी कार्य या मामले पर आगे कोई कार्रवाई न करना, अनिश्चितकाल के लिए टाल देना।
वाक्य प्रयोग: चुनाव समाप्त होते ही नेताओं ने जनता की समस्याओं के समाधान की फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
उत्तर:
- गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज: इसका अर्थ है दिखावटी परहेज या झूठा पाखंड करना। जब कोई व्यक्ति बड़ा अनुचित काम बिना संकोच कर लेता है, परंतु उसी से जुड़े छोटे काम में धर्म या मर्यादा का ढोंग करता है, तब यह कहा जाता है।
- ऊँट के मुँह में जीरा: इसका अर्थ है अति विशाल आवश्यकता की तुलना में बहुत ही अल्प या नगण्य वस्तु देना। जैसे किसी पहलवान को नाश्ते में केवल एक बिस्कुट देना ऊँट के मुँह में जीरा के समान है।
उत्तर: किसी विस्तृत अवतरण, आलेख या पत्र के समस्त अनिवार्य एवं सारगर्भित तथ्यों को अपनी सरल भाषा में लगभग एक-तिहाई ($\frac{1}{3}$) शब्दों में प्रस्तुत करने की कला को संक्षेपण कहते हैं।
संक्षेपण के तीन अनिवार्य भाग:
- उपयुक्त एवं संक्षिप्त शीर्षक (Title): जो मूल भाव को समेटे।
- संक्षिप्त अंश (Précis Content): मूल का $\frac{1}{3}$ भाग।
- शब्द-गणना विवरण: दाहिनी ओर नीचे मूल शब्द संख्या और संक्षेपण की शब्द संख्या का स्पष्ट उल्लेख।
उत्तर: शब्द-गणना के शास्त्रीय नियम निम्नलिखित हैं:
- सामासिक शब्द: यदि दो शब्द योजक चिह्न (हाइफ़न) से जुड़े हों (जैसे: हानि-लाभ, दिन-रात), तो उन्हें एक शब्द गिना जाएगा। यदि योजक चिह्न के बिना वे अलग-अलग लिखे हों, तो उन्हें दो शब्द माना जाएगा।
- संज्ञा + विभक्ति: संज्ञा के साथ कारक-विभक्तियाँ पृथक लिखी जाती हैं, अतः उन्हें दो शब्द गिना जाता है (जैसे: 'मोहन ने' = 2 शब्द, 'घर में' = 2 शब्द)।
- सर्वनाम + विभक्ति: सर्वनाम के साथ विभक्तियाँ मिलाकर लिखी जाती हैं, अतः उन्हें एक शब्द गिना जाता है (जैसे: 'उसने', 'आपकी', 'हमसे' = 1 शब्द)।
उत्तर: संक्षेपण की चरणबद्ध विधि निम्न प्रकार है:
- दिए गए मूल गद्यांश के कुल शब्दों की प्रामाणिक गिनती करके उसका $\frac{1}{3}$ भाग निकालें।
- गद्यांश को दो-तीन बार एकाग्रचित्त होकर पढ़ें ताकि उसका मुख्य मर्म समझ आ सके।
- मुख्य भावों को रेखांकित करें तथा उदाहरण, उपमा और अनावश्यक विस्तार को छोड़ दें।
- रफ़ पृष्ठ पर अपनी भाषा में $\frac{1}{3}$ शब्दों में प्रारूप तैयार करें।
- उचित शीर्षक दें और अंत में शब्द संख्या अंकित करके अंतिम रूप दें।
उत्तर: किसी सूत्र, विचार, सूक्ति या काव्यात्मक पंक्ति के गूढ़ अर्थ को तार्किक चिंतन और उदाहरणों द्वारा खोलकर विस्तार देने की प्रक्रिया को पल्लवन (भाव-विस्तार) कहते हैं।
अनिवार्य सीमाएँ:
- पल्लवन अनिवार्यतः एक ही अनुच्छेद (Single Paragraph) में होना चाहिए।
- इसमें संक्षेपण की भाँति शीर्षक नहीं दिया जाता।
- इसमें मूल भाव से बाहर जाकर भटकाव नहीं होना चाहिए और अपनी भाषा सरल एवं प्रांजल होनी चाहिए।
उत्तर:
पल्लवन: कविता मूलतः हृदय की भाषा है। बुद्धि और तर्क जहाँ मस्तिष्क को आंदोलित करते हैं, वहीं कविता सीधे मनुष्य की रागात्मक वृत्तियों और अंतर्मन को स्पर्श करती है। कविता की वास्तविक सार्थकता पाठक या श्रोता के हृदय में गहरी मानवीय संवेदना, करुणा और आनंद का संचार करने में है। यदि कोई रचना छंद और अलंकारों से युक्त हो किंतु वह सहृदय के भाव-जगत को स्पंदित न कर सके, तो वह कविता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। कविता मानव-हृदय को स्वार्थ-संबंधों से मुक्त कर उसे विराट लोक-चेतना से जोड़ती है।
उत्तर: अनुच्छेद की विशेषताएँ: अनुच्छेद किसी एक विषय पर केंद्रित लघु वाक्य-समूह होता है, जो पूरी तरह एक ही पैराग्राफ में लिखा जाता है। इसमें विचार अत्यंत क्रमबद्ध, सुसंबद्ध और सघन होते हैं।
निबंध से भिन्नता: निबंध एक विस्तृत विधा है जिसमें भूमिका, विभिन्न दृष्टिकोण, तर्क, उपशीर्षक और उपसंहार सहित अनेक अनुच्छेदों का प्रयोग होता है; जबकि अनुच्छेद में बिना किसी भूमिका या उपशीर्षक के केवल एक ही अनुच्छेद में पूरी बात कही जाती है।
उत्तर:
अनुच्छेद: भारतीय दर्शन में इस संसार को कर्मभूमि स्वीकार किया गया है, जहाँ प्रत्येक फल के पीछे कोई न कोई कार्य-कारण संबंध अनिवार्य रूप से विद्यमान रहता है। बिना पुरुषार्थ और कर्म के किसी भी अभीष्ट फल की प्राप्ति असंभव है। मानव जीवन का सच्चा सौंदर्य और लक्ष्य कर्मण्यता में ही निहित है, चाहे वह उपलब्धि धन-संपदा के रूप में हो या यश के रूप में। भाग्य और प्रारब्ध भी वस्तुतः पूर्व में किए गए कर्मों का ही संचित रूप होते हैं। प्रकृति भी कर्मशील व्यक्ति का ही साथ देती है। अतः आलस्य और निष्क्रियता का परित्याग कर निरंतर सत्कर्म में रत रहना ही सृष्टि का शाश्वत नियम है।
उत्तर: भावार्थ: दिए गए गद्यांश या पद्यांश के आंतरिक भावात्मक अर्थ और मर्म को सरल भाषा में स्पष्ट करना भावार्थ कहलाता है।
- संक्षेपण से समानता: दोनों में ही अपनी सरल भाषा में मूल कथ्य को बिना किसी भटकाव के स्पष्ट किया जाता है।
- संक्षेपण से भिन्नता: संक्षेपण में $\frac{1}{3}$ शब्दों की कठोर गणितीय सीमा और शीर्षक देना अनिवार्य होता है, जबकि भावार्थ में न तो शीर्षक की आवश्यकता होती है और न ही शब्दों की कोई निश्चित $\frac{1}{3}$ सीमा निर्धारित होती है।
उत्तर: 'आशय' का तात्पर्य है रचनाकार का मूल उद्देश्य अथवा अंतर्निहित कथ्य। लेखक किसी पंक्ति के माध्यम से किस सामाजिक, मनोवैज्ञानिक या दार्शनिक यथार्थ को प्रकट करना चाहता है, उसका उद्घाटन ही आशय लेखन है।
बड़ा होने का कारण: आशय में लेखक के गुप्त मंतव्य, पृष्ठभूमि, व्यंग्यार्थ और उद्देश्य की विस्तृत समीक्षा अपनी भाषा में करनी होती है, इसलिए इसमें आकार-विस्तार की छूट होती है और यह मूल अवतरण से बड़ा भी हो सकता है।
उत्तर: 'सार + अंश' से बना सारांश किसी बड़ी कथात्मक रचना (उपन्यास, कहानी), प्रबंध काव्य या विस्तृत भाषण के मुख्य-मुख्य अंशों का संक्षेप में प्रस्तुत किया गया निचोड़ है।
विशेषताएँ:
- यह मूल रचना से लगभग एक-तिहाई या उससे भी कम आकार में प्रस्तुत किया जाता है।
- इसमें संक्षेपण की भाँति शब्दों की कोई कठोर सीमा नहीं होती।
- यह पाठक को पूरी रचना पढ़े बिना उसकी मूल कथावस्तु और निष्कर्ष से परिचित करा देता है।
उत्तर: सप्रसंग व्याख्या के तीन चरण निम्नलिखित हैं:
- संदर्भ एवं प्रसंग निर्देश: इसमें पाठ्यपुस्तक का नाम, रचना का नाम, रचनाकार का नाम तथा वह विशिष्ट परिस्थिति बताई जाती है जिसमें वह बात कही गई। इससे परीक्षक को परीक्षार्थी के अध्ययन की प्रामाणिकता ज्ञात होती है।
- व्याख्या (कथ्य एवं भाव-विस्तार): इसमें पंक्ति के गूढ़ अर्थ, व्यंग्य और अंतर्निहित संदेश का विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया जाता है।
- विशेष (शिल्प एवं भाव सौंदर्य): इसमें भाषा-शैली, रस, छंद, अलंकार, बिंब-विधान और सामाजिक-आर्थिक यथार्थ का बिंदुवार उल्लेख होता है, जो व्याख्या को पूर्णता प्रदान करता है।
उत्तर: मुन्नी किसान जीवन की त्रासद और अंतहीन देनदारी से अत्यंत क्षुब्ध थी। हल्कू और मुन्नी पूरे वर्ष हाड़तोड़ मेहनत करते थे, किंतु फसल बिकने पर प्राप्त सारा पैसा जमींदार और सहना महाजन के पुराने कर्ज और ब्याज को चुकाने में ही चला जाता था। कड़कड़ाती ठंड से बचने के लिए कंबल खरीदने तक के पैसे उनके पास नहीं बचते थे। जब मजदूरी करके भी कर्ज ही चुकाना है, तो हाड़ गलाने वाली निरर्थक खेती करने से कोई लाभ नहीं था। इसलिए मुन्नी आक्रोश में खेती छोड़ देने को कहती है।
उत्तर: यह उक्ति तत्कालीन सामंती और महाजनी व्यवस्था के क्रूर शोषण चक्र पर तीखा व्यंग्य है।
- भारतीय किसान जीवन भर कठोर परिश्रम करता है, परंतु उसकी आर्थिक स्थिति सदा शून्य बनी रहती है। उसका जन्म ऋण में होता है, वह ऋण में जीता है और अपनी अगली पीढ़ी के लिए ऋण छोड़कर ही मर जाता है।
- मुन्नी का यह कथन इस विवशता की चरम सीमा है जहाँ जीवन का संपूर्ण उद्देश्य केवल शोषकों की तिजोरी भरना बनकर रह जाता है। यह मानवीय गरिमा के हनन की कारुणिक गाथा है।
उत्तर:
- नाग:
(i) सर्प: शिवजी के गले में विषधर नाग सुशोभित है।
(ii) हाथी: युद्ध क्षेत्र में दिग्गज नागों की सेना खड़ी थी। - अक्ष:
(i) आँख: उसके अक्ष से अश्रुधारा बह निकली।
(ii) धुरी: पृथ्वी अपने अक्ष पर 24 घंटे में एक चक्कर पूरा करती है। - मित्र:
(i) सखा/दोस्त: कृष्ण और सुदामा की मित्र-मंडली आदर्श मानी जाती है।
(ii) सूर्य: प्रातःकाल मित्र देव को अर्घ्य दिया जाता है।
(क) समुद्र (ख) बिजली (ग) सरस्वती (घ) सिंह
उत्तर:
- (क) समुद्र: जलनिधि, पयोधि (उदधि, रत्नाकर)।
- (ख) बिजली: विद्युत, सौदामिनी (चपला, दामिनी)।
- (ग) सरस्वती: वीणापाणि, शारदा (वागीश्वरी, ब्राह्मी)।
- (घ) सिंह: शार्दूल, मृगराज (केहरि, वनराज)।
उत्तर: संक्षेपण और पल्लवन रचना-विधान की दृष्टि से सर्वथा विपरीत प्रक्रियाएँ हैं:
- संक्षेपण (व्यास से समास की ओर): इसमें फैले हुए विस्तृत विचारों, उदाहरणों और व्याख्याओं को समेटकर कम से कम शब्दों में उनका सार (गागर में सागर) प्रस्तुत किया जाता है। यह मानसिक संकोच की प्रक्रिया है।
- पल्लवन (समास से व्यास की ओर): इसमें एक छोटे से बीज-रूप विचार, सूक्ति या सूत्र को तर्कों, भावों और उदाहरणों से पल्लवित कर विस्तृत रूप दिया जाता है। यह मानसिक विस्तार की प्रक्रिया है।
उत्तर: एक विद्यार्थी के लिए इन शब्द-रूपों का अध्ययन निम्नलिखित कारणों से अपरिहार्य है:
- अभिव्यक्ति में स्पष्टता: इससे भाषा में पुनरुक्ति दोष (एक ही शब्द को बार-बार दोहराना) समाप्त होता है और अभिव्यक्ति अत्यंत प्रभावशाली बनती है।
- काव्य एवं साहित्य का मर्म: श्लेष, यमक आदि अलंकारों और काव्यात्मक ध्वनियों को समझने के लिए अनेकार्थक एवं पर्यायवाची शब्दों का ज्ञान अनिवार्य है।
- प्रतियोगी एवं बोर्ड परीक्षाओं में सफलता: बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में वस्तुनिष्ठ तथा विषयनिष्ठ दोनों खंडों में सटीक अंक प्राप्त करने हेतु समृद्ध शब्द-ज्ञान आधारशिला का कार्य करता है।
0 Comments