साहित्य के रूप : संपूर्ण अध्ययन सामग्री
1. साहित्य का वर्गीकरण एवं रूपरेखा
- दृश्य काव्य (दृश्य साहित्य): नाटक, काव्य नाटक, एकांकी, रेडियो नाटक, नुक्कड़ नाटक, चलचित्र।
- श्रव्य काव्य (श्रव्य साहित्य):
- पद्य:
- प्रबंधकाव्य: महाकाव्य, खंडकाव्य (गीत, प्रगीत)।
- मुक्तक: गद्य कविता।
- गद्य
- चंपू (गद्य और पद्य का मिश्रित रूप)
- निबंधकाव्य
- पद्य:
- कथा साहित्य: उपन्यास, कहानी, लघुकथा।
- जीवनपरक साहित्य: जीवनी, आत्मकथा, संस्मरण, यात्रावृत्त, रेखाचित्र।
- वैचारिक साहित्य: निबंध, प्रबंध, लेख, भाषण, रिपोर्ताज, डायरी, साक्षात्कार, शब्दचित्र।
- आलोचनात्मक साहित्य / पत्रकारिता: सैद्धांतिक आलोचना, व्यावहारिक आलोचना, समीक्षा।
2. काव्य की अवधारणा एवं परिभाषाएँ
संस्कृत साहित्यशास्त्र में 'काव्य' शब्द संपूर्ण साहित्य का बोध कराता था। वर्तमान में 'काव्य' का अर्थ मात्र कविता तक सीमित हो गया है। उदाहरणार्थ, केदारनाथ सिंह का काव्य संग्रह कहने का तात्पर्य उनकी कविताओं का संग्रह है, उसमें उनकी गद्य रचनाएँ समाविष्ट नहीं हो सकतीं। यदि हम कहते हैं कि मुक्तिबोध का 'समग्र साहित्य' सुलभ है, तो इसमें मुक्तिबोध की कविताओं के अतिरिक्त कहानी, आलोचना, डायरी आदि सभी विधाओं की रचनाएँ आ जाएँगी। इसी प्रकार मैथिलीशरण गुप्त का साहित्य कहने पर उनकी कविताओं के साथ-साथ पत्र, गद्य रचनाएँ, नाटक तथा चंपूकाव्य 'यशोधरा' भी सम्मिलित हो जाता है।
प्राचीन काल में गद्य रचनाकार को भी कवि ही कहा जाता था। आधुनिक काल में कवि केवल कविता रचने वाले को कहा जाता है। कविता तथा गद्य दोनों लिखने वाले को 'साहित्यकार' अथवा 'लेखक' कहा जाता है। हिंदी में रचनाकारों के विविध नाम प्रचलित हैं; जैसे—कवि, कवयित्री, गीतकार, नाटककार, एकांकीकार, कहानीकार, उपन्यासकार, निबंधकार, प्रबंधकार, शब्दचित्रकार आदि।
काव्य की प्रमुख शास्त्रीय परिभाषाएँ:
2. आचार्य विश्वनाथ: "वाक्यं रसात्मकं काव्यम्" (रसात्मक वाक्य ही काव्य है।)
3. पंडितराज जगन्नाथ: "रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्" (रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाला शब्द काव्य है।)
4. आचार्य रामचंद्र शुक्ल: "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।"
साहित्य का मूल अर्थ: साहित्य शब्द का मूल अर्थ शब्द तथा अर्थ का सहभाव (एक साथ होना) है। इसके अंतर्गत प्रत्येक अर्थपूर्ण लेखन आ जाता है। भावना की प्रधानता तथा कलात्मकता से युक्त लेखन साहित्य कहलाता है।
3. दृश्यकाव्य: नाटक एवं उसके तत्त्व
दृश्य विधाओं का मंच पर प्रस्तुतीकरण होता है, अर्थात् देखने-दिखाने में ही उनकी सार्थकता होती है। इसलिए इन्हें 'दृश्यकाव्य' कहा गया। इसके विपरीत, प्राचीन काल में मुद्रण व्यवस्था न होने के कारण रचनाएँ सुनाने के उद्देश्य से की जाती थीं, जिसे 'श्रव्यकाव्य' कहा गया।
नाटक के प्रमुख पारिभाषिक अंग:
- नाटककार: नाटक की रचना करने वाला।
- अभिनेता: मंच पर लिखित नाटक के पात्रों का अभिनय करने वाला।
- निर्देशक: अभिनेताओं को अभिनय, भाव-भंगिमाएँ तथा भूमिकाएँ समझाने वाला मार्गदर्शक।
- प्रेक्षक (सहृदय): नाटक को देखने वाले दर्शक।
- प्रेक्षागृह: वह भवन या कक्ष जहाँ नाटक का मंचन संपन्न होता है।
- यवनिका: मंच और दर्शक के मध्य टंगा कपड़े का पर्दा, जो दृश्य परिवर्तन के समय उठाया-गिराया जाता है।
- नेपथ्य (ग्रीन रूम): मंच के पिछले भाग में स्थित वह पर्दायुक्त स्थान जहाँ अभिनेता अपनी वेशभूषा एवं अभिनय की तैयारियाँ करते हैं।
नाटक के छह अनिवार्य तत्त्व:
- कथावस्तु (कथानक): वह मूल घटना या आधार बिंदु जिस पर संपूर्ण नाटक टिका होता है। यह नाटक का प्रथम तत्त्व है।
- पात्र: घटना को विकसित करने वाले सजीव/निजीव माध्यम। प्रमुख पात्र को नायक या नायिका कहा जाता है, जो अंतिम फल का भोक्ता होता है। अन्य पात्रों में सहनायक (नायक का सहयोगी) और प्रतिनायक (नायक के विपरीत स्वभाव एवं दर्शन वाला विरोधी पात्र) होते हैं।
- कथोपथन (संवाद): कथा को आगे बढ़ाने वाला माध्यम। इसके दो प्रकार होते हैं—प्रकट संवाद (जो सभी पात्र व दर्शक सुनते हैं) और स्वगत संवाद (पात्र के अंतर्मन का चिंतन, जिसे वह बोलकर केवल दर्शकों तक पहुँचाता है)।
- देशकाल (वातावरण): नाटक के घटित होने का निश्चित स्थान और समय। देशकाल की स्वाभाविकता एवं अन्विति के अभाव में नाटक दोषपूर्ण हो जाता है।
- भाषा-शैली: मंचन का सशक्त माध्यम। पात्रों के सामाजिक स्तर, देशकाल और प्रसंग के अनुरूप भाषा का चयन किया जाता है (उदा. जयशंकर प्रसाद की तत्समप्रधान शैली बनाम मोहन राकेश की व्यावहारिक शैली)।
- उद्देश्य: नाटककार का मूल संदेश या जीवन-दर्शन। नाटक की प्रासंगिकता और यथार्थता उद्देश्य पर निर्भर करती है।
4. नाटक के विविध रूप
- (क) काव्यनाटक: वह नाटक जिसके समस्त संवाद पद्यात्मक (काव्यमय) होते हैं। प्रमुख उदाहरण: धर्मवीर भारती कृत 'अंधा युग', केदारनाथ मिश्र 'प्रभात' कृत 'संवर्त', तथा रामेश्वर सिंह 'काश्यप' कृत 'समाधान' एवं 'नीलकंठ निराला'।
- (ख) रेडियोनाटक: यह दृश्यकाव्य का ऐसा भेद है जो देखा नहीं जा सकता, केवल सुना जाता है (श्रव्य माध्यम)। इसमें मंच, यवनिका, प्रकाश या प्रेक्षागृह नहीं होते; संपूर्ण भाव केवल संवाद और सटीक ध्वनि-संयोजन (Sound Effects) से संप्रेषित होते हैं। इसमें स्वगत कथन का विशेष महत्व होता है।
- (ग) एकांकी: एक ही अंक में समाप्त होने वाली नाट्य रचना। इसमें नाटक के सभी छह तत्त्व विद्यमान रहते हैं। इसमें एक ही मुख्य कथा और एक ही दृश्य/घटना की केंद्रीयता होती है। प्रमुख एकांकीकार: डॉ. रामकुमार वर्मा, भुवनेश्वर, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश, देवेंद्रनाथ शर्मा, विष्णु प्रभाकर।
- (घ) नुक्कड़ नाटक: मंच, पर्दा, माइक एवं कृत्रिम साधनों से पूर्णतः मुक्त एकांकी का आधुनिक रूप। यह किसी सड़क के मोड़ या खुले मैदान में जनजागरण एवं सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध चेतना जगाने हेतु खेला जाता है। इसमें अभिनेता स्वाभाविक वेशभूषा में होते हैं।
5. चलचित्र एवं श्रव्यकाव्य (महाकाव्य व खंडकाव्य)
चलचित्र (Cinema):
चलचित्र बीसवीं शताब्दी का सर्वाधिक लोकप्रिय कला-माध्यम है। इसमें 'बिंब' (दृश्य/इमेज) और 'ध्वनि' (साउंड) भाषा का कार्य करते हैं। निर्देशक समाज से जीवंत संवाद स्थापित करने के लिए इसका प्रयोग करता है। भारतीय संदर्भ में अशिक्षा और मनोरंजन के अभाव में इसका महत्व अप्रतिम है। फिल्मकार सत्यजित राय का चिंतन इस दृष्टि से मील का पत्थर है।
श्रव्यकाव्य के भेद:
पद्य: गण, वर्ण एवं मात्रा के नियमों से बंधी रचना छंदबद्ध या पद्य कहलाती है। पद्य के दो मुख्य भेद हैं—
- 1. प्रबंधकाव्य: वह काव्यात्मक रचना जिसकी प्रत्येक पंक्ति और छंद में पूर्वापर संबंध (कथा का क्रमिक जुड़ाव) हो। कथा दीर्घ होती है और सर्गों में विभाजित होती है। इसके दो भेद हैं:
- (i) महाकाव्य: आचार्य भामह के अनुसार—विशाल कथानक, उदात्त चरित्र, नाटकीय पंचसंधियाँ, उत्कृष्ट अलंकृत शैली और जीवन के समग्र रूपों का चित्रण करने वाला सर्गबद्ध सुखांत काव्य महाकाव्य कहलाता है।
संस्कृत महाकाव्य: वाल्मीकि की 'रामायण', कालिदास का 'रघुवंशम्', श्रीहर्ष का 'नैषधचरितम्'।
हिंदी महाकाव्य: चंदबरदाई कृत 'पृथ्वीराज रासो', मलिक मोहम्मद जायसी कृत 'पद्मावत', गोस्वामी तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस', केशवदास कृत 'रामचंद्रिका', मैथिलीशरण गुप्त कृत 'साकेत', जयशंकर प्रसाद कृत 'कामायनी'। - (ii) खंडकाव्य: महाकाव्य की तरह समग्र जीवन का वर्णन न करके, जीवन के किसी एक मार्मिक अंश या विशिष्ट घटना का सांगोपांग चित्रण करने वाला प्रबंध काव्य खंडकाव्य कहलाता है (उदा. 'जयद्रथ वध', 'रश्मिरथी')।
- (i) महाकाव्य: आचार्य भामह के अनुसार—विशाल कथानक, उदात्त चरित्र, नाटकीय पंचसंधियाँ, उत्कृष्ट अलंकृत शैली और जीवन के समग्र रूपों का चित्रण करने वाला सर्गबद्ध सुखांत काव्य महाकाव्य कहलाता है।
- 2. मुक्तक काव्य: वह पद्य रचना जिसमें प्रत्येक छंद अपने आप में स्वतंत्र एवं पूर्ण अर्थवान होता है, इसमें पूर्वापर कथा संबंध नहीं होता (जैसे कबीर या बिहारी के दोहे)।
25 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तरी (Objective Questions with Explanations)
25 विषयनिष्ठ प्रश्नोत्तर (Subjective Questions with Detailed Answers)
उत्तर: संस्कृत साहित्यशास्त्र में 'काव्य' शब्द अत्यंत व्यापक था। वहाँ गद्य, पद्य, नाटक, चंपू आदि संपूर्ण सृजनात्मक साहित्य को 'काव्य' कहा जाता था। आचार्य विश्वनाथ और मम्मट आदि आचार्यों ने संपूर्ण साहित्य को ही काव्य की परिधि में रखा था।
आधुनिक संदर्भ: आधुनिक काल में काव्य का संकुचित अर्थ केवल 'कविता' या 'पद्य' तक सीमित हो गया है। उदाहरण के लिए, यदि हम 'केदारनाथ सिंह का काव्य संग्रह' कहें, तो उसमें केवल उनकी कविताएँ होंगी, उनके गद्य निबंध नहीं।
उत्तर: आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार—"जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।"
विशेषता: शुक्ल जी ने कविता को बुद्धि-विलास न मानकर हृदय की रागात्मक वृत्ति और मुक्ति का साधन माना है, जो मनुष्य को स्वार्थ-संबंधों के संकीर्ण दायरे से उठाकर लोक-चेतना से जोड़ती है।
उत्तर: दृश्य और श्रव्य काव्य में प्रमुख अंतर निम्नलिखित है:
- दृश्य काव्य: जिन साहित्यिक विधाओं की वास्तविक सार्थकता मंच पर अभिनेताओं द्वारा अभिनय के माध्यम से दर्शकों को प्रत्यक्ष दिखाने में होती है, उन्हें दृश्य काव्य कहते हैं; जैसे—नाटक, एकांकी।
- श्रव्य काव्य: जिस काव्य का रसास्वादन पढ़कर या कानों से सुनकर किया जाता है, उसे श्रव्य काव्य कहते हैं; जैसे—महाकाव्य, खंडकाव्य, कविता, कहानी आदि। प्राचीन काल में मुद्रण कला न होने से काव्य श्रवण-परंपरा द्वारा ही संप्रेषित होता था।
उत्तर:
- यवनिका: प्रेक्षागृह में मंच और दर्शकों के मध्य टंगे मुख्य कपड़े के पर्दे को यवनिका कहा जाता है। दृश्य बदलने या अंक के अंत में इसे उठाया और गिराया जाता है।
- नेपथ्य: मंच के पिछले पर्दे के पीछे का वह सुरक्षित कक्ष जहाँ अभिनेता अपनी वेशभूषा, रूपसज्जा (मेकअप) और संवादों की पूर्वाभ्यास तैयारी करते हैं। इसे आधुनिक समय में 'ग्रीन रूम' भी कहा जाता है।
उत्तर: भारतीय एवं पाश्चात्य नाट्यशास्त्र के समन्वय से नाटक के निम्नलिखित छह अनिवार्य तत्त्व माने गए हैं:
- कथावस्तु (कथानक)
- पात्र एवं चरित्र-चित्रण
- कथोपथन (संवाद)
- देशकाल एवं वातावरण
- भाषा-शैली
- उद्देश्य
उत्तर:
- नायक: नाटक का केंद्रीय और सर्वाधिक महत्वपूर्ण पात्र नायक होता है। कथावस्तु का मुख्य प्रवाह उसी के इर्द-गिर्द घूमता है और नाटक के अंतिम चरम फल (विजय/उद्देश्य) का भोक्ता वही होता है।
- प्रतिनायक: यह नायक का विरोधी पात्र होता है। इसका स्वभाव, आदर्श और आचरण नायक के विपरीत होता है। यह कथा में संघर्ष और नाटकीय द्वंद्व उत्पन्न करने के लिए अत्यंत आवश्यक होता है।
उत्तर:
- प्रकट संवाद: वे संवाद जिन्हें रंगमंच पर उपस्थित सभी पात्र सुनते हैं और उनका स्वाभाविक उत्तर देते हैं। यह पात्रों के आपसी विचार-विनिमय का माध्यम है।
- स्वगत संवाद: जब कोई पात्र अपने मन में चल रहे अंतर्द्वंद्व या गुप्त विचारों को जोर से बोलकर केवल प्रेक्षकों (दर्शकों) तक पहुँचाता है, जबकि मंच पर खड़े अन्य पात्र उसे न सुनने का अभिनय करते हैं, उसे 'स्वगत' (Aside) कहते हैं।
उत्तर: देशकाल से तात्पर्य उस ऐतिहासिक युग, भौगोलिक स्थान, समाज और समय से है जिसमें कथा घटित हो रही है। यदि देशकाल का सही निर्वाह न हो, तो नाटक में असंबद्धता और अनौचित्य दोष आ जाता है। उदाहरणार्थ, यदि मुगलकालीन नाटक में आधुनिक मोबाइल फोन या आधुनिक अंग्रेजी भाषा का प्रयोग दिखाया जाए तो नाटक की स्वाभाविकता और विश्वसनीयता नष्ट हो जाएगी।
उत्तर: जिस नाटक के समस्त संवाद गद्य के स्थान पर छंदोबद्ध, काव्यात्मक एवं पद्यात्मक भाषा में रचित होते हैं, उसे काव्यनाटक (गीतिनाट्य) कहा जाता है। इसमें नाटक के द्वंद्व और काव्य की भावुकता का सुंदर समन्वय होता है।
दो प्रसिद्ध उदाहरण:
- धर्मवीर भारती कृत 'अंधा युग'
- केदारनाथ मिश्र 'प्रभात' कृत 'संवर्त' (तथा रामेश्वर सिंह 'काश्यप' कृत 'नीलकंठ निराला')
उत्तर: रेडियो नाटक दृश्य नहीं बल्कि विशुद्ध श्रव्य काव्य है। इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं:
- इसमें दृश्य मंच, यवनिका, रूपसज्जा और प्रकाश व्यवस्था की आवश्यकता नहीं होती।
- पात्रों की भाव-भंगिमा, उम्र और मानसिक स्थिति केवल आवाज (Voice Modulation) और सटीक ध्वनि प्रभावों (Sound Effects) द्वारा व्यक्त की जाती है।
- इसमें 'स्वगत कथन' का अत्यधिक महत्व होता है।
- इसे एक बार रिकॉर्ड करके भविष्य में बार-बार प्रसारित किया जा सकता है।
उत्तर: एकांकी वह नाट्य विधा है जो केवल एक अंक में समाप्त होती है और जिसमें जीवन की किसी एक मार्मिक घटना का तीव्र और सुगठित चित्रण होता है।
अंतर:
- नाटक: इसमें कई अंक होते हैं, विस्तृत कथानक होता है, प्रासंगिक कथाएँ (उपकथाएँ) होती हैं और जीवन का समग्र रूप चित्रित होता है।
- एकांकी: इसमें केवल एक अंक होता है, कोई उपकथा नहीं होती, एक ही मुख्य घटना होती है और प्रभाव में तीव्र गति तथा सघनता होती है।
उत्तर: नुक्कड़ नाटक आधुनिक युग की अत्यंत लोकप्रिय, मंच-मुक्त नाट्य विधा है। यह रंगमंच के पर्दे, कृत्रिम प्रकाश और लाउडस्पीकर की बंदिशों से मुक्त होकर सीधे आम जनता के बीच सड़क, चौराहे या कारखाने के द्वार पर खेला जाता है।
सामाजिक महत्व: इसका मूल उद्देश्य सामाजिक कुरीतियों, भ्रष्टाचार, अशिक्षा, शोषण और राजनीतिक विद्रूपताओं के विरुद्ध आम जनता में सीधे संवाद स्थापित कर जनजागरण उत्पन्न करना है।
उत्तर: चलचित्र बीसवीं सदी का शक्तिशाली बहु-माध्यम है। जहाँ साहित्य केवल 'शब्दों' के माध्यम से कल्पना को जगाता है, वहीं सिनेमा में बिंब (इमेज) और ध्वनि (साउंड) प्राथमिक भाषा का कार्य करते हैं।
परस्पर संबंध: चलचित्र और साहित्य एक-दूसरे के पूरक हैं। महान उपन्यासों और कहानियों पर सफल फिल्मों का निर्माण होता है, और सिनेमा भी साहित्य को नई दृष्टि व वैश्विक दर्शक वर्ग प्रदान करता है।
उत्तर: प्रत्येक पद्य का काव्य होना अनिवार्य नहीं है।
- पद्य: जो रचना वर्ण, मात्रा, गण, यति और तुक के निश्चित नियमों में बंधी होती है, उसे छंदबद्ध पद्य कहते हैं। उदाहरणार्थ, प्राचीन ज्योतिष या आयुर्वेद के श्लोक पद्यबद्ध हैं, किंतु उनमें भावुकता, रस और सौंदर्य न होने से वे काव्य नहीं हैं।
- काव्य: काव्य में छंद के साथ-साथ रागात्मकता, रस, कल्पना और सौंदर्य का होना अनिवार्य है।
उत्तर: प्रबंधकाव्य उस दीर्घ काव्यात्मक रचना को कहते हैं जिसमें कोई ऐतिहासिक, पौराणिक या काल्पनिक कथा आदि से अंत तक क्रमिक रूप से जुड़ी रहती है। इसके प्रत्येक छंद में पूर्वापर संबंध होता है।
प्रबंधकाव्य के दो भेद हैं:
- महाकाव्य (विशाल फलक पर आधारित संपूर्ण जीवन का चित्रण)।
- खंडकाव्य (जीवन के किसी एक विशिष्ट अंग या घटना का चित्रण)।
उत्तर: आचार्य भामह ने अपने ग्रंथ 'काव्यालंकार' में महाकाव्य के निम्नलिखित लक्षण बताए हैं:
- कथानक विस्तृत और महान चरित्रों (उदात्त नायक) पर आश्रित होना चाहिए।
- यह नाटकीय पंचसंधियों (मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, निर्वहण) से युक्त होना चाहिए।
- इसकी शैली उत्कृष्ट, अलंकृत तथा छंद विधान विविधतापूर्ण होना चाहिए।
- यह अनेक सर्गों में बद्ध होना चाहिए और इसका अंत सुखांत होना चाहिए।
उत्तर: हिंदी के चार कालजयी महाकाव्य निम्नलिखित हैं:
| महाकाव्य का नाम | रचयिता | काल |
|---|---|---|
| पृथ्वीराज रासो | चंदबरदाई | आदिकाल |
| रामचरितमानस | गोस्वामी तुलसीदास | भक्तिकाल |
| साकेत | मैथिलीशरण गुप्त | द्विवेदी युग (आधुनिक) |
| कामायनी | जयशंकर प्रसाद | छायावाद (आधुनिक) |
उत्तर: खंडकाव्य: वह प्रबंध काव्य जिसमें किसी महापुरुष के समग्र जीवन का वर्णन न करके, उसके जीवन की किसी एक महत्वपूर्ण घटना या मार्मिक प्रसंग का पूर्णता के साथ वर्णन किया जाता है, उसे खंडकाव्य कहते हैं।
अंतर: महाकाव्य एक विशाल वटवृक्ष के समान संपूर्ण जीवन-दर्शन को समेटता है (जैसे 'रामचरितमानस'), जबकि खंडकाव्य उस वृक्ष की एक सुंदर टहनी या विशिष्ट प्रसंग के समान होता है (जैसे दिनकर का 'रश्मिरथी' या गुप्त जी का 'जयद्रथ वध')।
उत्तर: मुक्तक काव्य वह पद्य विधा है जिसमें प्रत्येक पद या छंद अपने आप में स्वतंत्र, स्वायत्त और पूर्ण होता है। इसमें प्रबंधकाव्य की भाँति कोई बंधी हुई पूर्वापर कथा नहीं होती।
लक्षण: इसका प्रत्येक छंद किसी संदर्भ के बिना भी पूरा अर्थ और रस देने में सक्षम होता है; जैसे कबीर के दोहे, सूरदास के पद, रहीम और बिहारी के दोहे।
उत्तर:
- कथा साहित्य: इसमें कल्पित अथवा यथार्थ घटना पर आधारित विधाएँ आती हैं—उपन्यास, कहानी, लघुकथा।
- जीवनपरक साहित्य: इसमें वास्तविक मानव जीवन के प्रामाणिक अनुभवों पर आधारित विधाएँ आती हैं—जीवनी, आत्मकथा, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्त।
उत्तर: जिस साहित्य में भावुकता के स्थान पर विचार, तर्क, बौद्धिकता, चिंतन और विश्लेषण की प्रधानता होती है, उसे 'वैचारिक साहित्य' कहते हैं।
प्रमुख रूप: निबंध, प्रबंध, वैचारिक लेख, गंभीर भाषण, रिपोर्ताज, डायरी, साक्षात्कार और शब्दचित्र।
उत्तर: निर्देशक रंगमंच की धुरी होता है। वह नाटककार की लिखित पांडुलिपि को मंच पर सजीव रूप देता है। अभिनेताओं के अभिनय, संवादों की अदायगी, भाव-भंगिमा, मंच-सज्जा, प्रकाश, ध्वनि और वेशभूषा का सामंजस्य बैठाकर नाटक के मूल उद्देश्य को दर्शकों तक संप्रेषित करना निर्देशक का ही कार्य होता है।
उत्तर:
- जयशंकर प्रसाद: इनके नाटकों ('स्कंदगुप्त', 'चंद्रगुप्त') की भाषा संस्कृतनिष्ठ, तत्समप्रधान, गंभीर एवं काव्यात्मक है। इसमें भारतीय संस्कृति का गौरवशाली अतीत झलकता है, किंतु रंगमंच पर इसका अभिनय अपेक्षाकृत कठिन माना गया।
- मोहन राकेश: इनके नाटकों ('आषाढ़ का एक दिन', 'लहरों के राजहंस') की भाषा आधुनिक, सहज, व्यावहारिक और अत्यंत संप्रेषणीय है, जो रंगमंच के पूरी तरह अनुकूल सिद्ध होती है।
उत्तर: जिस विशिष्ट काव्य रचना में गद्य और पद्य का संतुलित एवं आनुपातिक मिश्रण होता है, उसे संस्कृत साहित्यशास्त्र में 'चंपूकाव्य' कहा गया है (गद्यपद्यमयी काचिच्चम्पूरित्यभिधीयते)।
उदाहरण: राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित 'यशोधरा' आधुनिक हिंदी साहित्य का अत्यंत उत्कृष्ट चंपूकाव्य है।
उत्तर: उद्देश्य नाटक का अंतिम और मार्गदर्शक तत्त्व है। कोई भी रचना निरुद्देश्य नहीं होती। नाटककार अपने जीवन-दर्शन, सामाजिक यथार्थ और युगबोध के आधार पर समाज को एक दिशा देना चाहता है। नाटक की कथावस्तु, पात्रों का चयन और संवाद सब कुछ नाटककार के उसी केंद्रीय उद्देश्य को सिद्ध करने के साधन होते हैं। उद्देश्य की प्रासंगिकता ही नाटक को कालजयी बनाती है।
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