अध्याय 3: धातु एवं अधातु
BSEB Class 10 विज्ञान (रसायनशास्त्र) | रासायनिक गुणधर्म, सक्रियता श्रेणी, धातुकर्म एवं संक्षारण सम्पूर्ण अध्याय नोट्स
- कमरे के सामान्य ताप पर द्रव अवस्था में पाई जाने वाली एकमात्र धातु कौन-सी है? — पारा (मरकरी / Hg)।
- कमरे के ताप पर द्रव अवस्था में पाई जाने वाली एकमात्र अधातु कौन-सी है? — ब्रोमीन (Br)।
- सर्वाधिक आघातवर्ध्य (Malleable) और तन्य (Ductile) धातु कौन-सी है? — सोना (स्वर्ण / Au)।
- मात्र 1 ग्राम सोने से लगभग कितनी लंबी महीन तार खींची जा सकती है? — लगभग 2 किलोमीटर लंबी।
- ऊष्मा तथा विद्युत की सर्वोत्तम चालक धातु कौन-सी होती है? — चांदी (सिल्वर / Ag)।
- ऊष्मा की सबसे दुर्बल (खराब) चालक धातुएं कौन-सी हैं? — सीसा (लेड / Pb) तथा पारा (Hg)।
- चाकू से आसानी से काटी जा सकने वाली अत्यधिक मुलायम क्षार धातुएं कौन-सी हैं? — सोडियम (Na), पोटैशियम (K) तथा लीथियम (Li)।
- हाथ की हथेली पर रखने पर अपने अत्यंत निम्न गलनांक के कारण पिघलने वाली धातुएं कौन-सी हैं? — गैलियम (Ga) तथा सीजियम (Cs)।
- वह कौन-सी अधातु है जो अधातु होते हुए भी चमकीली (धात्विक चमक युक्त) होती है? — आयोडीन (I2)।
- कार्बन का कौन-सा अपररूप विद्युत का उत्तम सुचालक होता है? — ग्रेफाइट (Graphite)।
- धातुओं को पीटकर पतली चादर बनाने के गुण को क्या कहते हैं? — आघातवर्ध्यता (Malleability)।
- धातुओं के पतले तार के रूप में खींचे जा सकने की क्षमता को क्या कहते हैं? — तन्यता (Ductility)।
- कठोर सतह से टकराने पर आवाज (टन-टन की ध्वनि) उत्पन्न करने वाली धातुएं क्या कहलाती हैं? — ध्वानिक (सोनोरस / Sonorous)।
- सोडियम और पोटैशियम को मिट्टी के तेल (केरोसिन) में डुबोकर क्यों रखा जाता है? — अत्यधिक क्रियाशील होने और खुली वायु में आग पकड़ने के कारण।
- वे धातु ऑक्साइड जो अम्ल और क्षार दोनों से क्रिया करके लवण तथा जल बनाते हैं, क्या कहलाते हैं? — उभयधर्मी ऑक्साइड (Amphoteric Oxides)।
- उभयधर्मी ऑक्साइडों के दो सबसे प्रमुख उदाहरण कौन-से हैं? — ऐल्युमिनियम ऑक्साइड (Al2O3) तथा जिंक ऑक्साइड (ZnO)।
- ठंडे जल के साथ अत्यधिक तीव्र और ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया करने वाली दो धातुएं कौन-सी हैं? — पोटैशियम (K) तथा सोडियम (Na)।
- जल के साथ अभिक्रिया करने पर तैरने वाली दो धातुएं कौन-सी हैं? — कैल्शियम (Ca) तथा मैग्नीशियम (Mg) (उत्पन्न H2 गैस के बुलबुलों के चिपकने से)।
- वह कौन-सी धातु है जो ठंडे जल से नहीं बल्कि केवल गर्म जल के साथ अभिक्रिया करती है? — मैग्नीशियम (Mg)।
- कौन-सी धातुएं न तो ठंडे जल से और न ही गर्म जल से, बल्कि केवल भाप (Steam) से क्रिया करती हैं? — ऐल्युमिनियम (Al), लोहा (Fe) तथा जिंक (Zn)।
- जल या भाप के साथ बिल्कुल भी अभिक्रिया न करने वाली धातुएं कौन-सी हैं? — सीसा (Pb), कॉपर (Cu), चांदी (Ag) तथा सोना (Au)।
- जब धातुएं नाइट्रिक अम्ल (HNO3) के साथ क्रिया करती हैं, तो हाइड्रोजन गैस क्यों नहीं निकलती? — क्योंकि HNO3 एक प्रबल ऑक्सीकारक है जो H2 को जल में ऑक्सीकृत कर देता है।
- वे कौन-सी दो धातुएं हैं जो अति तनु (1% HNO3) के साथ क्रिया करके H2 गैस मुक्त करती हैं? — मैग्नीशियम (Mg) तथा मैंगनीज (Mn)।
- ऐक्वा रेजिया (अम्लराज) में सांद्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) तथा सांद्र नाइट्रिक अम्ल (HNO3) का अनुपात क्या होता है? — 3 : 1 (ताजा मिश्रण)।
- अम्लराज (ऐक्वा रेजिया) में अक्रिय उत्कृष्ट धातुएं जैसे सोना और प्लैटिनम क्यों घुल जाती हैं? — क्योंकि इसमें उपस्थित मुक्त नवजात क्लोरीन तीव्र क्रिया करती है।
- सक्रियता श्रेणी में सबसे शीर्ष (सर्वाधिक क्रियाशील) पर स्थित धातु कौन-सी है? — पोटैशियम (K)।
- सक्रियता श्रेणी में सबसे नीचे (न्यूनतम क्रियाशील) स्थित धातु कौन-सी है? — सोना (Au)।
- धातुओं की क्रियाशीलता को अवरोही (घटते) क्रम में व्यवस्थित सूची को क्या कहते हैं? — सक्रियता श्रेणी (Reactivity Series)।
- धातु से अधातु में इलेक्ट्रॉनों के स्थानांतरण से बनने वाले यौगिक क्या कहलाते हैं? — आयनिक यौगिक (विद्युत-संयोजी यौगिक / Ionic Compounds)।
- आयनिक यौगिकों के गलनांक और क्वथनांक उच्च क्यों होते हैं? — मजबूत अंतर-आयनिक स्थिरवैद्युत आकर्षण बल को तोड़ने हेतु अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता के कारण।
- आयनिक यौगिक ठोस अवस्था में विद्युत के कुचालक परंतु गलित या जलीय अवस्था में सुचालक क्यों होते हैं? — क्योंकि गलित/जलीय अवस्था में मुक्त आयन स्वतंत्र रूप से गति करते हैं।
- पृथ्वी की पर्पटी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले अकार्बनिक तत्वों या यौगिकों को क्या कहते हैं? — खनिज (Minerals)।
- वे खनिज जिनसे किसी धातु का प्रचुर मात्रा में और लाभकारी रूप से निष्कर्षण किया जा सके, क्या कहलाते हैं? — अयस्क (Ores)।
- अयस्कों में उपस्थित अवांछनीय अशुद्धियों (जैसे रेत, मिट्टी, चूना-पत्थर) को क्या कहा जाता है? — गैंग (आधात्री / Gangue)।
- पारे (Hg) के मुख्य सल्फाइड अयस्क का नाम और सूत्र क्या है? — सिनेबार (Cinnabar / HgS)।
- सल्फाइड अयस्क को वायु की उपस्थिति में अधिक ताप पर गर्म करके ऑक्साइड में बदलने की प्रक्रिया क्या कहलाती है? — भर्जन (जारण / Roasting)।
- कार्बोनेट अयस्क को सीमित या अनुपस्थित वायु में उच्च ताप पर गर्म कर ऑक्साइड में बदलना क्या कहलाता है? — निस्तापन (Calcination)।
- रेल की पटरियों और मशीनी दरारों को जोड़ने में प्रयुक्त होने वाली एलुमिनो-थर्मिक अभिक्रिया क्या कहलाती है? — थर्मिट अभिक्रिया (Thermite Reaction)।
- थर्मिट अभिक्रिया में अपचायक के रूप में किस धातु के चूर्ण का उपयोग किया जाता है? — ऐल्युमिनियम (Al) चूर्ण का।
- सक्रियता श्रेणी में सबसे ऊपर स्थित अत्यधिक क्रियाशील धातुओं (जैसे Na, Mg, Al) का निष्कर्षण किस विधि से होता है? — विद्युत-अपघटनी अपचयन (Electrolytic Reduction) द्वारा।
- तांबे के विद्युत-अपघटनी परिष्करण में एनोड किस धातु का बना होता है? — अशुद्ध तांबे (Impure Copper) की मोटी छड़ का।
- विद्युत-अपघटनी परिष्करण में एनोड के नीचे जमा होने वाली अविलेय अशुद्धियां क्या कहलाती हैं? — एनोड पंक (Anode Mud)।
- लोहे पर जंग लगने के लिए किन दो कारकों की अनिवार्य उपस्थिति आवश्यक है? — ऑक्सीजन (वायु) तथा नमी (जलवाष्प)।
- लोहे के जंग (रस्ट) का रासायनिक सूत्र क्या होता है? — Fe2O3·xH2O (जलयोजित फेरिक ऑक्साइड)।
- लोहे एवं इस्पात को जंग से सुरक्षित रखने के लिए उन पर जस्ते (जिंक) की पतली परत चढ़ाने की विधि क्या कहलाती है? — यशदलेपन (गैल्वनीकरण / Galvanisation)।
- दो या दो से अधिक धातुओं अथवा धातु एवं अधातु के समांगी मिश्रण को क्या कहते हैं? — मिश्रधातु (मिश्रधातु / Alloy)।
- पीतल (Brass) किन धातुओं की मिश्रधातु है? — तांबा (Cu ∼ 70%) तथा जिंक (Zn ∼ 30%)।
- कांसा (Bronze) किन धातुओं की मिश्रधातु है? — तांबा (Cu ∼ 90%) तथा टिन (Sn ∼ 10%)।
- सोल्डर (टांका धातु) किन दो धातुओं का मिश्रण है जिसका गलनांक बहुत कम होता है? — सीसा (Pb ∼ 50%) तथा टिन (Sn ∼ 50%)।
- शुद्ध 24 कैरेट सोना आभूषण बनाने के लिए उपयुक्त क्यों नहीं होता? — क्योंकि यह अत्यधिक मुलायम (नरम) होता है; कठोरता हेतु इसमें तांबा या चांदी मिलाया जाता है।
वे धातु ऑक्साइड जो अम्ल तथा क्षारक दोनों के साथ स्वतंत्र रूप से अभिक्रिया करके लवण तथा जल का निर्माण करते हैं, उभयधर्मी ऑक्साइड कहलाते हैं।
उदाहरण: ऐल्युमिनियम ऑक्साइड (Al2O3)
• अम्ल के साथ अभिक्रिया (क्षारीय व्यवहार):
सोडियम (Na) अत्यधिक क्रियाशील धातु है। यह सामान्य ताप पर भी वायु में उपस्थित ऑक्सीजन और नमी के साथ अत्यंत तीव्र ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया करती है और स्वतः आग पकड़ लेती है:
लोहा (Fe) ठंडे या गर्म जल के साथ बिल्कुल क्रिया नहीं करता, परंतु जब लाल तप्त लोहे पर जलवाष्प (भाप) प्रवाहित की जाती है, तो यह मैग्नेटिक आयरन ऑक्साइड (Fe3O4) बनाता है और हाइड्रोजन गैस मुक्त करता है:
कैल्शियम तथा मैग्नीशियम जब जल के साथ अभिक्रिया करते हैं, तो रासायनिक क्रिया के फलस्वरूप हाइड्रोजन गैस (H2) के बुलबुले उत्पन्न होते हैं:
अम्लराज: 3 भाग सांद्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) तथा 1 भाग सांद्र नाइट्रिक अम्ल (HNO3) के ताजे मिश्रण को अम्लराज कहते हैं (अनुपात 3 : 1)।
गुणधर्म एवं उपयोग: यह एक अत्यंत संक्षारक एवं धूमायमान (Fuming) द्रव है। यह उत्कृष्ट अक्रिय धातुओं जैसे सोना (Au) तथा प्लैटिनम (Pt) को भी अपने अंदर घोलने की अद्वितीय क्षमता रखता है। इसका उपयोग स्वर्णकारों द्वारा पुराने आभूषणों की सफाई और शुद्धिकरण में किया जाता है।
भर्जन: सल्फाइड अयस्कों को वायु की नियमित एवं प्रचुर उपस्थिति में गलनांक से नीचे उच्च ताप पर गर्म कर ऑक्साइड में बदलना भर्जन कहलाता है।
जब आयरन (III) ऑक्साइड (Fe2O3) की अभिक्रिया ऐल्युमिनियम धातु चूर्ण के साथ कराई जाती है, तो यह अत्यधिक ऊष्माक्षेपी विस्थापन अभिक्रिया होती है। उत्पन्न ऊष्मा इतनी प्रचंड होती है कि निष्कासित लोहा पिघली हुई (गलित) अवस्था में प्राप्त होता है:
सोडियम (Na, विन्यास 2, 8, 1) अपने अष्टक को पूरा करने के लिए 1 संयोजी इलेक्ट्रॉन त्यागकर स्थायी धनायन बनाता है:
1. घुलनशीलता: आयनिक यौगिक ध्रुवीय विलायक होने के कारण जल में अत्यधिक घुलनशील होते हैं, परंतु अध्रुवीय विलायकों जैसे केरोसिन, पेट्रोल और ईथर में पूर्णतः अघुलनशील होते हैं।
2. विद्युत चालकता: ठोस अवस्था में मजबूत जालक बंधनों के कारण आयन गति करने हेतु स्वतंत्र नहीं होते, अतः ठोस में ये विद्युत के कुचालक होते हैं। परंतु गलित अवस्था अथवा जलीय विलयन में आयन स्वतंत्र होकर गति करते हैं, जिससे ये विद्युत के उत्तम सुचालक बन जाते हैं।
1. पहले अयस्क को ऑक्साइड में बदला जाता है:
• सल्फाइड अयस्क का भर्जन: 2ZnS + 3O2 → 2ZnO + 2SO2↑
• कार्बोनेट अयस्क का निस्तापन: ZnCO3 → ZnO + CO2↑
2. प्राप्त जिंक ऑक्साइड का कोक (कार्बन) द्वारा अपचयन कराकर शुद्ध धातु प्राप्त की जाती है:
सोडियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम और ऐल्युमिनियम जैसी अत्यधिक सक्रिय धातुओं की ऑक्सीजन के प्रति बंधुता (Affinity) कार्बन की तुलना में बहुत अधिक होती है। कार्बन इन धातुओं के ऑक्साइडों में से ऑक्सीजन को खींचने में असमर्थ होता है। अतः इनका अपचयन कार्बन द्वारा संभव नहीं है; इन्हें इनके गलित क्लोराइडों के विद्युत-अपघटनी अपचयन (Electrolytic Reduction) द्वारा ही प्राप्त किया जाता है।
अम्लीकृत कॉपर सल्फेट (CuSO4) विलयन में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर:
• एनोड पर (अशुद्ध कॉपर का ऑक्सीकरण):
आर्द्र वायु (ऑक्सीजन और नमी) की उपस्थिति में लोहे की सतह पर भूरे रंग की पपड़ीदार परत का जमना जंग लगना कहलाता है। इसका रासायनिक सूत्र Fe2O3·xH2O (जलयोजित फेरिक ऑक्साइड) है।
बचाव के उपाय: 1. लोहे की सतह पर पेंट अथवा ग्रीस लगाना। 2. यशदलेपन (Galvanisation): लोहे पर पिघले हुए जिंक की पतली परत चढ़ाना। 3. मिश्रधातु बनाना (जैसे लोहे से स्टेनलेस स्टील बनाना)।
लोहे एवं इस्पात को जंग से बचाने के लिए उन पर जस्ते (जिंक / Zn) की एक सूक्ष्म परत चढ़ाने की विधि को यशदलेपन कहते हैं।
कारण: सक्रियता श्रेणी में जिंक लोहे से अधिक क्रियाशील है। यदि जिंक की परत कहीं से खरोंच लगकर छिल भी जाए, तो जिंक लोहे की तुलना में स्वयं पहले ऑक्सीकृत होकर एक सुरक्षात्मक परत (ZnO) बना लेता है और लोहे का संक्षारण नहीं होने देता (बलिदानी संरक्षण)।
दो या दो से अधिक धातुओं अथवा एक धातु एवं एक अधातु के समांगी मिश्रण को मिश्रधातु कहते हैं।
मुख्य उद्देश्य:
1. कठोरता तथा सामर्थ्य बढ़ाना: शुद्ध लोहा बहुत नर्म होता है, परंतु उसमें 0.05% कार्बन मिलाने पर वह अत्यधिक कठोर और मजबूत बन जाता है।
2. संक्षारण (जंग) से सुरक्षा: लोहे में निकेल और क्रोमियम मिलाकर 'स्टेनलेस स्टील' बनाया जाता है, जिसमें कभी जंग नहीं लगता।
यदि किसी मिश्रधातु में उपस्थित धातुओं में से एक धातु अनिवार्य रूप से पारा (मरकरी / Hg) हो, तो ऐसी मिश्रधातु को अमलगम कहा जाता है।
उदाहरण: दंत अमलगम (Dental Amalgam - पारे, चांदी, टिन और तांबे की मिश्रधातु), जिसका उपयोग दंत चिकित्सकों द्वारा दांतों के खोखले छिद्रों (Cavities) को भरने में किया जाता है; सोडियम अमलगम (Na-Hg)।
शुद्ध सोना 24 कैरेट का होता है और यह अत्यंत मुलायम, लचीला और कोमल होता है। इससे बने आभूषण तनिक से दबाव से मुड़ जाते हैं या टूट जाते हैं। आभूषणों को आवश्यक कठोरता और स्थायित्व प्रदान करने हेतु 22 कैरेट सोना प्रयुक्त होता है, जिसमें 22 भाग शुद्ध सोना तथा 2 भाग तांबा (Cu) अथवा चांदी (Ag) मिश्रित किया जाता है।
1. चांदी का काला पड़ना: चांदी वायु में उपस्थित सूक्ष्म हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S) गैस से अभिक्रिया करके सिल्वर सल्फाइड (Ag2S) की एक पतली काली परत बना लेती है।
2. तांबे का हरा होना: तांबा नम वायु में उपस्थित CO2 और जलवाष्प से मंद क्रिया करके क्षारीय कॉपर कार्बोनेट [CuCO3·Cu(OH)2] की एक हरी सुरक्षात्मक परत बना लेता है।
ऐनोडीकरण ऐल्युमिनियम की सतह पर तनु सल्फ्यूरिक अम्ल के विद्युत-अपघटन द्वारा ऐल्युमिनियम ऑक्साइड (Al2O3) की एक मोटी, संक्षारण-रोधी सुरक्षात्मक परत चढ़ाने की प्रक्रिया है।
महत्व: यह परत ऐल्युमिनियम को जंग से पूर्ण सुरक्षित रखती है तथा इस परत पर आकर्षक रंगीन डाई चढ़ाई जा सकती है, जिसका उपयोग प्रेशर कुकर, खिड़कियों के फ्रेम और सजावटी सामान बनाने में होता है।
1. ऑक्साइडों की प्रकृति: धातु ऑक्साइड सामान्यतः क्षारीय या उभयधर्मी होते हैं (जैसे Na2O, MgO, Al2O3); जबकि अधातु ऑक्साइड सामान्यतः अम्लीय या उदासीन होते हैं (जैसे SO2, CO2, CO, H2O)।
2. आयन निर्माण: धातुएं इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन बनाती हैं (विद्युत धनात्मक); जबकि अधातुएं इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके ऋणायन बनाती हैं (विद्युत ऋणात्मक)।
सक्रियता श्रेणी में लोहा (Fe) तांबे (Cu) से अधिक क्रियाशील है। अतः लोहा कॉपर सल्फेट विलयन में से तांबे को विस्थापित कर देता है। विलयन का नीला रंग धीरे-धीरे हल्का हरा (फेरस सल्फेट बनने के कारण) हो जाता है तथा लोहे की कील पर लाल-भूरे रंग के तांबे की परत जम जाती है:
सोल्डर सीसा (लेड / Pb ∼ 50%) और टिन (Sn ∼ 50%) की एक विशेष मिश्रधातु है।
गुण: इसका गलनांक अपनी दोनों मूल धातुओं की तुलना में अत्यंत निम्न (कम) होता है।
उपयोग: कम तापमान पर पिघलने के कारण इसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक परिपथों, मदरबोर्डों और बिजली के तारों को परस्पर टांका लगाने (वेल्डिंग/सोल्डरिंग) में किया जाता है।
निम्न सक्रिय कॉपर धातु को केवल हवा में गर्म करके निष्कर्षित किया जाता है:
1. पहले भर्जन द्वारा क्यूप्रस ऑक्साइड बनता है:
खनिज: भू-पर्पटी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले अकार्बनिक तत्व या उनके यौगिक खनिज कहलाते हैं।
अयस्क: वे विशिष्ट खनिज जिनमें किसी धातु की प्रतिशत मात्रा बहुत अधिक होती है और जिससे धातु को कम खर्च में सरलता से निष्कर्षित किया जा सकता है, अयस्क कहलाते हैं।
निष्कर्ष: सभी अयस्क खनिज होते हैं, परंतु सभी खनिज अयस्क नहीं हो सकते (क्योंकि कुछ खनिजों से धातु निकालना आर्थिक रूप से अत्यधिक महंगा होता है)।
सिनेबार (मर्क्यूरिक सल्फाइड) निम्न सक्रियता वाली धातु का अयस्क है। इसे वायु में गर्म करने पर यह पहले मर्क्यूरिक ऑक्साइड में बदलता है, जो अधिक गर्म करने पर स्वतः धातु में अपचयित हो जाता है:
सक्रियता श्रेणी: विभिन्न धातुओं को उनकी रासायनिक क्रियाशीलता के घटते हुए (अवरोही) क्रम में एक ऊर्ध्वाधर स्तंभ में व्यवस्थित करने पर प्राप्त श्रेणी को विद्युत-रासायनिक सक्रियता श्रेणी कहते हैं।
K > Na > Ca > Mg > Al
मध्यम क्रियाशील धातुएं (भाप व अम्लों से क्रिया):
Zn > Fe > Pb
[हाइड्रोजन - H (मानक संदर्भ)]:
कम क्रियाशील / उत्कृष्ट धातुएं (जल से अक्रियाशील):
Cu > Hg > Ag > Au
सक्रियता श्रेणी के प्रमुख व्यावहारिक अनुप्रयोग:
- 1. धातुओं द्वारा अम्लों से हाइड्रोजन का विस्थापन: जो धातुएं सक्रियता श्रेणी में हाइड्रोजन से ऊपर स्थित हैं (K से Pb तक), वे तनु अम्लों (HCl, H2SO4) से हाइड्रोजन को विस्थापित कर देती हैं:
Zn + 2HCl → ZnCl2 + H2↑हाइड्रोजन से नीचे स्थित धातुएं (Cu, Ag, Au) तनु अम्लों से H2 गैस मुक्त नहीं कर पातीं।
- 2. धातुओं की लवण विलयनों में विस्थापन अभिक्रियाएं: श्रेणी में अधिक क्रियाशील (ऊपर स्थित) धातु अपने से कम क्रियाशील (नीचे स्थित) धातु को उसके लवण के जलीय विलयन से विस्थापित कर देती है:
Zn(s) + CuSO4(aq) → ZnSO4(aq) + Cu(s)परंतु कॉपर जिंक सल्फेट से जिंक को विस्थापित नहीं कर सकता (Cu + ZnSO4 → कोई अभिक्रिया नहीं)।
- 3. अयस्कों से धातुओं का निष्कर्षण: श्रेणी में स्थान के आधार पर ही यह निर्धारित किया जाता है कि धातु का निष्कर्षण विद्युत-अपघटन द्वारा होगा (शीर्ष धातुएं) अथवा कार्बन द्वारा अपचयन से (मध्यम धातुएं)।
आयनिक यौगिक: धातु से अधातु में संयोजकता इलेक्ट्रॉनों के पूर्ण स्थानांतरण द्वारा बने परस्पर विपरीत आवेशित आयनों (धनायन एवं ऋणायन) के मध्य प्रबल स्थिरवैद्युत आकर्षण बल से बनने वाले रासायनिक यौगिकों को आयनिक यौगिक कहते हैं।
मैग्नीशियम क्लोराइड (MgCl2) का निर्माण:
- मैग्नीशियम परमाणु (Mg12, विन्यास: 2, 8, 2) दो इलेक्ट्रॉन त्यागकर निकटतम अक्रिय गैस नियॉन का स्थायी विन्यास प्राप्त करता है:
Mg → Mg2+ + 2e-
- दो क्लोरीन परमाणु (Cl17, विन्यास: 2, 8, 7) उन दोनों इलेक्ट्रॉनों में से 1-1 इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर स्थायी क्लोराइड आयन बनाते हैं:
2Cl + 2e- → 2Cl-
- इलेक्ट्रॉन स्थानांतरण रूप:
Mg : + 2 ·C̈l̈: → Mg2+ + 2[:C̈l̈:]- → MgCl2
आयनिक यौगिकों के चार प्रमुख गुणधर्म:
- 1. भौतिक प्रकृति: धनायनों और ऋणायनों के मध्य अत्यधिक प्रबल त्रिविमीय स्थिरवैद्युत आकर्षण बल होने के कारण ये ठोस एवं कठोर होते हैं। दाब डालने पर ये परतों के खिसकने से टूट जाते हैं, अतः ये भंगुर (Brittle) होते हैं।
- 2. उच्च गलनांक एवं क्वथनांक: इनके क्रिस्टल जालक में विपरीत आयनों को अलग करने के लिए अत्यंत भारी मात्रा में ऊष्मा ऊर्जा की आवश्यकता होती है (जैसे NaCl का गलनांक 1074 K है)।
- 3. विलेयता (घुलनशीलता): ये ध्रुवीय विलायक (जल) में अत्यधिक घुलनशील होते हैं क्योंकि जल के ध्रुव आयनों को अलग कर देते हैं; परंतु पेट्रोल, केरोसिन जैसे अध्रुवीय कार्बनिक विलायकों में अघुलनशील होते हैं।
- 4. विद्युत चालकता: ठोस अवस्था में आयन स्थिर जालक में बंधे होने के कारण गति नहीं कर सकते, अतः ठोस में ये कुचालक होते हैं। गलित अवस्था या जल में घोलने पर आयन स्वतंत्र हो जाते हैं और तीव्र विद्युत का वहन करते हैं।
धातुकर्म: अयस्कों में से अशुद्धियों को दूर करके व्यावसायिक रूप से शुद्ध धातु प्राप्त करने की संपूर्ण वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रक्रिया को धातुकर्म कहते हैं।
धातुकर्म के तीन मुख्य चरण:
- चरण 1: अयस्क का समृद्धिकरण (सांद्रण / Concentration of Ore): खदानों से निकले अयस्क में उपस्थित रेत, मिट्टी, चूना (गैंग) को भौतिक व रासायनिक विधियों द्वारा अलग करना।
• गुरुत्वीय पृथक्करण: भारी ऑक्साइड अयस्कों हेतु।
• झाग प्लवन विधि: सल्फाइड अयस्कों हेतु चीड़ के तेल द्वारा।
• चुंबकीय पृथक्करण: चुंबकीय अशुद्धियों को हटाने हेतु। - चरण 2: सांद्रित अयस्क से धातु का निष्कर्षण (Reduction): धातुओं की क्रियाशीलता के आधार पर:
• (क) उच्च सक्रिय धातुएं (K, Na, Ca, Mg, Al): इनके ऑक्साइड अत्यंत स्थाई होते हैं। इन्हें इनके गलित क्लोराइडों या ऑक्साइडों के विद्युत-अपघटनी अपचयन द्वारा कैथोड पर प्राप्त किया जाता है।
• (ख) मध्यम सक्रिय धातुएं (Zn, Fe, Pb): सल्फाइड अयस्कों का भर्जन तथा कार्बोनेट अयस्कों का निस्तापन करके पहले ऑक्साइड में बदलते हैं। फिर कोक (कार्बन) या ऐल्युमिनियम (थर्मिट विधि) द्वारा अपचयन कर धातु प्राप्त की जाती है।
• (ग) निम्न सक्रिय धातुएं (Cu, Hg): इनके सल्फाइड अयस्कों को केवल वायु में गर्म करके (स्वतः अपचयन) धातु प्राप्त कर ली जाती है। - चरण 3: धातु का परिष्करण (Refining): अपचयन से प्राप्त धातु में कुछ अशुद्धियां शेष रह जाती हैं। इसे विद्युत-अपघटनी परिष्करण विधि द्वारा 99.99% शुद्ध किया जाता है।
धातु निष्कर्षण से प्राप्त अशुद्ध तांबे को 99.99% विशुद्ध बनाने के लिए विद्युत-अपघटनी परिष्करण सबसे प्रामाणिक विधि है:
उपकरण की व्यवस्था:
- एनोड (धनात्मक इलेक्ट्रोड): अशुद्ध तांबे की मोटी प्लेट बनाई जाती है।
- कैथोड (ऋणात्मक इलेक्ट्रोड): शुद्ध तांबे की अत्यंत पतली पट्टी लगाई जाती है।
- विद्युत-अपघट्य (इलेक्ट्रोलाइट): अम्लीकृत कॉपर सल्फेट (CuSO4 + तनु H2SO4) का जलीय विलयन एक टैंक में भरा जाता है।
कार्यप्रणाली एवं रासायनिक अभिक्रियाएं: जब विद्युत-अपघट्य में दिष्ट धारा (DC) प्रवाहित की जाती है:
- एनोड से अशुद्ध तांबा घुलकर Cu2+ आयनों के रूप में विलयन में प्रवेश करता है:
एनोड पर: Cu(अशुद्ध) → Cu2+ + 2e- (ऑक्सीकरण)
- ठीक उसी समय, विलयन में से उतनी ही मात्रा में शुद्ध Cu2+ आयन कैथोड की ओर आकर्षित होते हैं और इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर शुद्ध तांबे के रूप में कैथोड पर जमा होते जाते हैं:
कैथोड पर: Cu2+ + 2e- → Cu(शुद्ध) (अपचयन)
परिणाम: जैसे-जैसे प्रक्रिया आगे बढ़ती है, अशुद्ध एनोड पतला होता जाता है और कैथोड शुद्ध तांबे के निक्षेपण से मोटा होता जाता है।
एनोड पंक (Anode Mud): अशुद्ध तांबे में उपस्थित विलेय अशुद्धियां विलयन में घुल जाती हैं, जबकि अविलेय अशुद्धियां (जैसे सोना, चांदी, प्लैटिनम) एनोड के ठीक नीचे पेंदे में कीचड़ के रूप में एकत्र हो जाती हैं। इसे एनोड पंक कहते हैं। इन बहुमूल्य धातुओं को बेचकर प्रक्रिया की लागत की भरपाई की जाती है।
संक्षारण: जब कोई धातु अपने आस-पास की वायु, नमी (जलवाष्प), अम्ल अथवा अन्य गैसों के संपर्क में आती है, तो धातु की सतह पर रासायनिक अथवा विद्युत-रासायनिक क्रिया द्वारा अवांछित यौगिकों (जैसे ऑक्साइड, कार्बोनेट, सल्फाइड) की परत बनने से धातु का क्षय होने लगता है। इसे संक्षारण कहते हैं।
लोहे में जंग लगने की आवश्यक शर्तों का प्रायोगिक सत्यापन:
तीन स्वच्छ परखनलियां (A, B तथा C) ली जाती हैं और प्रत्येक में लोहे की साफ कीलें रखी जाती हैं:
- परखनली A (वायु तथा जल दोनों उपस्थित): इसमें साधारण नल का जल इतना डाला जाता है कि कीलें आधी डूब जाएं। परखनली को कॉर्क से बंद कर दिया जाता है। (यहाँ कीलों को वायु और जल दोनों मिलते हैं)।
- परखनली B (केवल जल, वायु अनुपस्थित): इसमें उबला हुआ आसुत जल डाला जाता है (उबालने से जल में घुली हुई सारी वायु निकल जाती है)। इसके ऊपर 1 mL वनस्पति तेल की परत डाल दी जाती है ताकि बाहर की वायु जल में न घुल सके। कॉर्क बंद किया जाता है।
- परखनली C (केवल शुष्क वायु, नमी अनुपस्थित): इसमें थोड़ा निर्जलीय कैल्शियम क्लोराइड (Anhydrous CaCl2) रखा जाता है जो वायु की समस्त नमी को सोख लेता है। कीलें बिल्कुल शुष्क वायु में रहती हैं।
प्रेक्षण एवं निष्कर्ष (कुछ दिनों बाद):
- परखनली B और C की कीलों पर बिल्कुल भी जंग नहीं लगता और वे चमकती रहती हैं।
- केवल परखनली A की कीलों पर गहरे लाल-भूरे रंग का पपड़ीदार जंग लग जाता है।
वैज्ञानिक निष्कर्ष: यह प्रयोग अकाट्य रूप से सिद्ध करता है कि लोहे पर जंग लगने के लिए ऑक्सीजन (वायु) तथा जल (नमी) दोनों की एक साथ उपस्थिति अनिवार्य है; किसी एक की अनुपस्थिति में जंग नहीं लग सकता।
मिश्रधातु: दो या दो से अधिक धातुओं अथवा एक धातु एवं एक अधातु के समांगी (Homogeneous) ठोस मिश्रण को मिश्रधातु कहते हैं।
बनाने की विधि: पहले मुख्य प्राथमिक धातु को उच्च ताप पर पिघलाया जाता है, फिर अन्य निश्चित अनुपात में ली गई धातुओं या अधातुओं को उसमें पूरी तरह घोल दिया जाता है। इस समांगी द्रव मिश्रण को कमरे के ताप पर ठंडा करने पर ठोस मिश्रधातु प्राप्त होती है।
| मिश्रधातु | घटक तत्व (प्रतिशत) | विशिष्ट गुणधर्म | प्रमुख उपयोग |
|---|---|---|---|
| (i) पीतल (Brass) | तांबा (Cu ∼ 70%) + जिंक (Zn ∼ 30%) | चमकदार सुनहरा, शुद्ध तांबे से अधिक मजबूत, आघातवर्ध्य। | बर्तन, सजावटी सामान, कारतूस और वाद्य यंत्र बनाने में। |
| (ii) कांसा (Bronze) | तांबा (Cu ∼ 90%) + टिन (Sn ∼ 10%) | अत्यधिक कठोर, घर्षणरोधी, संक्षारण-मुक्त, ध्वानिक। | मूर्तियां, पदक (मेडल), सिक्के और भारी मशीनरी के बेयरिंग में। |
| (iii) सोल्डर (Solder) | सीसा (Pb ∼ 50%) + टिन (Sn ∼ 50%) | अत्यंत निम्न गलनांक (सुगमता से पिघलने वाली)। | इलेक्ट्रॉनिक परिपथों और बिजली के तारों की सोल्डरिंग (टांका लगाने) में। |
| (iv) स्टेनलेस स्टील | लोहा (Fe ∼ 74%) + निकेल (Ni 8%) + क्रोमियम (Cr 18%) + कार्बन (0.1%) | अत्यंत कठोर, उच्च तनन सामर्थ्य, कभी जंग नहीं लगता। | रसोई के बर्तन, शल्य चिकित्सा (सर्जिकल) उपकरण और घड़ियों में। |
धातुओं के रासायनिक गुणधर्म उनके संयोजी इलेक्ट्रॉनों को त्यागने की प्रवृत्ति पर निर्भर करते हैं:
- 1. ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया: लगभग सभी धातुएं ऑक्सीजन से संयुक्त होकर क्षारीय धातु ऑक्साइड बनाती हैं:
4Na + O2 → 2Na2O (कमरे के ताप पर तीव्र)2Mg + O2 →Δ 2MgO (चमकदार श्वेत ज्वाला के साथ)2Cu + O2 →प्रबल ताप 2CuO (काले रंग का कॉपर (II) ऑक्साइड)
- 2. जल के साथ अभिक्रिया: धातुएं जल के साथ क्रिया कर धातु हाइड्रॉक्साइड या ऑक्साइड बनाती हैं और H2 गैस मुक्त करती हैं:
2K(s) + 2H2O(l) → 2KOH(aq) + H2(g)↑ + प्रचंड ऊष्माMg(s) + 2H2O(गर्म) → Mg(OH)2(aq) + H2(g)↑2Al(s) + 3H2O(भाप) → Al2O3(s) + 3H2(g)↑
- 3. तनु अम्लों के साथ अभिक्रिया: धातुएं अम्लों से हाइड्रोजन आयनों को विस्थापित कर लवण बनाती हैं:
Mg + 2HCl → MgCl2 + H2↑2Al + 6HCl → 2AlCl3 + 3H2↑
- 4. अन्य धातु लवणों के साथ अभिक्रिया (विस्थापन): अधिक सक्रिय धातु कम सक्रिय धातु को विस्थापित करती है:
Cu(s) + 2AgNO3(aq) → Cu(NO3)2(aq) + 2Ag(s)
1. भौतिक गुणधर्मों में अंतर एवं अपवाद:
| भौतिक गुण | धातुएं (Metals) | अधातुएं (Non-metals) | महत्वपूर्ण अपवाद |
|---|---|---|---|
| भौतिक अवस्था | सामान्यतः ठोस। | ठोस, द्रव एवं गैस तीनों। | पारा (Hg) द्रव धातु है; ब्रोमीन (Br) द्रव अधातु है। |
| कठोरता | कठोर एवं सुदृढ़। | सामान्यतः नर्म व भंगुर। | Na, K चाकू से कटने योग्य नर्म धातुएं हैं; हीरा संसार का कठोरतम पदार्थ है। |
| चमक | धात्विक चमक होती है। | चमकहीन (धुंधली)। | आयोडीन अधातु होते हुए भी चमकदार क्रिस्टल बनाती है। |
| विद्युत चालकता | विद्युत की सुचालक। | विद्युत की कुचालक। | कार्बन का अपररूप ग्रेफाइट विद्युत का उत्तम सुचालक है। |
| गलनांक/क्वथनांक | अत्यधिक उच्च। | अपेक्षाकृत निम्न। | Ga, Cs हथेली पर पिघल जाती हैं; हीरा/ग्रेफाइट के गलनांक अति उच्च हैं। |
2. रासायनिक गुणधर्मों में अंतर:
- धातुएं विद्युत धनात्मक होती हैं (इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन बनाती हैं); अधातुएं विद्युत ऋणात्मक होती हैं (इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर ऋणायन बनाती हैं)।
- धातुओं के ऑक्साइड क्षारीय या उभयधर्मी होते हैं तथा लाल लिटमस को नीला करते हैं; अधातुओं के ऑक्साइड अम्लीय या उदासीन होते हैं और नीले लिटमस को लाल करते हैं।
- धातुएं तनु अम्लों से क्रिया करके हाइड्रोजन गैस मुक्त करती हैं; अधातुएं तनु अम्लों से हाइड्रोजन विस्थापित नहीं कर सकतीं।
- धातुएं अपचायक की भांति व्यवहार करती हैं; अधातुएं सामान्यतः ऑक्सीकारक होती हैं।
- धातुएं क्लोरीन के साथ आयनिक क्लोराइड बनाती हैं; अधातुएं सहसंयोजक क्लोराइड बनाती हैं।
ऐल्युमिनियम अत्यधिक क्रियाशील धातु है। इसका निष्कर्षण उसके मुख्य अयस्क बॉक्साइट (Al2O3·2H2O) से किया जाता है:
1. बेयर प्रक्रम (Bayer's Process) द्वारा शुद्ध ऐलुमिना प्राप्त करना:
बॉक्साइट को सांद्र NaOH विलयन के साथ गर्म करने पर सोडियम ऐल्युमिनेट बनता है। छनन के बाद कार्बन डाइऑक्साइड प्रवाहित कर शुद्ध Al(OH)3 अवक्षेपित किया जाता है, जिसे 1200°C पर गर्म करके शुद्ध निर्जल ऐलुमिना (Al2O3) प्राप्त होता है।
2. हॉल-हेरॉल्ट विद्युत-अपघटनी अपचयन प्रक्रम:
- विद्युत-अपघटनी सेल: इस्पात का एक बड़ा टैंक होता है जिसकी भीतरी सतह पर कार्बन (ग्रेफाइट) का अस्तर लगा होता है, जो कैथोड का कार्य करता है। टैंक में ऊपर से लटकी कार्बन की छड़ें एनोड का कार्य करती हैं।
- विद्युत-अपघट्य का संघटन: शुद्ध ऐलुमिना का गलनांक बहुत उच्च (लगभग 2050°C) होता है और यह विद्युत का दुर्बल चालक है। अतः इसमें क्रायोलाइट (Na3AlF6) तथा फ्लूओरस्पार (CaF2) मिलाया जाता है।
क्रायोलाइट मिलाने के दो उद्देश्य:
(क) यह मिश्रण के गलनांक को 2050°C से घटाकर लगभग 950°C पर ले आता है, जिससे अत्यधिक ईंधन की बचत होती है।
(ख) यह ऐलुमिना की विद्युत चालकता में भारी वृद्धि करता है।
रासायनिक अभिक्रियाएं:
एनोड पर (ऑक्सीकरण): 2O2- → O2 + 4e- तथा C + O2 → CO2↑
(एनोड की कार्बन छड़ें ऑक्सीजन से जलकर CO2 बनाती हैं, अतः उन्हें समय-समय पर बदलना पड़ता है)।
यह विशाल अंतर उनके अणुओं के मध्य बनने वाले रासायनिक बंध की प्रकृति के कारण है:
| विशेषता | सोडियम क्लोराइड (NaCl) | कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl4) |
|---|---|---|
| आबंधन का प्रकार | आयनिक (विद्युत-संयोजी) बंध (Na+ और Cl- के बीच)। | सहसंयोजक बंध (इलेक्ट्रॉनों के समान साझे द्वारा)। |
| आंतराण्विक बल | विपरीत आयनों के मध्य अत्यधिक प्रबल स्थिरवैद्युत आकर्षण बल। | उदासीन अणुओं के मध्य अत्यंत दुर्बल वांडरवाल्स बल। |
| गलनांक एवं क्वथनांक | अत्यधिक उच्च (गलनांक: 1074 K / 801°C)। | अत्यंत निम्न (गलनांक: 250 K / -23°C, कमरे के ताप पर उड़ने वाला द्रव)। |
| विद्युत चालकता | गलित/जलीय अवस्था में मुक्त आयनों की उपस्थिति से उत्तम चालक। | उदासीन अणु होने के कारण आयनों का पूर्ण अभाव; विद्युत का पूर्ण कुचालक। |
सक्रियता श्रेणी में धातुओं की स्थिति उनके निष्कर्षण की रासायनिक विधि को सीधे निर्धारित करती है:
1. निम्न सक्रियता वाली धातुओं का निष्कर्षण (पारा व तांबा):
इनके ऑक्साइड बहुत कम स्थाई होते हैं। इन्हें अतिरिक्त रासायनिक अपचायकों (कार्बन आदि) की आवश्यकता नहीं होती; केवल वायु में गर्म करने पर ये स्वतः अपचयित हो जाती हैं:
- सिनेबार से पारा (Hg):
2HgS + 3O2 →Δ 2HgO + 2SO2↑ (भर्जन)2HgO →अधिक ऊष्मा 2Hg + O2↑ (स्वतः तापीय अपचयन)
- कॉपर ग्लान्स से तांबा (Cu):
2Cu2S + 3O2 →Δ 2Cu2O + 2SO2↑2Cu2O + Cu2S →Δ 6Cu + SO2↑ (स्वतः अपचयन)
2. मध्यम सक्रियता वाली धातुओं का निष्कर्षण (जिंक व लोहा):
ये प्रकृति में सामान्यतः सल्फाइड या कार्बोनेट अयस्कों के रूप में पाई जाती हैं। इनके ऑक्साइडों को धातु में बदलने हेतु कार्बन (कोक) या अधिक सक्रिय धातु जैसे शक्तिशाली रासायनिक अपचायक की अनिवार्य आवश्यकता होती है:
- जिंक का निष्कर्षण:
भर्जन: 2ZnS + 3O2 →Δ 2ZnO + 2SO2↑निस्तापन: ZnCO3 →Δ ZnO + CO2↑कार्बन द्वारा अपचयन: ZnO + C →Δ Zn + CO↑
- लोहे का वात्या भट्ठी में अपचयन: कार्बन मोनोऑक्साइड द्वारा हेमेटाइट का अपचयन:
Fe2O3 + 3CO → 2Fe + 3CO2↑
संक्षारण से प्रतिवर्ष राष्ट्र को अरबों रुपये की धातु क्षति होती है। इसे रोकने के प्रमुख वैज्ञानिक उपाय निम्नलिखित हैं:
- 1. अवरोधक सुरक्षा (रंग-रोगन, तेल या ग्रीस लगाना): लोहे की सतह पर पेंट, वार्निश अथवा ग्रीस की एक जल-अभेद्य परत लगा दी जाती है। यह धातु की सतह को सीधे वायुमंडलीय ऑक्सीजन और नमी के भौतिक संपर्क में आने से रोक देती है।
- 2. यशदलेपन (Galvanisation): साफ किए गए लोहे अथवा इस्पात की वस्तुओं को पिघले हुए जस्ते (जिंक, लगभग 450°C) में डुबोया जाता है। सतह पर बनी जिंक की परत लोहे से पहले स्वयं बलिदान होकर (ZnO बनाकर) लोहे की रक्षा करती है।
- 3. विद्युत-लेपन (Electroplating): विद्युत-अपघटन द्वारा संक्षारण-संवेदनशील धातु पर टिन, निकेल अथवा क्रोमियम जैसी चमकदार और संक्षारण-प्रतिरोधी धातुओं की पतली परत चढ़ाई जाती है (जैसे खाद्य पदार्थों के डिब्बों पर टिन की परत)।
- 4. ऐनोडीकरण (Anodising): विशेष रूप से ऐल्युमिनियम के लिए। ऐल्युमिनियम को सल्फ्यूरिक अम्ल के सेल में एनोड बनाकर उस पर विद्युत द्वारा Al2O3 की एक मोटी, अभेद्य सुरक्षात्मक झिल्ली विकसित की जाती है।
- 5. कैथोडिक / उत्सर्ग सुरक्षा (Cathodic Protection): भूमिगत तेल/गैस पाइपलाइनों और समुद्री जहाजों के पेंदे को संक्षारण से बचाने के लिए उन्हें एक सुचालक तार द्वारा मैग्नीशियम या जिंक के बड़े ब्लॉकों से जोड़ दिया जाता है। चूंकि मैग्नीशियम लोहे से अधिक क्रियाशील है, अतः सारा ऑक्सीकरण मैग्नीशियम पर होता है और लोहा कैथोड बनकर पूरी तरह सुरक्षित रहता है।
- 6. मिश्रधातु बनाना (Alloying): धातु के आंतरिक परमाण्विक जालक को बदलकर उसमें संक्षारण-रोधी गुण उत्पन्न करना। जैसे साधारण लोहे में क्रोमियम और निकेल मिलाकर 'स्टेनलेस स्टील' बनाया जाता है, जिसमें वायु या जल का कोई प्रभाव नहीं होता।
तत्वों एवं यौगिकों की चरणबद्ध पहचान:
- तीखी गंध वाली गैस 'B' जो लाल लिटमस को नीला करती है, वह अवश्य ही एक क्षारीय गैस अमोनिया (NH3) है।
- अमोनिया धातु नाइट्राइड के जल-अपघटन से बनती है। अतः यौगिक 'A' धातु नाइट्राइड है।
- नाइट्रोजन के साथ सीधे गर्म करने पर नाइट्राइड बनाने वाली सबसे प्रमुख धातु मैग्नीशियम (Mg) है।
रासायनिक समीकरणों द्वारा पुष्टि:
- चरण 1 (यौगिक A का निर्माण): मैग्नीशियम धातु को नाइट्रोजन गैस में गर्म करने पर मैग्नीशियम नाइट्राइड बनता है:
3Mg(s) + N2(g) →Δ Mg3N2(s) [यौगिक A]
- चरण 2 (यौगिक B तथा C का निर्माण): मैग्नीशियम नाइट्राइड जल से क्रिया करके अमोनिया गैस तथा मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड बनाता है:
Mg3N2(s) + 6H2O(l) → 3Mg(OH)2(s) [यौगिक C] + 2NH3(g)↑ [गैस B]
अंतिम परिणाम:
• धातु M = मैग्नीशियम (Mg)
• यौगिक A = मैग्नीशियम नाइट्राइड (Mg3N2)
• गैस B = अमोनिया (NH3)
• यौगिक C = मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड [Mg(OH)2 / मिल्क ऑफ मैग्नीशिया]।
(i) स्कूल की घंटियां धातुओं की बनाई जाती हैं, लकड़ी की नहीं।
(ii) भोजन रखने वाले डिब्बों पर टिन की परत चढ़ाई जाती है, जिंक की नहीं।
(iii) तांबे के बर्तनों पर नींबू या इमली का रस रगड़ने से वे पुनः क्यों चमकने लगते हैं?
(iv) सोडियम क्लोराइड ठोस अवस्था में बिजली का संचालन नहीं करता, परंतु जल में घोलने पर करता है।
(v) आभूषण बनाने हेतु प्लैटिनम, सोना और चांदी का ही उपयोग क्यों किया जाता है?
- (i) घंटियां धातुओं की क्यों होती हैं: धातुएं ध्वानिक (Sonorous) होती हैं। जब किसी ठोस हथौड़े से धातु पर आघात किया जाता है, तो उसके क्रिस्टल जालक में कंपन उत्पन्न होने से एक गूंजने वाली तीव्र व स्पष्ट ध्वनि निकलती है, जो लकड़ी में संभव नहीं है।
- (ii) डिब्बों पर टिन की परत क्यों: जिंक सक्रियता श्रेणी में टिन की तुलना में अधिक क्रियाशील है। यदि डिब्बों पर जिंक की परत होगी, तो भोजन में उपस्थित कार्बनिक अम्ल जिंक से क्रिया कर विषैले यौगिक बना देंगे जिससे भोजन विषाक्त हो जाएगा। टिन अत्यंत कम क्रियाशील होने से भोजन से कोई क्रिया नहीं करता।
- (iii) तांबे के बर्तनों पर नींबू रगड़ना: पुराने तांबे के बर्तनों पर वायुमंडलीय गैसों से क्रिया के कारण क्षारीय कॉपर कार्बोनेट [CuCO3·Cu(OH)2] की एक बदरंग हरी परत जम जाती है। नींबू या इमली में उपस्थित सिट्रिक या टार्टरिक अम्ल इस क्षारीय परत को घोलकर घुलनशील लवण बना देते हैं, जो पानी से धोने पर बह जाता है और शुद्ध चमकीला तांबा बाहर निकल आता है।
- (iv) सोडियम क्लोराइड की चालकता: ठोस NaCl में आयन मजबूत स्थिरवैद्युत बलों से अपने निश्चित जालक बिंदुओं पर जकड़े होते हैं और गति नहीं कर सकते। जल में घोलने पर जल के ध्रुवीय अणु आयनों को पृथक कर देते हैं, जिससे स्वतंत्र गतिशील आयन उत्पन्न हो जाते हैं और विद्युत धारा का संवहन करते हैं।
- (v) आभूषणों में Au, Ag, Pt का प्रयोग: ये धातुएं सक्रियता श्रेणी में सबसे नीचे स्थित उत्कृष्ट धातुएं हैं। ये अत्यधिक चमकदार होती हैं तथा हवा, पानी और अम्लों के प्रति पूर्णतः अक्रिय होती हैं, जिससे इनमें कभी जंग या धुंधलापन नहीं आता और इनकी चमक पीढ़ियों तक स्थायी बनी रहती है। साथ ही ये अत्यधिक तन्य और आघातवर्ध्य हैं।
मानव सभ्यता का इतिहास ही धातुओं के विकास का इतिहास रहा है—ताम्र पाषाण युग से लेकर कांस्य युग, लौह युग और आज के आधुनिक मिश्रधातु युग तक। धातुएं किसी भी राष्ट्र की आर्थिक समृद्धि और औद्योगिक संप्रभुता की रीढ़ हैं:
- 1. अवसंरचना, निर्माण एवं परिवहन उद्योग:
• लोहा एवं इस्पात (Steel): पुलों, बहुमंजिला इमारतों, रेलवे ट्रैकों, समुद्री जहाजों, रेलगाड़ियों और भारी कारखानों की आधारभूत संरचना केवल इस्पात की विशाल सामर्थ्य पर टिकी है।
• ऐल्युमिनियम: अपने अत्यंत हल्के भार और उच्च मजबूती के कारण यह विमानन (हवाई जहाज), अंतरिक्ष रॉकेट, हाई-स्पीड ट्रेनों और ऑटोमोबाइल उद्योग का प्रमुख आधार है। - 2. ऊर्जा एवं विद्युत क्रांति:
• तांबा (Cu) और ऐल्युमिनियम (Al) विद्युत के उत्कृष्ट चालक होने के कारण संपूर्ण वैश्विक पावर ग्रिड, जनरेटरों, विद्युत मोटरों, ट्रांसफॉर्मरों और घरेलू तारों की धुरी हैं।
• टंगस्टन का उपयोग अपने 3380°C के उच्चतम गलनांक के कारण बिजली के बल्बों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के फिलामेंट में होता है। - 3. अंतरिक्ष, परमाणु एवं रक्षा प्रौद्योगिकी (रणनीतिक महत्व):
• टाइटेनियम (Ti) को 'रणनीतिक धातु' कहा जाता है क्योंकि यह स्टील जैसी मजबूत परंतु भार में आधी होती है और अंतरिक्ष यानों व युद्धक विमानों में प्रयुक्त होती है।
• यूरेनियम और थोरियम परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में विद्युत उत्पादन और रक्षा आवश्यकताओं के नाभिकीय ईंधन हैं। - 4. इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्प्यूटर चिप उद्योग:
• यद्यपि सिलिकॉन अर्धचालक है, परंतु कंप्यूटर चिप्स और मदरबोर्डों में अति-सूक्ष्म संपर्कों (Micro-connections) के लिए सोना (Au) और चांदी (Ag) का अनिवार्य उपयोग होता है क्योंकि वे जंग-मुक्त रहते हैं।
• लिथियम (Li) आधुनिक मोबाइल, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की रीचार्जेबल बैटरी का हृदय है।
निष्कर्ष: संक्षेप में, धातुएं और उनकी अत्याधुनिक मिश्रधातुएं आधुनिक विश्व की रीढ़ हैं। धातुकर्म के सतत वैज्ञानिक विकास और उनके पुनर्चक्रण (Recycling) के बिना 21वीं सदी के तकनीकी विकास और हरित ऊर्जा संक्रमण की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
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