Chapter 1. अर्थव्यवस्था एवं इसके विकास का इतिहास | BSEB 10 Economics Subjective


BSEB कक्षा 10 अर्थशास्त्र

अध्याय 1: अर्थव्यवस्था एवं इसके विकास का इतिहास (सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री)

भाग 1: 50 एक-पंक्ति उत्तरीय प्रश्न (One-Liners)

1. अर्थव्यवस्था (Economy) किसे कहते हैं?

अर्थव्यवस्था समाज की सभी आर्थिक क्रियाओं का वह संगठित ढांचा है जिसके द्वारा लोग कार्य करके अपनी आजीविका अर्जित करते हैं।

2. अर्थशास्त्री आर्थर लुईस के अनुसार अर्थव्यवस्था का क्या कार्य है?

"अर्थव्यवस्था का उद्देश्य मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए संसाधनों का कुशलतम उपयोग करना है।"

3. ब्राउन (A. J. Brown) के अनुसार अर्थव्यवस्था की परिभाषा क्या है?

"अर्थव्यवस्था आजीविका अर्जन की एक प्रणाली है" (Economy is a system of earning livelihood)।

4. उपनिवेश (Colony) किसे कहते हैं?

जब कोई शक्तिशाली देश किसी अन्य देश पर अपना राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण स्थापित कर उसके संसाधनों का दोहन अपने हित में करता है, तो शासित देश उपनिवेश कहलाता है।

5. भारत लगभग कितने वर्षों तक ब्रिटिश शासन का उपनिवेश रहा?

लगभग 200 वर्षों तक (1757 के प्लासी युद्ध से 1947 तक)।

6. 'फूट डालो और शासन करो' (Divide and Rule) की नीति किसने अपनाई थी?

ब्रिटिश (अंग्रेज) शासकों ने।

7. प्राचीन काल में भारत को उसकी अतुलनीय संपन्नता के कारण क्या कहा जाता था?

'सोने की चिड़िया' (Golden Bird)।

8. अर्थव्यवस्था को उत्पादन के साधनों के स्वामित्व के आधार पर कितने भागों में बांटा जाता है?

तीन भागों में—पूंजीवादी, समाजवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्था।

9. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था (Capitalist Economy) किसे कहते हैं?

वह अर्थव्यवस्था जहाँ उत्पादन के साधनों का स्वामित्व निजी व्यक्तियों के पास होता है और इसका मुख्य उद्देश्य निजी लाभ कमाना होता है।

10. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था वाले किन्हीं दो प्रमुख देशों के नाम लिखें।

संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और जापान।

11. समाजवादी अर्थव्यवस्था (Socialist Economy) किसे कहते हैं?

वह अर्थव्यवस्था जहाँ उत्पादन के साधनों का स्वामित्व एवं नियंत्रण समाज या सरकार के पास होता है और इसका उद्देश्य लोक-कल्याण होता है।

12. समाजवादी अर्थव्यवस्था के दो प्रमुख उदाहरण कौन-से देश हैं?

रूस और चीन (या क्यूबा)।

13. मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) क्या है?

वह अर्थव्यवस्था जहाँ पूंजीवाद और समाजवाद का सह-अस्तित्व होता है तथा उत्पादन के साधनों पर निजी व्यक्तियों और सरकार दोनों का नियंत्रण होता है।

14. भारत में किस प्रकार की अर्थव्यवस्था पाई जाती है?

मिश्रित अर्थव्यवस्था।

15. व्यावसायिक संरचना के आधार पर अर्थव्यवस्था को कितने क्षेत्रों में बांटा जाता है?

तीन क्षेत्रों में—प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र।

16. प्राथमिक क्षेत्र (Primary Sector) को अन्य किस नाम से जाना जाता है?

कृषि क्षेत्र (Agriculture Sector)।

17. प्राथमिक क्षेत्र के अंतर्गत कौन-कौन सी गतिविधियां आती हैं?

कृषि, पशुपालन, मछली पालन, वानिकी (जंगल) और खनन।

18. द्वितीयक क्षेत्र (Secondary Sector) को अन्य किस नाम से पुकारा जाता है?

औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Sector)।

19. द्वितीयक क्षेत्र के अंतर्गत कौन-सी प्रमुख क्रियाएं आती हैं?

विनिर्माण (कारखाने), निर्माण (सड़क/भवन निर्माण), गैस, बिजली और जलापूर्ति।

20. तृतीयक क्षेत्र (Tertiary Sector) को अन्य किस नाम से जाना जाता है?

सेवा क्षेत्र (Service Sector)।

21. तृतीयक क्षेत्र के दो उदाहरण दें।

बैंकिंग और परिवहन (या संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य)।

22. आर्थिक विकास (Economic Development) क्या है?

यह एक ऐसी दीर्घकालिक प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत किसी देश की वास्तविक राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में निरंतर वृद्धि होती है तथा संस्थागत व सामाजिक संरचना में सकारात्मक बदलाव आता है।

23. आर्थिक वृद्धि (Economic Growth) शब्द का प्रयोग सामान्यतः किन देशों के संदर्भ में होता है?

विकसित देशों के संदर्भ में।

24. आर्थिक विकास (Economic Development) शब्द का प्रयोग सामान्यतः किन देशों के संदर्भ में होता है?

विकासशील एवं अल्पविकसित देशों के संदर्भ में।

25. समावेशी विकास (Inclusive Growth) किसे कहते हैं?

विकास की वह प्रक्रिया जिसमें समाज के सभी वर्गों (विशेषकर वंचित एवं निर्धन वर्ग) को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाए और लाभ सभी तक पहुंचे।

26. सतत या पोषणीय विकास (Sustainable Development) क्या है?

ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ भावी पीढ़ियों के संसाधनों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करे।

27. आर्थिक नियोजन (Economic Planning) का क्या अर्थ है?

राष्ट्र की प्राथमिकताओं के अनुसार देश के उपलब्ध प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों का विभिन्न विकासात्मक गतिविधियों में समयबद्ध एवं सुनियोजित उपयोग करना।

28. भारत में योजना आयोग (Planning Commission) का गठन कब हुआ था?

15 मार्च 1950 को।

29. योजना आयोग के पदेन अध्यक्ष (Ex-officio Chairman) कौन होते थे?

भारत के प्रधानमंत्री।

30. भारत के योजना आयोग के प्रथम अध्यक्ष कौन थे?

पंडित जवाहरलाल नेहरू।

31. भारत में योजना आयोग को समाप्त कर किस नए आयोग का गठन किया गया?

नीति आयोग (NITI Aayog)।

32. नीति आयोग की स्थापना किस तिथि को की गई?

1 जनवरी 2015 को।

33. NITI का पूर्ण रूप (Full Form) क्या है?

National Institution for Transforming India (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान)।

34. राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) का गठन कब किया गया था?

6 अगस्त 1952 को।

35. NDC का पूर्ण रूप क्या है?

National Development Council (राष्ट्रीय विकास परिषद)।

36. भारत की पहली पंचवर्षीय योजना की कार्यावधि क्या थी?

1951 से 1956 तक।

37. राष्ट्रीय आय (National Income) किसे कहते हैं?

किसी देश में एक वर्ष की अवधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य को।

38. प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) का सूत्र क्या है?

प्रति व्यक्ति आय = देश की कुल राष्ट्रीय आय ÷ कुल जनसंख्या।

39. विश्व बैंक की विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार विकसित देश कौन-से हैं?

वे देश जिनकी प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय एक निश्चित उच्च सीमा से अधिक होती है।

40. मानव विकास सूचकांक (HDI) का प्रतिपादन किसने किया था?

प्रसिद्ध पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब-उल-हक ने (यूएनडीपी के तहत 1990 में)।

41. HDI का पूर्ण रूप क्या है?

Human Development Index (मानव विकास सूचकांक)।

42. मानव विकास सूचकांक (HDI) के तीन प्रमुख घटक (मापदंड) कौन-से हैं?

जीवन प्रत्याशा (स्वास्थ्य), शैक्षिक प्राप्ति (ज्ञान) और जीवन स्तर (प्रति व्यक्ति आय)।

43. PQLI का पूर्ण रूप क्या है?

Physical Quality of Life Index (जीवन का भौतिक गुणवत्ता सूचकांक)।

44. PQLI की संकल्पना का प्रतिपादन किसने किया था?

मॉरिस डी. मॉरिस (Morris D. Morris) ने।

45. आधारभूत संरचना (Infrastructure) किसे कहते हैं?

उन सभी सुविधाओं एवं सेवाओं का समुच्चय जो देश के आर्थिक विकास की रीढ़ होते हैं (जैसे—सड़क, बिजली, परिवहन, संचार, स्कूल, अस्पताल)।

46. "बिहार के विकास के बिना भारत का विकास संभव नहीं है" यह कथन किसका है?

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का।

47. बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य का गठन कब हुआ?

15 नवंबर 2000 को।

48. उत्तरी बिहार की सबसे विनाशकारी प्राकृतिक आपदा कौन-सी है?

बाढ़ (विशेषकर कोसी और गंडक नदी की बाढ़)।

49. बिहार का शोक (Sorrow of Bihar) किस नदी को कहा जाता है?

कोसी नदी को।

50. बीमारू (BIMARU) राज्यों में कौन-कौन से राज्य शामिल माने गए हैं?

बिहार (BI), मध्य प्रदेश (MA), राजस्थान (R) और उत्तर प्रदेश (U)।

भाग 2: 25 लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)

प्रश्न 1. अर्थव्यवस्था किसे कहते हैं? इसके दो प्रमुख कार्य कौन-से हैं?
अर्थव्यवस्था समाज की सभी आर्थिक क्रियाओं (उत्पादन, उपभोग, विनिमय, वितरण) का एक ऐसा संगठित ढांचा है जिसके माध्यम से लोग अपनी आजीविका चलाते हैं।
इसके दो प्रमुख कार्य हैं:
  • लोगों की आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए विभिन्न वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन करना।
  • लोगों को आजीविका अर्जन के लिए रोजगार एवं आय के अवसर प्रदान करना।
प्रश्न 2. ब्रिटिश शासन द्वारा भारत के आर्थिक शोषण की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।
अंग्रेजों ने भारत को केवल एक कच्चा माल निर्यातक देश और ब्रिटेन में निर्मित औद्योगिक वस्तुओं का एक बड़ा बाजार (उपभोक्ता) बनाकर रख दिया। उन्होंने 'फूट डालो और शासन करो' की नीति अपनाई, कृषि पर भारी लगान थोपा और भारत के समृद्ध हस्तशिल्प व हथकरघा उद्योग को बर्बाद कर दिया, जिससे भारत आर्थिक रूप से पंगु हो गया।
प्रश्न 3. पूंजीवादी और समाजवादी अर्थव्यवस्था में मुख्य अंतर क्या है?
  • पूंजीवादी अर्थव्यवस्था: उत्पादन के साधनों (जमीन, कारखाने, पूंजी) पर निजी व्यक्तियों का मालिकाना हक होता है और इसका एकमात्र लक्ष्य 'निजी लाभ कमाना' होता है (जैसे—अमेरिका)।
  • समाजवादी अर्थव्यवस्था: उत्पादन के साधनों पर पूरे समाज या राज्य (सरकार) का नियंत्रण होता है और इसका मुख्य उद्देश्य 'जन-कल्याण एवं सामाजिक समानता' स्थापित करना होता है (जैसे—चीन, क्यूबा)।
प्रश्न 4. मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) की मुख्य विशेषताएं लिखिए।
मिश्रित अर्थव्यवस्था में पूंजीवाद और समाजवाद दोनों की अच्छी विशेषताओं का मिश्रण होता है:
  • यहाँ सार्वजनिक क्षेत्र (सरकारी उपक्रम) और निजी क्षेत्र दोनों कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करते हैं।
  • आधारभूत एवं भारी उद्योग (जैसे रेलवे, रक्षा) सरकार के अधीन होते हैं, जबकि उपभोक्ता वस्तुएं निजी क्षेत्र द्वारा बनाई जाती हैं। भारत इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।
प्रश्न 5. प्राथमिक क्षेत्र (Primary Sector) किसे कहते हैं? सोदाहरण समझाइए।
प्राथमिक क्षेत्र अर्थव्यवस्था का वह क्षेत्र है जहाँ उत्पादन की प्रक्रिया सीधे प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर निर्भर करती है। इसे 'कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र' भी कहा जाता है। उदाहरणार्थ—खेती करना, पशुपालन, मछली पालन, रेशम कीट पालन, वानिकी और खनिजों का खनन।
प्रश्न 6. द्वितीयक क्षेत्र (Secondary Sector) से क्या अभिप्राय है?
जब प्राथमिक क्षेत्र से प्राप्त कच्चे माल को मशीनों, कारखानों और विनिर्माण प्रक्रियाओं के माध्यम से अधिक उपयोगी और मूल्यवान वस्तुओं में बदला जाता है, तो उसे द्वितीयक क्षेत्र कहते हैं। इसे 'औद्योगिक क्षेत्र' भी कहते हैं। जैसे—गन्ने से चीनी बनाना, कपास से कपड़ा बनाना, लोहा-इस्पात उद्योग और भवन निर्माण।
प्रश्न 7. तृतीयक क्षेत्र (Tertiary Sector) को 'सेवा क्षेत्र' क्यों कहा जाता है?
तृतीयक क्षेत्र प्रत्यक्ष रूप से किसी भौतिक वस्तु का उत्पादन नहीं करता, बल्कि यह प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रों की उत्पादन प्रक्रियाओं को सुचारु बनाने तथा समाज के जीवन को सुगम बनाने वाली अमूर्त सेवाएं प्रदान करता है। जैसे—माल को ढोने के लिए परिवहन, लेन-देन के लिए बैंकिंग, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार।
प्रश्न 8. आर्थिक वृद्धि (Economic Growth) और आर्थिक विकास (Economic Development) में क्या अंतर है?
  • आर्थिक वृद्धि: यह केवल राष्ट्रीय आय और उत्पादन के परिमाणात्मक (मात्रात्मक) विस्तार को दर्शाती है। इसका प्रयोग प्रायः पहले से विकसित और अमीर देशों के लिए किया जाता है।
  • आर्थिक विकास: यह एक व्यापक अवधारणा है जिसमें आय में वृद्धि के साथ-साथ समाज की गरीबी, बेरोजगारी और असमानता में कमी तथा संरचनात्मक सुधार (गुणात्मक परिवर्तन) भी शामिल होते हैं। यह विकासशील देशों से संबंधित है।
प्रश्न 9. सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development) का क्या महत्व है?
प्राकृतिक संसाधन (जैसे कोयला, पेट्रोलियम, शुद्ध जल, वन) सीमित हैं। सतत विकास का सिद्धांत यह सिखाता है कि हम आज अपने विकास की गति को बनाए रखते हुए इन संसाधनों का अंधाधुंध दोहन न करें, पर्यावरण को प्रदूषित न करें, ताकि हमारी आने वाली भावी पीढ़ियां भी इन संसाधनों का उपयोग कर सम्मानजनक जीवन जी सकें।
प्रश्न 10. समावेशी विकास (Inclusive Growth) से आप क्या समझते हैं?
समावेशी विकास का आशय ऐसे आर्थिक विकास से है जिसका लाभ समाज के किसी एक धनी वर्ग या क्षेत्र तक सीमित न रहकर समाज के अंतिम पायदान पर खड़े निर्धन, वंचित, पिछड़े, महिला और सीमांत वर्ग तक समान रूप से पहुंचे। इसमें सभी को विकास की मुख्यधारा में शामिल किया जाता है।
प्रश्न 11. आर्थिक नियोजन (Economic Planning) के दो प्रमुख उद्देश्य बताइए।
  • देश के सीमित प्राकृतिक, मानवीय और पूंजीगत संसाधनों का राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार अनुकूलतम उपयोग कर आर्थिक वृद्धि दर को तेज करना।
  • देश से गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी को समाप्त कर सामाजिक न्याय और संतुलित क्षेत्रीय विकास स्थापित करना।
प्रश्न 12. योजना आयोग पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
भारत में आर्थिक नियोजन हेतु 15 मार्च 1950 को मंत्रिमंडल के एक प्रस्ताव द्वारा योजना आयोग का गठन किया गया। यह एक गैर-संवैधानिक और सलाहकारी निकाय था जिसके पदेन अध्यक्ष देश के प्रधानमंत्री होते थे। इसने देश के विकास के लिए 12 पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं। अगस्त 2014 में इसे समाप्त कर दिया गया।
प्रश्न 13. राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) का क्या कार्य था?
6 अगस्त 1952 को गठित राष्ट्रीय विकास परिषद का मुख्य कार्य योजना आयोग द्वारा तैयार की गई पंचवर्षीय योजनाओं के प्रारूप की समीक्षा करना, उन पर विचार-विमर्श करना और उन्हें अंतिम रूप से स्वीकृति (मंजूरी) प्रदान करना था। इसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य शामिल होते थे।
प्रश्न 14. नीति आयोग (NITI Aayog) क्या है? यह योजना आयोग से किस प्रकार भिन्न है?
भारत सरकार ने 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग के स्थान पर 'नीति आयोग' की स्थापना की। योजना आयोग 'ऊपर से नीचे' (Top-to-Bottom) दृष्टिकोण पर काम करता था और राज्यों पर योजनाएं थोपता था, जबकि नीति आयोग 'सहकारी संघवाद' (Cooperative Federalism) और 'नीचे से ऊपर' (Bottom-to-Top) मॉडल पर कार्य करता है, जहाँ राज्यों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाती है।
प्रश्न 15. राष्ट्रीय आय (National Income) और प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) में क्या संबंध है?
दोनों एक-दूसरे से सीधे जुड़े हैं। राष्ट्रीय आय देश के कुल उत्पादन का मौद्रिक मूल्य है, जबकि प्रति व्यक्ति आय उस आय का प्रति नागरिक औसत है। यदि देश की राष्ट्रीय आय जनसंख्या की तुलना में तेजी से बढ़ती है, तो प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ती है। परंतु यदि राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर जनसंख्या वृद्धि दर से कम हो, तो प्रति व्यक्ति आय घट जाएगी।
प्रश्न 16. मानव विकास सूचकांक (HDI) क्या है? इसके मुख्य घटक कौन-से हैं?
मानव विकास सूचकांक (HDI) संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा विभिन्न देशों में मानवीय विकास के स्तर को मापने का एक समग्र सांख्यिकीय पैमाना है। इसके तीन प्रमुख घटक हैं:
  • जीवन प्रत्याशा सूचकांक: जन्म के समय संभावित औसत आयु (स्वास्थ्य का पैमाना)।
  • शिक्षा सूचकांक: स्कूली शिक्षा के औसत व प्रत्याशित वर्ष (ज्ञान का पैमाना)।
  • जीवन स्तर सूचकांक: प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (क्रय शक्ति का पैमाना)।
प्रश्न 17. आधारभूत संरचना (Infrastructure) का आर्थिक विकास में क्या महत्व है?
आधारभूत संरचना (जैसे ऊर्जा, सड़कें, बंदरगाह, रेलवे, दूरसंचार, स्कूल, अस्पताल) किसी देश के आर्थिक तंत्र का कंकाल होती हैं। यदि सड़कें अच्छी न हों और 24 घंटे बिजली न मिले, तो कारखाने और कृषि कार्य ठप हो जाएंगे। सुदृढ़ आधारभूत संरचना उत्पादन लागत घटाती है, निवेश को आकर्षित करती है और विकास को तीव्र गति प्रदान करती है।
प्रश्न 18. झारखंड विभाजन (15 नवंबर 2000) से बिहार की अर्थव्यवस्था को क्या क्षति हुई?
विभाजन के फलस्वरूप तत्कालीन एकीकृत बिहार के लगभग सभी खनिज भंडार (कोयला, लोहा, बॉक्साइट, अभ्रक) और विशाल भारी उद्योग (जैसे जमशेदपुर का टिस्को, बोकारो स्टील प्लांट, भारी इंजीनियरिंग निगम) नवगठित झारखंड राज्य के हिस्से में चले गए। बिहार के पास केवल बाढ़ और सूखे से ग्रस्त उपजाऊ मैदानी कृषि भूमि और घनी आबादी ही शेष बची।
प्रश्न 19. बिहार में कृषि की प्रमुख दो समस्याएं क्या हैं?
  • प्राकृतिक आपदाओं पर निर्भरता: उत्तरी बिहार प्रतिवर्ष कोसी, बागमती जैसी नदियों की विनाशकारी बाढ़ से तबाह होता है, जबकि दक्षिण बिहार मानसूनी अनिश्चितता के कारण सूखे का शिकार रहता है।
  • जोतों का अत्यधिक छोटा आकार: जनसंख्या के भारी दबाव के कारण खेतों का आकार अत्यंत छोटा और बिखरा हुआ है, जिससे आधुनिक मशीनों (ट्रैक्टर, कंबाइन) का किफायती उपयोग नहीं हो पाता।
प्रश्न 20. कोसी नदी को 'बिहार का शोक' क्यों कहा जाता है?
कोसी नदी नेपाल के हिमालयी क्षेत्र से निकलकर उत्तर बिहार के मैदानी भागों में आती है। वर्षा ऋतु में यह भारी मात्रा में गाद (बालू और मिट्टी) लाती है और अपना प्रवाह मार्ग बार-बार बदलती है। इसके कारण हर साल सहरसा, सुपौल, मधेपुरा आदि जिलों में भयानक बाढ़ आती है, जिससे हजारों एकड़ फसल, घर-बार और जन-धन जलमग्न होकर नष्ट हो जाते हैं।
प्रश्न 21. बीमारू (BIMARU) राज्यों की अवधारणा क्या है?
प्रसिद्ध जनसांख्यिकी विशेषज्ञ आशीष बोस ने 1980 के दशक में भारत के चार सबसे पिछड़े राज्यों—बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के शुरुआती अक्षरों को मिलाकर 'BIMARU' शब्द गढ़ा था। इन राज्यों में उच्च जनसंख्या वृद्धि, अत्यधिक गरीबी, निम्न साक्षरता दर और स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति के कारण इन्हें यह संज्ञा दी गई थी।
प्रश्न 22. 'गरीबी ही गरीबी को जन्म देती है' इस कथन का क्या आशय है?
रेगनर नर्क्स के अनुसार, एक गरीब व्यक्ति या देश की आय कम होती है, जिससे उसकी बचत क्षमता कम होती है। कम बचत के कारण निवेश कम होता है, जिससे उत्पादन और रोजगार सीमित रहता है। फलस्वरूप, व्यक्ति पुनः गरीब ही बना रहता है। इस प्रकार गरीबी का यह दुश्चक्र अपनी निरंतरता बनाए रखता है।
प्रश्न 23. बिहार में औद्योगिक पिछड़ेपन के दो मुख्य कारण लिखिए।
  • कच्चे माल एवं खनिजों का अभाव: 2000 में विभाजन के बाद सभी महत्वपूर्ण खनिज झारखंड चले गए, जिससे धातु और भारी इंजीनियरिंग आधारित उद्योगों की संभावना समाप्त हो गई।
  • पूंजी निवेश और बिजली का अभाव: निजी निवेशकों के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाएं—जैसे निर्बाध औद्योगिक बिजली, औद्योगिक गलियारे और कानून-व्यवस्था का अभाव रहा।
प्रश्न 24. हरित क्रांति (Green Revolution) का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?
1960 के दशक के उत्तरार्ध में उच्च उत्पादकता वाले बीजों (HYV Seeds), रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और सुनिश्चित सिंचाई के प्रयोग से भारत में खाद्यान्न (विशेषकर गेहूं और चावल) के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। इससे भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना और आयात पर निर्भरता समाप्त हुई।
प्रश्न 25. आर्थिक क्रियाएं (Economic Activities) किसे कहते हैं? इसके प्रमुख प्रकार कौन-से हैं?
वे सभी मानवीय क्रियाकलाप जिनका प्रत्यक्ष संबंध धन, आय और भौतिक संसाधनों के उत्पादन, उपभोग, विनिमय और वितरण से होता है, आर्थिक क्रियाएं कहलाती हैं। इसके प्रमुख चार अंग हैं: उत्पादन (Production), उपभोग (Consumption), विनिमय (Exchange) और वितरण (Distribution)।

भाग 3: 15 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)

प्रश्न 1. अर्थव्यवस्था किसे कहते हैं? अर्थव्यवस्था की संरचना या ढांचे का तीनों क्षेत्रों (प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक) के संदर्भ में सविस्तार वर्णन कीजिए।

अर्थव्यवस्था किसी देश या समाज की उन सभी संस्थाओं, गतिविधियों और मानवीय प्रयासों का समग्र ताना-बाना है, जो आजीविका कमाने और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन, वितरण और उपभोग से जुड़ी हैं। ए. जे. ब्राउन के शब्दों में, "अर्थव्यवस्था आजीविका अर्जन की एक प्रणाली है।"

अर्थव्यवस्था की संरचना (Structure of Economy)
प्राथमिक क्षेत्र (कृषि क्षेत्र)
  • कृषि व फसल उत्पादन
  • पशुपालन व डेयरी
  • मत्स्य पालन व वानिकी
  • खनन (Mining)
द्वितीयक क्षेत्र (औद्योगिक क्षेत्र)
  • विनिर्माण (कारखाने/उद्योग)
  • भवन, पुल व सड़क निर्माण
  • विद्युत, गैस व जलापूर्ति
  • कुटीर एवं लघु उद्योग
तृतीयक क्षेत्र (सेवा क्षेत्र)
  • परिवहन व संचार
  • बैंकिंग, बीमा व व्यापार
  • शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाएं
  • होटल व पर्यटन
  1. प्राथमिक क्षेत्र (Primary Sector): यह वह क्षेत्र है जहाँ उत्पादन प्रत्यक्ष रूप से प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों (भूमि, जल, वनस्पति, खनिज) पर निर्भर करता है। इसे 'कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र' भी कहते हैं। विकासशील देशों की अधिकांश जनसंख्या इसी क्षेत्र पर आश्रित होती है।
  2. द्वितीयक क्षेत्र (Secondary Sector): इस क्षेत्र में प्राथमिक क्षेत्र से प्राप्त कच्चे माल का रूप बदलकर, मशीनों और मानवीय श्रम की सहायता से उसे अधिक उपयोगी, टिकाऊ और मूल्यवान उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है। इसे 'औद्योगिक क्षेत्र' कहा जाता है। इसमें कुटीर उद्योगों से लेकर भारी कारखाने (कपड़ा मिल, सीमेंट, चीनी, ऑटोमोबाइल) शामिल हैं।
  3. तृतीयक क्षेत्र (Tertiary Sector): यह क्षेत्र किसी भौतिक वस्तु का उत्पादन नहीं करता, बल्कि प्राथमिक और द्वितीयक दोनों क्षेत्रों की गतिविधियों को संचालित करने तथा समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराता है। इसीलिए इसे 'सेवा क्षेत्र' कहते हैं। आधुनिक युग में आर्थिक विकास के साथ इस क्षेत्र का योगदान जीडीपी में सबसे अधिक हो जाता है।
प्रश्न 2. उत्पादन के साधनों के स्वामित्व के आधार पर अर्थव्यवस्था के विभिन्न प्रकारों की तुलनात्मक विवेचना कीजिए।

विश्व के विभिन्न देशों में उत्पादन के साधनों (भूमि, श्रम, पूंजी, संगठन और उद्यम) पर किसका अधिकार है, इस आधार पर अर्थव्यवस्था को तीन प्रमुख रूपों में वर्गीकृत किया जाता है:

तुलना का आधार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था (Capitalism) समाजवादी अर्थव्यवस्था (Socialism) मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy)
स्वामित्व निजी व्यक्तियों और पूंजीपतियों के पास। पूर्णतः राज्य (सरकार) या पूरे समाज के पास। निजी व्यक्तियों और सरकार दोनों का सह-अस्तित्व।
मुख्य उद्देश्य अधिकतम निजी लाभ कमाना। अधिकतम सामाजिक कल्याण और समानता। जन-कल्याण के साथ-साथ निजी लाभ।
मूल्य निर्धारण स्वतंत्र बाजार शक्तियां (मांग और पूर्ति द्वारा)। केंद्रीय नियोजन सत्ता (सरकार द्वारा निर्धारित)। बाजार शक्तियां + सरकार द्वारा मूल्य नियंत्रण (PDS/MSP)।
प्रतियोगिता उत्पादकों के बीच खुली और तीव्र प्रतियोगिता। प्रतियोगिता का पूर्ण अभाव (सरकारी एकाधिकार)। निजी क्षेत्र में प्रतियोगिता, सार्वजनिक में नियंत्रण।
प्रमुख उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, फ्रांस। चीन, क्यूबा, पूर्व सोवियत संघ, उत्तर कोरिया। भारत, ब्राजील, इंडोनेशिया।

विस्तृत विश्लेषण:

  • पूंजीवाद में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नवाचार को बढ़ावा मिलता है, परंतु इसके कारण अमीर और गरीब के बीच की खाई बहुत चौड़ी हो जाती है तथा श्रमिकों का शोषण होता है।
  • समाजवाद में वर्ग-संघर्ष समाप्त होता है और सभी को बुनियादी सुविधाएं (रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा) समान रूप से मिलती हैं, परंतु व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन होता है और प्रतिस्पर्धा न होने से उत्पादन की दक्षता घट जाती है।
  • मिश्रित अर्थव्यवस्था इन दोनों का स्वर्ण-मध्यम मार्ग है। भारत ने स्वतंत्रता के बाद मिश्रित मॉडल को अपनाया ताकि आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक न्याय भी सुनिश्चित हो सके। यहाँ रेलवे, परमाणु ऊर्जा, रक्षा जैसे क्षेत्र सरकार के पास हैं, जबकि वस्त्र, कृषि, होटल, आईटी जैसे क्षेत्र निजी उद्यमियों के लिए खुले हैं।
प्रश्न 3. ब्रिटिश शासन ने भारत की अर्थव्यवस्था को किस प्रकार प्रभावित किया? 'औपनिवेशिक शोषण' की सविस्तार व्याख्या कीजिए।

1757 में प्लासी के युद्ध के बाद भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन प्रारंभ हुआ, जो 1947 तक लगभग दो शताब्दियों तक चला। ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत अपने उत्कृष्ट मलमल, रेशम, मसालों, हस्तशिल्प और सोने-चांदी के संचय के कारण विश्व भर में 'सोने की चिड़िया' के नाम से विख्यात था। परंतु अंग्रेजों ने अपने 200 वर्षों के औपनिवेशिक शासन में भारतीय अर्थव्यवस्था को योजनाबद्ध तरीके से तहस-नहस कर दिया:

  • कृषि का अनैतिक शोषण और पिछड़ापन: अंग्रेजों ने जमींदारी, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी जैसी क्रूर भू-राजस्व प्रणालियां लागू कीं। किसानों पर अत्यधिक लगान थोपा गया। इसके अलावा, ब्रिटेन के कारखानों की जरूरत पूरी करने के लिए खाद्यान्नों के स्थान पर नकदी फसलों (नील, अफीम, कपास, जूट) की जबरन खेती (व्यावसायीकरण) कराई गई, जिसके परिणामस्वरूप देश में बार-बार भीषण अकाल पड़े और लाखों लोग भुखमरी से मरे।
  • हस्तशिल्प और घरेलू कुटीर उद्योगों का विनाश (De-industrialization): ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के बाद वहां की मशीनों से बने सस्ते कपड़ों और सामानों को भारतीय बाजारों में बिना किसी आयात शुल्क के पाट दिया गया। दूसरी ओर, भारत से बाहर जाने वाले तैयार माल पर भारी प्रशुल्क (Tariff) लगा दिए गए। ढाका की मलमल, सूरत के जरी उद्योग और मुर्शिदाबाद के रेशम बुनकरों के हाथ कट गए और वे बेरोजगार होकर कृषि पर बोझ बन गए।
  • कच्चे माल का निर्यातक और तैयार माल का आयातक बनाना: भारत की स्वतंत्र और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था को समाप्त कर उसे केवल इंग्लैंड के कारखानों के लिए कच्चा माल (कपास, लौह अयस्क, चाय) उपलब्ध कराने वाला और वहां से बनकर आए तैयार माल को खरीदने वाला एक लाचार उपभोक्ता बाजार बना दिया गया।
  • धन का निष्कासन (Drain of Wealth): दादाभाई नौरोजी ने अपनी पुस्तक में सिद्ध किया कि किस प्रकार भारत के राजस्व, करों और व्यापारिक बचत का एक विशाल हिस्सा सेना के खर्च, अंग्रेज अफसरों के वेतन, पेंशन और 'होम चार्जेस' के रूप में बिना किसी प्रतिफल के प्रतिवर्ष ब्रिटेन भेजा जाता रहा।

निष्कर्ष: 1947 में जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए, तो देश भुखमरी, अशिक्षा (साक्षरता मात्र 17%), निम्न जीवन प्रत्याशा (लगभग 32 वर्ष) और ठहरे हुए औद्योगिक ढांचे से ग्रस्त एक अत्यंत दरिद्र राष्ट्र था।

प्रश्न 4. आर्थिक विकास (Economic Development) की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए तथा इसके मापन के प्रमुख सूचकांकों की व्याख्या कीजिए।

आर्थिक विकास केवल राष्ट्रीय आय में होने वाली वृद्धि तक सीमित नहीं है। यह एक बहुआयामी और दीर्घकालिक प्रक्रिया है जिसमें उत्पादन तकनीकों में सुधार, आय के न्यायसंगत वितरण, गरीबी, कुपोषण, निरक्षरता और बेरोजगारी के उन्मूलन तथा समाज के समग्र जीवन स्तर में गुणात्मक सुधार को शामिल किया जाता है। सी. पी. किंडल बर्गर के अनुसार, "आर्थिक विकास का अर्थ उत्पादन के साधनों की वृद्धि के साथ-साथ तकनीकी और संस्थागत परिवर्तनों से है।"

आर्थिक विकास को मापने के प्रमुख सूचकांक:

  1. राष्ट्रीय आय (National Income): एक वित्तीय वर्ष में किसी देश के सामान्य निवासियों द्वारा उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य। सामान्यतः जिस देश की वास्तविक राष्ट्रीय आय निरंतर बढ़ती है, उसे विकसित माना जाता है। परंतु यह जनसंख्या वृद्धि और आय के असमान वितरण को नहीं दर्शाती।
  2. प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income): देश की कुल राष्ट्रीय आय को कुल जनसंख्या से विभाजित करने पर प्राप्त औसत आय। विश्व बैंक अपनी विकास रिपोर्ट में विभिन्न देशों की संपन्नता मापने के लिए इसी पैमाने का प्रयोग करता है।
  3. मानव विकास सूचकांक (Human Development Index - HDI): यह सबसे आधुनिक, समग्र और मानवीय मापदंड है जिसे 1990 में अर्थशास्त्री महबूब-उल-हक और प्रो. अमर्त्य सेन के सहयोग से तैयार किया गया। इसमें तीन बुनियादी आयामों का संयुक्त ज्यामितीय औसत निकाला जाता है:
    • स्वास्थ्य (दीर्घायु): जन्म के समय जीवन प्रत्याशा।
    • शिक्षा (ज्ञान): वयस्कों की औसत स्कूली शिक्षा और बच्चों के प्रत्याशित स्कूली वर्ष।
    • जीवन स्तर (क्रय शक्ति): प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI per capita at PPP)।
    HDI का मान 0 से 1 के बीच होता है। 1 के जितना करीब मान होगा, देश उतना ही विकसित माना जाता है।
  4. जीवन का भौतिक गुणवत्ता सूचकांक (PQLI): मॉरिस डी. मॉरिस द्वारा विकसित इस सूचकांक में तीन चरों का औसत निकाला जाता है: शिशु मृत्यु दर (IMR), 1 वर्ष की आयु पर जीवन प्रत्याशा, और बुनियादी साक्षरता दर। इसका मान 1 से 100 के बीच होता है।
प्रश्न 5. आर्थिक नियोजन (Economic Planning) क्या है? भारत में योजना आयोग, राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) और नीति आयोग के ऐतिहासिक रूपांतरण की विस्तृत विवेचना कीजिए।

आर्थिक नियोजन से तात्पर्य किसी देश की केंद्रीय सत्ता द्वारा राष्ट्र के सीमित प्राकृतिक, मानवीय और वित्तीय संसाधनों का प्राथमिकताओं के आधार पर पूर्व-निर्धारित सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को एक निश्चित समयावधि में प्राप्त करने के लिए किया जाने वाला सुविचारित और व्यवस्थित प्रयास है।

1. योजना आयोग (Planning Commission - 1950 से 2014):
स्वतंत्रता के बाद देश के द्रुत आर्थिक विकास हेतु 15 मार्च 1950 को योजना आयोग का गठन किया गया। इसके पदेन अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते थे। इसने 1951 से 2017 तक कुल 12 पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं। प्रथम योजना (1951-56) कृषि पर और द्वितीय योजना (1956-61) भारी उद्योगों पर केंद्रित थी। यद्यपि इसने देश में आधारभूत उद्योगों, बांधों (भाखड़ा नांगल) और आईआईटी की नींव रखी, परंतु कालांतर में यह एक केंद्रीकृत, नौकरशाही-प्रधान संस्था बन गई जो राज्यों की स्थानीय आवश्यकताओं की उपेक्षा कर दिल्ली से नीतियां थोपती थी।

2. राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC - 1952):
योजना निर्माण में राज्यों की राय शामिल करने और केंद्र-राज्य समन्वय स्थापित करने हेतु 6 अगस्त 1952 को NDC की स्थापना की गई। योजना आयोग द्वारा तैयार की गई पंचवर्षीय योजनाओं का अंतिम अनुमोदन (पास करना) NDC का ही दायित्व था।

3. नीति आयोग (NITI Aayog - 2015 से वर्तमान):
बदलते वैश्विक और घरेलू आर्थिक परिदृश्य के अनुरूप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने योजना आयोग को समाप्त कर 1 जनवरी 2015 को NITI Aayog (National Institution for Transforming India) की स्थापना की।

योजना आयोग (Top-to-Bottom)

केंद्रीय योजना (दिल्ली) → राज्यों पर वित्तीय आवंटन एवं योजनाएं थोपना (आदेशात्मक मॉडल)।

नीति आयोग (Bottom-to-Top)

सहकारी संघवाद (राज्यों का सक्रिय सहयोग) → थिंक टैंक और नीतिगत नवाचार मॉडल।

नीति आयोग की मुख्य विशेषताएं:

  • यह सरकार के एक बौद्धिक संस्थान (Think Tank) के रूप में कार्य करता है।
  • यह 'सहकारी संघवाद' को बढ़ावा देता है, जहाँ सभी राज्यों के मुख्यमंत्री इसकी गवर्निंग काउंसिल के पूर्ण सदस्य हैं।
  • यह राज्यों को वित्तीय अनुदान बांटने का कार्य नहीं करता (यह कार्य वित्त आयोग करता है), बल्कि तकनीकी, रणनीतिक और नीतिगत सलाह प्रदान करता है।
प्रश्न 6. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के प्रमुख कारणों का विस्तारपूर्वक परीक्षण कीजिए।

प्राचीन काल में पाटलिपुत्र, नालंदा और वैशाली के रूप में पूरे विश्व का मार्गदर्शन करने वाला बिहार आज भारत के सबसे निर्धन और पिछड़े राज्यों की श्रेणी में आता है। बिहार के इस पिछड़ेपन के कारण ऐतिहासिक, भौगोलिक, राजनीतिक और संरचनात्मक हैं:

  1. जनसंख्या का अत्यधिक और अनियंत्रित विस्फोट: बिहार भारत का सर्वाधिक जनघनत्व वाला राज्य है (लगभग 1,106 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी)। सीमित कृषि भूमि और संसाधनों पर विशाल जनसंख्या का अत्यधिक बोझ होने से प्रति व्यक्ति पूंजी और संसाधनों की उपलब्धता नगण्य रह जाती है।
  2. कृषि की दयनीय अवस्था एवं प्राकृतिक आपदाओं की दोहरी मार: बिहार की 75% से अधिक कार्यशील जनसंख्या कृषि पर आश्रित है, परंतु यहाँ की खेती प्रकृति का जुआ है। उत्तरी बिहार प्रतिवर्ष कोसी, बागमती, कमला-बलान जैसी नेपाल से आने वाली अनियंत्रित नदियों की भीषण बाढ़ से तबाह हो जाता है। इसके विपरीत, दक्षिण बिहार (गया, नवादा, औरंगाबाद) भीषण सूखे की चपेट में रहता है। बाढ़ और सूखे के इस स्थायी चक्र से हर साल सैकड़ों करोड़ की फसलें और अवसंरचना नष्ट हो जाती हैं।
  3. खनिज संपदा और भारी उद्योगों की शून्यता: 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य बना। इस विभाजन में अविभाजित बिहार के लगभग 100% खनिज (कोयला, लोहा, तांबा, यूरेनियम, बॉक्साइट) और सभी बड़े भारी उद्योग (टाटा स्टील, भारी मशीन निर्माण, बोकारो स्टील आदि) झारखंड चले गए। बिहार के पास केवल बाढ़-ग्रस्त मैदानी कृषि भूमि बची, और यहाँ की चीनी मिलें, जूट मिलें और कागज उद्योग भी सरकारी उपेक्षा के कारण बंद होते चले गए।
  4. आधारभूत संरचना (Infrastructure) का नितांत अभाव: राज्य में दशकों तक निर्बाध बिजली, पक्की सड़कों, लॉजिस्टिक्स पार्कों और तकनीकी शिक्षण संस्थानों की भारी कमी रही। पर्याप्त बिजली और सुरक्षा न होने के कारण निजी पूंजीपतियों ने बिहार में कभी बड़े कारखाने लगाने का साहस नहीं किया।
  5. कुशल मानव संसाधन और पूंजी का भारी पलायन: उच्च शिक्षा और सम्मानजनक रोजगार के अवसरों के अभाव में बिहार के लाखों कुशल इंजीनियर, डॉक्टर, प्रशासनिक अधिकारी, छात्र और करोड़ों कर्मठ मजदूर दूसरे राज्यों (दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब) की ओर पलायन कर जाते हैं। इससे राज्य की बौद्धिक और उत्पादक शक्ति बाहर चली जाती है और बैंकों में जमा जनता का पैसा (CD Ratio) भी दूसरे राज्यों के उद्योगों में लगा दिया जाता है।
  6. प्रशासनिक लालफीताशाही और राजनीतिक अस्थिरता: दशकों तक व्याप्त सुशासन की कमी, भ्रष्टाचार, धीमी प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया और कानून-व्यवस्था की चुनौतियों ने आर्थिक विकास की गति को अवरुद्ध रखा।
प्रश्न 7. बिहार को पिछड़ेपन से मुक्त करने और इसके त्वरित आर्थिक विकास हेतु कौन-से प्रभावी उपाय किए जाने चाहिए?

बिहार के पिछड़ेपन को दूर किए बिना संपूर्ण भारत की विकास दर को ऊंचाइयों पर नहीं ले जाया जा सकता। बिहार को विकास की मुख्यधारा में लाने हेतु निम्नलिखित ठोस एवं चरणबद्ध उपाय किए जाने अनिवार्य हैं:

  • जल प्रबंधन एवं बाढ़ नियंत्रण की स्थायी व्यवस्था: उत्तरी बिहार में बाढ़ नियंत्रण के लिए नेपाल सीमा पर उच्च जलाशयों और बांधों के निर्माण हेतु केंद्र सरकार को नेपाल से द्विपक्षीय समझौता करना चाहिए। राज्य के भीतर 'नदी जोड़ो परियोजना' को युद्धस्तर पर लागू किया जाए, ताकि उत्तर बिहार के अतिरिक्त बाढ़ के पानी को नहरों के माध्यम से दक्षिण बिहार के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पहुंचाकर सिंचाई और बिजली उत्पादन किया जा सके।
  • कृषि का आधुनिकीकरण एवं कृषि-आधारित उद्योगों (Agro-industries) की स्थापना: बिहार में मखाना, लीची, जरदालु आम, कतरनी चावल, मक्का और आलू का विश्वस्तरीय उत्पादन होता है। राज्य में आधुनिक खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing Units), मेगा फूड पार्क्स, शीतगृहों (Cold Storages) और पैकेजिंग उद्योगों का संजाल बिछाया जाए। इससे किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिलेगा और स्थानीय स्तर पर लाखों युवाओं को रोजगार प्राप्त होगा।
  • आधारभूत संरचना का तीव्र विस्तार: राज्य के प्रत्येक कोने में 24 घंटे निर्बाध औद्योगिक बिजली, फोर-लेन और एक्सप्रेसवे का नेटवर्क, तथा नए हवाई अड्डों (जैसे दरभंगा, पूर्णिया) का विस्तार किया जाए। 'सिंगल विंडो क्लीयरेंस' लागू कर देश-विदेश के बड़े निवेशकों को भूमि, सुरक्षा और कर रियायतें देकर आकर्षित किया जाए।
  • जनसंख्या नियंत्रण एवं परिवार नियोजन: ग्रामीण क्षेत्रों में महिला साक्षरता का सघन प्रसार किया जाए और स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से परिवार नियोजन की आधुनिक तकनीकों को सुलभ बनाकर प्रजनन दर (Fertility Rate) को नियंत्रित किया जाए।
  • तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा में क्रांतिकारी सुधार: हर जिले में उच्च स्तरीय आईटीआई, पॉलिटेक्निक, इंजीनियरिंग, मेडिकल और नर्सिंग कॉलेज खोले जाएं ताकि बिहार के युवाओं को आधुनिक उद्योगों (आईटी, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स) की मांग के अनुरूप दक्ष बनाया जा सके और उन्हें मजदूरी के स्थान पर कुशल रोजगार मिले।
  • पर्यटन उद्योग का आक्रामक विकास: बिहार में विश्वस्तरीय ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरें हैं। बोधगया (महाबोधि मंदिर), राजगीर, नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर, वैशाली, पावापुरी और पटना साहिब को जोड़कर एक उत्कृष्ट 'अंतरराष्ट्रीय पर्यटन सर्किट' विकसित किया जाए। पर्यटन उद्योग से भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा और स्थानीय आतिथ्य रोजगार सृजित हो सकता है।
  • विशेष राज्य का दर्जा एवं केंद्रीय वित्तीय पैकेज: भौगोलिक विषमताओं (बाढ़/सूखा), अंतरराष्ट्रीय सीमा और विभाजन के नुकसान की भरपाई हेतु बिहार को विशेष राज्य का दर्जा या विशेष केंद्रीय आर्थिक पैकेज दिया जाना चाहिए ताकि कर रियायतों के माध्यम से निजी उद्योगपति यहाँ अपनी इकाइयां स्थापित करने को प्रेरित हों।
प्रश्न 8. "सतत विकास (Sustainable Development) केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि मानव जाति के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है।" इस कथन की समीक्षा कीजिए।

1987 में संयुक्त राष्ट्र के ब्रुंटलैंड कमीशन (Brundtland Commission) ने अपनी रिपोर्ट 'Our Common Future' में सतत पोषणीय विकास को परिभाषित करते हुए कहा: "सतत विकास वह विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को भावी पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से समझौता किए बिना पूरा करता है।"

औद्योगिक क्रांति के बाद से विश्व ने अंधाधुंध आर्थिक वृद्धि की अंधी दौड़ में प्रकृति का निर्मम दोहन किया है। यदि विकास की यही विनाशकारी पद्धति जारी रही, तो आने वाले समय में मानव सभ्यता का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा:

  • सीमित प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा: कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और भूजल जैसे संसाधन अनवीकरणीय (Non-renewable) हैं। यदि वर्तमान पीढ़ी इनका बेहिसाब उपभोग कर लेगी, तो आगामी पीढ़ियों के लिए ऊर्जा का भारी संकट पैदा हो जाएगा। अतः सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जैव-ईंधन जैसे नवीकरणीय स्रोतों की ओर मुड़ना अनिवार्य है।
  • पारिस्थितिक संतुलन और जलवायु परिवर्तन: जंगलों की अंधाधुंध कटाई और जीवाश्म ईंधनों के जलने से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ गई है, जिससे 'ग्लोबल वार्मिंग' और जलवायु परिवर्तन हो रहा है। इसके कारण ध्रुवीय बर्फ पिघल रही है, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, और बेमौसम सूखा व चक्रवात आ रहे हैं। सतत विकास प्रकृति और मानव के सह-अस्तित्व पर बल देता है।
  • जैविक विविधता का संरक्षण: विकास की वर्तमान शैली ने हजारों वन्यजीवों, वनस्पतियों और जलीय जीवों को विलुप्त कर दिया है। खाद्य श्रृंखला (Food Chain) के टूटने से पारिस्थितिकी तंत्र चरमरा रहा है।

निष्कर्ष: सतत विकास कोई ऐच्छिक विकल्प नहीं है, बल्कि यह वर्तमान और भविष्य के बीच न्याय का सिद्धांत है। हमें ऐसी हरित तकनीकों (Green Technology) और जीवनशैली को अपनाना होगा जो आर्थिक समृद्धि भी दे और पृथ्वी के पर्यावरण को भी अक्षुण्ण रखे।

प्रश्न 9. समावेशी विकास (Inclusive Growth) की संकल्पना को स्पष्ट करते हुए बताइए कि भारत में इसे प्राप्त करने के लिए कौन-से प्रमुख कदम उठाए गए हैं?

समावेशी विकास का अभिप्राय एक ऐसे सर्वांगीण और न्यायसंगत विकास से है जिसमें समाज के सभी भौगोलिक क्षेत्रों और सभी सामाजिक वर्गों—विशेष रूप से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को विकास की प्रक्रिया में समान भागीदारी और लाभ प्राप्त हो। इसका मूल मंत्र है: "सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास।"

भारत में समावेशी विकास हेतु उठाए गए प्रमुख कदम:

  • वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion): 'प्रधानमंत्री जन-धन योजना' के तहत देश के करोड़ों निर्धन और वंचित नागरिकों के शून्य-शेष बैंक खाते खोले गए, जिससे वे औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जुड़े।
  • प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT): सरकारी योजनाओं की सब्सिडी, छात्रवृत्ति और पेंशन की राशि बिचौलियों और भ्रष्टाचार के बिना सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुंचाई जा रही है।
  • रोजगार की वैधानिक गारंटी (MGNREGA): महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत ग्रामीण परिवारों को वर्ष में कम से कम 100 दिनों के अकुशल श्रम रोजगार की कानूनी गारंटी दी गई है, जिसमें महिलाओं की 33% से अधिक भागीदारी है।
  • खाद्य सुरक्षा (NFSA): 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम' और 'प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना' के माध्यम से देश के लगभग 80 करोड़ जरूरतमंद नागरिकों को निःशुल्क या अत्यंत रियायती दरों पर अनाज उपलब्ध कराया जा रहा है ताकि भुखमरी समाप्त हो सके।
  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य एवं आवास सुरक्षा: 'आयुष्मान भारत योजना' के तहत गरीब परिवारों को ₹5 लाख तक का निःशुल्क स्वास्थ्य बीमा तथा 'प्रधानमंत्री आवास योजना' के तहत बेघर गरीबों को पक्के मकान दिए जा रहे हैं।
  • शिक्षा एवं कौशल संवर्धन: 'समग्र शिक्षा अभियान' के तहत अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा और 'कौशल विकास मिशन' (Skill India) के तहत वंचित युवाओं को रोजगारपरक प्रशिक्षण देकर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है।
प्रश्न 10. भारत के संदर्भ में प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों के ऐतिहासिक विकास और उनके संरचनात्मक परिवर्तनों का सविस्तार विश्लेषण कीजिए।

किसी देश के आर्थिक विकास की यात्रा में उसके सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और कार्यबल (रोजगार) में विभिन्न क्षेत्रों के योगदान में क्रमिक और संरचनात्मक बदलाव आता है। भारत में 1950 से लेकर वर्तमान समय तक इन तीनों क्षेत्रों में निम्नलिखित ऐतिहासिक रूपांतरण देखा गया है:

क्षेत्र 1950-51 में GDP योगदान वर्तमान GDP योगदान वर्तमान रोजगार में हिस्सेदारी ऐतिहासिक प्रवृत्ति व वर्तमान स्थिति
प्राथमिक (कृषि) लगभग 55% से 59% लगभग 15% से 17% लगभग 44% से 46% GDP में हिस्सेदारी तेजी से घटी है, परंतु जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी इसी पर आश्रित है (प्रच्छन्न बेरोजगारी)।
द्वितीयक (उद्योग) लगभग 13% से 15% लगभग 27% से 29% लगभग 24% से 25% मध्यम गति से वृद्धि हुई है; विनिर्माण क्षेत्र उस गति से नहीं बढ़ा जिस गति से चीन में बढ़ा।
तृतीयक (सेवाएं) लगभग 28% से 30% लगभग 54% से 55% लगभग 30% से 32% विस्फोटक और सर्वाधिक तीव्र वृद्धि; आज भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा चालक बन चुका है।

संरचनात्मक परिवर्तन की मुख्य विशेषताएं और विषमताएं:

  • सेवा क्षेत्र का अभूतपूर्व उभार: स्वतंत्रता के समय भारत कृषि-प्रधान देश था। विगत सात दशकों में तृतीयक क्षेत्र (विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी, सॉफ्टवेयर, दूरसंचार, बैंकिंग, विमानन और वित्तीय सेवाएं) का योगदान GDP में आधे से अधिक हो गया है। भारत सीधे कृषि से सेवा अर्थव्यवस्था में तब्दील हो गया।
  • भारतीय विकास का विशिष्ट अंतर्विरोध: सामान्य आर्थिक सिद्धांत (जैसा पश्चिमी देशों में हुआ) के अनुसार श्रम पहले कृषि से भारी उद्योगों में जाता है और फिर सेवाओं में जाता है। परंतु भारत में विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र का विकास सीमित रहा। परिणामस्वरूप, आज भी देश की लगभग 45% आबादी कृषि में लगी है जो राष्ट्रीय आय में मात्र 16% पैदा करती है, जबकि सेवा क्षेत्र मात्र 31% कार्यबल के साथ राष्ट्रीय आय का 54% उत्पन्न करता है।
  • आगे की राह: इस गंभीर क्षेत्रीय विषमता को दूर करने के लिए 'मेक इन इंडिया' और विनिर्माण क्षेत्र को गति देना अनिवार्य है ताकि कृषि से अतिरिक्त श्रम को निकालकर कारखानों में सम्मानजनक रोजगार दिया जा सके।
प्रश्न 11. "मानव पूंजी निर्माण (Human Capital Formation) देश के आर्थिक विकास की अनिवार्य पूर्व-शर्त है।" शिक्षा और स्वास्थ्य के संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए।

भौतिक पूंजी (जैसे कारखाने, मशीनें, सड़कें) की भांति ही किसी देश के नागरिकों के ज्ञान, कौशल, स्वास्थ्य, कार्यकुशलता और उत्पादकता को 'मानव पूंजी' कहा जाता है। जब देश की जनसंख्या को केवल एक दायित्व न मानकर उस पर शिक्षा और स्वास्थ्य के माध्यम से सुनियोजित निवेश किया जाता है, तो वह एक बहुमूल्य परिसंपत्ति बन जाती है।

शिक्षा की केंद्रीय भूमिका:

  • उत्पादकता और आय में वृद्धि: एक शिक्षित और तकनीकी रूप से प्रशिक्षित व्यक्ति किसी अनपढ़ व्यक्ति की तुलना में नई तकनीकों (कंप्यूटर, आधुनिक मशीनरी) को तेजी से सीखता है और कम समय में उच्च गुणवत्ता का उत्पादन करता है।
  • नवाचार और अनुसंधान (Innovation): उच्च शिक्षा समाज में नए वैज्ञानिक आविष्कार, उद्यमिता और स्टार्टअप संस्कृति को जन्म देती है, जिससे नए उद्योग स्थापित होते हैं।
  • सामाजिक चेतना का प्रसार: शिक्षा नागरिकों में स्वच्छता, कानून का पालन, परिवार नियोजन और पर्यावरण संरक्षण के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करती है।

स्वास्थ्य की अपरिहार्यता:

  • कार्यक्षमता और निरंतरता: एक अस्वस्थ और कुपोषित श्रमिक बार-बार बीमार पड़ने के कारण काम से अनुपस्थित रहता है, जिससे कार्य दिवसों की हानि होती है और उत्पादकता घट जाती है। उत्तम स्वास्थ्य व्यक्ति को सतत और ऊर्जावान होकर कार्य करने की क्षमता देता है।
  • चिकित्सा व्यय की बचत: जब सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छ पेयजल पर निवेश करती है, तो संक्रामक बीमारियां घटती हैं, जिससे परिवारों का वह पैसा जो इलाज में बर्बाद होता, उत्पादक बचतों और शिक्षा में लगता है।

निष्कर्ष: नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमर्त्य सेन के अनुसार, आर्थिक विकास का अर्थ केवल वस्तुओं का उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मानव की क्षमताओं (Capabilities) का विस्तार करना है। बिना शिक्षित और स्वस्थ मानव पूंजी के कोई भी देश प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न होने के बावजूद समृद्ध नहीं बन सकता।

प्रश्न 12. भारत के संदर्भ में 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' (Mixed Economy) की सार्थकता, उपलब्धियों एवं सीमाओं का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के समक्ष दो विरोधी विकास मॉडल थे—पश्चिमी देशों का अनियंत्रित पूंजीवादी मॉडल और सोवियत संघ का पूर्णतः सरकारी समाजवादी मॉडल। भारत के नीति-निर्माताओं (विशेषकर पंडित नेहरू) ने दोनों के अतिवादी स्वरूपों को त्यागकर 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' को अपनाया।

सार्थकता (मिश्रित मॉडल क्यों चुना गया?):
स्वतंत्रता के समय भारतीय निजी उद्योगपतियों के पास इतनी विशाल पूंजी और तकनीकी क्षमता नहीं थी कि वे रेल, भारी इस्पात कारखाने, तेल शोधन संयंत्र और विशाल बांध बना सकें। अतः इन रणनीतिक क्षेत्रों का दायित्व सरकार (सार्वजनिक क्षेत्र) ने लिया। साथ ही, कृषि और उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माण में निजी पहल को स्वतंत्रता दी गई ताकि व्यक्तिगत प्रेरणा बनी रहे।

प्रमुख उपलब्धियां:

  • देश में एक सुदृढ़ और आत्मनिर्भर आधारभूत व भारी औद्योगिक ढांचा (भिलाई, राउरकेला, एचईसी, भेल) तैयार हुआ।
  • हरित क्रांति के माध्यम से देश खाद्यान्न के क्षेत्र में पूर्णतः आत्मनिर्भर बना।
  • रेलवे, डाक, जीवन बीमा और सार्वजनिक बैंकों के माध्यम से दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों तक सस्ती बुनियादी सेवाएं पहुंचीं।
  • पूंजीवाद की भांति धन का अनियंत्रित संकेंद्रण कुछ हद तक रुका और समाज कल्याणकारी नीतियां लागू हुईं।

सीमाएं एवं कमियां (1991 से पूर्व):

  • लाइसेंस-परमिट राज और लालफीताशाही: निजी क्षेत्र पर अत्यधिक सरकारी नियंत्रणों और प्रतिबंधों के कारण भ्रष्टाचार पनपा और उद्योगों की स्थापना अत्यंत जटिल हो गई।
  • सार्वजनिक उपक्रमों की अक्षमता: सरकारी कंपनियों (PSUs) में जवाबदेही के अभाव, अत्यधिक राजनीतिक हस्तक्षेप और ट्रेड यूनियनों के दबाव के कारण भारी वित्तीय घाटे होने लगे।
  • कमजोर प्रतिस्पर्धा: विदेशी माल पर अत्यधिक प्रतिबंधों के कारण घरेलू उत्पादकों को खुली प्रतिस्पर्धा नहीं मिली, जिससे उत्पादों की गुणवत्ता निम्न रही और उपभोक्ता को सीमित विकल्प मिले।

निष्कर्ष: इन्हीं सीमाओं को दूर करने के लिए भारत ने 1991 में 'नई आर्थिक नीति' (LPG - उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) को अपनाया, जिसने मिश्रित अर्थव्यवस्था के मूल ढांचे को बनाए रखते हुए निजी क्षेत्र को अधिक खुलापन और विश्व बाजार से प्रतिस्पर्धा करने की शक्ति दी।

प्रश्न 13. बिहार के विभाजन (2000) के उपरांत उत्पन्न आर्थिक संकटों तथा राज्य के पुनर्निर्माण में कृषि की भूमिका का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।

15 नवंबर 2000 को बिहार का विभाजन राज्य के आधुनिक आर्थिक इतिहास की सबसे युगांतरकारी और आघातकारी घटना थी। इस विभाजन ने राज्य की आर्थिक संरचना को पूरी तरह बदल दिया:

विभाजन से उत्पन्न आर्थिक संकट:

  • खनिज संपदा से पूर्ण वंचित होना: अविभाजित बिहार पूरे देश के खनिज उत्पादन में अग्रणी था। विभाजन के बाद कोयला, बॉक्साइट, तांबा, लौह अयस्क, चूना पत्थर आदि के समूचे समृद्ध क्षेत्र झारखंड में चले गए। बिहार पूरी तरह 'खनिज-विहीन' राज्य बन गया।
  • औद्योगिक आधार का नष्ट होना: जमशेदपुर (टिस्को), बोकारो स्टील, सिंदरी उर्वरक कारखाना, धनबाद की कोयला खदानें, रांची का एचईसी जैसे देश के विशालतम औद्योगिक परिसर झारखंड के नियंत्रण में चले गए। बिहार के पास कोई बड़ा विनिर्माण केंद्र नहीं बचा।
  • राजस्व की अपार क्षति: राज्य को खनिजों से मिलने वाली भारी रॉयल्टी (खनन कर) और औद्योगिक करों का स्रोत समाप्त हो गया, जिससे राज्य सरकार का खजाना खाली हो गया।
  • जनसंख्या और क्षेत्रफल का असंतुलन: कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का एक बड़ा हिस्सा झारखंड चला गया, परंतु घनी आबादी का लगभग 75% हिस्सा बिहार में ही रह गया, जिससे भूमि पर जनसंख्या का घनत्व अत्यधिक बढ़ गया।

राज्य के पुनर्निर्माण में कृषि की संजीवनी भूमिका:
खनिजों और भारी उद्योगों के छिन जाने के बाद बिहार के पास विकास का एकमात्र आधार स्तंभ उसकी उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) और प्रचुर भूजल संसाधन ही बचे। कृषि ने राज्य के पुनर्निर्माण में रीढ़ की हड्डी का कार्य किया:

  • कृषि रोडमैप की शुरुआत: बिहार सरकार ने 2008 से चरणबद्ध 'कृषि रोडमैप' लागू किए, जिसका उद्देश्य हर भारतीय की थाली में कम से कम एक बिहारी व्यंजन पहुंचाना था।
  • उत्पादकता में ऐतिहासिक वृद्धि: उन्नत बीजों, यंत्रीकरण और 'श्री विधि' (SRI Method) से धान और गेहूं की खेती में बिहार के किसानों ने विश्व रिकॉर्ड स्तर की उत्पादकता दर्ज की। मक्का उत्पादन में बिहार देश का शीर्ष राज्य बनकर उभरा।
  • बागवानी और विशिष्ट उत्पाद: शाही लीची (मुजफ्फरपुर), जरदालु आम (भागलपुर), मखाना (मिथिलांचल) और कतरनी चावल को वैश्विक जीआई टैग (GI Tag) मिला। आज देश के कुल मखाना उत्पादन का 85% से अधिक बिहार में होता है।
  • दुग्ध सहकारिता और 'सुधा' क्रांति: कॉम्फेड (COMFED) द्वारा संचालित 'सुधा' डेयरी नेटवर्क ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में श्वेत क्रांति ला दी, जिससे लाखों छोटे किसानों और महिलाओं को नियमित नकद आय प्राप्त होने लगी।

निष्कर्ष: कृषि ही बिहार की वास्तविक शक्ति है। यदि बाढ़ का स्थायी समाधान कर दिया जाए और कृषि प्रसंस्करण उद्योगों की स्थापना कर दी जाए, तो कृषि के दम पर ही बिहार देश के अग्रणी राज्यों की श्रेणी में पुनः स्थापित हो सकता है।

प्रश्न 14. राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) के संगठनात्मक ढांचे, उद्देश्यों एवं भारत के योजनाबद्ध विकास में इसकी भूमिका की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण संघीय देश में बिना राज्यों के सक्रिय सहयोग के किसी भी राष्ट्रीय योजना को धरातल पर उतारना असंभव था। इसी उद्देश्य से 6 अगस्त 1952 को केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक प्रस्ताव द्वारा 'राष्ट्रीय विकास परिषद' (National Development Council - NDC) की स्थापना की गई थी।

संगठनात्मक ढांचा:

  • अध्यक्ष: भारत के प्रधानमंत्री इसके पदेन अध्यक्ष होते थे।
  • सदस्य: केंद्रीय मंत्रिमंडल के सभी कैबिनेट मंत्री, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल/प्रशासक, तथा योजना आयोग के सभी सदस्य इसके पदेन सदस्य होते थे। योजना आयोग के सचिव ही इसके सचिव होते थे।

प्रमुख उद्देश्य एवं कार्य:

  • योजना आयोग द्वारा तैयार किए गए राष्ट्रीय विकास प्रारूप (Draft Plan) पर गहन विचार-विमर्श करना और उसे अंतिम वैधानिक स्वीकृति देना।
  • राष्ट्रीय योजनाओं के संचालन के लिए आवश्यक संसाधनों (वित्तीय, तकनीकी और मानवीय) का आकलन और जुटाने के उपाय सुझाना।
  • उन सामाजिक और आर्थिक नीतियों की समीक्षा करना जो राष्ट्रीय विकास को प्रभावित करती हैं।
  • देश के विभिन्न राज्यों के बीच संतुलित और समतामूलक क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित करना।

योजनाबद्ध विकास में भूमिका एवं उपलब्धियां:

  • NDC भारत के 'सहकारी संघवाद' का सर्वोच्च मंच बनकर उभरा जहाँ राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अपनी वित्तीय कठिनाइयों और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को सीधे प्रधानमंत्री के समक्ष रखने का अवसर मिलता था।
  • इसने विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं को पूरे देश की साझा राष्ट्रीय सहमति का दस्तावेज बनाया, न कि केवल केंद्र सरकार का एकतरफा एजेंडा।

आलोचनात्मक सीमाएं (कमियां):

  • सलाहकारी प्रकृति: NDC का निर्णय कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं था; यह मात्र एक परामर्शदात्री निकाय था।
  • अनियमित बैठकें: इसकी बैठकें वर्ष में केवल एक या दो बार ही औपचारिक रूप से बुलाई जाती थीं, जिससे इसमें योजनाओं के क्रियान्वयन की निरंतर निगरानी करने की क्षमता नहीं थी।
  • राजनीतिकरण: अक्सर गैर-कांग्रेसी या विपक्षी दलों के मुख्यमंत्री इस मंच का उपयोग केंद्र सरकार पर वित्तीय भेदभाव का आरोप लगाने के राजनीतिक अखाड़े के रूप में करते थे।

वर्तमान स्थिति: 2015 में नीति आयोग के गठन और उसकी 'गवर्निंग काउंसिल' में ही सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को नियमित भागीदार बना दिए जाने के बाद NDC की आवश्यकता स्वतः समाप्त हो गई।

प्रश्न 15. "आर्थिक विकास की दिशा में वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण (LPG) ने विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के समक्ष नए अवसर और गंभीर चुनौतियां दोनों प्रस्तुत की हैं।" इस कथन की युक्तिसंगत समीक्षा कीजिए।

वर्ष 1991 में गहरे भुगतान संतुलन संकट (विदेशी मुद्रा भंडार का मात्र दो सप्ताह के बराबर रह जाना) से जूझते हुए भारत ने अपनी आर्थिक नीतियों में ऐतिहासिक यू-टर्न लिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में 'नई आर्थिक नीति' लागू की गई, जिसे संक्षेप में LPG (Liberalization, Privatization, Globalization) कहा जाता है। इसने विकासशील देशों को दोराहे पर ला खड़ा किया:

नई आर्थिक नीति 1991 (LPG सुधार)
उदारीकरण (Liberalization)
  • लाइसेंस राज की समाप्ति
  • अनावश्यक नियंत्रणों में छूट
  • व्यापारिक नियमों का सरलीकरण
निजीकरण (Privatization)
  • सरकारी विनिवेश (Disinvestment)
  • निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन
  • कार्यकुशलता व प्रतिस्पर्धा
वैश्वीकरण (Globalization)
  • टैरिफ व कोटा में भारी कटौती
  • FDI व बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आगमन
  • वैश्विक बाजार से जुड़ाव

LPG द्वारा सृजित नए अवसर (सकारात्मक प्रभाव):

  • विदेशी निवेश और मुद्रा भंडार में अभूतपूर्व वृद्धि: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के नियमों को उदार बनाने से बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में अरबों डॉलर का निवेश किया, जिससे हमारा विदेशी मुद्रा भंडार शून्य के कगार से बढ़कर ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
  • उपभोक्ताओं को असीमित विकल्प और बेहतर गुणवत्ता: ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन और वस्त्र बाजारों में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से आम जनता को विश्वस्तरीय उत्पाद अत्यधिक सस्ती दरों पर उपलब्ध होने लगे।
  • सेवा क्षेत्र और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्रांति: भारत आउटसोर्सिंग (BPO/KPO) और सॉफ्टवेयर निर्यात का वैश्विक केंद्र बन गया, जिससे लाखों शिक्षित युवाओं को उच्च वेतन वाले रोजगार प्राप्त हुए।
  • भारतीय कंपनियों का बहुराष्ट्रीय बनना: टाटा, इन्फोसिस, विप्रो, महिंद्रा और सन फार्मा जैसी भारतीय कंपनियों ने अपनी तकनीकी दक्षता बढ़ाकर विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण किया और वैश्विक पहचान बनाई।

LPG द्वारा उत्पन्न गंभीर चुनौतियां एवं खतरे (नकारात्मक प्रभाव):

  • लघु, कुटीर एवं पारंपरिक उद्योगों पर आघात: बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विशाल पूंजी और आधुनिक मशीनों से बने सस्ते उत्पादों (विशेषकर चीनी माल) से मुकाबला न कर पाने के कारण भारत के पारंपरिक हथकरघा, हस्तशिल्प और खिलौना उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच गए।
  • आर्थिक विषमता की चौड़ी होती खाई: LPG सुधारों का अधिकांश लाभ बड़े उद्योगपतियों, शेयर बाजार के सटोरियों, उच्च शिक्षित तकनीकी वर्ग और महानगरों तक सीमित रहा। ग्रामीण भारत, अनपढ़ मजदूर और किसान इस समृद्धि से अछूते रह गए, जिससे अमीर-गरीब के बीच विषमता और बढ़ गई।
  • श्रमिकों की असुरक्षा और अनौपचारिक रोजगार: निजीकरण के दौर में स्थायी और पेंशनयुक्त नौकरियों के स्थान पर ठेकेदारी प्रथा (Contractual Jobs) और अनौपचारिक रोजगार को बढ़ावा मिला, जिससे श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा समाप्त हो गई।
  • कृषि क्षेत्र की उपेक्षा: सरकार का पूरा ध्यान सेवा और औद्योगिक क्षेत्र पर केंद्रित हो गया, जिससे कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश घटा और किसानों की आर्थिक बदहाली व आत्महत्याओं के मामलों में वृद्धि हुई।

संतुलित निष्कर्ष:
वैश्वीकरण और उदारीकरण एक ऐसी वास्तविकता हैं जिससे कोई भी देश अलग-थलग नहीं रह सकता। समझदारी इसमें है कि हम वैश्विक पूंजी और उन्नत तकनीक का लाभ उठाते हुए अपने देश के किसानों, छोटे कारीगरों और कमजोर वर्गों को संरक्षण और सब्सिडी प्रदान करें ताकि विकास 'अंधाधुंध कॉर्पोरेट विकास' न बनकर एक 'न्यायसंगत और मानवीय विकास' बन सके।

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