पाठ 8: जित-जित मैं निरखत हूँ
बिहार बोर्ड (BSEB) कक्षा 10वीं हिंदी (गोधूलि भाग-2, गद्य खंड) | सम्पूर्ण नोट्स
1. पाठ का संक्षिप्त परिचय (Overview)
- पाठ का नाम: जित-जित मैं निरखत हूँ
- विधा: साक्षात्कार (Interview / बातचीत)
- साक्षात्कारकर्ता: रश्मि वाजपेयी (प्रसिद्ध नृत्यांगना एवं पत्रिका 'नटरंग' की संपादक)
- व्यक्तित्व: पंडित बिरजू महाराज (कथक सम्राट)
- मूल भाव: इस पाठ में कथक नृत्य के पर्याय बन चुके पंडित बिरजू महाराज के जीवन-संघर्ष, पारिवारिक पृष्ठभूमि, गुरु-शिष्य परंपरा, रियाज़, आर्थिक अभावों से लेकर अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने तक की प्रेरक यात्रा का अंतरंग वर्णन है।
2. कलाकार परिचय (पंडित बिरजू महाराज)
- जन्म: 4 फरवरी 1938 ई०, शुक्रवार सुबह 8 बजे, लखनऊ के जफ़रिन अस्पताल में (वसंत पंचमी के ठीक एक दिन पहले)।
- पारिवारिक पृष्ठभूमि: वे लखनऊ घराने के वंशज और इस परंपरा की सातवीं पीढ़ी के कलाकार थे। वे अपने घर की आखिरी संतान थे (तीन बहनों के बाद सबसे छोटे)।
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वंशज एवं गुरु:
- पिता (बाबूजी): पंडित अच्छन महाराज (इनके मुख्य गुरु)।
- चाचा (काका): पंडित शंभू महाराज और पंडित लच्छू महाराज।
- व्यक्तित्व: सौम्य, हँसमुख, मिलनसार, स्वभाव में बच्चों जैसा भोलापन, दोहरे बदन और मंझोले कद के धनी।
3. पाठ का विस्तृत सारांश एवं मुख्य प्रसंग (Detailed Summary)
1. बचपन और रियासतों में प्रदर्शन:
- बिरजू महाराज के पिता लगभग 22 साल तक रामपुर के नवाब के यहाँ रहे।
- जब बिरजू महाराज 6 वर्ष के थे, तो नवाब साहब उनका नृत्य देखकर बहुत प्रभावित हुए और उनकी भी तनख्वाह बाँध दी।
- बाबूजी को रामपुर की नौकरी छूटना राहत भरा लगा, जिसके बाद उन्होंने हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाया।
2. गंडा बंधन एवं बाबूजी का देहावसान:
- बिरजू महाराज को मुख्य तालीम उनके बाबूजी से मिली।
- जब बिरजू महाराज ने दो निजी कार्यक्रमों से 500 रुपये कमाए, तब बाबूजी ने 500 रुपये नज़राना लेकर विधिवत उनका गंडा बाँधा (दीक्षा दी)। उनके साथ लखनऊ के एक लड़के 'जगत किशोर' का भी गंडा बँधा था।
- जब बिरजू महाराज मात्र साढ़े नौ साल के थे, तब उनके बाबूजी की 54 वर्ष की आयु में लू लगने से असामयिक मृत्यु हो गई। बाबूजी का अंतिम कार्यक्रम मैनपुरी में था।
- घर में इतना भी पैसा नहीं था कि उनका दसवाँ-तेरहवीं किया जा सके। 10 दिनों के भीतर बालक बिरजू ने दो जगहों पर नाचकर ₹500 जुटाए और क्रिया-कर्म संपन्न करवाया।
3. आर्थिक तंगी और ट्यूशन का दौर:
- पिता की मृत्यु के बाद वे लखनऊ से कानपुर आ गए।
- कानपुर में 11 वर्ष की उम्र में वे ₹25-₹25 की दो ट्यूशन पढ़ाते थे। वे तीन मील पैदल जाते थे और रास्ते में कब्रिस्तान पड़ता था। एक अमीर छात्र सीताराम बागला को वे डांस सिखाते थे और वह उन्हें हाईस्कूल की पढ़ाई कराता था।
4. दिल्ली गमन और 'संगीत भारती' से जुड़ाव:
- 14 वर्ष की आयु में कपिला जी (वात्स्यायन) उन्हें दिल्ली के 'संगीत भारती' में ले आईं, जहाँ उन्हें ₹250 मासिक वेतन मिलता था। वे दरियागंज में एक दुछत्ती में रहते थे।
- संगीत भारती में साढ़े चार साल काम करने के बाद उन्होंने वहाँ की नौकरी छोड़ दी और बाद में वे 'भारतीय कला केंद्र' से जुड़े।
5. रियाज़ और अन्य कलाओं में रुचि:
- वे सुबह 4 बजे उठकर बिना नागा 4-4 घंटे रियाज़ करते थे।
- नृत्य के अतिरिक्त वे सितार, गिटार, हारमोनियम, तबला और सरोद बजाने के भी बेहद शौकीन थे।
- उन्होंने अपनी पहली साइकिल संगीत भारती की कमाई से खरीदी थी ताकि बस के पैसे बचा सकें।
6. शादी और पुरस्कार:
- मात्र 18 वर्ष की आयु में अम्मा जी ने उनकी शादी करा दी।
- उन्हें मात्र 27 वर्ष की उम्र में 'संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार' प्राप्त हुआ।
- उनका पहला विदेश दौरा रूस (Russia) का था, जहाँ वे 'कुमारसंभव' बैले लेकर गए थे। इसके बाद उन्होंने जर्मनी, जापान, हॉंगकॉंग, लाओस, बर्मा, अमेरिका और इंग्लैंड में अपने नृत्य के जलवे बिखेरे।
7. अम्मा जी की भूमिका एवं शिष्य परंपरा:
- वे अपनी अम्मा जी को अपना सबसे बड़ा जज/एग्जामिनर और 'गुरुवाइन' मानते थे। जब भी वे नाचते, तो अम्मा से पूछते थे कि कहीं कोई चूक तो नहीं हुई।
- प्रमुख शिष्य: तीरथ प्रताप, प्रदीप, कृष्णमोहन, राममोहन तथा विदेशी शिष्याओं में वेरोनिक व मैक्लीन। भारतीय शिष्याओं में शाश्वती और दुर्गा प्रमुख थीं।
4. पाठ में शामिल काव्यांश का भावार्थ (Bhavarth)
(क) बिरजू महाराज का पद (काव्यांश-1)
"श्याम श्याम श्याम है ॥
वृक्षन की पतियन में, फूलन की कलियन में
पवन के झकोरन में, श्याम श्याम श्याम है ॥
गुणिजन के तालन में, गायक के स्वरन में
कवियन के हृदय में, श्याम श्याम श्याम है ॥"
वृक्षन की पतियन में, फूलन की कलियन में
पवन के झकोरन में, श्याम श्याम श्याम है ॥
गुणिजन के तालन में, गायक के स्वरन में
कवियन के हृदय में, श्याम श्याम श्याम है ॥"
भावार्थ: इस पद में बिरजू महाराज ने कृष्ण-भक्ति की व्यापकता का वर्णन किया है। प्रकृति के प्रत्येक अंग—वृक्षों के पत्तों, फूलों की कलियों, हवा के झोकों और संगीत के ताल-स्वरों तथा कवियों के हृदय में सर्वत्र केवल श्रीकृष्ण की ही सत्ता समाई हुई है।
(ख) श्रीराम वर्मा द्वारा लिखित कविता: 'बिरजू महाराज का नृत्य देखते हुए'
भावार्थ: कवि कहते हैं कि बिरजू महाराज का नृत्य केवल शरीर का संचालन या मुद्रा नहीं है, बल्कि वह लय में डूबी संपूर्ण सृष्टि का साकार रूप है। उनके घुँघरू जब बजते हैं तो ऐसा लगता है मानो समूचा ब्रह्मांड और नक्षत्र झूम रहे हों। उनका नृत्य भारतीय शास्त्रीय कला की शाश्वत गहराई को जीवंत बना देता है।
5. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य (Important One-Liners)
- 'जित-जित मैं निरखत हूँ' पाठ साहित्य की कौन-सी विधा है — साक्षात्कार (Interview)।
- पंडित बिरजू महाराज का साक्षात्कार किसने लिया — रश्मि वाजपेयी ने ('नटरंग' पत्रिका की संपादक)।
- पंडित बिरजू महाराज किस नृत्य शैली से संबंधित हैं — कथक से।
- बिरजू महाराज का जन्म कब और कहाँ हुआ — 4 फरवरी 1938 ई० को जफ़रिन अस्पताल, लखनऊ में।
- बिरजू महाराज लखनऊ घराने की किस पीढ़ी के कलाकार हैं — सातवीं (7वीं) पीढ़ी के।
- बिरजू महाराज के पिता का नाम क्या था — पंडित अच्छन महाराज।
- बिरजू महाराज के चाचा कौन-कौन थे — पंडित शंभू महाराज और पंडित लच्छू महाराज।
- बाबूजी ने कितने रुपये नज़राना लेकर बिरजू महाराज का गंडा बाँधा था — ₹500।
- बाबूजी की मृत्यु के समय बिरजू महाराज की उम्र कितनी थी — साढ़े नौ वर्ष।
- बिरजू महाराज के बाबूजी की मृत्यु किस कारण से हुई थी — लू लगने से (54 वर्ष की आयु में)।
- बिरजू महाराज का विवाह किस उम्र में हुआ था — 18 वर्ष की आयु में।
- बिरजू महाराज को 'संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार' किस उम्र में मिला — 27 वर्ष की उम्र में।
- बिरजू महाराज का पहला विदेश दौरा कौन-सा देश था — रूस (कुमारसंभव बैले के साथ)।
- बिरजू महाराज अपना सबसे बड़ा जज/एग्जामिनर किसे मानते थे — अपनी अम्मा जी (माता) को।
- बिरजू महाराज की सबसे प्रिय व समर्पित शिष्या कौन थीं — शाश्वती।
- बिरजू महाराज कानपुर में कितने साल रहे — ढाई साल (जहाँ वे ₹25-₹25 की दो ट्यूशन पढ़ाते थे)।
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