बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिन्दी (गद्य खंड) | पाठ 5: "नागरी लिपि" — गुणाकर मुले
सम्पूर्ण 50 महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
उत्तर: गुणाकर मुले।
उत्तर: सन् 1935 ई० में महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक गाँव में।
उत्तर: मराठी भाषा में।
उत्तर: इलाहाबाद से।
उत्तर: सन् 2009 में।
उत्तर: गणित, खगोल विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, विज्ञान का इतिहास, पुरालिपिशास्त्र, प्राचीन भारत का इतिहास और संस्कृति।
उत्तर: 'अक्षर कथा'।
उत्तर: 'भारतीय लिपियों की कहानी' से।
उत्तर: करीब दो सदी पहले, जब पहली बार इसके टाइप (मुद्रण हेतु) बने और पुस्तकें छपने लगीं।
उत्तर: संस्कृत, प्राकृत, नेपाली (खसकुरा), नेवारी और मराठी।
उत्तर: 'ळ' अक्षर।
उत्तर: नन्दिनागरी।
उत्तर: विजयनगर के राजाओं के लेखों की लिपि को।
उत्तर: राजराज और राजेंद्र के सिक्कों पर।
उत्तर: 'वीरकेरलस्य'।
उत्तर: 'अव्यक्तमेकं मुहम्मद अवतार नृपति महमूद'।
उत्तर: बादशाह अकबर ने।
उत्तर: छोटी आड़ी लकीरें या छोटे ठोस त्रिकोण।
उत्तर: इसके अक्षरों के सिरों पर पूरी आड़ी लकीरें (शिरोरेखाएँ) होती हैं, जो अक्षरों की चौड़ाई जितनी लंबी होती हैं।
उत्तर: गुजरात के नागर ब्राह्मणों द्वारा पहली बार उपयोग किए जाने के कारण इसका नाम 'नागरी' पड़ा।
उत्तर: 'पादताड़ितकम्' नाटक से।
उत्तर: चंद्रगुप्त (द्वितीय) 'विक्रमादित्य' का।
उत्तर: सरहपाद (8वीं सदी)।
उत्तर: तिब्बत से (10वीं-11वीं सदी की लिपि में)।
उत्तर: राजा दंतिदुर्ग ने।
उत्तर: राजा कृष्ण (प्रथम) के शासनकाल में।
उत्तर: महावीराचार्य ने (850 ई० में)।
उत्तर: दिवे-आगर (रत्नागिरी जिला) से।
उत्तर: ग्वालियर प्रशस्ति।
उत्तर: इंदौर (मध्य प्रदेश) के समीप।
उत्तर: करीब दो सदी पहले जब पहली बार देवनागरी के मुद्रण टाइप तैयार हुए और उसमें पुस्तकें तथा पत्र-पत्रिकाएँ छपने लगीं, तब इस लिपि के रूप और अक्षरों में सर्वमान्य स्थिरता आई।
उत्तर: दक्षिण भारत में प्रयुक्त प्राचीन नागरी लिपि को 'नन्दिनागरी' कहा जाता था। कोंकण के शिलाहारों, मान्यखेट के राष्ट्रकूटों, देवगिरि के यादवों और विजयनगर के राजाओं के अभिलेख इसी लिपि में मिलते हैं।
उत्तर: ईसा की आठवीं से ग्यारहवीं सदी तक नागरी लिपि के अभिलेख उत्तर भारत से लेकर सुदूर दक्षिण भारत और श्रीलंका तक प्राप्त होते हैं, इसलिए उस काल में यह पूरे देश की एक सार्वदेशिक लिपि थी।
उत्तर: गुप्तकालीन ब्राह्मी व सिद्धम् लिपि के अक्षरों के सिर पर छोटे ठोस त्रिकोण या छोटी लकीरें होती थीं, जबकि नागरी लिपि में अक्षरों के सिरों पर पूरी चौड़ाई वाली स्पष्ट शिरोरेखाएँ खींची जाती हैं।
उत्तर: चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का व्यक्तिगत नाम 'देव' था और उनकी राजधानी पटना (पाटलिपुत्र) को 'नगर' कहा जाता था। संभवतः इसी 'देवनगर' की प्रमुख लिपि होने के कारण इसे 'देवनागरी' कहा गया।
उत्तर: गजनवी ने 1028 ई० में लाहौर की टकसाल से जो चाँदी के सिक्के जारी किए, उन पर एक तरफ अरबी-कूफी में कलमा और दूसरी तरफ नागरी लिपि में 'अव्यक्तमेकं मुहम्मद अवतार नृपति महमूद' अंकित था।
उत्तर: बादशाह अकबर ने ऐसे सिक्के चलाए जिन पर एक ओर भगवान राम और माता सीता की सुंदर आकृतियाँ तथा नागरी लिपि में 'रामतिय' शब्द खुदा हुआ था।
उत्तर: राष्ट्रकूट मूलतः कन्नड़-भाषी थे, किंतु उनके प्रारंभिक अभिलेख (जैसे दंतिदुर्ग का सामांगड दानपत्र 754 ई०) नागरी लिपि में मिलते हैं, जिससे सिद्ध होता है कि वे नागरी का व्यापक प्रयोग करते थे।
उत्तर: श्रवणबेलगोल में गोमटेश्वर की विशाल मूर्ति के पास 'श्रीगंगराज सुत्ताले करवावियले' जैसे प्राचीन मराठी वाक्य दक्षिणी शैली की नागरी लिपि में खुदे हुए हैं।
उत्तर: मेवाड़ के गुहिल, सांभर-अजमेर के चौहान, कन्नौज के गाहड़वाल, काठियावाड़ के सोलंकी, आबू के परमार, जेजाकभुक्ति के चंदेल और त्रिपुरी के कलचुरि शासकों के लेख नागरी लिपि में हैं।
उत्तर: 8वीं सदी में अवंती और बाद में कन्नौज पर शासन करने वाले गुर्जर-प्रतिहारों (जैसे मिहिर भोज और महेंद्रपाल) के सभी आधिकारिक राजकीय अभिलेख व प्रशस्तियाँ नागरी लिपि में ही प्राप्त होती हैं।
उत्तर: 13वीं सदी के यादव राजा रामचंद्र के ताम्रपत्रों में 'ए' और 'ओ' की मात्राएँ अक्षरों के ऊपर न लगकर उनके बाईं ओर लगाई गई हैं।
उत्तर: 11वीं सदी का दिवे-आगर ताम्रपत्र (1060 ई०) और अक्षी का शिलालेख (1012 ई०) नागरी लिपि में प्राप्त मराठी भाषा के प्राचीनतम आदिशिलालेख माने जाते हैं।
उत्तर: लिपि के ऐतिहासिक विकास को जानने से हमें अपनी सभ्यता, भाषा, साझी सांस्कृतिक एकता और प्राचीन भारतीय इतिहास की निरंतरता का ठोस बोध होता है।
उत्तर: प्राचीन काल में वे तत्कालीन क्षेत्रीय लिपियों में भी लिखी जाती थीं, किंतु मुद्रण आने के बाद संसार भर में संस्कृत-प्राकृत ग्रंथों के प्रकाशन के लिए देवनागरी को ही मुख्य रूप से अपनाया गया।
उत्तर: प्रस्तुत निबंध में विख्यात विद्वान गुणाकर मुले ने हिन्दी की लिपि 'नागरी' या 'देवनागरी' के ऐतिहासिक विकास, प्राचीनता और अखिल भारतीय स्वरूप का प्रामाणिक विवेचन किया है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि 8वीं से 11वीं सदी के मध्य नागरी लिपि का विस्तार उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक था। दक्षिण के राष्ट्रकूट, चोल, चेर, चालुक्य और विजयनगर के राजाओं ने अपने सिक्कों, ताम्रपत्रों और शिलाओं पर नागरी (नन्दिनागरी) का भरपूर प्रयोग किया। उत्तर भारत में प्रतिहार, परमार, चौहान और चंदेल शासकों ने इसे राजकीय लिपि बनाया। यहाँ तक कि गजनवी, गोरी, खिलजी, शेरशाह और अकबर जैसे मुस्लिम शासकों ने भी अपने सिक्कों पर नागरी शब्द खुदवाए। यह लिपि विभिन्न भारतीय भाषाओं (हिन्दी, मराठी, नेपाली, संस्कृत आदि) को एक सूत्र में जोड़ने वाली भारत की साझी ऐतिहासिक विरासत है।
उत्तर: नागरी और देवनागरी के नामकरण को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं:
- नागर ब्राह्मण मत: एक मत के अनुसार गुजरात के नागर ब्राह्मणों ने सबसे पहले इस लिपि का प्रयोग किया, इसलिए इसे 'नागरी' कहा गया।
- काशी (देवनगरी) मत: दूसरा मत है कि अन्य सभी नगर साधारण हैं, किंतु काशी 'देवनगरी' है; अतः काशी में प्रचलित लिपि 'देवनागरी' कहलाई।
- पाटलिपुत्र (देवनगर) मत: ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार प्राचीन काल में पाटलिपुत्र को 'नगर' कहा जाता था और गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का व्यक्तिगत नाम 'देव' था। अतः 'देवनगर' (पटना) की मुख्य लिपि होने के कारण इसका नाम 'देवनागरी' पड़ा।
उत्तर: दक्षिण भारत में नागरी लिपि का प्रयोग अत्यंत व्यापक था:
- राष्ट्रकूट शासक: दंतिदुर्ग का 754 ई० का सामांगड दानपत्र और एलोरा के कैलाश मंदिर के अभिलेख नागरी में हैं।
- चोल और चेर शासक: 11वीं सदी के प्रतापी राजा राजराज और राजेंद्र के सिक्कों तथा 12वीं सदी के केरल शासकों के सिक्कों पर नागरी में 'वीरकेरलस्य' अंकित है।
- पांड्य शासक: राजा वरगुण का 9वीं सदी का प्रसिद्ध 'पलियम ताम्रपत्र' संस्कृत भाषा और नागरी लिपि में है।
- विजयनगर साम्राज्य: 14वीं-15वीं सदी के विजयनगर के राजाओं के सभी आधिकारिक दानपत्र और वेदों की पांडुलिपियाँ नन्दिनागरी लिपि में ही लिपिबद्ध कराई गई थीं।
उत्तर: नागरी लिपि भारत की भाषाई और सांस्कृतिक एकता की आधारशिला रही है। मध्यकाल में जब देश में अनेक क्षेत्रीय भाषाएँ (मराठी, बंगाली, गुजराती आदि) जन्म ले रही थीं, तब नागरी लिपि ने समूचे भारत को एक प्रशासनिक और साहित्यिक सूत्र में बाँधे रखा। उत्तर भारत के राजपूत राजाओं से लेकर दक्षिण के हिंदू राजाओं और दिल्ली सल्तनत व मुगल काल के इस्लामी शासकों तक ने इस लिपि को अपनाया। आज भी हिन्दी, संस्कृत, मराठी और नेपाली जैसी प्रमुख भाषाएँ इसी लिपि में लिखी जाती हैं। अतः नागरी लिपि भारत की साझी अस्मिता और राष्ट्रीय चेतना की संवाहक है।
उत्तर:
- प्रसंग: प्रस्तुत गद्यांश इतिहास व पुरालिपिशास्त्र के अध्येता गुणाकर मुले द्वारा रचित निबंध 'नागरी लिपि' से उद्धृत है।
- व्याख्या: लेखक पुरातात्विक और ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष निकालते हैं कि आठवीं-नौवीं शताब्दी के दौरान नागरी लिपि किसी सीमित क्षेत्र की बोली या लिपि नहीं थी, बल्कि इसका प्रयोग समूचे भारत में शासकीय, धार्मिक और व्यापारिक कार्यों के लिए होता था। उत्तर के हिमालय से लेकर दक्षिण के समुद्र तट तक इसके अभिलेख मिलना इसे एक 'सार्वदेशिक लिपि' सिद्ध करता है। नागरी लिपि का यह राष्ट्रव्यापी प्रसार केवल अक्षरों का फैलाव नहीं था, बल्कि इसने भारत में प्रादेशिक भाषाओं के विकास, नए दार्शनिक संप्रदायों के उदय और भारतीय इतिहास में एक समन्वित, समृद्ध व एकीकृत सांस्कृतिक युग का सूत्रपात किया।
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