बिहार बोर्ड कक्षा 10 : वर्णिका (भाग-2)
पाठ 5: धरती कब तक घूमेगी
लेखक: साँवर दइया
प्रश्न 1 सीता अपने ही घर में क्यों घुटन महसूस करती है?
उत्तर: सीता अपने ही घर में घुटन इसलिए महसूस करती है क्योंकि पति की मृत्यु के बाद बेटों और बहुओं ने उसे एक बोझ समझ लिया है। भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद उसे अपने ही घर में आत्मीयता, सम्मान और प्यार नहीं मिलता। बेटों ने उसके दो वक्त के भोजन को लेकर आपस में बारी बाँध रखी है और बहुएँ बात-बात पर ताने कसती हैं। परिवार का यह संवेदनहीन, स्वार्थी और अपमानजनक व्यवहार सीता के हृदय को निरंतर आहत करता है, जिससे वह अपने ही घर में घुटन महसूस करती है।
प्रश्न 2 पाली बदलने पर अपने घर दादी माँ के खाने को लेकर बच्चे खुश होते हैं जबकि उनके माता-पिता नाखुश। बच्चे की खुशी और माता-पिता की नाखुशी के कारणों पर विचार करें।
उत्तर:
- बच्चों की खुशी का कारण: बच्चों का मन छल-कपट और स्वार्थ से परे तथा सरल होता है। वे अपनी दादी से अत्यधिक स्नेह करते हैं और उनके साथ मिलकर एक ही थाली में खाना खाने के उत्साह के कारण खुश होते हैं।
- माता-पिता की नाखुशी का कारण: बेटों और बहुओं की दृष्टि में माँ केवल एक आर्थिक और पारिवारिक बोझ है। वे माँ को प्रेम या सेवा का नहीं बल्कि केवल भोजन का अतिरिक्त खर्च मानते हैं। इसलिए जब दादी की पाली उनके यहाँ आती है, तो वे इसे आफत समझकर अप्रसन्न और दुखी होते हैं।
प्रश्न 3 ‘इस समय उसकी आँखों के आगे न तो अँधेरा था और न ही उसे धरती और आकाश के बीच घुटन हुई।’ – सप्रसंग व्याख्या करें।
उत्तर:
- प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक 'वर्णिका भाग-2' के पाठ 'धरती कब तक घूमेगी' से ली गई है, जिसके लेखक साँवर दइया हैं।
- व्याख्या: जब सीता के तीनों बेटों ने उसे पचास-पचास रुपये हर महीने देकर अपना खाना खुद पकाने का फैसला सुनाया, तो सीता के आत्मसम्मान को गहरी ठेस पहुँची। उसने महसूस किया कि जब अपने ही घर में मजदूरी जैसा व्यवहार सहना है, तो वह बाहर भी काम करके अपना पेट पाल सकती है। उसने घर छोड़कर निकल जाने का साहसिक निर्णय लिया। घर के संकीर्ण और अपमानजनक माहौल से बाहर निकलते ही उसके मन का संशय और निराशा समाप्त हो गई। उसे अपनी स्वतंत्रता और स्वाभिमान का अहसास हुआ, जिसके कारण उसके आगे से सारा अँधेरा हट गया और उसे असीम आकाश के नीचे खुली हवा में मुक्ति का अनुभव हुआ।
प्रश्न 4 सीता का चरित्र चित्रण करें।
उत्तर: सीता कहानी की मुख्य पात्र है, जिसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- सहनशील व मूक दर्शक: सीता बेटों और बहुओं के कटु वचन, ताने और अपमान को बिना किसी विरोध के चुपचाप सहती रहती है।
- ममतामयी माँ व दादी: वह अपने बच्चों और पोते-पोतियों से गहरा प्रेम करती है। बच्चों की देखभाल और घर के कामों में बिना स्वार्थ के हाथ बँटाती है।
- स्वाभिमानी स्त्री: सीता भिखारी की तरह टुकड़ों पर जीना पसंद नहीं करती। जब बेटों ने उसे ₹50-₹50 देकर अलग खाना बनाने का फरमान सुनाया, तो अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए उसने घर छोड़ने का दृढ़ निर्णय लिया।
- यथार्थवादी सोच: वह परिस्थिति की वास्तविकता को समझती है कि केवल पेट भरने के लिए स्वाभिमान को गिरवी नहीं रखा जा सकता।
प्रश्न 5 कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट करें।
उत्तर: कहानी का शीर्षक 'धरती कब तक घूमेगी' अत्यंत मार्मिक, प्रतीकात्मक और सार्थक है। जिस प्रकार धरती अपनी धुरी पर निरंतर घूमती रहती है और सब कुछ चुपचाप सहती है, उसी प्रकार सीता भी अपने तीनों बेटों के बीच एक-एक महीने के चक्र में लगातार घूमती रहती है। उसकी व्यथा और सहनशीलता की भी एक सीमा है। अंततः जब उसका स्वाभिमान जागता है, तो वह इस अंतहीन और अपमानजनक चक्र को तोड़कर बाहर निकल जाती है। यह शीर्षक सीता की अंतहीन पीड़ा और बदलते पारिवारिक मूल्यों पर गहरा कटाक्ष करता है।
प्रश्न 6 कहानी का सारांश प्रस्तुत करें।
उत्तर: 'धरती कब तक घूमेगी' एक वृद्ध और असहाय माँ 'सीता' के पारिवारिक उपेक्षा और संघर्ष की कारुणिक कथा है। पति की मृत्यु के बाद उसके तीन बेटे (कैलाश, नारायण और बिज्जू) माँ के दो वक्त के खाने को लेकर विवाद करते हैं और यह निर्णय लेते हैं कि माँ हर बेटे के साथ बारी-बारी से एक-एक महीना रहेगी।
सीता एक बेटे के घर से दूसरे बेटे के घर लुढ़कती रहती है, जहाँ उसे बहुओं (राधा, भँवरी और पुष्पा) के ताने और तिरस्कार झेलने पड़ते हैं। पाँच वर्ष इसी तरह अपमान में बीत जाने के बाद, बेटे माँ के लिए एक और क्रूर निर्णय लेते हैं कि तीनों उसे हर महीने पचास-पचास रुपये देंगे और वह अपनी रोटी खुद बनाकर खाएगी।
इस निर्णय से सीता का स्वाभिमान जाग उठता है। वह सोचती है कि जब दूसरों के घर बर्तन माँजकर भी पेट भरा जा सकता है, तो अपने ही बेटों के घर जिल्लत क्यों सही जाए। अगली सुबह सीता अपनी छोटी सी गठरी बाँधकर चुपचाप घर छोड़कर निकल जाती है। खुले आकाश के नीचे उसे आत्मसम्मान और वास्तविक मुक्ति का अहसास होता है।
सीता एक बेटे के घर से दूसरे बेटे के घर लुढ़कती रहती है, जहाँ उसे बहुओं (राधा, भँवरी और पुष्पा) के ताने और तिरस्कार झेलने पड़ते हैं। पाँच वर्ष इसी तरह अपमान में बीत जाने के बाद, बेटे माँ के लिए एक और क्रूर निर्णय लेते हैं कि तीनों उसे हर महीने पचास-पचास रुपये देंगे और वह अपनी रोटी खुद बनाकर खाएगी।
इस निर्णय से सीता का स्वाभिमान जाग उठता है। वह सोचती है कि जब दूसरों के घर बर्तन माँजकर भी पेट भरा जा सकता है, तो अपने ही बेटों के घर जिल्लत क्यों सही जाए। अगली सुबह सीता अपनी छोटी सी गठरी बाँधकर चुपचाप घर छोड़कर निकल जाती है। खुले आकाश के नीचे उसे आत्मसम्मान और वास्तविक मुक्ति का अहसास होता है।
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