बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिन्दी (गद्य खंड) | पाठ 4: "नाखून क्यों बढ़ते हैं" — आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
सम्पूर्ण 50 महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
उत्तर: यह एक ललित निबंध है और इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं।
उत्तर: सन् 1907 ई० में आरत दुबे का छपरा, बलिया (उत्तर प्रदेश) में।
उत्तर: 'आलोक पर्व' पर।
उत्तर: 'पद्मभूषण' से।
उत्तर: 'बाणभट्ट की आत्मकथा', 'चारुचंद्रलेख', 'पुनर्नवा' और 'अनामदास का पोथा'।
उत्तर: सन् 1979 में दिल्ली में।
उत्तर: लेखक की छोटी लड़की (पुत्री) ने।
उत्तर: 'अल्पज्ञ पिता' को।
उत्तर: जीवन-रक्षा के प्रमुख अस्त्र।
उत्तर: दधीचि मुनि की हड्डियों से।
उत्तर: आर्यों के पास लोहे के मजबूत अस्त्र और घोड़े थे।
उत्तर: एटम बम (परमाणु बम) पर।
उत्तर: हिरोशिमा के हत्याकांड में।
उत्तर: वात्स्यायन के 'कामसूत्र' से।
उत्तर: बड़े-बड़े नखों को।
उत्तर: छोटे नखों को।
उत्तर: मोम (सिक्थक) और आलता (अलक्तक) का।
उत्तर: अनजाने में होने वाली प्राकृतिक व जन्मजात स्मृतियों/क्रियाओं को (जैसे नाखून, केश बढ़ना)।
उत्तर: उसकी आदिम पाशविक वृत्ति (पशुता) का।
उत्तर: मनुष्यता और सौंदर्यबोध (संस्कृति) को।
उत्तर: अनधीनता या किसी की अधीनता का अभाव।
उत्तर: स्वतंत्रता, स्वराज्य और स्वाधीनता।
उत्तर: महाकवि कालिदास की।
उत्तर: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का।
उत्तर: निर्वैर भाव, सत्य और अक्रोध को।
उत्तर: सबके सुख-दुख को सहानुभूति के साथ देखने में।
उत्तर: महात्मा गाँधी ने।
उत्तर: जिस प्रकार मनुष्य की पूँछ झड़ गई, उसी प्रकार अनावश्यक अंग होने से नाखून भी झड़ जाएँगे।
उत्तर: चरितार्थता (प्रेम, मैत्री और त्याग) को।
उत्तर: 'सिक्थक' का अर्थ मोम और 'अलक्तक' का अर्थ आलता है।
उत्तर: लेखक यह सोचने पर विवश हो गया कि मनुष्य आज भी अपने भीतर की पशुता (नाखून) को क्यों ढो रहा है और वह किस दिशा में बढ़ रहा है—पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर।
उत्तर: आदिम काल में मनुष्य वनमानुष जैसा जंगली था। उस समय शिकार करने, प्रतिद्वंद्वियों से आत्मरक्षा करने और भोजन जुटाने के लिए नाखून ही उसके सबसे मुख्य अस्त्र थे।
उत्तर: देवासुर संग्राम में असुरों के विनाश के लिए दधीचि मुनि ने लोक-कल्याण हेतु अपनी अस्थियों का दान दिया था, जिनसे इंद्र का अमोघ वज्र बना। यह त्याग की पराकाष्ठा का प्रतीक है।
उत्तर: मनुष्य पहले नाखून और दाँतों पर निर्भर था; फिर उसने पत्थर के ढेले, पेड़ की शाखाएँ, हड्डियों के अस्त्र, लोहे के बाण, बंदूकें, तोपें और अंततः एटम बम जैसे संहारक अस्त्र बनाए।
उत्तर: नाखून का बढ़ना मनुष्य के भीतर की अंध, पाशविक और हिंसक वृत्ति का प्रतीक है, जबकि उन्हें काटना मनुष्यता, आत्म-नियंत्रण, दया और सभ्यता का प्रतीक है।
उत्तर: वात्स्यायन के कामसूत्र के अनुसार विलासी नागरिक नाखूनों को त्रिकोण, वर्तुल, चंद्राकार और दंतुल आकृतियों में काटकर मोम व आलते से लाल व चिकना बनाकर सँवारते थे।
उत्तर: नाखून का बढ़ना, केश (बाल) का बढ़ना, दाँत का दोबारा जमना और पलकों का गिरना मानव शरीर की चार प्रमुख अभ्यास-जन्य सहजात वृत्तियाँ हैं।
उत्तर: 'इंडिपेंडेंस' केवल किसी की अधीनता न होने की नकारात्मक स्थिति है, जबकि 'स्वाधीनता' में 'स्व' (अपने आप) द्वारा स्वयं पर लगाए गए नैतिक बंधनों और मर्यादाओं का भाव निहित है।
उत्तर: लेखक यह समझाना चाहते हैं कि हर प्राचीन रूढ़ि या सड़ी-गली परंपरा से केवल इसलिए चिपके रहना गलत है कि वह पुरानी है; हमें विवेक से हितकर चीजों को ही अपनाना चाहिए।
उत्तर: भले (बुद्धिमान) लोग पुरानी और नई दोनों बातों की परीक्षा करके जो कल्याणकारी होता है उसे ग्रहण करते हैं, जबकि मूढ़ (मूर्ख) लोग दूसरों के बहकावे में भटकते हैं।
उत्तर: आहार और निद्रा दोनों में समान हैं, किंतु मनुष्य में संयम, श्रद्धा, तप, त्याग और दूसरों के सुख-दुख के प्रति संवेदना होती है, जो उसे पशु से श्रेष्ठ बनाती है।
उत्तर: उन्होंने बाहर की मशीनरी और उपकरणों के बजाय भीतर झाँकने, मन से हिंसा, क्रोध व लोभ को दूर करने तथा लोक-कल्याण के लिए कष्ट सहने और प्रेम को अपनाने का मार्ग बताया था।
उत्तर: अस्त्र-शस्त्रों के संचय और बाह्य उपकरणों के बाहुल्य से विजय पाना 'सफलता' है, किंतु प्रेम, मैत्री, त्याग और सबके कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित कर देना 'चरितार्थता' है।
उत्तर: प्राणीशास्त्रियों के अनुसार जिस प्रकार विकास-क्रम में मनुष्य की अनावश्यक पूँछ झड़ गई, उसी प्रकार एक दिन नाखूनों का बढ़ना और मनुष्य की आंतरिक पशुता (हिंसा) भी समाप्त हो जाएगी।
उत्तर: उनके निबंधों में इतिहास, संस्कृति, दर्शन और लोक-जीवन का अनूठा समन्वय होता है; वे अत्यंत सरल प्रसंगों से उठाकर गूढ़ दार्शनिक सत्यों का अनावरण करते हैं।
उत्तर: प्रस्तुत निबंध में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक बालिका के सरल प्रश्न के बहाने मानव सभ्यता, संस्कृति और पशुता के द्वंद्व का गंभीर विश्लेषण किया है। लाखों वर्ष पूर्व नाखून मनुष्य के जीवन-रक्षा के अस्त्र थे। विकास के साथ मनुष्य ने पत्थरों, हड्डियों, धातुओं और आधुनिक काल में एटम बम जैसे भयानक अस्त्र बना लिए। प्रकृति आज भी नाखून बढ़ाकर मनुष्य को उसके पाशविक अतीत की याद दिलाती है, किंतु मनुष्य अपनी संस्कृति और चेतना के बल पर उन्हें बार-बार काट देता है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि अस्त्र-शस्त्रों को बढ़ाना पशुता की निशानी है और उन्हें रोकना मनुष्यता का तकाजा है। वास्तविक चरितार्थता हिंसा और संहारक अस्त्रों के संचय में नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, मैत्री और आत्म-संयम में है। अंततः लेखक विश्वास व्यक्त करते हैं कि मनुष्य अपनी पाशविक प्रवृत्तियों पर विजय अवश्य प्राप्त करेगा।
उत्तर: लेखक ने अस्त्र-शस्त्रों की होड़ को मनुष्य के पतन और विनाश का मार्ग बताया है। आदिम युग में नाखून ही हथियार थे, किंतु जैसे-जैसे सभ्यता बढ़ी, मनुष्य ने लोहे से लेकर परमाणु बम तक का आविष्कार कर लिया। हिरोशिमा का नरसंहार इस बात का प्रमाण है कि हथियारों की यह अंधी दौड़ संपूर्ण मानव जाति के अस्तित्व को संकट में डाल चुकी है। अस्त्र-शस्त्र मनुष्य के भीतर की क्रूरता, भय और आक्रामकता को बढ़ाते हैं। जब तक मनुष्य बाह्य हथियारों की ताकत बढ़ाता रहेगा, वह आत्मिक रूप से पशु ही बना रहेगा। मनुष्य की सच्ची पहचान विनाशक अस्त्रों में नहीं, बल्कि उन पर नियंत्रण लगाने और अहिंसा, प्रेम व बंधुत्व के मार्ग पर चलने में है। अतः अस्त्र-निर्माण की प्रवृत्ति सीधे तौर पर मनुष्यता के मूल्यों का हनन करती है।
उत्तर: लेखक 'इंडिपेंडेंस' और 'स्वाधीनता' के बीच गहरा अंतर स्पष्ट करते हैं। भारतवासियों ने स्वतंत्रता के लिए जिन शब्दों—स्वतंत्रता, स्वराज्य और स्वाधीनता—का चयन किया, उन सब में 'स्व' (आत्म) का भाव केंद्रीय है। इसका अर्थ यह है कि भारतीय संस्कृति स्वच्छंदता या अराजकता का समर्थन नहीं करती, बल्कि अपने आप पर अपने द्वारा लगाए गए संयम और नैतिक मर्यादाओं को सर्वोच्च मानती है। यह 'स्व' का बंधन ही मनुष्य को पशु से अलग करता है। दूसरों के सुख-दुख के प्रति सहानुभूति, सत्य, अक्रोध और त्याग हमारे दीर्घकालीन संस्कारों की देन हैं। लेखक का मानना है कि सच्चा स्वराज्य वही है जहाँ मनुष्य बाह्य दबावों के बिना अंतःकरण की प्रेरणा से आत्म-नियंत्रित होकर समाज के कल्याण में योगदान दे।
उत्तर: यह शीर्षक एक अत्यंत सहज, बाल-सुलभ और कौतूहलपूर्ण प्रश्न से आरंभ होता है, किंतु इसके गर्भ में मानव जाति के करोड़ों वर्षों के इतिहास, संस्कृति और भविष्य की गहरी चिंता समाहित है। 'नाखून का बढ़ना' केवल एक शारीरिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर दबी हुई आदिम पाशविकता, हिंसा और स्वार्थ का प्रतीक है। वहीं 'नाखून को काटना' मनुष्य के संस्कार, संयम, दया और मानवीय विकास का प्रतीक है। पूरा निबंध इसी एक प्रश्न के उत्तर की खोज में सभ्यता की पड़ताल करता है। यह शीर्षक पाठक को बाह्य रूप से आकर्षित करता है और आंतरिक रूप से गहरे आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है; अतः यह पूर्णतः सटीक और सार्थक है।
उत्तर:
- प्रसंग: प्रस्तुत गद्यांश मानवतावादी विचारक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित सुप्रसिद्ध ललित निबंध 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' से उद्धृत है।
- व्याख्या: लेखक जीवन के दो मूल्यों—सफलता और चरितार्थता—का अंतर स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि घातक हथियारों का संग्रह करके और भौतिक ऐशो-आराम के साधन जुटाकर मनुष्य सांसारिक प्रभुत्व या विजय प्राप्त कर सकता है, जिसे दुनिया 'सफलता' कहती है; किंतु यह मनुष्य का सर्वोच्च लक्ष्य नहीं है। मनुष्य का वास्तविक गौरव और सार्थकता (चरितार्थता) दूसरों के प्रति प्रेम, मित्रता, त्याग और बिना किसी स्वार्थ के प्राणी-मात्र के कल्याण के लिए सर्वस्व समर्पित करने में है। नाखून का बढ़ना पाशविक बल से भौतिक सफलता पाने की अंधी चेष्टा का प्रतीक है, जबकि विवेकपूर्वक उन्हें काट देना अंतःकरण के उन आत्म-संयमित बंधनों का परिणाम है जो मनुष्य को भौतिकता से ऊपर उठाकर सच्चे आत्मिक आनंद और मानवता (चरितार्थता) की ओर अग्रसर करते हैं।
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