Class 10 Hindi (गोधूलि भाग-2: गद्य खंड)
अध्याय 4: नाखून क्यों बढ़ते हैं (रचयिता: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी)
I. पाठ के साथ (प्रश्न-उत्तर)
प्रश्न 1: नाखून क्यों बढ़ते हैं? यह प्रश्न लेखक के आगे कैसे उपस्थित हुआ?
उत्तर:
नाखून क्यों बढ़ते हैं? यह प्रश्न लेखक के सामने तब उपस्थित हुआ जब उनकी छोटी लड़की ने उनसे सहज भाव में अचानक पूछ दिया कि "आदमी के नाखून क्यों बढ़ते हैं?" इस प्रश्न ने लेखक को सोच में डाल दिया और वे इस पर विचार करने के लिए विवश हो गए।
नाखून क्यों बढ़ते हैं? यह प्रश्न लेखक के सामने तब उपस्थित हुआ जब उनकी छोटी लड़की ने उनसे सहज भाव में अचानक पूछ दिया कि "आदमी के नाखून क्यों बढ़ते हैं?" इस प्रश्न ने लेखक को सोच में डाल दिया और वे इस पर विचार करने के लिए विवश हो गए।
प्रश्न 2: बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाती है?
उत्तर:
बढ़ते नाखूनों के माध्यम से प्रकृति मनुष्य को उसके अतीत की याद दिलाती है कि लाखों वर्ष पहले वह जंगली था, बनमानुष जैसा था और नाखून ही उसके रक्षा के अस्त्र थे। प्रकृति मनुष्य को यह चेतावनी देती है कि तुम्हारे भीतर पशुता के लक्षण (पाशविक वृत्ति) अभी भी विद्यमान हैं और तुम मूलतः पशु ही हो।
बढ़ते नाखूनों के माध्यम से प्रकृति मनुष्य को उसके अतीत की याद दिलाती है कि लाखों वर्ष पहले वह जंगली था, बनमानुष जैसा था और नाखून ही उसके रक्षा के अस्त्र थे। प्रकृति मनुष्य को यह चेतावनी देती है कि तुम्हारे भीतर पशुता के लक्षण (पाशविक वृत्ति) अभी भी विद्यमान हैं और तुम मूलतः पशु ही हो।
प्रश्न 3: लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप में देखना कहाँ तक संगत है?
उत्तर:
लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप में देखना पूर्णतः संगत है। मानव इतिहास के प्रारंभिक काल में जब मनुष्य जंगली था, तब जीवन-रक्षा तथा प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ने के लिए उसके पास कोई बाहरी हथियार नहीं थे। उस समय उसके अपने नाखून और दाँत ही उसके मुख्य अस्त्र-शस्त्र हुआ करते थे।
लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप में देखना पूर्णतः संगत है। मानव इतिहास के प्रारंभिक काल में जब मनुष्य जंगली था, तब जीवन-रक्षा तथा प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ने के लिए उसके पास कोई बाहरी हथियार नहीं थे। उस समय उसके अपने नाखून और दाँत ही उसके मुख्य अस्त्र-शस्त्र हुआ करते थे।
प्रश्न 4: मनुष्य बार-बार नाखूनों को क्यों काटता है?
उत्तर:
नाखून मनुष्य की पाशविक वृत्ति (पशुता) के प्रतीक हैं। मनुष्य अब अपनी पुरानी पशुता के चिह्नों को छोड़ना चाहता है और अपनी मनुष्यता तथा सौंदर्य-चेतना को कायम रखना चाहता है। इसलिए वह बार-बार बढ़ते नाखूनों को काटकर अपनी सभ्यता और संवेदनशीलता को प्रकट करता है।
नाखून मनुष्य की पाशविक वृत्ति (पशुता) के प्रतीक हैं। मनुष्य अब अपनी पुरानी पशुता के चिह्नों को छोड़ना चाहता है और अपनी मनुष्यता तथा सौंदर्य-चेतना को कायम रखना चाहता है। इसलिए वह बार-बार बढ़ते नाखूनों को काटकर अपनी सभ्यता और संवेदनशीलता को प्रकट करता है।
प्रश्न 5: सुकुमार विनोदों के लिए नाखून को उपयोग में लाना मनुष्य ने कैसे शुरू किया? लेखक ने इस संबंध में क्या बताया है?
उत्तर:
लेखक ने वात्स्यायन के 'कामसूत्र' के हवाले से बताया है कि लगभग दो हज़ार वर्ष पहले भारतवासी नाखूनों को काटकर सुंदर कलात्मक आकृतियों में सँवारते थे। वे नाखूनों को त्रिकोण, वर्तुलाकार, चंद्राकार, दंतुल आदि आकृतियों में काटते थे तथा मोम और आलता लगाकर उन्हें लाल व चिकना बनाते थे। इस प्रकार उन्होंने नाखूनों का उपयोग सुकुमार प्रसाधनों और सौंदर्य-विनोद के लिए करना शुरू किया था।
लेखक ने वात्स्यायन के 'कामसूत्र' के हवाले से बताया है कि लगभग दो हज़ार वर्ष पहले भारतवासी नाखूनों को काटकर सुंदर कलात्मक आकृतियों में सँवारते थे। वे नाखूनों को त्रिकोण, वर्तुलाकार, चंद्राकार, दंतुल आदि आकृतियों में काटते थे तथा मोम और आलता लगाकर उन्हें लाल व चिकना बनाते थे। इस प्रकार उन्होंने नाखूनों का उपयोग सुकुमार प्रसाधनों और सौंदर्य-विनोद के लिए करना शुरू किया था।
प्रश्न 6: नख बढ़ाना और उन्हें काटना कैसे मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं? इनका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
- नख बढ़ाना और काटना: नाखूनों का स्वतः बढ़ना मनुष्य के भीतर अज्ञान में छिपी 'पशुता की सहजात वृत्ति' का परिणाम है। दूसरी ओर, उन्हें काटना मनुष्य की अपनी इच्छा, विवेक और 'मनुष्यता की स्व-निर्धारित आत्म-बंधन वाली वृत्ति' है।
- अभिप्राय: नख बढ़ाना पशुत्व का प्रमाण है और नख काटना मनुष्यता की निशानी है।
प्रश्न 7: लेखक क्यों पूछता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर? स्पष्ट करें।
उत्तर:
लेखक आज के समय में एटम बम, मिसाइल और विनाशकारी अस्त्र-शस्त्रों की होड़ देखकर यह गंभीर प्रश्न पूछता है। यद्यपि मनुष्य नाखून काटता है, परंतु वह दूसरे भयंकर मारणास्त्रों का संचय कर रहा है जो पशुता का ही आधुनिक रूप हैं। इसलिए लेखक चिंतित होकर पूछता है कि अस्त्र-शस्त्रों को बढ़ाकर मनुष्य पशुता की ओर जा रहा है या हिंसा छोड़कर मनुष्यता की ओर बढ़ रहा है।
लेखक आज के समय में एटम बम, मिसाइल और विनाशकारी अस्त्र-शस्त्रों की होड़ देखकर यह गंभीर प्रश्न पूछता है। यद्यपि मनुष्य नाखून काटता है, परंतु वह दूसरे भयंकर मारणास्त्रों का संचय कर रहा है जो पशुता का ही आधुनिक रूप हैं। इसलिए लेखक चिंतित होकर पूछता है कि अस्त्र-शस्त्रों को बढ़ाकर मनुष्य पशुता की ओर जा रहा है या हिंसा छोड़कर मनुष्यता की ओर बढ़ रहा है।
प्रश्न 8: देश की आजादी के लिए प्रयुक्त किन शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करता है और लेखक के निष्कर्ष क्या हैं?
उत्तर:
- शब्दों की मीमांसा: लेखक अंग्रेजी शब्द 'इंडिपेंडेंस' (Independence) का अर्थ 'अनधीनता' (किसी पर आश्रित न होना) बताता है। वहीं भारतीय चिंतन में इसके स्थान पर 'स्वाधीनता', 'स्वतंत्रता' और 'स्वराज्य' शब्दों का प्रयोग हुआ है, जिनमें 'स्व' (अपना खुद का बंधन) जुड़ा हुआ है।
- लेखक का निष्कर्ष: भारतीय संस्कृति की मुख्य विशेषता अपने ऊपर अपने द्वारा लगाया गया बंधन (स्व-निर्धारित आत्म-बंधन) है, जो मनुष्य को अनुशासित और अनुप्राणित करता है।
प्रश्न 9: लेखक ने किस प्रसंग में कहा है कि बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती? लेखक का अभिप्राय स्पष्ट करें।
उत्तर:
- प्रसंग: अतीत के प्रति अत्यधिक मोह और अंधानुकरण के प्रसंग में लेखक ने यह बात कही है।
- अभिप्राय: जिस प्रकार एक बंदरिया अपने मरे हुए बच्चे को अपनी गोद में चिपकाए रखती है, उसी प्रकार हर पुरानी और सड़ी-गली परंपरा या विचार केवल प्राचीन होने के कारण हमेशा हितकर नहीं हो सकता। हमें बिना सोचे-समझे पुरानी रूढ़ियों से चिपके रहने के बजाय विवेकपूर्वक अच्छी बातों को ग्रहण करना चाहिए।
प्रश्न 10: 'स्वाधीनता' शब्द की सार्थकता लेखक क्या बताता है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार 'स्वाधीनता' शब्द का अर्थ है— "अपने ही अधीन रहना"। यह शब्द हमें यह सिखाता है कि वास्तविक स्वतंत्रता दूसरों की पराधीनता समाप्त करने में नहीं, बल्कि अपने मन, वचन और व्यवहार पर खुद का संयम व आत्म-नियंत्रण (स्व का बंधन) रखने में निहित है।
लेखक के अनुसार 'स्वाधीनता' शब्द का अर्थ है— "अपने ही अधीन रहना"। यह शब्द हमें यह सिखाता है कि वास्तविक स्वतंत्रता दूसरों की पराधीनता समाप्त करने में नहीं, बल्कि अपने मन, वचन और व्यवहार पर खुद का संयम व आत्म-नियंत्रण (स्व का बंधन) रखने में निहित है।
प्रश्न 11: निबंध में लेखक ने किस बूढ़े का ज़िक्र किया है? लेखक की दृष्टि में बूढ़े के कथनों की सार्थकता क्या है?
उत्तर:
- बूढ़े का ज़िक्र: निबंध में लेखक ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी (बूढ़े) का ज़िक्र किया है।
- कथनों की सार्थकता: गाँधीजी ने कहा था कि हिंसा को मन से दूर करो, क्रोध व द्वेष मिटाओ, सत्य, प्रेम, त्याग और अहिंसा को अपनाओ। बाहर के उपकरणों और मशीनी ताकत की जगह अपने भीतर की आत्म-शक्ति को बढ़ाओ। आज के हिंसाग्रस्त और अस्त्र-शस्त्रों की होड़ वाले युग में विश्व-शांति के लिए बूढ़े (गाँधीजी) के ये विचार अत्यंत सार्थक एवं अनिवार्य हैं।
प्रश्न 12: मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएँगे – प्राणिशास्त्रियों के इस अनुमान से लेखक के मन में कैसी आशा जगती है?
उत्तर:
प्राणिशास्त्रियों का मानना है कि जैसे क्रमिक विकास में मनुष्य की अनपेक्षित पूँछ गायब हो गई, वैसे ही एक दिन उसके नाखून बढ़ना भी बंद हो जाएँगे। इस अनुमान से लेखक के मन में आशा जगती है कि जिस दिन नाखून बढ़ना बंद होंगे, उसी दिन मनुष्य के भीतर की हिंसक पाशविक प्रवृत्ति और उसके द्वारा बनाए गए मारणास्त्र (परमाणु बम आदि) भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएँगे तथा पृथ्वी पर पूर्ण शांति स्थापित होगी।
प्राणिशास्त्रियों का मानना है कि जैसे क्रमिक विकास में मनुष्य की अनपेक्षित पूँछ गायब हो गई, वैसे ही एक दिन उसके नाखून बढ़ना भी बंद हो जाएँगे। इस अनुमान से लेखक के मन में आशा जगती है कि जिस दिन नाखून बढ़ना बंद होंगे, उसी दिन मनुष्य के भीतर की हिंसक पाशविक प्रवृत्ति और उसके द्वारा बनाए गए मारणास्त्र (परमाणु बम आदि) भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएँगे तथा पृथ्वी पर पूर्ण शांति स्थापित होगी।
प्रश्न 13: 'सफलता' और 'चरितार्थता' शब्दों में लेखक अर्थ की भिन्नता किस प्रकार प्रतिपादित करता है?
उत्तर:
- सफलता: मनुष्य बाह्य उपकरणों, अस्त्र-शस्त्रों के संचय और भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति को सफलता कह सकता है।
- चरितार्थता: मनुष्य की वास्तविक चरितार्थता प्रेम में, मैत्री में, त्याग में और सर्वमंगल के लिए अपने आप को समर्पित कर देने में है। अस्त्र-शस्त्रों का संचय सफलता तो हो सकता है, लेकिन चरितार्थता नहीं।
प्रश्न 14: व्याख्या करें –
(क) "काट दीजिए, वे चुपचाप दंड स्वीकार कर लेंगे; पर निर्लज्ज अपराधी की भाँति फिर छूटते ही सेंध पर हाजिर।"
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित ललित निबंध 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' से ली गई हैं।
व्याख्या: लेखक कहते हैं कि जब हम नाखूनों को काट देते हैं, तो वे बिना कोई विरोध किए कट जाते हैं, मानो चुपचाप सजा स्वीकार कर रहे हों। परंतु कुछ ही दिनों बाद वे ढीठ व निर्लज्ज अपराधी की तरह पुनः बढ़कर सामने आ जाते हैं। यह मनुष्य के भीतर छिपी पशुता के बार-बार उभरने का प्रतीक है।
(ख) "मैं मनुष्य के नाखून की ओर देखता हूँ तो कभी-कभी निराश हो जाता हूँ।"
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' पाठ से उद्धृत है।
व्याख्या: लेखक जब बढ़ते नाखूनों को देखते हैं, तो निराश हो जाते हैं क्योंकि नाखून इस बात का प्रमाण हैं कि लाखों वर्षों की सभ्यता के बाद भी मनुष्य के भीतर की पशुता समाप्त नहीं हुई है। वह आज भी नए-नए घातक हथियारों का निर्माण कर हिंसक बना हुआ है।
(ग) "कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा।"
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति निबंध का अंतिम सुविचारित निष्कर्ष है।
व्याख्या: लेखक यहाँ आशावादी दृष्टिकोण प्रकट करते हैं कि यदि अज्ञानवश नाखून (पशुता) बार-बार बढ़ते भी हैं, तो मनुष्य अपने विवेक, संयम और मानवीय संस्कारों के बल पर उन्हें हमेशा काटता रहेगा और पशुता पर मनुष्यता की विजय ध्वजा फहराएगा।
प्रश्न 15: लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी भारी विशेषता यह है कि इसने अपने ऊपर अपने द्वारा ही संयम और आत्म-बंधन (स्व का बंधन) लगाना सीखा है। भारतीय सोच में स्वतंत्रता को 'स्वाधीनता' और 'स्वराज्य' कहा गया है। दूसरों को दुख न पहुँचाना, त्याग, तप, संयम और सर्वजन-हिताय सोचना हमारी सांस्कृतिक चेतना का मूल आधार है।
लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी भारी विशेषता यह है कि इसने अपने ऊपर अपने द्वारा ही संयम और आत्म-बंधन (स्व का बंधन) लगाना सीखा है। भारतीय सोच में स्वतंत्रता को 'स्वाधीनता' और 'स्वराज्य' कहा गया है। दूसरों को दुख न पहुँचाना, त्याग, तप, संयम और सर्वजन-हिताय सोचना हमारी सांस्कृतिक चेतना का मूल आधार है।
प्रश्न 16: 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' का सारांश प्रस्तुत करें।
उत्तर:
सारांश:
'नाखून क्यों बढ़ते हैं' आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का एक प्रसिद्ध ललित निबंध है। लेखक की पुत्री के एक सहज प्रश्न से इस निबंध की शुरुआत होती है। लेखक विचार करते हैं कि आदिमानव काल में जब मनुष्य जंगली था, तब अपनी रक्षा के लिए नाखून ही उसके अस्त्र थे। धीरे-धीरे उसने पत्थर, हड्डियों और लोहे के अस्त्र बनाए और आज एटम बम जैसे विनाशकारी हथियारों तक पहुँच गया है।
नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की पाशविक वृत्ति (पशुता) का प्रतीक है, जबकि उन्हें काटना उसकी मनुष्यता, सभ्यता और सौंदर्य-बोध का प्रमाण है। निबंध में लेखक महात्मा गाँधी के विचारों का स्मरण कराते हैं कि बाह्य साधनों की वृद्धि करने के बजाय भीतर की अहिंसा, सत्य, प्रेम और त्याग की भावना को बढ़ाना चाहिए। अंत में लेखक यह विश्वास प्रकट करते हैं कि एक दिन ऐसा आएगा जब मनुष्य के नाखून और उसकी पाशविक प्रवृत्तियाँ दोनों हमेशा के लिए मिट जाएँगी।
सारांश:
'नाखून क्यों बढ़ते हैं' आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का एक प्रसिद्ध ललित निबंध है। लेखक की पुत्री के एक सहज प्रश्न से इस निबंध की शुरुआत होती है। लेखक विचार करते हैं कि आदिमानव काल में जब मनुष्य जंगली था, तब अपनी रक्षा के लिए नाखून ही उसके अस्त्र थे। धीरे-धीरे उसने पत्थर, हड्डियों और लोहे के अस्त्र बनाए और आज एटम बम जैसे विनाशकारी हथियारों तक पहुँच गया है।
नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की पाशविक वृत्ति (पशुता) का प्रतीक है, जबकि उन्हें काटना उसकी मनुष्यता, सभ्यता और सौंदर्य-बोध का प्रमाण है। निबंध में लेखक महात्मा गाँधी के विचारों का स्मरण कराते हैं कि बाह्य साधनों की वृद्धि करने के बजाय भीतर की अहिंसा, सत्य, प्रेम और त्याग की भावना को बढ़ाना चाहिए। अंत में लेखक यह विश्वास प्रकट करते हैं कि एक दिन ऐसा आएगा जब मनुष्य के नाखून और उसकी पाशविक प्रवृत्तियाँ दोनों हमेशा के लिए मिट जाएँगी।
II. पाठ के आस-पास
1. अपने शिक्षक से देवराज इंद्र और दधीचि मुनि की कथा मालूम करें।
उत्तर:
पौराणिक कथा के अनुसार, जब वृत्रासुर नामक दैत्य का उपद्रव बढ़ा और देवगण पराजित होने लगे, तो देवराज इंद्र ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी ने बताया कि यदि परम तपस्वी महर्षि दधीचि की हड्डियों से अस्त्र बनाया जाए, तो ही वृत्रासुर का वध संभव है। देव-कल्याण और संसार की रक्षा के लिए महर्षि दधीचि ने सहर्ष अपनी देह त्याग दी। उनकी हड्डियों से 'वज्र' का निर्माण हुआ, जिससे इंद्र ने असुरों का संहार किया।
पौराणिक कथा के अनुसार, जब वृत्रासुर नामक दैत्य का उपद्रव बढ़ा और देवगण पराजित होने लगे, तो देवराज इंद्र ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी ने बताया कि यदि परम तपस्वी महर्षि दधीचि की हड्डियों से अस्त्र बनाया जाए, तो ही वृत्रासुर का वध संभव है। देव-कल्याण और संसार की रक्षा के लिए महर्षि दधीचि ने सहर्ष अपनी देह त्याग दी। उनकी हड्डियों से 'वज्र' का निर्माण हुआ, जिससे इंद्र ने असुरों का संहार किया।
2. लेखक ने कालिदास के किस कथन का हवाला दिया है? उसका मूल रूप संस्कृत के शिक्षक से मालूम कर याद कर लें तथा उसके अर्थ को ध्यान में रखते हुए एक स्वतंत्र टिप्पणी लिखकर कक्षा में उसका पाठ करें।
उत्तर:
कालिदास का कथन (संस्कृत मूल):
"द्वंद्वं हि सर्वं न पुराणामित्येव साधु न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।"
(अर्थात्: "सब पुराने अच्छे नहीं होते और सब नए खराब नहीं होते। बुद्धिमान लोग दोनों की जाँच करके जो हितकर होता है, उसे ही ग्रहण करते हैं।")
टिप्पणी: कालिदास का यह कथन हमें विवेकशील बनने की प्रेरणा देता है। हमें अंधानुकरण से बचकर प्राचीन और आधुनिक दोनों विचारों में से केवल उसी तत्व को स्वीकारना चाहिए जो मानव कल्याण के लिए श्रेष्ठ हो।
"द्वंद्वं हि सर्वं न पुराणामित्येव साधु न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।"
(अर्थात्: "सब पुराने अच्छे नहीं होते और सब नए खराब नहीं होते। बुद्धिमान लोग दोनों की जाँच करके जो हितकर होता है, उसे ही ग्रहण करते हैं।")
3. समय-समय पर भारत में बाहर से आने वाली जातियों के नाम और समय अपने इतिहास के शिक्षक से मालूम करें।
उत्तर:
- आर्य: लगभग 1500 ई० पूर्व
- यूनानी (ग्रीक): चौथी सदी ई० पूर्व (सिकंदर का आक्रमण)
- शक एवं कुषाण: पहली-दूसरी सदी ई० पूर्व
- हूण: ५वीं-६ठी सदी ईस्वी
- अरब व तुर्क (मुस्लिम आक्रमणकारी): 8वीं से 12वीं सदी ईस्वी
- मुगल: 16वीं सदी ईस्वी
- यूरोपीय (पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी, अंग्रेज): 16वीं से 18वीं सदी ईस्वी
III. भाषा की बात
1. निम्नलिखित शब्दों के वचन बदलें –
| एकवचन शब्द | बहुवचन रूप |
|---|---|
| अल्पज्ञ | अल्पज्ञों |
| प्रतिद्वंद्वी | प्रतिद्वंद्वियों |
| हड्डी | हड्डियाँ |
| मुनि | मुनियों |
| अवशेष | अवशेषों |
| वस्तु | वस्तुएँ |
| उत्तराधिकार | उत्तराधिकारों |
| बाँदरिया (बंदरिया) | बँदरियाँ |
2. वाक्य-प्रयोग द्वारा निम्नलिखित शब्दों के लिंग-निर्णय करें –
| शब्द | लिंग | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|
| बंदूक | स्त्रीलिंग | सैनिक के पास नई बंदूक है। |
| घाट | पुल्लिंग | गंगा नदी का घाट बहुत सुंदर है। |
| सतह | स्त्रीलिंग | तालाब की सतह साफ दिख रही है। |
| अनुवर्ती | स्त्रीलिंग/विशेषण | यह पुरानी परंपरा की अनुवर्ती क्रिया है। |
| भंडार | पुल्लिंग | घर में अनाज का विशाल भंडार है। |
| खोज | स्त्रीलिंग | वैज्ञानिक नई औषधियों की खोज कर रहे हैं। |
| अंग | पुल्लिंग | नाखून शरीर का एक अंग है। |
| वस्तु | स्त्रीलिंग | यह बहुत कीमती वस्तु है। |
3. निम्नलिखित वाक्यों में क्रिया की काल रचना स्पष्ट करें –
- (क) उन दिनों उसे जूझना पड़ता था। ➔ अपूर्ण भूतकाल / अभ्यास बोधक भूतकाल
- (ख) मनुष्य और आगे बढ़ा। ➔ सामान्य भूतकाल
- (ग) यह सबको मालूम है। ➔ सामान्य वर्तमानकाल
- (घ) वह तो बढ़ती ही जा रही है। ➔ सातत्यबोधक (अपूर्ण) वर्तमानकाल
- (ङ) मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा। ➔ सामान्य भविष्यत्काल
4. "अस्त्र-शस्त्रों का बढ़ने देना मनुष्य को अपनी इच्छा की निशानी है और उनकी बाढ़ को रोकना मनुष्यत्व का तकाज़ा है।" -- इस वाक्य में आए विभक्ति चिह्नों के प्रकार बताएँ।
- का (अस्त्र-शस्त्रों का): संबंध कारक
- को (मनुष्य को): कर्म कारक
- की (इच्छा की): संबंध कारक
- को (बाढ़ को): कर्म कारक
- का (मनुष्यत्व का): संबंध कारक
5. 'स्वतंत्रता', 'स्वराज्य' जैसे शब्दों की तरह 'स्व' लगाकर पाँच शब्द बनाइए।
'स्व' प्रयुक्त शब्द: स्वाधीनता (स्व + अधीनता), स्वधर्म (स्व + धर्म), स्वदेशी (स्व + देशी), स्वभाव (स्व + भाव), स्वावलंबन (स्व + अवलंबन)।
6. निम्नलिखित के विलोम शब्द लिखें –
| मूल शब्द | विलोम शब्द |
|---|---|
| पशुता | मनुष्यता |
| घृणा | प्रेम |
| अभ्यास | अनभ्यास |
| मारणास्त्र | रक्षणशास्त्र / अहिंसा |
| ग्रहण | त्याग |
| मूढ़ | ज्ञानी / विद्वान |
| अनुवर्तित | अननुवर्तित |
| सत्याचरण | असत्याचरण |
IV. शब्द निधि (शब्दार्थ)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अल्पज्ञ | कम जानने वाला |
| दयनीय | दया करने योग्य |
| बेहया | बेपरवाह / निर्लज्ज |
| प्रतिद्वंद्वी | विरोधी |
| नखधर | नाखून धारण करने वाला |
| दंतावलंबी | दाँतों का सहारा लेकर जीने वाला |
| पाशविक वृत्ति | पशु जैसा स्वभाव एवं आचरण |
| सहजात वृत्ति | जन्म के साथ पैदा होने वाली आदत या स्वभाव |
| अनुसंधित्सा | अनुसंधान या खोज करने की प्रबल इच्छा |
| सर्वस्व | सब कुछ |
| उद्भावित | प्रकट की गई / विकसित की गई |
| चरितार्थता | सार्थकता |
| तक़ाज़ा | माँग / आवश्यकता |
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