Class 10 Hindi (गोधूलि भाग-2: काव्य खंड)
अध्याय 4: स्वदेशी (रचयिता: बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन')
I. कविता के साथ (प्रश्न-उत्तर)
प्रश्न 1: कविता के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कविता का शीर्षक 'स्वदेशी' पूर्णतः सार्थक और सोद्देश्य है। पूरी कविता में कवि बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' जी ने देश में घटती स्वदेशी भावना, भाषा, वेशभूषा, खान-पान और रीति-रिवाजों के प्रति चिंता व्यक्त की है। कवि ने भारतीयों द्वारा अंग्रेजी चाल-चलन और विदेशी वस्तुओं को अपनाने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हुए पुनः 'स्वदेशी' (अपनी भाषा और संस्कृति) को अपनाने की प्रेरणा दी है। अतः यह शीर्षक कविता के मूल भाव को सटीक रूप से अभिव्यक्त करता है।
कविता का शीर्षक 'स्वदेशी' पूर्णतः सार्थक और सोद्देश्य है। पूरी कविता में कवि बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' जी ने देश में घटती स्वदेशी भावना, भाषा, वेशभूषा, खान-पान और रीति-रिवाजों के प्रति चिंता व्यक्त की है। कवि ने भारतीयों द्वारा अंग्रेजी चाल-चलन और विदेशी वस्तुओं को अपनाने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हुए पुनः 'स्वदेशी' (अपनी भाषा और संस्कृति) को अपनाने की प्रेरणा दी है। अतः यह शीर्षक कविता के मूल भाव को सटीक रूप से अभिव्यक्त करता है।
प्रश्न 2: कवि को भारत में भारतीयता क्यों नहीं दिखाई पड़ती?
उत्तर:
कवि को भारत में भारतीयता इसलिए दिखाई नहीं पड़ती क्योंकि यहाँ के लोगों का खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा, रुचि, भाषा और व्यवहार पूरी तरह से विदेशी (अंग्रेजी) हो चुका है। भारतीय लोग अपनी मातृभाषा हिंदी बोलने और हिंदुस्तानी नाम सुनने में भी लजाते (शर्माते) हैं। समाज के हर क्षेत्र में अंग्रेजी संस्कृति हावी हो गई है, जिससे भारतीयता का लेश (तिल मात्र भी रूप) अब दिखाई नहीं देता।
कवि को भारत में भारतीयता इसलिए दिखाई नहीं पड़ती क्योंकि यहाँ के लोगों का खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा, रुचि, भाषा और व्यवहार पूरी तरह से विदेशी (अंग्रेजी) हो चुका है। भारतीय लोग अपनी मातृभाषा हिंदी बोलने और हिंदुस्तानी नाम सुनने में भी लजाते (शर्माते) हैं। समाज के हर क्षेत्र में अंग्रेजी संस्कृति हावी हो गई है, जिससे भारतीयता का लेश (तिल मात्र भी रूप) अब दिखाई नहीं देता।
प्रश्न 3: कवि समाज के किस वर्ग की आलोचना करता है और क्यों?
उत्तर:
कवि समाज के उच्च एवं मध्यम वर्ग (तथाकथित शिक्षित व संपन्न वर्ग) की आलोचना करता है।
कारण: यह वर्ग अपनी भाषा और संस्कृति को छोड़कर विदेशी (अंग्रेजी) विद्या, चाल-चलन और जीवनशैली को बड़े गर्व के साथ अपना रहा है। ये लोग अंग्रेजों की चाटुकारिता और खुशामद में लगे हैं तथा देश हित की जगह स्वार्थ और प्रदर्शन को प्राथमिकता दे रहे हैं।
कवि समाज के उच्च एवं मध्यम वर्ग (तथाकथित शिक्षित व संपन्न वर्ग) की आलोचना करता है।
कारण: यह वर्ग अपनी भाषा और संस्कृति को छोड़कर विदेशी (अंग्रेजी) विद्या, चाल-चलन और जीवनशैली को बड़े गर्व के साथ अपना रहा है। ये लोग अंग्रेजों की चाटुकारिता और खुशामद में लगे हैं तथा देश हित की जगह स्वार्थ और प्रदर्शन को प्राथमिकता दे रहे हैं।
प्रश्न 4: कवि नगर, बाज़ार और अर्थव्यवस्था पर क्या टिप्पणी करता है?
उत्तर:
कवि नगर, बाज़ार और अर्थव्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए कहता है कि भारत के नगरों का ढाँचा और लोगों का चाल-चलन अब पूरी तरह से अंग्रेजी हो गया है। बाज़ार विदेशी (अंग्रेजी) सामानों से भरे पड़े हैं और भारतीय बाज़ारों से स्वदेशी वस्तुएँ गायब हो गई हैं। इससे देश का धन विदेश जा रहा है और देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से विदेशी व्यापार पर निर्भर होकर खोखली हो रही है।
कवि नगर, बाज़ार और अर्थव्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए कहता है कि भारत के नगरों का ढाँचा और लोगों का चाल-चलन अब पूरी तरह से अंग्रेजी हो गया है। बाज़ार विदेशी (अंग्रेजी) सामानों से भरे पड़े हैं और भारतीय बाज़ारों से स्वदेशी वस्तुएँ गायब हो गई हैं। इससे देश का धन विदेश जा रहा है और देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से विदेशी व्यापार पर निर्भर होकर खोखली हो रही है।
प्रश्न 5: नेताओं के बारे में कवि की क्या राय है?
उत्तर:
नेताओं के बारे में कवि की राय अत्यंत व्यंग्यात्मक और निराशाजनक है। कवि कहता है कि जिन नेताओं से अपनी ढीली-ढाली धोती तक नहीं सँभलती, वे देश का प्रबंध और शासन चलाने का झूठा दावा करते हैं। ऐसे अयोग्य और स्वार्थी नेता देश को सही दिशा देने में पूरी तरह असमर्थ हैं।
नेताओं के बारे में कवि की राय अत्यंत व्यंग्यात्मक और निराशाजनक है। कवि कहता है कि जिन नेताओं से अपनी ढीली-ढाली धोती तक नहीं सँभलती, वे देश का प्रबंध और शासन चलाने का झूठा दावा करते हैं। ऐसे अयोग्य और स्वार्थी नेता देश को सही दिशा देने में पूरी तरह असमर्थ हैं।
प्रश्न 6: कवि ने 'डफाली' किसे कहा है और क्यों?
उत्तर:
कवि ने अंग्रेजी शासन की चाटुकारिता और झूठी प्रशंसा करने वाले चाटुकार (झूठी प्रशंसा करने वाले) भारतीयों को 'डफाली' कहा है।
कारण: जिस प्रकार डफाली (डफ बजाने वाला) केवल दूसरों को खुश करने के लिए ताल पर बजाता है, उसी प्रकार ये लोग अपने स्वार्थ के लिए अंग्रेजों की झूठी प्रशंसा और खुशामद के गीत गाते हैं।
कवि ने अंग्रेजी शासन की चाटुकारिता और झूठी प्रशंसा करने वाले चाटुकार (झूठी प्रशंसा करने वाले) भारतीयों को 'डफाली' कहा है।
कारण: जिस प्रकार डफाली (डफ बजाने वाला) केवल दूसरों को खुश करने के लिए ताल पर बजाता है, उसी प्रकार ये लोग अपने स्वार्थ के लिए अंग्रेजों की झूठी प्रशंसा और खुशामद के गीत गाते हैं।
प्रश्न 7: व्याख्या करें –
(क) "मनुज भारती देखि कोऊ, सकत नहीं पहिचान।"
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक 'गोधूलि भाग-2' की 'स्वदेशी' शीर्षक कविता से उद्धृत है, जिसके रचयिता भारतेंदु युग के कवि बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' हैं।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि विदेशी वेशभूषा, भाषा और आचार-विचार अपनाने के कारण आज किसी भारतीय मनुष्य को देखकर यह पहचान पाना भी असंभव हो गया है कि वह हिंदू है, मुसलमान है या ईसाई। सभी लोगों ने अपना मौलिक स्वरूप खो दिया है।
(ख) "अंग्रेजी रुचि, गृह, सकल वस्तु देस विपरीत।"
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' जी द्वारा रचित दोहे 'स्वदेशी' से ली गई है।
व्याख्या: कवि भारत की वर्तमान स्थिति का वर्णन करते हुए कहते हैं कि आज देश में लोगों की पसंद (रुचि), घर की बनावट, सजावट और प्रयोग में आने वाली सभी वस्तुएँ हमारे देश की मूल संस्कृति और जलवायु के विपरीत पूरी तरह से विदेशी (अंग्रेजी) हो चुकी हैं।
प्रश्न 8: आपके मत से स्वदेशी की भावना किस दोहे में सबसे अधिक प्रभावशाली है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
हमारे मत से स्वदेशी की भावना निम्नांकित दोहे में सबसे अधिक प्रभावशाली है:
हमारे मत से स्वदेशी की भावना निम्नांकित दोहे में सबसे अधिक प्रभावशाली है:
"बोलि सकत हिंदी नहीं, अब ये मिलि हिंदू लोग।
अंग्रेजी भाखन करत, अंग्रेजी उपभोग।।"
स्पष्टीकरण: यह दोहा सीधे हमारी मातृभाषा और स्वाभिमान पर प्रहार करता है। भाषा ही किसी संस्कृति की आत्मा होती है। जब देश के लोग अपनी ही भाषा हिंदी बोलने में हिचकिचाते हैं और विदेशी भाषा व वस्तुओं का उपभोग करते हैं, तो यह दोहा पाठक के मन में अपनी भाषा और स्वदेशी संस्कृति के प्रति लज्जा व पुनर्जागरण का सबसे गहरा प्रभाव छोड़ता है।
अंग्रेजी भाखन करत, अंग्रेजी उपभोग।।"
II. कविता के आस-पास
1. नवजागरण के बारे में अपने शिक्षक से जानकारी लें और एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
टिप्पणी: 'नवजागरण' (Renaissance) का अर्थ है— सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से पुनः जागना। १९वीं शताब्दी में भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन विचारकों (जैसे प्रेमघन) ने भारत में नवजागरण की नींव रखी। इसका मुख्य उद्देश्य अंधविश्वासों, सामाजिक कुरीतियों, विदेशी मानसिक परतंत्रता और अंग्रेजी शासन के कुप्रभावों से जनता को जागरूक कर उनमें स्वदेशी, देशप्रेम और राष्ट्रीय स्वाभिमान की भावना जगाना था।
टिप्पणी: 'नवजागरण' (Renaissance) का अर्थ है— सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से पुनः जागना। १९वीं शताब्दी में भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन विचारकों (जैसे प्रेमघन) ने भारत में नवजागरण की नींव रखी। इसका मुख्य उद्देश्य अंधविश्वासों, सामाजिक कुरीतियों, विदेशी मानसिक परतंत्रता और अंग्रेजी शासन के कुप्रभावों से जनता को जागरूक कर उनमें स्वदेशी, देशप्रेम और राष्ट्रीय स्वाभिमान की भावना जगाना था।
2. भारतेंदु हिंदी नवजागरण के अग्रदूत थे। इस संबंध में अपने शिक्षक से चर्चा करें।
उत्तर:
भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी साहित्य और हिंदी नवजागरण का 'अग्रदूत' माना जाता है। उन्होंने हिंदी भाषा के परिमार्जन के साथ-साथ अपनी पत्रिकाओं और नाटकों (जैसे 'भारत दुर्दशा') के माध्यम से देशवासियों में स्वदेशी चेतना, मातृभाषा प्रेम ("निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल") और देशानुराग का संदेश दिया। उन्होंने साहित्य को दरबारी चाटुकारिता से निकालकर सीधे जन-सामान्य की समस्याओं से जोड़ा।
भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी साहित्य और हिंदी नवजागरण का 'अग्रदूत' माना जाता है। उन्होंने हिंदी भाषा के परिमार्जन के साथ-साथ अपनी पत्रिकाओं और नाटकों (जैसे 'भारत दुर्दशा') के माध्यम से देशवासियों में स्वदेशी चेतना, मातृभाषा प्रेम ("निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल") और देशानुराग का संदेश दिया। उन्होंने साहित्य को दरबारी चाटुकारिता से निकालकर सीधे जन-सामान्य की समस्याओं से जोड़ा।
3. भारतेंदु हरिश्चंद्र के साथ प्रेमघन के संबंधों के बारे में भारतेंदु युग पर लिखी पुस्तकों की सहायता लेकर जानकारी प्राप्त करें।
उत्तर:
बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' भारतेंदु हरिश्चंद्र जी को अपना परम गुरु और आदर्श मानते थे। प्रेमघन जी भारतेंदु मंडल के प्रमुख और सक्रिय सदस्य थे। भारतेंदु जी के विचारों, देशभक्ति और साहित्यिक दिशा से प्रभावित होकर ही प्रेमघन जी ने मिर्ज़ापुर से साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन शुरू किया तथा राष्ट्रीय स्वाधीनता की चेतना को अपनी रचनाओं का मुख्य आधार बनाया।
बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' भारतेंदु हरिश्चंद्र जी को अपना परम गुरु और आदर्श मानते थे। प्रेमघन जी भारतेंदु मंडल के प्रमुख और सक्रिय सदस्य थे। भारतेंदु जी के विचारों, देशभक्ति और साहित्यिक दिशा से प्रभावित होकर ही प्रेमघन जी ने मिर्ज़ापुर से साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन शुरू किया तथा राष्ट्रीय स्वाधीनता की चेतना को अपनी रचनाओं का मुख्य आधार बनाया।
4. 'स्वदेशी' शीर्षक के अंतर्गत रखी जाने योग्य भारतेंदु युग के कवियों की कुछ रचनाएँ एकत्र कीजिए।
उत्तर:
- भारतेंदु हरिश्चंद्र: 'भारत दुर्दशा', 'निज भाषा उन्नति' (दोहावली)।
- प्रताप नारायण मिश्र: 'मन की लहर', 'हठी हम्मीर'।
- राधाचरण गोस्वामी: 'भारत-प्रशंसा'।
5. विद्यालय के पुस्तकालय से रामचंद्र शुक्ल का निबंध 'प्रेमघन की छाया स्मृति' खोजकर पढ़ें और शिक्षक एवं मित्रों से चर्चा करें।
उत्तर:
(विद्यार्थी आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा रचित संस्मरण/निबंध 'प्रेमघन की छाया स्मृति' को पुस्तकालय से लेकर स्वाध्याय करें। इसमें शुक्ल जी ने प्रेमघन जी के व्यक्तित्व, उनकी वेशभूषा, बातचीत की कला और साहित्यिक मंडलियों का अत्यंत सुंदर व सजीव वर्णन किया है।)
(विद्यार्थी आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा रचित संस्मरण/निबंध 'प्रेमघन की छाया स्मृति' को पुस्तकालय से लेकर स्वाध्याय करें। इसमें शुक्ल जी ने प्रेमघन जी के व्यक्तित्व, उनकी वेशभूषा, बातचीत की कला और साहित्यिक मंडलियों का अत्यंत सुंदर व सजीव वर्णन किया है।)
III. भाषा की बात
1. निम्नांकित शब्दों से विशेषण बनाएँ –
| मूल शब्द | विशेषण रूप |
|---|---|
| रुचि | रुचिकर / रुचिपूर्ण |
| देस (देश) | देशीय / देशी |
| नगर | नागरिक / नगरीय |
| प्रबंध | प्रबंधक / प्रबंधकीय |
| खयाल | खयाली |
| दास्ता (दासता) | दास |
| झूठ | झूठा |
| प्रशंसा | प्रशंसनीय / प्रशंसक |
2. निम्नांकित शब्दों का लिंग-निर्णय करते हुए वाक्य बनाएँ –
| शब्द | लिंग | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|
| चाल-चलन | पुल्लिंग | उसका चाल-चलन ठीक नहीं है। |
| खामख्याली | स्त्रीलिंग | ऐसी खामख्याली में रहना मूर्खता है। |
| खुशामद | स्त्रीलिंग | नेताओं की खुशामद करना बंद करो। |
| माल | पुल्लिंग | बाज़ार में अंग्रेजी माल भरा पड़ा है। |
| वस्तु | स्त्रीलिंग | स्वदेशी वस्तु का प्रयोग करना चाहिए। |
| वाहन | पुल्लिंग | सड़क पर नया वाहन चल रहा है। |
| रीत (रीति) | स्त्रीलिंग | यह पुरानी रीत अब बदल चुकी है। |
| हाट | स्त्रीलिंग / पुल्लिंग | आज गाँव में बड़ी हाट लगी है। |
| दासवृत्ति | स्त्रीलिंग | लोगों में दासवृत्ति बढ़ती जा रही है। |
3. कविता से संज्ञा पदों का चुनाव करें और उनके प्रकार भी बताएँ –
| संज्ञा पद | संज्ञा का प्रकार |
|---|---|
| वस्तु / माल / वाहन / गेह (गृह) | जातिवाचक संज्ञा |
| भारत / देश / परदेस | स्थानवाचक / जातिवाचक संज्ञा |
| मनुज / हिंदू / मुसलमान / क्रिस्तान | जातिवाचक संज्ञा |
| हिंदी / अंग्रेजी | व्यक्तिवाचक संज्ञा (भाषाएँ) |
| रीति / नीति / गति / चाल-चलन | भाववाचक संज्ञा |
| भारतीयता / चाल | भाववाचक संज्ञा |
| हाट / नगर | समूहवाचक / जातिवाचक संज्ञा |
| डफाली | जातिवाचक संज्ञा |
IV. शब्द निधि (शब्दार्थ)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मनुज | मनुष्य |
| लखात | दिखाई पड़ना / दिखना |
| भाखन | बोलना / भाषा |
| हाट | बाज़ार |
| जिनसों | जिनसे |
| खाम खयाली | व्यर्थ का विचार / कोरी कल्पना |
| दासवृत्ति | गुलामी का पेशा / चाटुकारिता |
| डफाली | डफ (बाजा) बजाने वाला / ढोलकिया |
0 Comments