Chapter 4. नाखून क्यों बढ़ते हैं | BSEB 10 Hindi Notes


पाठ 4: नाखून क्यों बढ़ते हैं

बिहार बोर्ड (BSEB) कक्षा 10वीं हिंदी (गोधूलि भाग-2, गद्य खंड) | सम्पूर्ण नोट्स

1. पाठ का संक्षिप्त परिचय (Overview)

  • पाठ का नाम: नाखून क्यों बढ़ते हैं
  • विधा: ललित निबंध
  • लेखक: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
  • संकलन स्रोत: 'हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली'
  • मूल भाव: एक अबोध बालिका के सरल प्रश्न के माध्यम से मानव सभ्यता, संस्कृति और इतिहास का गहन विश्लेषण। निबंध में लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की आदिम पाशविक वृत्ति (पशुता) और संघर्ष-चेतना का प्रमाण है, जबकि नाखूनों को काटना मनुष्यता, आत्म-संयम, सौंदर्यबोध और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है।

2. लेखक परिचय (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी)

  • जन्म: सन् 1907 ई० में आरत दुबे का छपरा, बलिया (उत्तर प्रदेश) में।
  • अध्ययन व भाषा ज्ञान: संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बाँग्ला आदि भाषाओं के साथ इतिहास, संस्कृति, धर्म और दर्शन के प्रकांड विद्वान।
  • कार्य/पेशा:
    • काशी हिंदू विश्वविद्यालय, शांति निकेतन विश्वविद्यालय और चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एवं प्रशासनिक पदों पर रहे।
    • लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा डी० लिट्० की मानद उपाधि।
  • निधन: सन् 1979 ई० में दिल्ली में।
  • प्रमुख कृतियाँ:
    • निबंध संग्रह: 'अशोक के फूल', 'कल्पलता', 'विचार और वितर्क', 'कुटज', 'विचार-प्रवाह', 'आलोक पर्व', 'प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद'।
    • उपन्यास: 'बाणभट्ट की आत्मकथा', 'चारुचंद्रलेख', 'पुनर्नवा', 'अनामदास का पोथा'।
    • आलोचना / साहित्येतिहास: 'सूर साहित्य', 'कबीर', 'मध्यकालीन बोध का स्वरूप', 'नाथ संप्रदाय', 'कालिदास की लालित्य योजना', 'हिंदी साहित्य का आदिकाल', 'हिंदी साहित्य की भूमिका', 'हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास'।
    • ग्रंथ संपादन: 'संदेशरासक', 'पृथ्वीराजरासो', 'नाथ-सिद्धों की बानियाँ'।
    • पत्रिका संपादन: 'विश्व भारती' (शांति निकेतन)।
  • पुरस्कार एवं सम्मान: 'आलोक पर्व' पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार, भारत सरकार द्वारा 'पद्मभूषण' सम्मान।

3. पाठ का विस्तृत सारांश एवं मुख्य विचार (Summary & Analysis)

बालिका का प्रश्न और लेखक की चिंता:

लेखक की छोटी लड़की ने एक दिन अचानक पूछ दिया—"आदमी के नाखून क्यों बढ़ते हैं?" इस सरल प्रश्न ने लेखक को सोचने पर विवश कर दिया। लेखक कहते हैं कि 'अल्पज्ञ पिता बड़ा दयनीय जीव होता है।'

नाखून: पाशविकता और आत्मरक्षा का आदिम रूप:

लाखों वर्ष पहले जब मनुष्य जंगली था (वनमानुष जैसा), तब नाखून ही उसके जीवन-रक्षा के प्रमुख अस्त्र थे। बाद में उसने पत्थर के ढेले, पेड़ों की डालों और हड्डियों के हथियार बनाए (जैसे दधीचि मुनि की हड्डियों से बना इंद्र का वज्र)। आगे चलकर धातु (लोहे) के अस्त्र-शस्त्र बने और आज मनुष्य परमाणु बम (एटम बम) तक पहुँच गया है।
प्रकृति आज भी मनुष्य को उसके आदिम हिंसक रूप की याद दिलाने के लिए नाखूनों को जिलाए जा रही है, परंतु मनुष्य अब बर्बर युग के इस अवशेष को मिटाना चाहता है।

नाखूनों का विलासिता और सौंदर्यबोध से जुड़ाव:

वात्स्यायन के 'कामसूत्र' से ज्ञात होता है कि लगभग 2,000 वर्ष पहले भारतवासी नाखूनों को तरह-तरह के आकारों में काटते थे—त्रिकोण, वर्तुलाकार, चंद्राकार, दंतुल आदि। उन्हें सिक्थक (मोम) और अलक्तक (आलता) से रँगकर चिकना और लाल बनाया जाता था। गौड़ देश के लोग बड़े नाखून और दाक्षिणात्य (दक्षिण भारत के) लोग छोटे नाखून पसंद करते थे।

सहजात वृत्तियाँ (अनजानी स्मृतियाँ):
मनुष्य के शरीर में कुछ ऐसी वृत्तियाँ हैं जो अनजाने में अपने-आप घटती हैं:
  • नाखूनों का बढ़ना
  • केशों (बालों) का बढ़ना
  • दाँतों का दोबारा जमना
  • पलकों का गिरना
नाखूनों का बढ़ना पशुत्व की सहजात वृत्ति है और उन्हें काटना मनुष्यता की पहचान है।
'स्वाधीनता' और 'स्व' का बंधन:

अंग्रेजी शब्द 'Independence' (अनधीनता) के स्थान पर भारतीयों ने 'स्वाधीनता', 'स्वतंत्रता' और 'स्वराज्य' जैसे शब्दों को अपनाया, जिनमें 'स्व' (अपने आप) का बंधन निहित है। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता अपने ऊपर स्वयं द्वारा लगाया गया अनुशासन और आत्म-नियंत्रण है।

महात्मा बुद्ध और गाँधी जी का संदेश:
  • गौतम बुद्ध ने कहा था कि मनुष्य की मनुष्यता दूसरों के सुख-दुख को सहानुभूति के साथ देखने में है।
  • एक बूढ़े (महात्मा गाँधी) ने कहा था कि बाहर नहीं, भीतर देखो; हिंसा, क्रोध और द्वेष को त्यागो और प्रेम व त्याग को अपनाओ। यद्यपि उस बूढ़े को गोली मार दी गई, फिर भी उनका विचार सत्य है।
सफलता बनाम चरितार्थता:
लेखक सफलता और चरितार्थता में अंतर स्पष्ट करते हैं—
  • सफलता: मारणास्त्रों के संचयन और भौतिक उपकरणों की बाह्य वृद्धि से प्राप्त होती है।
  • चरितार्थता: प्रेम, मैत्री, त्याग और निःशेष भाव से आत्म-समर्पण में है।
निष्कर्ष:

लेखक विश्वास व्यक्त करते हैं कि जिस प्रकार मानव शरीर से पूँछ झड़ गई, उसी प्रकार एक दिन मनुष्य के भीतर से पाशविक हिंसा और अस्त्र-शस्त्रों की होड़ भी समाप्त हो जाएगी।

"कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा।"

4. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य (Important One-Liners)

  • 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' ललित निबंध के लेखक कौन हैं — आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
  • हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म कब और कहाँ हुआ था — सन् 1907 ई० में आरत दुबे का छपरा, बलिया (उत्तर प्रदेश) में
  • द्विवेदी जी को किस निबंध संग्रह पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला — 'आलोक पर्व' पर
  • भारत सरकार द्वारा द्विवेदी जी को कौन-सा सम्मान दिया गया — पद्मभूषण
  • द्विवेदी जी का निधन कब हुआ — सन् 1979 ई० में दिल्ली में
  • लेखक से किसने पूछा कि 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' — लेखक की छोटी लड़की ने
  • 'अल्पज्ञ पिता कैसा जीव होता है' — दयनीय जीव
  • देवताओं के राजा (इंद्र) का वज्र किसकी हड्डियों से बना था — दधीचि मुनि की हड्डियों से
  • कामसूत्र के रचयिता कौन हैं — वात्स्यायन
  • प्राचीन काल में भारतवासी नाखूनों को किससे रँगते थे — सिक्थक (मोम) और अलक्तक (आलता) से
  • किस देश के लोग बड़े-बड़े नखों (नाखूनों) को पसंद करते थे — गौड़ देश के लोग
  • छोटे नाखूनों को कौन पसंद करते थे — दाक्षिणात्य (दक्षिण भारत के लोग)
  • नाखून का बढ़ना किसका प्रमाण है — मनुष्य की पाशविक वृत्ति (पशुता) का
  • नाखूनों को काटना किसका प्रतीक है — मनुष्यता, संयम और आत्म-नियंत्रण का
  • 'सहजात वृत्तियाँ' किसे कहते हैं — अनजानी स्मृतियों को (अनायास घटने वाली शारीरिक क्रियाओं को)
  • "सब पुराने अच्छे नहीं होते और सब नए खराब नहीं होते" — यह कथन किसका है — महाकवि कालिदास का
  • मनुष्य की चरितार्थता किसमें है — प्रेम, मैत्री, त्याग और आत्मोत्सर्ग में

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