Chapter 3. माँ (कहानी)
कक्षा 10वीं हिंदी (वर्णिका भाग-2) | सम्पूर्ण पाठ्य नोट्स एवं महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
पाठ परिचय (Overview)
- पाठ का नाम: माँ
- विधा: गुजराती कहानी (हिंदी अनुवाद)
- मुख्य पात्र: माँ (माजी), मंगु (जन्म से पागल और गूँगी पुत्री), कमु (मंगु की विवाहित बड़ी बहन), दो पुत्र और उनकी बहुएँ, कुसुम (गाँव की लड़की जो बाद में पागल हुई और ठीक हो गई)।
- केंद्रीय विषय: एक माँ की अपनी निशक्त, मानसिक रूप से अस्वस्थ संतान के प्रति अगाध, निस्वार्थ और करुणामयी ममता का चित्रण।
लेखक परिचय (Lekhak Parichay)
- लेखक: ईश्वर पेटलीकर
- भाषा: गुजराती भाषा के अत्यंत लोकप्रिय कथाकार
- प्रसिद्ध कृतियाँ: प्रसिद्ध कहानी — 'खून की सगाई'; लोकप्रिय उपन्यास — 'काला पानी'
- स्रोत/संकलन: गोपालदास नागर द्वारा संपादित एवं अनूदित कहानी संग्रह 'माँ' से साभार संकलित।
कहानी का सारांश (Summary)
१. मंगु और माँ का मातृत्व
मंगु जन्म से ही पागल और गूँगी है। माँ के चार बच्चे हैं (दो बेटे और दो बेटियाँ)। बाकी बच्चे सामान्य हैं और पुत्र शहर में कमाते हैं, पर माँ का सारा वात्सल्य और ममता मंगु पर ही न्योछावर रहता है। माँ अस्पतालों को 'अपंग जानवरों की गौशाला' मानकर मंगु को भर्ती कराने से हमेशा मना करती थीं।
२. अस्पताल के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव
गाँव के कन्या विद्यालय में पढ़ने वाली लड़की कुसुम जब पागल हुई, तो उसे अस्पताल भेजा गया। अस्पताल में इलाज के बाद वह पूरी तरह स्वस्थ होकर लौटी। कुसुम का सुधार देखकर माँ का अस्पताल के प्रति भय दूर हुआ और उन्होंने भारी मन से मंगु को अस्पताल भेजने का निश्चय किया।
३. अस्पताल में भर्ती
बड़े बेटे को पत्र भेजकर बुलाया गया और मजिस्ट्रेट का ऑर्डर लेकर माँ, बड़ा बेटा और मंगु अस्पताल पहुंचे। अस्पताल के डॉक्टर, मेट्रन और नर्सों के सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार को देखकर माँ ने भर्राए कंठ से मंगु की देखरेख की कई हिदायतें दीं और उसे भर्ती कराया।
४. माँ का मानसिक संतुलन खोना
मंगु को अस्पताल छोड़कर जब माँ घर लौटीं, तो रातभर सो नहीं सकीं। मंगु की याद, उसकी ठंड, भूख और अकेलेपन की चिंता उनके कलेजे को छलनी करती रही। भोर होते-होते पुत्र और ग्रामीणों ने चीख सुनी— "दौड़ो रे दौड़ो! मेरी मंगु को मार डाला रे..!" मंगु के विरह और गहन वेदना में माँ स्वयं पागल हो गईं और मंगु की श्रेणी में मिल गईं।
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