अध्याय 1: भारत : संसाधन एवं उपयोग (Part - 1) — Complete Question Answer Solution
नीचे अभ्यास के सभी 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs), 4 लघु उत्तरीय प्रश्न, 2 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न तथा परियोजना कार्य के बिंदुवार, सटीक और आसान भाषा में उत्तर प्रस्तुत हैं।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
प्रश्न 1. संसाधन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर: पर्यावरण में मौजूद वे सभी वस्तुएं या पदार्थ जो मानव की भौतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और जैविक आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, संसाधन कहलाते हैं। कोई भी वस्तु स्वतः संसाधन नहीं होती; जब मनुष्य अपनी बुद्धि, ज्ञान, कौशल और तकनीक का उपयोग करके उसे अपने लिए उपयोगी बनाता है, तब वह संसाधन बनती है।
जैसे—भूमि, जल, वन, खनिज, कोयला, वन्यजीव और स्वयं मनुष्य (मानव संसाधन)।
प्रश्न 2. संभावी एवं संचित-कोष संसाधन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
-
संभावी संसाधन (Potential Resources):
वे संसाधन जो किसी क्षेत्र में मौजूद हैं और जिनमें भविष्य में उपयोग की अपार संभावनाएँ हैं, परंतु वर्तमान में उचित तकनीक या पूँजी के अभाव में उनका पूरी क्षमता से उपयोग नहीं किया जा रहा है।
उदाहरण: राजस्थान और गुजरात में सौर ऊर्जा एवं पवन ऊर्जा की असीम संभावनाएँ। -
संचित-कोष संसाधन (Reserve Resources):
यह 'भंडार' संसाधन का ही एक भाग है, जिसके उपयोग की तकनीक तो उपलब्ध है, परंतु भविष्य की पीढ़ियों या भावी आवश्यकताओं को सुरक्षित रखने के लिए इसका उपयोग अभी सीमित या नियंत्रित रूप में किया जा रहा है।
उदाहरण: बांधों में संचित जल जिसका उपयोग भविष्य में बिजली बनाने के लिए सुरक्षित रखा गया है, अथवा नदियों का अप्रयुक्त जल।
प्रश्न 3. संसाधन संरक्षण की उपयोगिता को लिखिए।
उत्तर: संसाधनों का विवेकपूर्ण, नियोजित और मितव्ययिता के साथ उपयोग करना ही संसाधन संरक्षण है। इसकी उपयोगिता निम्नलिखित है:
- भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षा: कोयला, पेट्रोलियम जैसे अनवीकरणीय संसाधन सीमित हैं; संरक्षण से वे आने वाली पीढ़ियों के लिए बचे रहेंगे।
- पर्यावरणीय संतुलन: अंधाधुंध दोहन से प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, मृदा अपरदन और ओजोन क्षरण जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं, जिन्हें संरक्षण रोक सकता है।
- सतत आर्थिक प्रगति: संसाधनों का संतुलित दोहन आर्थिक विकास की निरंतरता को बिना किसी संकट के बनाए रखता है।
प्रश्न 4. संसाधन-निर्माण में तकनीक की क्या भूमिका है, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: संसाधन निर्माण में तकनीक (Technology) की केंद्रीय भूमिका होती है:
- प्रकृति में उपस्थित कोई भी पदार्थ तब तक केवल 'तत्व' मात्र रहता है जब तक कि उसे उपयोगी बनाने की तकनीक ज्ञात न हो।
- उदाहरण: नदियों में बहता पानी केवल जल था, परंतु जब मनुष्य ने टरबाइन और हाइड्रोइलेक्ट्रिक तकनीक विकसित की, तो वही जल 'पनबिजली संसाधन' बन गया।
- इसी तरह जमीन के भीतर दबा कच्चा पेट्रोलियम तकनीक के माध्यम से ही पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और प्लास्टिक के रूप में बहुमूल्य संसाधन में बदला जाता है। तकनीक ज्ञान के साथ मिलकर अनुपयोगी वस्तु को भी संसाधन का रूप दे देती है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
प्रश्न 1. संसाधन के विकास में 'सतत् विकास' की अवधारणा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सतत् पोषणीय विकास का अर्थ एक ऐसे आर्थिक और सामाजिक विकास से है, जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना किया जाए और वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति इस तरह करे कि आने वाली भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं और उनके अधिकारों के साथ कोई समझौता न हो।
- अंधाधुंध दोहन पर रोक: 20वीं सदी में मनुष्य ने औद्योगिक लाभ और लालच के कारण जंगलों, खनिजों और जलस्रोतों का अत्यधिक दोहन किया, जिससे पर्यावरण संकट (प्रदूषण, सूखा, बाढ़) पैदा हुआ। सतत् विकास इस अंधी दौड़ पर अंकुश लगाता है।
- संसाधनों का न्यायसंगत वितरण: यह सुनिश्चित करता है कि संसाधन केवल कुछ अमीर पूंजीपतियों के हाथों में केंद्रित न हों, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक उनका लाभ पहुँचे।
- अंतरराष्ट्रीय पहल: 1987 के ब्रुंटलैंड आयोग की रिपोर्ट ('हमारा साझा भविष्य' - Our Common Future) और 1992 के रियो डी जेनेरियो पृथ्वी सम्मेलन (Agenda 21) में सतत् विकास को वैश्विक स्तर पर स्वीकार किया गया।
प्रश्न 2. स्वामित्व के आधार पर संसाधन के विविध स्वरूपों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: स्वामित्व (Ownership) के आधार पर संसाधनों को चार मुख्य वर्गों में विभाजित किया गया है:
-
1. व्यक्तिगत संसाधन (Individual Resources):
वे संसाधन जिन पर किसी व्यक्ति विशेष या परिवार का कानूनी मालिकाना हक होता है और जिसके बदले वे सरकार को लगान या कर चुकाते हैं।
उदाहरण: किसानों की अपनी निजी भूमि, रिहायशी मकान, निजी बाग-बगीचे, कुएं, चारागाह और निजी तालाब। -
2. सामुदायिक संसाधन (Community Resources):
वे संसाधन जिनका स्वामित्व और उपभोग पूरे गाँव, मोहल्ले या समुदाय के सभी व्यक्तियों के लिए सुलभ होता है। किसी एक व्यक्ति का इस पर एकाधिकार नहीं होता।
उदाहरण: गाँव की शामलात भूमि, गोचर (चारागाह) भूमि, श्मशान घाट, कब्रिस्तान, तालाब, सार्वजनिक पार्क, खेल का मैदान और पिकनिक स्थल। -
3. राष्ट्रीय संसाधन (National Resources):
तकनीकी और कानूनी रूप से देश की भौगोलिक सीमा के भीतर पाए जाने वाले समस्त खनिज, जल, वन, वन्यजीव, भूमि और संपदा राष्ट्रीय संसाधन हैं। सरकार को जनकल्याण के लिए व्यक्तिगत भूमि का अधिग्रहण करने का भी कानूनी अधिकार होता है। इसके अलावा समुद्र तट से 19.2 किमी (12 नॉटिकल मील) तक का समुद्री क्षेत्र भी राष्ट्रीय संपत्ति है।
उदाहरण: देश के रेलवे मार्ग, नदियाँ, राष्ट्रीय राजमार्ग, कोयला व लोहे की खदानें। -
4. अंतर्राष्ट्रीय संसाधन (International Resources):
खुले समुद्र में किसी भी देश की तट रेखा से 200 समुद्री मील (अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र) से परे का विशाल खुला महासागरीय क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय संसाधन कहलाता है। इन संसाधनों पर किसी अकेले देश का अधिकार नहीं होता; इनका उपयोग संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति के बिना नहीं किया जा सकता।
परियोजना कार्य (Project Work)
1. विद्यालय में विषय शिक्षक से मिलकर एक संगोष्ठी का आयोजन करें, जिसमें उपयोग में आनेवाले संसाधनों के संरक्षण के उपाय पर चर्चा हो।
संगोष्ठी प्रारूप (विद्यार्थियों के प्रोजेक्ट हेतु रूपरेखा):
- विषय: 'दैनिक जीवन में संसाधनों का संरक्षण: हमारी साझी जिम्मेदारी'
- स्थान: विद्यालय सभागार
- मुख्य वक्ता: भूगोल विषय शिक्षक एवं छात्र प्रतिनिधि
- चर्चा के मुख्य बिंदु:
- कक्षा से बाहर निकलते समय बिजली के पंखे और बल्ब बंद करना (ऊर्जा संरक्षण)।
- विद्यालय परिसर में लगे नलों को खुला न छोड़ना और टपकते नलों की तुरंत मरम्मत (जल संरक्षण)।
- कागज़ के दोनों तरफ लिखना ताकि पेड़ों की कटाई कम हो (वन संरक्षण)।
- प्लास्टिक के स्थान पर कपड़े या जूट के थैलों का उपयोग करना।
2. अपने प्रखंड में उपलब्ध संभाव्य संसाधन का सर्वेक्षण कर उसके विकास पर आधारित एक प्रतिवेदन प्रस्तुत कीजिए।
सर्वेक्षण प्रतिवेदन प्रारूप (स्थानीय संदर्भ):
- प्रखंड का नाम: (विद्यार्थी अपने प्रखंड का नाम लिखें, उदा. बेतिया / मझौलिया)
- पहचाने गए संभाव्य संसाधन:
- सौर ऊर्जा: प्रखंड में वर्ष के अधिकांश महीनों में खिली धूप रहती है। बंजर और छतों पर सोलर पैनल लगाकर विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा उत्पादन की अपार संभावना है।
- बायोमास एवं कृषि अवशेष: गन्ने की खोई, धान की भूसी और मवेशियों के प्रचुर गोबर से बायोगैस और बायो-इथेनॉल संयंत्र लगाए जा सकते हैं।
- विकास हेतु सुझाव:
- किसानों को सोलर वाटर पंप लगाने के लिए सरकारी अनुदान दिया जाए।
- प्रखंड स्तर पर कृषि अपशिष्ट से खाद और बिजली बनाने के लघु उद्योग स्थापित किए जाएं।
इकाई 1 (क) भूमि एवं मृदा संसाधन (Part - 2) Solution
नीचे अभ्यास के सभी 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs), 5 लघु उत्तरीय प्रश्न, 3 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न तथा परियोजना कार्य के सटीक, बिंदुवार और सरल भाषा में उत्तर दिए गए हैं।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
प्रश्न 1. जलोढ़ मृदा के विस्तार वाले राज्यों के नाम बतावें। इस मृदा में कौन-कौन सी फसलें लगायी जा सकती हैं ?
उत्तर:
- विस्तार वाले प्रमुख राज्य: उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब, हरियाणा, असम और तटीय ओडिशा व आंध्र प्रदेश।
- उगाई जाने वाली प्रमुख फसलें: जलोढ़ मिट्टी पोटाश, चूना और फास्फोरस से युक्त अत्यधिक उपजाऊ होती है। इसमें मुख्य रूप से धान (चावल), गेहूँ, गन्ना, मक्का, दलहन (चना, मसूर) और जूट (पटसन) की भरपूर पैदावार होती है।
प्रश्न 2. समोच्च कृषि से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर: पहाड़ी और ढलान वाली भूमि पर ढाल के समानांतर खींची गई काल्पनिक समान ऊँचाई वाली रेखाओं (समोच्च रेखाओं) के अनुसार जुताई और मेड़बंदी करके खेती करने की पद्धति को 'समोच्च कृषि' (Contour Ploughing) कहते हैं। यह विधि ढलान पर बहते हुए वर्षा जल की गति को मंद कर देती है, जिससे मिट्टी का कटाव रुकता है और भूमि में नमी संचित रहती है।
प्रश्न 3. पवन अपरदन वाले क्षेत्र में कृषि की कौन-सी पद्धति उपयोगी मानी जाती है ?
उत्तर: पवन अपरदन (हवा द्वारा मिट्टी की ऊपरी परत का उड़ना) वाले शुष्क एवं मरुस्थलीय क्षेत्रों में 'पट्टिका कृषि' (Strip Cropping) सबसे उपयोगी पद्धति मानी जाती है। इसमें फसलों के बीच-बीच में घास की चौड़ी पट्टियाँ उगाई जाती हैं, जो हवा की गति को तोड़कर मिट्टी के उड़ने और कटाव को रोकती हैं। इसके अलावा खेतों के किनारों पर रक्षक मेखला (Shelter Belts) के रूप में पेड़ों की कतारें लगाना भी अत्यंत प्रभावी है।
प्रश्न 4. भारत के किन भागों में नदी डेल्टा का विकास हुआ है? यहाँ की मृदा की क्या विशेषता है।
उत्तर:
- डेल्टा विकास के क्षेत्र: भारत के पूर्वी तटीय मैदानों में बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली प्रमुख नदियों—महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी के मुहानों पर उपजाऊ नदी डेल्टा का निर्माण हुआ है (इसके साथ ही उत्तर में गंगा-ब्रह्मपुत्र का विशाल डेल्टा है)।
-
डेल्टाई मृदा की विशेषताएँ:
- यह बारीक कणों वाली नवीन जलोढ़ (खादर) मिट्टी होती है।
- इसमें ह्यूमस, पोटाश, फास्फोरस और चूने की प्रचुरता होती है।
- इसकी जल-धारण क्षमता उच्च होती है और यह अत्यधिक उपजाऊ होने के कारण चावल और जूट की सघन खेती के लिए सर्वोत्तम होती है।
प्रश्न 5. फसल चक्रण मृदा संरक्षण में किस प्रकार सहायक है ?
उत्तर: किसी निश्चित खेत में एक ही फसल को बार-बार उगाने के बजाय बदल-बदलकर विभिन्न फसलें बोने की वैज्ञानिक प्रक्रिया को फसल चक्रण कहते हैं।
- जब अनाज वाली फसलों (जैसे धान या गेहूँ) के बाद खेत में दलहनी या तिलहनी फसलें (जैसे चना, मटर, मूंग) उगाई जाती हैं, तो दलहन पौधों की जड़ों में मौजूद 'राइजोबियम' जीवाणु वायुमंडल से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में स्थिर करते हैं।
- इससे मिट्टी में बिना किसी रासायनिक खाद के प्राकृतिक रूप से पोषक तत्वों और नाइट्रोजन की पुनः पूर्ति हो जाती है, जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक सुरक्षित रहती है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
प्रश्न 1. जलाक्रांतता कैसे उपस्थित होता है ? मृदा अपरदन में इसकी क्या भूमिका है ?
उत्तर:
जब किसी कृषि क्षेत्र में आवश्यकता से अधिक जल भर दिया जाता है या नहरों व नलकूपों द्वारा लंबे समय तक अनियंत्रित सिंचाई की जाती है और वहाँ जल निकासी (Drainage) की उचित व्यवस्था नहीं होती, तो पानी जमीन के भीतर रिसकर भूजल स्तर को सतह के बिल्कुल करीब ले आता है। इस स्थिति को 'जलाक्रांतता' (Waterlogging) कहते हैं। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नहरी सिंचित क्षेत्रों में यह समस्या सर्वाधिक देखी जाती है।
- लवणता और क्षारीयता में वृद्धि: लगातार पानी भरा रहने से केशिका क्रिया (Capillary Action) द्वारा मिट्टी के निचले संस्तरों में मौजूद हानिकारक लवण (सोडियम और मैग्नीशियम के साल्ट) घुलकर सतह पर आ जाते हैं और पानी वाष्पीकृत होने के बाद सतह पर सफेद क्षारीय परत जम जाती है, जिससे उपजाऊ मिट्टी 'रेह' या 'ऊसर' (बंजर) में बदल जाती है।
- मिट्टी की संरचना का विघटन: पानी के ठहराव से मिट्टी के कणों के बीच मौजूद वायु के छिद्र बंद हो जाते हैं। पौधों की जड़ों को ऑक्सीजन न मिलने से वे सड़ने लगती हैं और मिट्टी की दानेदार बनावट बिखरकर कीचड़ और दलदल बन जाती है।
- अपरदन की सुगमता: दलदली और बंजर बनी मिट्टी पर वनस्पति नहीं उग पाती। पौधों की जड़ों की पकड़ खत्म होते ही वर्षा का पानी ऊपरी उपजाऊ परत को आसानी से बहाकर ले जाता है।
प्रश्न 2. मृदा संरक्षण पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर:
मृदा पृथ्वी पर जीवन का आधार है। भोजन, वस्त्र और आश्रय की पूर्ति किसी न किसी रूप में मिट्टी से ही होती है। किंतु मानवीय भूलों, वनों की अंधाधुंध कटाई, अनियंत्रित पशुचारण और अत्यधिक रासायनिक खादों के प्रयोग से मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत तेजी से कटकर बह रही है। मृदा के इस कटाव और क्षरण को रोकना तथा उसकी उर्वरा शक्ति को बनाए रखना ही मृदा संरक्षण कहलाता है।
- 1. सघन वृक्षारोपण (Afforestation): पेड़ों और घासों की जड़ें मिट्टी के कणों को आपस में मजबूती से बांधकर रखती हैं, जिससे तेज हवा और बहता पानी मिट्टी को नहीं काट पाता।
- 2. सोपानी एवं समोच्च जुताई: पहाड़ी और ढलान वाले क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर और ढाल के लंबवत जुताई करके जल प्रवाह को धीमा किया जाता है, जिससे पर्वतीय मिट्टी सुरक्षित रहती है।
- 3. पट्टिका कृषि एवं रक्षक मेखला: शुष्क और मरुस्थलीय भागों में हवा की दिशा के आड़े पेड़ों की कतारें (रक्षक मेखला) लगाकर और फसलों के बीच घास की पट्टियाँ उगाकर पवन अपरदन को रोका जाता है।
- 4. अवनालिका नियंत्रण (चेकडैम निर्माण): चंबल घाटी जैसे बीहड़ और गहरे खड्डों वाले क्षेत्रों में मिट्टी के बहाव को थामने के लिए छोटी-छोटी नालियों पर पत्थरों या लकड़ियों के बंधे (चेकडैम) बनाए जाने चाहिए।
- 5. संतुलित रासायनिक उपयोग व फसल चक्रण: खेतों में अत्यधिक कीटनाशकों और उर्वरकों के स्थान पर जैविक कम्पोस्ट खाद को बढ़ावा देना चाहिए तथा दलहनी फसलों के साथ फसल चक्र अपनाना चाहिए।
प्रश्न 3. भारत में अत्यधिक पशुधन होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग नगण्य है। स्पष्ट करें।
उत्तर: भारत विश्व में सबसे अधिक पशुधन (गाय, भैंस, बकरी आदि) रखने वाले देशों में शीर्ष स्थान पर है, किंतु देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसका अपेक्षित और वास्तविक योगदान बहुत कम (असंतोषजनक) है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
-
1. निम्न नस्ल और उत्पादकता:
भारत में अधिकांश मवेशी देसी और अनुत्पादक नस्ल के हैं। विकसित देशों (जैसे डेनमार्क, नीदरलैंड्स) की तुलना में भारतीय गाय-भैंसों की प्रति पशु दैनिक दूध उत्पादन क्षमता काफी कम है। -
2. पौष्टिक चारे और आहार का अभाव:
देश में कुल भौगोलिक क्षेत्र का मात्र 4% भाग ही स्थाई चारागाहों के अंतर्गत बचा है। चारे और पौष्टिक दाने की भारी कमी के कारण अधिकांश पशु कुपोषण के शिकार रहते हैं और कमजोर अवस्था में रहते हैं। -
3. वैज्ञानिक प्रबंधन एवं पशु चिकित्सा की कमी:
ग्रामीण भारत में वैज्ञानिक पशुपालन विधियों, उन्नत वीर्य संवर्धन (कृत्रिम गर्भाधान) और समय पर टीकाकरण की सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। खुरपका-मुंहपका जैसी बीमारियों से पशुधन असमय काल-कवलित हो जाता है। -
4. धार्मिक और सामाजिक मान्यताएँ:
भारतीय समाज में गोवंश के प्रति धार्मिक और भावनात्मक जुड़ाव है। इसके कारण जब गायें और बैल बूढ़े या अनुत्पादक (दूध न देने योग्य) हो जाते हैं, तब भी किसान आर्थिक विवशता के बावजूद उन्हें पालते हैं या वे आवारा मवेशियों के रूप में घूमते हैं, जिससे वे आय का स्रोत बनने के बजाय आर्थिक बोझ बन जाते हैं। -
5. संगठित डेयरी व प्रसंस्करण उद्योग का अभाव:
सहकारी दुग्ध समितियों (जैसे अमूल, सुधा) के प्रसार के बावजूद देश के विशाल ग्रामीण अंचलों में दूध, मक्खन, पनीर और चमड़ा प्रसंस्करण का संगठित ढांचा नहीं है, जिससे बिचौलियों के कारण पशुपालकों को उचित लाभ नहीं मिल पाता।
परियोजना कार्य (Project Work)
1. अपने आस-पास के क्षेत्र में उपलब्ध मृदा संसाधन के उपयोग एवं संरक्षण हेतु एक परियोजना तैयार करें।
प्रोजेक्ट प्रारूप (विद्यार्थियों के उपयोग हेतु):
- अध्ययन क्षेत्र: (स्थानीय गाँव या शहर का नाम लिखें)
- उपलब्ध मृदा का प्रकार: जलोढ़ मृदा (हल्की दोमट और बलुई मटियार)।
- वर्तमान उपयोग: मुख्य रूप से धान, गेहूँ, गन्ना और मौसमी सब्जियों (आलू, गोभी) की सघन खेती के लिए।
- स्थानीय समस्या: नलकूपों से अत्यधिक जलभराव और यूरिया खाद के अंधाधुंध इस्तेमाल से मिट्टी की ऊपरी सतह कड़ी हो रही है।
-
संरक्षण हेतु कार्ययोजना:
- रासायनिक उर्वरकों की जगह वर्मीकम्पोस्ट (केंचुआ खाद) और गोबर की सड़ी खाद का उपयोग बढ़ाना।
- सिंचाई के लिए प्लास्टिक पाइप या ड्रिप विधि का प्रयोग करना ताकि जलाक्रांतता न बने।
- मेड़ों पर शीशम, महोगनी या जामुन के पेड़ लगाना।
2. ग्राम प्रतिनिधि, विद्यालय प्रधान से मिलकर संसाधन संरक्षण एवं प्रबंधन पर एक संगोष्ठी का आयोजन करें।
संगोष्ठी आयोजन प्रतिवेदन (संकेत):
- स्थान: राजकीय उच्च विद्यालय परिसर
- अध्यक्षता: विद्यालय के प्रधानाध्यापक
- मुख्य अतिथि: स्थानीय मुखिया / ग्राम पंचायत प्रतिनिधि
-
विचार-विमर्श का सार:
- संगोष्ठी में गाँव के तालाबों और आहरों की सफाई कर वर्षा जल संचय करने का संकल्प लिया गया।
- मुखिया जी द्वारा आश्वासन दिया गया कि पंचायत फंड से गाँव की परती भूमि और नहर के तटबंधों पर फलदार व छायादार पौधे लगाए जाएंगे।
- विद्यालय के छात्रों ने किसानों के बीच रासायनिक खादों के विवेकपूर्ण उपयोग और पॉलिथीन मुक्त मिट्टी अभियान चलाने की जिम्मेदारी ली।
इकाई 1 (ख) जल संसाधन (Part - 3) Complete Solution
नीचे इस अभ्यास के सभी 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs), 5 लघु उत्तरीय प्रश्न, 2 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न, परियोजना कार्य तथा क्रियाकलाप के संपूर्ण एवं सटीक उत्तर प्रस्तुत हैं।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
प्रश्न 1. बहुउद्देशीय परियोजना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: नदियों पर बड़े बांध बनाकर केवल एक कार्य नहीं, बल्कि एक साथ अनेक लक्ष्यों की पूर्ति करने वाली योजना को 'बहुउद्देशीय परियोजना' (Multipurpose River Valley Project) कहते हैं।
इसके मुख्य उद्देश्यों में शामिल हैं:
- बाढ़ पर नियंत्रण पाना।
- खेतों की सिंचाई के लिए नहरें निकालना।
- जलविद्युत (पनबिजली) का उत्पादन करना।
- मत्स्य पालन (मछली पालन) और नौकायन (जल परिवहन) को बढ़ावा देना।
- मृदा अपरदन रोकना और पर्यटन केंद्रों का विकास करना।
उदा. भाखड़ा नांगल परियोजना, दामोदर घाटी परियोजना और कोसी परियोजना।
प्रश्न 2. जल संसाधन के क्या उपयोग हैं? लिखें।
उत्तर: जल संसाधन के प्रमुख उपयोग निम्नलिखित हैं:
- घरेलू कार्य: पीने, भोजन पकाने, नहाने, सफाई और कपड़े धोने में।
- कृषि कार्य: फसलों की सिंचाई, जलभराव और पशुपालन में।
- औद्योगिक उपयोग: कल-कारखानों में शीतलक (Coolant), विलायक और रासायनिक प्रक्रियाओं के लिए।
- ऊर्जा उत्पादन: जलविद्युत गृहों में टरबाइन चलाकर पनबिजली बनाने में।
- पर्यावरण व जैव-विविधता: जलीय जीवों के आवास और पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने में।
प्रश्न 3. अंतर्राज्यीय जल-विवाद के क्या कारण हैं?
उत्तर: जब कोई नदी एक से अधिक राज्यों से होकर बहती है, तो उसके जल के बंटवारे को लेकर राज्यों के बीच होने वाले झगड़े को अंतर्राज्यीय जल-विवाद कहते हैं। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- जल की सीमितता व बढ़ती मांग: जनसंख्या वृद्धि, औद्योगीकरण और नहरी सिंचाई के कारण प्रत्येक राज्य अधिक से अधिक पानी अपने क्षेत्र में रोकना चाहता है।
- बांधों का निर्माण: ऊपरी तटवर्ती राज्य द्वारा नदी पर बांध या जलाशय बना लेने से निचले राज्यों को ग्रीष्म ऋतु में पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता।
- जल विद्युत व राजस्व का बंटवारा: परियोजना से उत्पादित बिजली और लागत के बंटवारे को लेकर मतभेद होना।
उदा. कावेरी जल विवाद (तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच) तथा सतलुज-यमुना लिंक विवाद (पंजाब और हरियाणा के बीच)।
प्रश्न 4. जल संकट क्या है?
उत्तर: जब किसी क्षेत्र में जनसंख्या की मूलभूत आवश्यकताओं (पीने, स्वच्छता और कृषि) की पूर्ति के लिए पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ और सुरक्षित जल उपलब्ध नहीं हो पाता, तो उस स्थिति को 'जल संकट' (Water Scarcity) कहते हैं। जल संकट केवल पानी की भौतिक कमी से ही नहीं, बल्कि उपलब्ध जल के अत्यधिक प्रदूषित होकर अनुपयोगी हो जाने के कारण भी उत्पन्न होता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार जब प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता एक निश्चित सीमा से कम हो जाती है, तो वह क्षेत्र गंभीर जल संकट ग्रस्त माना जाता है।
प्रश्न 5. भारत की नदियों के प्रदूषण के कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: भारत की पवित्र और जीवनदायिनी नदियों के निरंतर प्रदूषित होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- औद्योगिक अपशिष्ट का विसर्जन: चमड़ा, रासायनिक, कपड़ा और कागज कारखानों से निकलने वाले जहरीले रसायनों और तेजाब को बिना उपचारित किए सीधे नदियों में बहा दिया जाता है।
- शहरी सीवरेज और मैला: शहरों की घनी आबादी का गंदा नाला, सीवर का पानी और ठोस कचरा सीधे नदियों में गिरता है।
- कृषि रसायनों का रिसाव: खेतों में डाले जाने वाले कीटनाशक और रासायनिक उर्वरक वर्षा जल के साथ बहकर नदियों में मिलकर जल को विषैला बना देते हैं।
- धार्मिक और सामाजिक प्रथाएं: नदियों में अधजले शवों, मूर्तियों के विसर्जन, पूजा सामग्री और साबुन लगाकर नहाने से भी प्रदूषण तेजी से बढ़ता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
प्रश्न 1. जल संरक्षण से आप क्या समझते हैं? इसके क्या उपाय हैं?
उत्तर:
जल एक सीमित प्राकृतिक संपदा है। जल के अविवेकपूर्ण दोहन, बर्बादी और प्रदूषण को रोककर उसका न्यायसंगत, वैज्ञानिक और किफायती उपयोग करना तथा वर्षा जल को संचित कर भूमिगत जल स्तर को बढ़ाना ही 'जल संरक्षण' (Water Conservation) कहलाता है।
-
1. वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting):
भवनों की छतों और खुले प्रांगणों से गिरने वाले वर्षा जल को भूमिगत टैंकों, गड्ढों या रिचार्ज बोरवेल में जमा कर भूजल स्तर को रिचार्ज करना चाहिए। तमिलनाडु जैसे राज्यों में इसे घरों के लिए कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया गया है। -
2. आधुनिक और वैज्ञानिक सिंचाई प्रणाली:
परंपरागत रूप से खेतों में पानी भरने (बाढ़ विधि) के स्थान पर 'टपकन सिंचाई' (Drip Irrigation) और 'फव्वारा सिंचाई' (Sprinkler) का उपयोग किया जाए, जिससे 50% से अधिक पानी की बचत होती है। -
3. औद्योगिक जल का शोधन एवं पुनर्चक्रण (Recycling):
कारखानों के अपशिष्ट जल को 'एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट' (ETP) द्वारा शुद्ध कर पुनः ठंडा करने या बागवानी के उपयोग में लाया जाना चाहिए। -
4. भूजल दोहन पर कानूनी नियंत्रण:
घरेलू और व्यावसायिक कार्यों के लिए सबमर्सिबल पंपों द्वारा भूजल के अनियंत्रित निष्कर्षण पर कड़े नियम और वाटर मीटर लगाए जाएं। -
5. पारंपरिक जलस्रोतों का जीर्णोद्धार:
गाँवों के पुराने तालाबों, पोखरों, कुओं, आहर और पइन की नियमित उड़ाही (सफाई) की जाए ताकि वे वर्षा जल को अधिक मात्रा में रोक सकें। -
6. जन-जागरूकता अभियान:
विद्यालयों और समाज में 'जल ही जीवन है' के संदेश को आत्मसात कराया जाए और घरेलू स्तर पर नलों को खुला छोड़ने की आदत को बदला जाए।
प्रश्न 2. वर्षा जल की मानव जीवन में क्या भूमिका है ? इसके संग्रहण व पुनः चक्रण के विधियों का उल्लेख करें।
उत्तर:
वर्षा जल (Rainwater) पृथ्वी पर ताजे और मीठे पानी का प्राथमिक एवं सबसे शुद्ध प्राकृतिक स्रोत है।
- यह समस्त नदियों, झीलों, तालाबों और भूमिगत जल स्रोतों को पुनः भरने (Recharge) का एकमात्र प्राकृतिक माध्यम है।
- भारत जैसे कृषि प्रधान देश में खाद्यान्न सुरक्षा और करोड़ों किसानों की आजीविका सीधे मानसूनी वर्षा की मात्रा पर टिकी है।
- यह वातावरण के तापमान को नियंत्रित करता है, वनों को जीवन देता है और पीने योग्य जल का संकट दूर करता है।
-
1. छत जल संचयन (Rooftop Rainwater Harvesting):
मकानों की छत पर गिरने वाले बारिश के पानी को पीवीसी पाइपों के माध्यम से एक फिल्टर चैंबर (बालू, कंकड़ और चारकोल युक्त) से गुजारकर भूमिगत जलकुंड (टांका/हौज) में जमा किया जाता है। इस पानी का उपयोग सूखे महीनों में सीधे कपड़े धोने और उबालकर पीने के लिए किया जा सकता है। -
2. पुनर्भरण खंदक एवं सोख्ता गड्ढे (Recharge Pits & Trenches):
मैदानों और सड़कों के किनारे 1 से 2 मीटर चौड़े और 3 मीटर गहरे गड्ढे बनाए जाते हैं जिनमें बजरी और बालू भरा होता है। वर्षा का अपवाह जल इसमें गिरकर सीधे धरती की निचली परतों में रिस जाता है, जिससे आसपास के कुओं और बोरवेल का जलस्तर ऊपर उठ जाता है। -
3. सेवा कूप (Recharge Wells):
सूखे पड़े या अनुपयोगी नलकूपों/हैंडपंपों को वर्षा जल पाइपलाइन से जोड़कर सीधे गहरे जलभरों (Aquifers) तक साफ पानी उतारा जाता है। -
4. चेकडैम और जलसंभर (Watershed) प्रबंधन:
पहाड़ी और ढलानी नालों पर छोटे-छोटे पत्थरों या सीमेंट के आड़े बंधे (Check Dams) बनाकर बहते पानी की गति को रोका जाता है, जिससे मिट्टी भी कटने से बचती है और पानी जमीन में समा जाता है। -
5. पारंपरिक आहर-पइन एवं जोहड़ प्रणाली:
बिहार की पारंपरिक 'आहर-पइन' और राजस्थान के 'जोहड़' वर्षा के पानी को बड़े पोखरों में रोककर रबी फसलों की सिंचाई और पशुओं के लिए सुरक्षित रखते हैं।
परियोजना कार्य (Project Work)
अपने विद्यालय के आस-पास बहने वाली नदियों के जल-उपयोग पर एक परियोजना तैयार करें।
प्रोजेक्ट प्रारूप (विद्यार्थियों की फाइल हेतु):
- नदी का नाम: (स्थानीय संदर्भ अनुसार लिखें, उदा. गंडक / सिकरहना / पुनपुन / गंगा नदी)
- भौगोलिक स्थिति: विद्यालय से लगभग 2 से 3 किलोमीटर की दूरी पर प्रवाहित।
-
प्रमुख जल उपयोग का सर्वेक्षण:
- सिंचाई: नदी से निकली छोटी नहरों और डीजल पंपसेटों द्वारा समीपवर्ती खेतों में धान और सब्जियों की सिंचाई की जाती है।
- पशुपालन: गाँव के मवेशियों (भैंस, गाय) को नहलाने और पानी पिलाने के लिए उपयोग।
- घरेलू व दैनिक कार्य: तटवर्ती आबादी द्वारा कपड़े धोने और स्नान के लिए उपयोग।
- मत्स्य पालन: स्थानीय मल्लाह परिवारों द्वारा मछली पकड़कर दैनिक आजीविका चलाना।
- पर्यावरणीय अवलोकन: नदी किनारे पॉलिथीन और पूजा सामग्री फेंकने से तट के पास जल गंदा हो रहा है, जिसके संरक्षण हेतु विद्यालय की इको-क्लब टीम द्वारा स्वच्छता अभियान चलाया जाना चाहिए।
क्रियाकलाप (Activities)
1. अपने आस-पास के क्षेत्रों में भूमिगत जल-स्तर वृद्धि के स्रोतों की तलाश करें एवं उसकी योजना बनायें।
-
पहचाने गए स्रोत:
- विद्यालय परिसर और घरों की पक्की छतों का व्यर्थ बहता बारिश का पानी।
- सार्वजनिक चापाकलों (हैंडपंपों) के पास लगातार बहकर नालियों में जाने वाला पानी।
- गाँव के किनारे स्थित सूखे और गाद से भरे पुराने तालाब।
-
कार्ययोजना:
- विद्यालय की छत पर पाइप जोड़कर खेल के मैदान के कोने में एक सोख्ता गड्ढा (Soak Pit) बनाया जाए।
- चापाकलों के पास 3 फीट गहरा सोख्ता चेंबर तैयार किया जाए ताकि बर्बाद पानी सीधे भूगर्भ में जाए और कीचड़ न फैले।
- ग्राम पंचायत के सहयोग से मनरेगा योजना के तहत गाँव के तालाब की गहरी खुदाई (उड़ाही) करवाई जाए ताकि अधिक वर्षा जल संचित हो सके।
2. अंतर्राज्यीय जल विवाद की सूची तैयार करें :
| विवादित नदी का नाम | संबंधित राज्यों के नाम | विवाद का मुख्य कारण |
|---|---|---|
| कावेरी नदी | तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल एवं पुडुचेरी | कृष्णराज सागर बांध और मेट्टूर बांध के जल बंटवारे को लेकर। |
| कृष्णा नदी | महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना | अलमट्टी बांध की ऊंचाई और सिंचाई जल आवंटन। |
| गोदावरी नदी | महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश एवं ओडिशा | जल प्रवाह और सहायक नदियों पर बैराज निर्माण को लेकर। |
| नर्मदा नदी | मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र एवं राजस्थान | सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई और जल-विद्युत व पानी का हिस्सा। |
| सतलुज-यमुना (SYL) | पंजाब और हरियाणा | सतलुज-यमुना लिंक नहर के निर्माण और रावी-व्यास जल के बंटवारे पर। |
इकाई 1 (ग) वन एवं वन्य प्राणी संसाधन (Part - 4) Complete Solution
नीचे पाठ्यपुस्तक के सभी 15 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs), 10 लघु उत्तरीय प्रश्न तथा 5 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न के बिंदुवार, सटीक और आसान भाषा में उत्तर प्रस्तुत हैं।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
प्रश्न 1. बिहार में वन सम्पदा की वर्तमान स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर: 15 नवंबर 2000 को बिहार से झारखंड के विभाजन के उपरांत राज्य की अधिकांश वन संपदा झारखंड में चली गई।
- वर्तमान में बिहार के कुल 94,163 वर्ग किमी भौगोलिक क्षेत्रफल के मात्र 7.74% (लगभग 6374 वर्ग किमी) भाग पर ही वनों का विस्तार है।
- राज्य के अधिकांश मैदानी जिलों (जैसे शेखपुरा, सीवान, बक्सर, गोपालगंज) में वन क्षेत्र 1% से भी कम है।
- वनों का मुख्य संकेन्द्रण पश्चिमी चम्पारण की सोमेश्वर पहाड़ियों और दक्षिण-पश्चिमी सीमावर्ती जिलों जैसे कैमूर, रोहतास, गया, नवादा, जमुई और बांका में पाया जाता है।
प्रश्न 2. वन विनाश के मुख्य कारकों को लिखिये।
उत्तर: भारत में वनों के तेजी से नष्ट होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- कृषि भूमि का विस्तार: बढ़ती आबादी के पेट भरने के लिए जंगलों को साफ करके खेतों में बदला गया।
- नदी घाटी परियोजनाएँ एवं बांध: बड़े बांधों के जलाशयों में डूबने के कारण हजारों हेक्टेयर सघन वन जलमग्न होकर नष्ट हो गए (जैसे नर्मदा सागर परियोजना)।
- पूर्वोत्तर में झूम (स्थानांतरी) खेती: जंगलों को काटकर व जलाकर की जाने वाली खेती से वन आवरण घटा है।
- खनन कार्य व औद्योगीकरण: लोहे, कोयले और खनिजों की खदानों तथा रेलवे व सड़कों के विस्तार हेतु पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हुई।
प्रश्न 3. वन के पर्यावरणीय महत्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर: वन पर्यावरण के सुरक्षा कवच हैं। इनका पर्यावरणीय महत्व इस प्रकार है:
- ऑक्सीजन की आपूर्ति: वन प्रकाश-संश्लेषण द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर प्राणवायु (ऑक्सीजन) प्रदान करते हैं।
- वर्षा एवं जलवायु संतुलन: ये बादलों को आकर्षित कर पर्याप्त वर्षा कराने और तापमान को नियंत्रित रखने में सहायक होते हैं।
- मृदा संरक्षण व बाढ़ नियंत्रण: पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधकर कटाव रोकती हैं और वर्षा जल के तेज बहाव को धीमा कर बाढ़ की विभीषिका कम करती हैं।
- जैव-विविधता का आश्रय: लाखों पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों को प्राकृतिक आवास और आहार प्रदान करते हैं।
प्रश्न 4. वन्य-जीवों के ह्रास के चार प्रमुख कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: वन्य जीवों की संख्या में आ रही भारी गिरावट के चार मुख्य कारक निम्नलिखित हैं:
- प्राकृतिक आवासों का विनाश: वनों के कटने, नगरीकरण और सड़कों के निर्माण से जंगली जानवरों के रहने और छिपने की जगहें छिन गई हैं।
- अवैध शिकार (Poaching): खाल, सींग, दांत, हड्डियों और पंखों के लालच में तस्करों द्वारा वन्य जीवों का निर्मम शिकार।
- प्रदूषण एवं विषाक्त रसायन: खेतों में कीटनाशकों के छिड़काव और औद्योगिक कचरे से जल व वायु प्रदूषित होकर वन्य जीवों की मृत्यु का कारण बन रहे हैं।
- दावानल (जंगलों की आग): गर्मियों में जंगलों में लगने वाली भीषण आग से अनगिनत दुर्लभ जीव और उनके अंडे-बच्चे जलकर भस्म हो जाते हैं।
प्रश्न 5. वन और वन्य जीवों के संरक्षण में सहयोगी रीति रिवाजों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में प्रकृति व जीवों को देवताओं का दर्जा दिया गया है:
- वृक्षों की पूजा: पीपल, बरगद (वट), नीम, तुलसी, आम और बेल के वृक्षों को पवित्र मानकर काटना पाप माना जाता है, जिससे इनका स्वतः संरक्षण होता है।
- पवित्र उपवन (Sacred Groves): जनजातीय समाजों में जंगलों के एक हिस्से को देवी-देवताओं का थान (सरना) मानकर छुआ तक नहीं जाता।
- जीवों का धार्मिक महत्व: मोर को कार्तिकेय का वाहन, गरुड़ को भगवान विष्णु का वाहन, चूहे को गणेश का और बाघ को दुर्गा का वाहन मानकर उनकी रक्षा की जाती है। राजस्थान का बिश्नोई समाज काले हिरण और खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा के लिए अपनी जान तक न्योछावर करने को तत्पर रहता है।
प्रश्न 6. चिपको आन्दोलन क्या है?
उत्तर: 'चिपको आंदोलन' 1970 के दशक के आरंभ में वर्तमान उत्तराखंड के चमोली (टिहरी गढ़वाल) जिले में शुरू हुआ एक प्रसिद्ध पर्यावरण-संरक्षण आंदोलन था।
- जब ठेकेदारों द्वारा खेल उपकरण बनाने के लिए अंगू के पेड़ों की कटाई शुरू की गई, तो सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट और गौरा देवी के नेतृत्व में स्थानीय महिलाओं और ग्रामीणों ने पेड़ों से चिपककर (लिपटकर) उन्हें काटने से रोक दिया।
- इस अहिंसक आंदोलन के कारण तत्कालीन सरकार को हिमालयी क्षेत्रों में 15 वर्षों तक पेड़ों की कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना पड़ा।
प्रश्न 7. कैंसर रोग के उपचार में वन का क्या योगदान है?
उत्तर: वनों से हमें अनगिनत जीवनरक्षक औषधियाँ प्राप्त होती हैं। हिमालयी क्षेत्र (हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश) में पाया जाने वाला 'चीड़' जाति का सदाबहार पौधा 'हिमालयन यव' (Taxus wallichiana) कैंसर के उपचार में वरदान है।
- इसकी छाल, पत्तियों, टहनियों और जड़ों से 'टेक्सोल' (Taxol) नामक रासायनिक सत्व निकाला जाता है।
- यह रसायन स्तन कैंसर और गर्भाशय कैंसर के इलाज की प्रमुख दवाओं में उपयोग किया जाता है। विश्व में सर्वाधिक बिकने वाली कैंसर रोधी औषधियाँ इसी वनस्पति से तैयार की जाती हैं।
प्रश्न 8. दस लुप्त होने वाले पशु-पक्षियों का नाम लिखिए।
उत्तर: भारत में विलुप्त हो चुके अथवा विलुप्त होने की कगार पर खड़े (संकटग्रस्त) 10 प्रमुख पशु-पक्षी निम्नलिखित हैं:
- पशु: (1) एशियाई चीता, (2) कस्तूरी मृग, (3) जावा गैंडा, (4) हंगुल (कश्मीरी बारहसिंगा), (5) हिम तेंदुआ।
- पक्षी: (6) गुलाबी सिर वाली बत्तख (Pink-headed Duck), (7) पहाड़ी बटेर (Mountain Quail), (8) जंगली चित्तीदार उल्लू (Forest Owlet), (9) गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड), (10) गिद्ध (Vulture)।
प्रश्न 9. वन्य-जीवों के ह्रास में प्रदूषण जनित समस्याओं पर अपना विचार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: औद्योगिक और कृषि प्रदूषण ने वन्य जीवों के जीवन तंत्र को बुरी तरह क्षतिग्रस्त किया है:
- जल स्रोतों का विषाक्त होना: कारखानों के रासायनिक अपशिष्ट नदियों और वन के ताल-तलैयों में मिलने से वह पानी पीने वाले जंगली जानवर असमय मौत का शिकार होते हैं।
- कीटनाशकों की खाद्य श्रृंखला में एंट्री: खेतों में डाले जाने वाले डीडीटी और रासायनिक कीटनाशकों को खाने वाले कीटों और चूहों को जब गिद्ध, चील या बाज खाते हैं, तो जैव-आवर्धन (Biomagnification) के कारण उनके अंडों के छिलके पतले हो जाते हैं और वे फूट जाते हैं, जिससे पक्षियों की संख्या तेजी से घटी है (उदा. डाइक्लोफेनाक दवा से गिद्धों का विनाश)।
- वायु व ध्वनि प्रदूषण: जंगलों के बीच से गुजरने वाले हाईवे और खदानों के तेज शोर से वन्य जीवों की प्रजनन क्षमता और मानसिक व्यवहार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
प्रश्न 10. भारत के दो प्रमुख जैवमंडल क्षेत्र का नाम, क्षेत्रफल एवं राज्यों का नाम बताएँ।
उत्तर:
-
1. नंदा देवी जैवमंडल क्षेत्र:
राज्य: उत्तराखंड | क्षेत्रफल: लगभग 5,860.69 वर्ग किलोमीटर -
2. नीलगिरि जैवमंडल क्षेत्र:
राज्य: तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक (तीनों राज्यों का मिलन स्थल) | क्षेत्रफल: लगभग 5,520 वर्ग किलोमीटर
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
प्रश्न 1. वन एवं वन्य जीवों के महत्त्व का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर: वन और वन्य जीव प्रकृति के दो ऐसे अभिन्न अंग हैं जिनके बिना पृथ्वी पर मानव सभ्यता की निरंतरता असंभव है। इनके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
-
1. पारिस्थितिक एवं पर्यावरणीय महत्व:
वन वायुमंडल में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के अनुपात को संतुलित रखते हैं। ये जल चक्र को नियमित करते हैं, वर्षा को आकर्षित करते हैं और अपनी जड़ों से मिट्टी को बांधकर भू-अपरदन व रेगिस्तान के प्रसार को रोकते हैं। वन्य प्राणी खाद्य श्रृंखला (Food Chain) और खाद्य जाल (Food Web) को बनाए रखते हैं। यदि जंगल से मांसाहारी जीव (शेर, बाघ) खत्म हो जाएं, तो शाकाहारी जीवों की संख्या इतनी बढ़ जाएगी कि वे सारी वनस्पति चट कर जाएंगे। -
2. आर्थिक एवं औद्योगिक महत्व:
वनों से हमें बहुमूल्य इमारती लकड़ी (सागवान, सखुआ, शीशम), जलावन, गोंद, लाख, राल, कत्था, रबर, बेंत और कागज उद्योग के लिए बांस व लुगदी प्राप्त होती है। राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के जरिए 'इको-टूरिज्म' (पर्यावरण पर्यटन) का विकास होता है, जिससे सरकार को राजस्व और स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है। -
3. औषधीय महत्व:
भारतीय वनों में लगभग 50,000 पादप प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से हजारों का उपयोग आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा में होता है। सर्पगंधा (रक्तचाप हेतु), जामुन (मधुमेह हेतु), तुलसी, नीम, हर्रे-बहेड़ा और हिमालयन यव (कैंसर उपचार) इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। -
4. सांस्कृतिक एवं भावनात्मक महत्व:
वन हमारे ऋषि-मुनियों की तपोभूमि और वैदिक संस्कृति का पालना रहे हैं। भारतीय लोकजीवन में प्रकृति की रक्षा को ईश्वरीय आराधना माना गया है।
प्रश्न 2. वृक्षों के घनत्व के आधार पर वनों का वर्गीकरण कीजिए और सभी वर्गों का वर्णन विस्तार से कीजिए।
उत्तर: भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) द्वारा कैनोपी घनत्व (वृक्षों के छत्र के फैलाव) के आधार पर वनों को पाँच प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है:
-
1. अत्यंत सघन वन (Very Dense Forests):
पहचान: जिस वन क्षेत्र में वृक्षों का छत्र घनत्व 70% या उससे अधिक होता है, उसे अत्यंत सघन वन कहते हैं। यहाँ सूर्य का प्रकाश भी धरातल तक कठिनाई से पहुँचता है।
वितरण: यह कुल वन क्षेत्र का बहुत छोटा हिस्सा है। यह मुख्यतः पूर्वोत्तर राज्यों (अरुणाचल प्रदेश, असम), अंडमान-निकोबार और पश्चिमी घाट के ढलानों पर पाया जाता है। -
2. सघन वन (Dense / Moderately Dense Forests):
पहचान: जिन वनों में कैनोपी का घनत्व 40% से 70% के बीच होता है।
वितरण: देश के लगभग 73,604 वर्ग किमी क्षेत्र में विस्तृत हैं। यह मध्य प्रदेश, ओडिशा, उत्तराखंड, महाराष्ट्र और हिमालय के तराई क्षेत्रों में फैले हुए हैं। -
3. खुले वन (Open Forests):
पहचान: जहाँ वृक्षों का घनत्व 10% से 40% के बीच होता है। यहाँ पेड़ दूर-दूर होते हैं और बीच में झाड़ियाँ व घास पाई जाती हैं।
वितरण: यह लगभग 2.59 लाख वर्ग किमी में फैले हैं। राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के सूखे पठारी भागों में इनका बाहुल्य है। -
4. झाड़ियाँ एवं अल्प सघन वन (Shrubs / Mangrove):
पहचान: जहाँ वृक्षों का घनत्व 10% से भी कम होता है। यहाँ केवल कंटीली झाड़ियाँ, कैक्टस और बबूल पनपते हैं।
वितरण: राजस्थान के थार मरुस्थल और पंजाब-हरियाणा के शुष्क सीमावर्ती भागों में पाए जाते हैं। -
5. मैंग्रोव (तटीय/ज्वारीय वन):
पहचान: खारे पानी और दलदली मिट्टी में उगने वाले विशेष वन।
वितरण: पश्चिम बंगाल का सुंदरवन, अंडमान-निकोबार तथा गुजरात और ओडिशा के तटीय डेल्टाई भागों में।
प्रश्न 3. जैव विविधता क्या है? यह मानव के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं? विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों, जंगली जानवरों, सूक्ष्म जीवाणुओं और उनकी विभिन्न प्रजातियों तथा उनके पारिस्थितिक तंत्र की समग्र विविधता को 'जैव विविधता' कहा जाता है।
- 1. जीवन का आधारभूत तंत्र (Life Support System): मानव का अस्तित्व पूरी तरह जैव विविधता पर टिका है। पौधे हमें प्राणवायु ऑक्सीजन देते हैं, जल को शुद्ध करते हैं और भोजन के रूप में अन्न, फल व सब्जियां प्रदान करते हैं।
- 2. आर्थिक सुरक्षा एवं आजीविका: कृषि, मत्स्य पालन, पशुपालन, रेशम उद्योग, लाख उद्योग और फार्मास्यूटिकल (दवा) उद्योग पूरी तरह विविध वनस्पतियों और जीवों पर निर्भर हैं। दुनिया की आधी से अधिक अर्थव्यवस्था प्राकृतिक संसाधनों से चलती है।
- 3. परागण एवं मृदा निर्माण (Ecosystem Services): मधुमक्खियाँ, तितलियाँ, चिड़ियाँ और कीट फसलों में परागण (Pollination) कराते हैं, जिससे अनाज और फल पैदा होते हैं। केंचुए और मिट्टी के सूक्ष्म जीवाणु ह्यूमस बनाकर जमीन को उपजाऊ बनाए रखते हैं।
- 4. जलवायु नियमन: सघन वन और महासागरीय जैव विविधता ग्रीनहाउस गैसों को सोखकर ग्लोबल वार्मिंग और मौसम के चरम बदलावों से धरती की रक्षा करती है।
प्रश्न 4. विस्तार पूर्वक बतायें कि मानव-क्रियाएँ किस प्रकार प्राकृतिक वनस्पति और प्राणीजात के ह्रास के कारक हैं।
उत्तर: मनुष्य ने अपने तकनीकी विकास और अंतहीन लालच के कारण प्राकृतिक पर्यावरण पर गहरा आघात किया है। मानवीय क्रियाकलाप निम्नलिखित रूपों में वनस्पति और वन्य जीवों के विनाश के कारक बने हैं:
- 1. वनों की अंधाधुंध कटाई: शहरी कॉलोनियों, फैक्टरियों, चौड़े राजमार्गों और रेल लाइनों के निर्माण के लिए लाखों हेक्टेयर घने वनों पर बुलडोजर चला दिया गया, जिससे वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास हमेशा के लिए नष्ट हो गए।
- 2. बड़े बांध और बहुउद्देशीय परियोजनाएँ: 1951 के बाद से हजारों वर्ग किलोमीटर जंगल नदी घाटी परियोजनाओं के विशाल जलाशयों में जलमग्न हो गए। इससे घाटी में रहने वाले स्थानिक पेड़-पौधे और जीव-जंतु पूरी तरह डूबकर नष्ट हो गए।
- 3. खनन गतिविधियाँ (Mining): झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक के समृद्ध वन क्षेत्रों में कोयला, लोहा और बॉक्साइट निकालने के लिए खुले मुहाने की खदानें बनाई गईं। खनन के मलबे और रसायनों ने पूरी हरियाली को बंजर खड्डों में बदल दिया।
- 4. रासायनिक कृषि और प्रदूषण: हरित क्रांति के बाद रासायनिक कीटनाशकों, खरपतवारनाशकों और उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग ने मिट्टी के केंचुओं, परागण करने वाले कीटों और पक्षियों को जहर देकर मार डाला।
- 5. व्यावसायिक शिकार और तस्करी: हाथी दांत, बाघ की खाल, गेंडे के सींग और दुर्लभ कस्तूरी के लिए मनुष्यों ने आधुनिक बंदूकों से जीवों का अंधाधुंध कत्लेआम किया, जिससे कई प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर पहुँच गईं।
प्रश्न 5. भारतीय जैवमंडल क्षेत्रों की चर्चा विस्तार से कीजिए।
उत्तर: जैवमंडल क्षेत्र (Biosphere Reserves) स्थलीय और तटीय पारिस्थितिक तंत्र के ऐसे विशेष संरक्षित क्षेत्र होते हैं, जहाँ वन्य जीवों, वनस्पतियों और स्थानीय पारंपरिक जनजातियों की जीवनशैली का समग्र संरक्षण वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किया जाता है।
भारत में स्थिति: यूनेस्को (UNESCO) के 'मानव एवं जैवमंडल' (MAB) कार्यक्रम के अंतर्गत भारत में कुल 18 जैवमंडल निचय (Biosphere Reserves) स्थापित किए गए हैं।
- 1. नीलगिरि (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक): यह 1986 में स्थापित भारत का पहला जैवमंडल रिजर्व है। यह पश्चिमी घाट की जैव-विविधता, सदाबहार वनों और शेर जैसी पूंछ वाले लंगूर (Lion-tailed Macaque) व नीलगिरि तहर के लिए विख्यात है।
- 2. नंदा देवी (उत्तराखंड): हिमालय के उच्च पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र में स्थित। यहाँ हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग और दुर्लभ ब्रह्मकमल जैसी जड़ी-बूटियाँ संरक्षित हैं।
- 3. सुंदरवन (पश्चिम बंगाल): गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा पर स्थित यह क्षेत्र मैंग्रोव वनस्पति और विश्व प्रसिद्ध 'रॉयल बंगाल टाइगर' (Royal Bengal Tiger) का सबसे बड़ा प्राकृतिक आवास है।
- 4. मन्नार की खाड़ी (तमिलनाडु तट): यह समुद्री जैव-विविधता से संपन्न क्षेत्र है, जो प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) और समुद्री गाय (Dugong) के संरक्षण के लिए जाना जाता है।
- 5. काजीरंगा व मानस (असम): यह पूर्वोत्तर के आर्द्र वन हैं, जो एक सींग वाले भारतीय गैंडे, जंगली भैंस और हाथियों के संरक्षण केंद्र हैं।
- 6. पंचमढ़ी (मध्य प्रदेश) एवं शिमलीपाल (ओडिशा): मध्य भारत के साल और सागवान के सघन वनों तथा जनजातीय संस्कृति के सह-अस्तित्व के प्रतीक हैं।
इकाई 1 (घ) खनिज संसाधन (Part - 5) Complete Solution
नीचे अभ्यास के सभी 14 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs), 12 लघु उत्तरीय प्रश्न, 8 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न, मानचित्र कार्य तथा प्रयोग/क्रियाकलाप के संपूर्ण एवं प्रामाणिक उत्तर दिए गए हैं।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
प्रश्न 1. खनिज क्या है?
उत्तर: प्राकृतिक रूप से भूगर्भ से प्राप्त होने वाले ऐसे समरूप अजैविक पदार्थ जिनकी एक निश्चित आंतरिक रासायनिक संरचना, निश्चित भौतिक गुणधर्म और निश्चित परमाणु संरचना होती है, खनिज (Mineral) कहलाते हैं। जैसे—लोहा, तांबा, अभ्रक, कोयला और बॉक्साइट।
प्रश्न 2. धात्विक खनिज के दो प्रमुख पहचान क्या हैं?
उत्तर: धात्विक खनिजों की दो प्रमुख पहचान निम्नलिखित हैं:
- इन्हें गलाने पर शुद्ध धातु प्राप्त होती है तथा इनमें एक विशेष प्राकृतिक चमक (Metallic Luster) होती है।
- ये आघातवर्ध्य (Malleable) और तन्य (Ductile) होते हैं; अर्थात् पीटने पर ये टूटते नहीं बल्कि चादर के रूप में फैल जाते हैं और इनसे तार खींचे जा सकते हैं।
प्रश्न 3. खनिजों की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: खनिजों की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
- असमान वितरण: पृथ्वी पर खनिज समान रूप से नहीं पाए जाते; कहीं खनिजों के विशाल भंडार हैं तो कहीं इनका पूर्ण अभाव है।
- गुणवत्ता एवं मात्रा में व्युत्क्रमानुपाती संबंध: उच्च गुणवत्ता वाले खनिज कम मात्रा में मिलते हैं, जबकि निम्न गुणवत्ता वाले खनिज अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।
- समाप्यता (अनवीकरणीय प्रकृति): ये सीमित संसाधन हैं जिनका एक बार दोहन कर लेने के बाद पुनर्निर्माण लाखों वर्षों तक संभव नहीं होता।
प्रश्न 4. लौह अयस्क के प्रकारों के नाम लिखिए।
उत्तर: लौह तत्व की मात्रा और शुद्धता के आधार पर लौह अयस्क मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं:
- 1. मैग्नेटाइट (Fe₃O₄): यह सर्वोत्तम कोटि का अयस्क है, जिसमें 70% से अधिक लोहा होता है। इसमें चुंबकीय गुण पाए जाते हैं।
- 2. हेमाटाइट (Fe₂O₃): यह भारत में सर्वाधिक पाया जाने वाला औद्योगिक अयस्क है, जिसमें 60% से 70% तक लोहा होता है। इसे 'लाल अयस्क' भी कहते हैं।
- 3. लिमोनाइट: इसमें लोहे का अंश 40% से 60% तक होता है। इसका रंग पीला होता है।
प्रश्न 5. लोहे के प्रमुख उत्पादक राज्यों के नाम लिखिए।
उत्तर: भारत के प्रमुख लौह अयस्क उत्पादक राज्य हैं:
- कर्नाटक (कुद्रेमुख, बेल्लारी, चिकमगलूर)
- ओडिशा (मयूरभंज, क्योंझर, सुंदरगढ़)
- छत्तीसगढ़ (बस्तर - बैलाडीला, दुर्ग)
- झारखंड (पश्चिमी सिंहभूम - नोआमुंडी, गुआ)
- गोवा
प्रश्न 6. झारखंड के मुख्य लौह उत्पादक जिलों के नाम लिखिए।
उत्तर: झारखंड में लौह अयस्क का खनन मुख्य रूप से पश्चिमी सिंहभूम और पूर्वी सिंहभूम जिलों में होता है। यहाँ की प्रमुख खदानें नोआमुंडी, गुआ, किरीबुरू और जामदा हैं।
प्रश्न 7. मैंगनीज के उपयोग पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: मैंगनीज एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक धातु है। इसके प्रमुख उपयोग निम्नलिखित हैं:
- इसका मुख्य उपयोग इस्पात (स्टील) तथा फेरो-मैंगनीज मिश्रधातु बनाने में होता है (1 टन इस्पात बनाने में लगभग 10 किग्रा मैंगनीज लगता है)।
- यह इस्पात को कठोरता, मजबूती और जंग-रोधी क्षमता प्रदान करता है।
- इसका उपयोग ब्लीचिंग पाउडर, कीटनाशक दवाइयों, शुष्क सेलों (बैटरी), कांच और चमकीले पेंट-वार्निश बनाने में किया जाता है।
प्रश्न 8. अल्युमिनियम के उपयोग का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: एल्युमिनियम हल्का, मजबूत, जंग-रोधी और विद्युत का अच्छा सुचालक होता है। इसके मुख्य उपयोग हैं:
- हवाई जहाजों (विमान निर्माण) के ढांचे बनाने में।
- लंबी दूरी के विद्युत संचरण (बिजली के तारों) में।
- रेलगाड़ियों के डिब्बे, ऑटोमोबाइल पार्ट्स और घरेलू बर्तन बनाने में।
- दवाइयों, सिगरेट और खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग फॉयल तैयार करने में।
प्रश्न 9. अभ्रक का उपयोग क्या है?
उत्तर: अभ्रक पारदर्शी, लचीला और उच्च विद्युत-रोधी (विद्युत का कुचालक) तथा ताप-रोधी खनिज है।
- इसका सर्वाधिक उपयोग विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में इंसुलेटर, कंडेंसर, हीटर, बिजली की प्रेस, ट्रांसफार्मर और टीवी उपकरणों में होता है।
- इसके बारीक चूर्ण का उपयोग पेंट, वार्निश, चमकीले कागज और आयुर्वेदिक औषधियों (अभ्रक भस्म) में किया जाता है।
प्रश्न 10. चूना-पत्थर की क्या उपयोगिता है?
उत्तर: चूना-पत्थर (CaCO₃) की उपयोगिता निम्नलिखित उद्योगों में है:
- सीमेंट उद्योग: यह सीमेंट निर्माण का सबसे प्रमुख कच्चा माल है (कुल उत्पादन का लगभग 76% हिस्सा सीमेंट में खपता है)।
- लौह-इस्पात उद्योग: ब्लास्ट फर्नेस में लोहे की अशुद्धियों को दूर करने के लिए गालक (Flux) के रूप में।
- रासायनिक उद्योग: कागज, चीनी मिलों में रस को साफ करने, ब्लीचिंग पाउडर बनाने और भवनों की सफेदी में।
प्रश्न 11. खनिजों की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: खनिजों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- भू-गर्भिक उत्पत्ति: खनिज प्राकृतिक भू-वैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा लाखों-करोड़ों वर्षों में बनते हैं; इन्हें कृत्रिम रूप से तुरंत नहीं बनाया जा सकता।
- अनवीकरणीय एवं क्षयशील: इनका भंडार सीमित है। निरंतर खनन से खदानों की गहराई बढ़ती है और गुणवत्ता घटती जाती है।
- उद्योगों का आधार: किसी भी देश की औद्योगिक और सैन्य शक्ति उसके खनिज संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर करती है।
प्रश्न 12. खनिजों के संरक्षण एवं प्रबंधन से क्या समझते हैं?
उत्तर: खनिज अनवीकरणीय प्राकृतिक संपदा हैं।
- खनिज संरक्षण: खनिजों के अंधाधुंध विदोहन और बर्बादी को रोककर उनका योजनाबद्ध, मितव्ययी और विवेकपूर्ण उपयोग करना ताकि वे लंबे समय तक भावी पीढ़ियों के काम आ सकें।
- खनिज प्रबंधन: खनन के दौरान आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करना ताकि अयस्क व्यर्थ न जाए, कम गुणवत्ता वाले खनिजों का परिष्करण करना, धातुओं का पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) करना और खनिजों के सस्ते व नवीकरणीय विकल्पों की खोज करना।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
प्रश्न 1. खनिज कितने प्रकार के होते हैं? प्रत्येक का सोदाहरण परिचय दीजिये।
उत्तर: संरचना, रंग और भौतिक व रासायनिक गुणों के आधार पर खनिजों को मुख्य रूप से दो बड़े वर्गों में विभाजित किया जाता है:
-
1. धात्विक खनिज (Metallic Minerals):
जिन खनिजों से प्रगलन द्वारा धातुएं प्राप्त होती हैं। ये कठोर, चमकदार और आघातवर्ध्य होते हैं। इन्हें दो उप-वर्गों में बांटा जाता है:- (क) लौह युक्त खनिज: जिनमें लोहे का अंश प्रधान होता है। उदाहरण: लौह-अयस्क, मैंगनीज, क्रोमाइट, निकल।
- (ख) अलौह युक्त खनिज: जिनमें लोहा नहीं होता। उदाहरण: बॉक्साइट (एल्युमिनियम अयस्क), तांबा, सीसा, जस्ता, सोना, चांदी।
-
2. अधात्विक खनिज (Non-Metallic Minerals):
जिन खनिजों में धातुओं का पूर्ण अभाव होता है। पीटने पर ये टूटकर चूर-चूर हो जाते हैं (भंगुर होते हैं)। इन्हें दो उप-वर्गों में बांटा जाता है:- (क) कार्बनिक (ईंधन) खनिज: जिनमें कार्बन होता है और जो जीवाश्मों से बनते हैं। उदाहरण: कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस।
- (ख) अकार्बनिक खनिज: जिनमें कार्बन नहीं होता। उदाहरण: अभ्रक, चूना-पत्थर, जिप्सम, डोलोमाइट और ग्रेफाइट।
प्रश्न 2. धात्विक एवं अधात्विक खनिजों में क्या अंतर है? तुलना कीजिये।
उत्तर:
| तुलना का आधार | धात्विक खनिज (Metallic Minerals) | अधात्विक खनिज (Non-Metallic Minerals) |
|---|---|---|
| 1. धातु की उपस्थिति | इन्हें पिघलाने या गलाने पर शुद्ध धातु प्राप्त होती है। | इन्हें गलाने पर कोई धातु प्राप्त नहीं होती। |
| 2. प्रकृति व चमक | इनमें विशिष्ट धात्विक चमक होती है और ये प्रायः कठोर होते हैं। | इनमें अपनी कोई विशेष चमक नहीं होती (कुछ अपवाद छोड़कर)। |
| 3. आघातवर्ध्यता व तन्यता | ये आघातवर्ध्य और तन्य होते हैं; इन्हें पीटकर चादरें व तार बनाए जा सकते हैं। | ये भंगुर होते हैं; चोट मारने पर ये टुकड़ों में बिखर जाते हैं। |
| 4. चट्टानों का प्रकार | ये प्रायः आग्नेय (Igneous) और कायांतरित चट्टानों में पाए जाते हैं। | ये अधिकांशतः अवसादी (Sedimentary) चट्टानों में मिलते हैं। |
| 5. प्रमुख उदाहरण | लोहा, मैंगनीज, तांबा, बॉक्साइट, सोना, चांदी। | अभ्रक, चूना-पत्थर, जिप्सम, कोयला, नमक। |
प्रश्न 3. भारत की खनिज पेटियों का नाम लिखकर किन्हीं दो का वर्णन कीजिये।
उत्तर: भारत में खनिजों का वितरण मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत के पठारी भागों में संकेंद्रित है। देश में प्रमुख 5 खनिज पेटियाँ पाई जाती हैं:
- उत्तर-पूर्वी पठारी पेटी
- दक्षिण-पश्चिमी पठारी पेटी
- उत्तर-पश्चिमी पेटी
- दक्षिणी पेटी
- मध्य पेटी / हिमालयी पेटी
-
1. उत्तर-पूर्वी पठारी पेटी (North-Eastern Plateau Belt):
यह भारत की सबसे धनी और समृद्ध खनिज पेटी है, जिसे 'भारत का रूर' (Ruhr of India) कहा जाता है।
विस्तार: छोटानागपुर का पठार (झारखंड), ओडिशा का पठार और पश्चिम बंगाल का पश्चिमी भाग।
प्रमुख खनिज: देश का अधिकांश लौह अयस्क, कोयला, मैंगनीज, बॉक्साइट, तांबा और अभ्रक इसी पेटी में स्थित है। जमशेदपुर, बोकारो, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे बड़े इस्पात संयंत्र इसी पेटी पर निर्भर हैं। -
2. दक्षिण-पश्चिमी पठारी पेटी (South-Western Plateau Belt):
विस्तार: कर्नाटक, गोवा और सीमावर्ती केरल व तमिलनाडु के पहाड़ी भाग।
प्रमुख खनिज: यह पेटी उच्च कोटि के लौह-अयस्क (विशेष रूप से कुद्रेमुख, बेल्लारी-होसपेट क्षेत्र), मैंगनीज और चूना-पत्थर से समृद्ध है। गोवा में लौह अयस्क का सघन खनन होता है जिसका मर्मगाओ बंदरगाह से निर्यात किया जाता है। यहाँ नेवेली में लिग्नाइट कोयला तथा केरल के तटीय बालू में थोरियम और मोनाजाइट जैसे परमाणु खनिज भी मिलते हैं।
प्रश्न 4. लौह अयस्क का वर्गीकरण कर उनकी विशेषताओं को लिखिये।
उत्तर: शुद्ध लोहे (Fe) के प्रतिशत और रासायनिक संघटन के आधार पर भारत में पाए जाने वाले लौह अयस्क को चार वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है:
-
1. मैग्नेटाइट (Fe₃O₄):
यह काले रंग का सर्वोत्तम कोटि का लौह अयस्क है। इसमें शुद्ध धातु का अंश 70% से अधिक होता है। इसमें प्राकृतिक चुंबकीय गुण होते हैं, इसलिए यह विद्युत उद्योगों के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में इसके बड़े निक्षेप हैं। -
2. हेमाटाइट (Fe₂O₃):
यह लाल और भूरे रंग का होता है, जिसे 'लाल अयस्क' भी कहा जाता है। इसमें धातु का अंश 60% से 70% तक होता है। भारत के कुल लौह अयस्क भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा हेमाटाइट का ही है और उद्योगों में इसी का सर्वाधिक उपयोग होता है। ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ में यह प्रचुर मात्रा में मिलता है। -
3. लिमोनाइट (2Fe₂O₃ · 3H₂O):
यह पीले रंग का जलयोजित लौह ऑक्साइड होता है। इसमें लोहे का अंश 40% से 60% तक होता है। इसका उपयोग हल्के उद्योगों और रंगों में होता है। -
4. सिडेराइट (FeCO₃):
यह लौह कार्बोनेट है, जो भूरे रंग का होता है। इसमें धातु का अंश सबसे कम (40% से भी कम) होता है और इसमें राख व अशुद्धियाँ अधिक होती हैं।
प्रश्न 5. भारत में लौह अयस्क के वितरण पर प्रकाश डालिये।
उत्तर: भारत विश्व में लौह अयस्क के विशालतम भंडारों वाले देशों में से एक है। भारत का अधिकांश लौह अयस्क उच्च कोटि का (हेमाटाइट व मैग्नेटाइट) है। इसका राज्यवार वितरण निम्नलिखित है:
- 1. ओडिशा: भारत का सबसे बड़ा लौह उत्पादक राज्य है। यहाँ मयूरभंज (बादामपहाड़, गुरुमहिसानी), क्योंझर (किरीबुरू) और सुंदरगढ़ जिलों में उत्तम कोटि का हेमाटाइट अयस्क मिलता है।
- 2. छत्तीसगढ़: यह देश का लगभग 20% लोहा उत्पादित करता है। बस्तर जिले की बैलाडीला खान और दुर्ग जिले की दल्ली-राजहरा खान देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं। बैलाडीला का उच्च कोटि का लोहा विशाखापत्तनम बंदरगाह से जापान को निर्यात किया जाता है।
- 3. कर्नाटक: यहाँ देश के विपुल मैग्नेटाइट भंडार हैं। बेल्लारी, चिकमगलूर की बाबाबूदन पहाड़ियां और कुद्रेमुख प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं। कुद्रेमुख से लोहे को स्लरी (घोल) बनाकर पाइपलाइन द्वारा मंगलूरू पत्तन तक भेजा जाता है।
- 4. झारखंड: झारखंड देश का प्राचीनतम लौह उत्पादक राज्य है। पश्चिमी सिंहभूम के नोआमुंडी, गुआ और जामदा प्रमुख खदानें हैं, जो जमशेदपुर और बोकारो इस्पात संयंत्रों को कच्चे माल की आपूर्ति करती हैं।
- 5. अन्य राज्य: गोवा (सांगुएम, बिचोलिम), महाराष्ट्र (चंद्रपुर, रत्नागिरी), आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु (सलेम)।
प्रश्न 6. मैंगनीज अथवा बाक्साइट की उपयोगिता तथा देश में इनके वितरण का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
(परीक्षार्थियों की सुविधा हेतु दोनों का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत है, परीक्षा में छात्र किसी एक का चयन कर सकते हैं)
- उपयोगिता: मैंगनीज लौह-मिश्र धातु बनाने का मुख्य घटक है। 1 टन इस्पात बनाने में 10 किग्रा मैंगनीज आवश्यक होता है। यह लोहे को कठोर, लचीला और जंग-रोधी बनाता है। इसके अलावा ड्राई सेल बैटरी, ब्लीचिंग पाउडर, रंग-रोगन और कांच उद्योग में इसका भारी उपयोग होता है।
-
वितरण:
- ओडिशा: देश का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है (सुंदरगढ़, क्योंझर, कोरापुट, कालाहांडी)।
- मध्य प्रदेश: बालाघाट और छिंदवाड़ा जिले।
- महाराष्ट्र: नागपुर और भंडारा जिले।
- कर्नाटक: शिमोगा, बेल्लारी और चित्रदुर्ग।
- आंध्र प्रदेश: श्रीकाकुलम और विशाखापत्तनम।
- उपयोगिता: बॉक्साइट एल्युमिनियम धातु का अयस्क है। एल्युमिनियम हल्का, जंग-मुक्त और विद्युत का उत्तम चालक होने के कारण इसका उपयोग विमान निर्माण, बिजली के तारों, बर्तनों, ऑटोमोबाइल और पैकेजिंग में तांबे के विकल्प के रूप में किया जाता है।
-
वितरण:
- ओडिशा: देश का अग्रणी बॉक्साइट उत्पादक है। कालाहांडी, कोरापुट, संबलपुर और बोलनगीर की पंचपतमली खदानें प्रमुख हैं।
- गुजरात: जामनगर, भावनगर और कच्छ।
- झारखंड: लोहरदगा, गुमला और लातेहार की खदानें मूरी एल्युमिना संयंत्र को आपूर्ति करती हैं।
- महाराष्ट्र एवं छत्तीसगढ़: कोल्हापुर, रत्नागिरी तथा बिलासपुर-मैकाल पठारी क्षेत्र।
प्रश्न 7. अभ्रक की उपयोगिता एवं वितरण पर प्रकाश डालिये।
उत्तर:
- अभ्रक एक परतदार, लचीला और पारदर्शी अधात्विक खनिज है।
- विद्युत रोधी क्षमता: यह उच्च विद्युत विभव (High Voltage) को बिना पिघले या टूटे सहन कर सकता है और विद्युत का पूर्ण कुचालक है।
- अतः इसका अनिवार्य उपयोग हीटर, विद्युत प्रेस, कंडेंसर, ट्रांसफार्मर, रेडियो, रडार, मोटर और इलेक्ट्रॉनिक चिप्स में होता है।
- इसका बारीक चूर्ण सजावटी पेंट्स, वार्निश, वॉलपेपर और कॉस्मेटिक्स (सौंदर्य प्रसाधनों) को चमकीला बनाने के लिए किया जाता है।
- 1. बिहार-झारखंड अभ्रक पेटी: यह पेटी लगभग 150 किमी लंबी और 22 किमी चौड़ी पट्टी में फैली है। यहाँ दुनिया का सबसे उच्च कोटि का हल्का लाल पारदर्शी अभ्रक मिलता है जिसे 'बंगाल रूबी अभ्रक' कहा जाता है। मुख्य केंद्र झारखंड के कोडरमा (जिसे 'विश्व की अभ्रक राजधानी' कहा जाता है), गिरिडीह, हजारीबाग तथा बिहार के नवादा व जमुई जिले हैं।
- 2. आंध्र प्रदेश (नेल्लोर पेटी): वर्तमान में नेल्लोर जिला देश का सर्वाधिक अभ्रक उत्पादित करने वाला क्षेत्र है। यहाँ हरे रंग का अभ्रक प्राप्त होता है।
- 3. राजस्थान पेटी: यह पेटी जयपुर से लेकर भीलवाड़ा, अजमेर और उदयपुर तक विस्तृत है।
प्रश्न 8. खनिजों के संरक्षण के उपाय सुझाइये।
उत्तर: खनिज भू-वैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा लाखों वर्षों में तैयार होने वाले अनवीकरणीय प्राकृतिक उपहार हैं। इनके तेजी से घटते भंडारों को बचाने के लिए निम्नलिखित संरक्षण उपाय अनिवार्य हैं:
- 1. खनन में आधुनिक एवं कुशल तकनीक का प्रयोग: खनन और प्रगलन के दौरान अयस्कों की बर्बादी को न्यूनतम किया जाए ताकि कम से कम खनिज मलबे में तब्दील हो।
- 2. धातुओं का पुनर्चक्रण (Recycling of Metals): स्क्रैप लोहे, तांबे, पीतल और एल्युमिनियम के पुराने बर्तनों व मशीनों को पिघलाकर पुनः नई वस्तुएं बनाई जाएं, जिससे खानों से नए अयस्क निकालने का दबाव कम होगा।
- 3. सस्ते एवं नवीकरणीय विकल्पों की खोज (Substitutes): दुर्लभ और महंगे खनिजों के स्थान पर वैकल्पिक पदार्थों का प्रयोग हो; जैसे—तांबे की जगह एल्युमिनियम के तार तथा धातुओं के स्थान पर मजबूत बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक व कंपोजिट फाइबर का उपयोग।
- 4. निम्न कोटि के अयस्कों का परिष्करण: आधुनिक तकनीकों से कम गुणवत्ता वाले अयस्कों का संवर्धन (Beneficiation) करके उन्हें उपयोगी बनाया जाए ताकि केवल उच्च कोटि की खदानों पर ही निर्भर न रहना पड़े।
- 5. सुनियोजित एवं दीर्घकालीन राष्ट्रीय नीति: खनिजों के अंधाधुंध निर्यात पर रोक लगाई जाए, विशेषकर उच्च कोटि के लौह-अयस्क और दुर्लभ खनिजों को भविष्य की घरेलू औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए सुरक्षित रखा जाए।
मानचित्र कार्य (Map Work)
1. भारत के एक मानचित्र पर महत्वपूर्ण खनिजों के वितरण को दर्शाइये:
- छोटा नागपुर पठार (झारखंड/ओडिशा): लोहा, कोयला और बॉक्साइट क्षेत्र।
- राजस्थान (खेतड़ी): तांबा पट्टी।
- आंध्र प्रदेश (नेल्लोर): अभ्रक क्षेत्र।
(संकेत: इन प्रमुख क्षेत्रों को अलग-अलग प्रतीकों जैसे लोहे के लिए त्रिकोण ▲, तांबे के लिए वृत्त ●, अभ्रक के लिए चौकोर ■ द्वारा मानचित्र पर अंकित करें)।
2. लौह अयस्क के मुख्य उत्पादक केन्द्रों को भारत के मानचित्र में अंकित कीजिये:
- मयूरभंज एवं क्योंझर: ओडिशा के उत्तरी भाग में।
- बैलाडीला: छत्तीसगढ़ के दक्षिणी सिरे (दंतेवाड़ा) पर।
- कुद्रेमुख एवं बेल्लारी: कर्नाटक के पश्चिमी और मध्य भाग में।
- नोआमुंडी: झारखंड के दक्षिणी सिंहभूम जिले में।
3. पूरे पृष्ठ पर भारत का मानचित्र बनाकर निम्नलिखित को दिखाइये:
- मैंगनीज उत्पादक क्षेत्र: बालाघाट (मध्य प्रदेश), नागपुर (महाराष्ट्र), सुंदरगढ़ (ओडिशा)।
- बॉक्साइट उत्पादक क्षेत्र: कोरापुट (ओडिशा), लोहरदगा (झारखंड), जामनगर (गुजरात)।
- तांबा उत्पादक क्षेत्र: खेतड़ी (राजस्थान), बालाघाट का मलांजखंड (मध्य प्रदेश), सिंहभूम (झारखंड)।
4. विभिन्न चट्टानों तथा खनिजों के टुकड़े उपलब्ध कर भूगोल प्रयोगशाला में संग्रह कीजिये:
प्रयोगशाला संग्रह सूची (प्रोजेक्ट प्रारूप):
- धात्विक खनिज नमूने: हेमाटाइट (भूरा-लाल लोहे का पत्थर), बॉक्साइट (मिट्टी जैसा गुलाबी-सफेद पत्थर), तांबे का अयस्क।
- अधात्विक खनिज नमूने: अभ्रक (पतली पारदर्शी चमकती परतें), चूना-पत्थर, ग्रेफाइट (चिकना काला पत्थर), कोयला।
प्रयोग कीजिये (Practical / Activity)
(क) प्लाइवुड या गत्ते पर निर्मित भारत का मानचित्र तैयार कर विभिन्न खनिजों के उत्पादक स्थान पर अलग-अलग रंग का बल्ब लगाइये तथा प्रत्येक खनिज हेतु एक-एक स्विच लगाइये।
मॉडल निर्माण निर्देश (विज्ञान/भूगोल प्रदर्शनी हेतु):
- एक 3×2 फीट के प्लाईवुड बोर्ड पर भारत का राजनीतिक मानचित्र चिपकाएँ।
- लौह अयस्क केंद्रों (मयूरभंज, बैलाडीला, कुद्रेमुख) पर लाल रंग की LED, बॉक्साइट केंद्रों पर पीली LED, तांबा केंद्रों पर हरी LED और अभ्रक केंद्रों पर सफेद LED लगाएं।
- सभी समान रंग की LED को एक 9V बैटरी और एक स्वतंत्र पुश-बटन स्विच से श्रेणीबद्ध जोड़ें।
- स्विच बोर्ड पर 'लोहा', 'बॉक्साइट', 'तांबा' और 'अभ्रक' के लेबल लगाएं। जब 'लोहा' का स्विच दबाया जाएगा, तो भारत के सभी प्रमुख लौह उत्पादक केंद्र एक साथ लाल बत्ती से जगमगा उठेंगे।
(ख) खनिजों की महत्ता, उपलब्धता एवं संरक्षण के संबंध में अपने भूगोल शिक्षक से विमर्श कीजिये।
विमर्श सारांश (कक्षा संगोष्ठी प्रारूप):
- भूगोल शिक्षक के साथ चर्चा में यह निष्कर्ष निकला कि खनिज किसी देश की आर्थिक संप्रभुता के आधार हैं।
- चूंकि भारत तेजी से विकसित हो रहा है, इसलिए हमारे सीमित खनिजों का दोहन वैज्ञानिक तरीके से होना चाहिए।
- छात्रों ने संकल्प लिया कि वे धातुओं के पुनर्चक्रण को बढ़ावा देंगे और ई-कचरे (E-waste) के सही निस्तारण के प्रति समाज को जागरूक करेंगे।
(ग) शिक्षक-अभिभावक की आज्ञा लेकर अपने पड़ोसी राज्यों के खनिज बहुल क्षेत्रों का भ्रमण, खनिजों का अवलोकन तथा उनका संग्रह कीजिये।
शैक्षणिक भ्रमण प्रतिवेदन (झारखंड/सीमावर्ती क्षेत्र संदर्भ):
- भ्रमण स्थल: कोडरमा (अभ्रक खदान क्षेत्र) एवं पलामू/रोहतास (चूना-पत्थर खदानें)।
- अवलोकन: विद्यार्थियों ने देखा कि खुली खदानों से किस प्रकार भारी मशीनों द्वारा चट्टानों को तोड़ा जाता है।
- संग्रह: भ्रमण के दौरान छात्रों ने अभ्रक की परतदार चादरें, चूना-पत्थर के विभिन्न टुकड़े और कैल्साइट के क्रिस्टल एकत्रित कर विद्यालय की भूगोल प्रयोगशाला के संग्रहालय में प्रदर्शित किए।
अध्याय 1: शक्ति (ऊर्जा) संसाधन — सम्पूर्ण NCERT/BSEB अभ्यास हल
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Multiple Choice Questions)
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
1. पारम्परिक एवं गैर-पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों के तीन-तीन उदाहरण लिखिये।
- पारम्परिक ऊर्जा स्रोत: कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस।
- गैर-पारम्परिक ऊर्जा स्रोत: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और बायोगैस।
2. गोण्डवाना समूह के कोयला क्षेत्रों के नाम लिखिये।
भारत के प्रमुख गोण्डवाना कोयला क्षेत्र निम्नलिखित नदी घाटियों में फैले हैं:
- दामोदर घाटी क्षेत्र (झरिया, रानीगंज, बोकारो)
- सोन घाटी क्षेत्र (सिंगरौली)
- महानदी घाटी क्षेत्र (तलचर)
- वर्धा-गोदावरी घाटी क्षेत्र (चांदा, सिंगरेनी)
3. झारखण्ड राज्य के मुख्य कोयला उत्पादक क्षेत्रों के नाम अंकित कीजिये।
उत्तर: झारखण्ड के प्रमुख कोयला क्षेत्र हैं: झरिया, बोकारो, धनबाद, गिरिडीह, कर्णपुरा और रामगढ़।
4. कोयले के विभिन्न प्रकारों के नाम लिखिये।
कार्बन की मात्रा के आधार पर कोयला चार प्रकार का होता है:
- एन्थ्रासाइट: सर्वोत्तम कोटि, 90% से अधिक कार्बन
- बिटुमिनस: मध्यम कोटि, 70% से 80% कार्बन
- लिग्नाइट: भूरा कोयला, 40% से 55% कार्बन
- पीट: निम्न कोटि, 40% से कम कार्बन
5. पेट्रोलियम से किन-किन वस्तुओं का निर्माण होता है?
उत्तर: कच्चे पेट्रोलियम के प्रभाजी आसवन से पेट्रोल, डीजल, केरोसिन तेल, स्नेहक (lubricants), ग्रीस, मोम, कोलतार तथा पेट्रो-रसायन उद्योग में प्रयुक्त होने वाले कृत्रिम रबर, प्लास्टिक, रासायनिक खाद और दवाइयाँ प्राप्त होती हैं।
6. सागर सम्राट क्या है?
उत्तर: 'सागर सम्राट' मुम्बई हाई तेल क्षेत्र में स्थित एक विशाल जलयान (मंच/प्लैटफॉर्म) है, जिसका उपयोग समुद्र के भीतर गहराई में छेद (ड्रिलिंग) करके खनिज तेल निकालने के लिए किया जाता है।
7. किन्हीं चार तेल शोधक कारखाने का स्थान निर्दिष्ट कीजिये।
- डिगबोई (असम)
- बरौनी (बिहार)
- मथुरा (उत्तर प्रदेश)
- जामनगर (गुजरात)
8. जल विद्युत उत्पादन के कौन-कौन से मुख्य कारक हैं?
- बारहमासी और तीव्र गति से बहने वाली नदियों का जल।
- बाँध बनाकर पानी को ऊँचाई से गिराने हेतु उपयुक्त ढाल या प्राकृतिक जलप्रपात।
- टरबाइन चलाने के लिए पर्याप्त जल भंडारण क्षमता।
- भारी पूँजी, तकनीकी ज्ञान तथा विद्युत की निरंतर स्थानीय माँग।
9. नदी घाटी परियोजनाओं को बहुउद्देशीय क्यों कहा जाता है?
उत्तर: नदी घाटी परियोजनाओं द्वारा एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति की जाती है; जैसे—बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, जल विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन, पर्यटन, मृदा अपरदन पर रोक और नौका परिवहन। एक से अधिक उद्देश्यों को पूरा करने के कारण ही इन्हें 'बहुउद्देशीय परियोजना' कहा जाता है।
10. निम्नलिखित नदी घाटी परियोजनाएँ किन-किन राज्यों में अवस्थित हैं—हीराकुंड, तुंगभद्रा एवं रिहन्द।
- हीराकुंड परियोजना: ओडिशा (महानदी पर)
- तुंगभद्रा परियोजना: कर्नाटक और आंध्र प्रदेश (तुंगभद्रा नदी पर)
- रिहन्द परियोजना: उत्तर प्रदेश (रिहन्द नदी पर)
11. ताप शक्ति क्यों समाप्य संसाधन है?
उत्तर: ताप विद्युत उत्पादन के लिए मुख्य रूप से कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का उपयोग किया जाता है। ये सभी जीवाश्म ईंधन अनवीकरणीय तथा सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं, जिनका एक बार उपयोग होने के बाद पुनर्चक्रण संभव नहीं है। अतः ताप शक्ति एक समाप्य (exhaustible) संसाधन है।
12. परमाणु शक्ति किन-किन खनिजों से प्राप्त होता है?
उत्तर: परमाणु शक्ति मुख्यतः यूरेनियम, थोरियम, प्लूटोनियम, बेरिलियम, मोनाजाइट तथा जिरकोनियम जैसे आणविक खनिजों के विखंडन से प्राप्त होती है।
13. मोनाजाइट भारत में कहाँ-कहाँ उपलब्ध है?
उत्तर: मोनाजाइट मुख्य रूप से केरल के तटीय बालू में भारी मात्रा में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त यह तमिलनाडु, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों में भी मिलता है।
14. सौर ऊर्जा का उत्पादन कैसे होता है?
उत्तर: सूर्य की किरणों (धूप) को 'फोटोवोल्टिक सेलों' (Photovoltaic Cells) द्वारा सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। इसके अतिरिक्त सोलर पैनलों और कलेक्टर्स की सहायता से सौर विकिरण को ऊष्मा ऊर्जा में बदलकर भी भाप से टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पादित की जाती है।
15. भारत के किन-किन क्षेत्रों में पवन ऊर्जा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ हैं?
उत्तर: भारत के तटीय एवं खुले पठारी भाग जहाँ तीव्र और निरंतर हवाएं चलती हैं, पवन ऊर्जा के लिए अत्यंत अनुकूल हैं। इनमें प्रमुख राज्य गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा राजस्थान के खुले मरुस्थलीय भाग शामिल हैं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
1. शक्ति संसाधन का वर्गीकरण विभिन्न आधारों के अनुसार, सोदाहरण, स्पष्ट कीजिये?
ऊर्जा या शक्ति संसाधनों को निम्नलिखित आधारों पर वर्गीकृत किया गया है:
- समाप्य / अनवीकरणीय स्रोत: वे स्रोत जो सीमित हैं और दोबारा जल्दी नहीं बन सकते; जैसे—कोयला, पेट्रोलियम।
- अक्षय / नवीकरणीय स्रोत: जो कभी समाप्त नहीं होते और बार-बार उपयोग किए जा सकते हैं; जैसे—सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत।
- जैविक: जैसे वनस्पति व जीवों के अवशेष से बने कोयला और खनिज तेल।
- अजैविक: जैसे सौर विकिरण, पवन, जल और परमाणु खनिज।
- पारम्परिक स्रोत: लंबे समय से उपयोग में लाए जा रहे स्रोत; जैसे—कोयला, पेट्रोलियम, लकड़ी।
- गैर-पारम्परिक स्रोत: आधुनिक तकनीक द्वारा हाल के वर्षों में अपनाए गए स्रोत; जैसे—सौर ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा।
2. भारत में पारम्परिक शक्ति के विभिन्न स्रोतों का विवरण प्रस्तुत कीजिये?
भारत में परम्परागत ऊर्जा के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं:
- कोयला: यह देश का प्राथमिक ऊर्जा स्रोत है। कुल बिजली उत्पादन का अधिकांश भाग कोयला-आधारित ताप विद्युत से आता है।
- खनिज तेल (पेट्रोलियम): परिवहन और उद्योगों की धुरी है। भारत में असम, मुम्बई हाई और गुजरात मुख्य उत्पादक क्षेत्र हैं।
- प्राकृतिक गैस: पर्यावरण अनुकूल ईंधन है, जिसका उपयोग उर्वरक उद्योग, विद्युत उत्पादन तथा सीएनजी/पीएनजी के रूप में वाहनों व घरों में होता है।
- जल विद्युत: नदियों पर बाँध बनाकर टरबाइन के जरिए स्वच्छ ऊर्जा पैदा की जाती है। यह प्रदूषण रहित और नवीकरणीय पारंपरिक स्रोत है।
3. गोंडवाना काल के कोयले का भारत में वितरण पर प्रकाश डालिये?
भारत का 98% से अधिक कोयला भंडार गोंडवाना युगीन है, जो लगभग 20 करोड़ वर्ष पुराना है। इसका वितरण चार मुख्य नदी घाटियों में है:
- दामोदर घाटी: झरिया (देश का सबसे बड़ा कोयला क्षेत्र), रानीगंज, बोकारो, गिरिडीह और रामगढ़।
- सोन घाटी: मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित सिंगरौली क्षेत्र।
- महानदी घाटी: ओडिशा का तलचर और छत्तीसगढ़ का कोरबा क्षेत्र।
- गोदावरी घाटी: तेलंगाना का सिंगरेनी तथा महाराष्ट्र का वर्धा-चांदा क्षेत्र।
4. कोयले का वर्गीकरण कर उनकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये?
कार्बन की मात्रा, वाष्प और जलवाष्प के अनुपात पर कोयले को चार श्रेणियों में बाँटा जाता है:
- एन्थ्रासाइट (Anthracite): इसमें कार्बन की मात्रा 90% से अधिक होती है। यह जलते समय धुआँ नहीं देता, अत्यधिक ऊष्मा देता है और सबसे कठोर होता है।
- बिटुमिनस (Bituminous): इसमें 70% से 80% कार्बन होता है। भारत में सबसे ज्यादा यही कोयला पाया जाता है। इसका उपयोग कोकिंग कोल बनाने और बिजली उत्पादन में होता है।
- लिग्नाइट (Lignite): इसे 'भूरा कोयला' भी कहते हैं। इसमें 40% से 55% कार्बन होता है और नमी अधिक होती है, जिससे यह अधिक धुआँ देता है।
- पीट (Peat): इसमें कार्बन की मात्रा 40% से भी कम होती है। यह लकड़ी जैसा दिखता है, बहुत अधिक राख और धुआँ छोड़ता है।
5. भारत में खनिज तेल के वितरण का वर्णन कीजिये?
भारत में खनिज तेल मुख्य रूप से अवसादी चट्टानों में पाया जाता है और इसके पाँच प्रमुख क्षेत्र हैं:
- उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (असम-अरुणाचल): देश का सबसे पुराना तेल क्षेत्र, जिसमें डिगबोई, नहरकटिया, मोरान-हुगरीजन शामिल हैं।
- गुजरात क्षेत्र: अंकलेश्वर, कलोल, मेहसाणा, खम्भात और लूनेज प्रमुख तेल उत्पादक कुएँ हैं।
- पश्चिमी अपतटीय क्षेत्र (मुम्बई हाई): मुम्बई तट से 176 किमी दूर अरब सागर में स्थित, जो देश का सबसे बड़ा तेल उत्पादक क्षेत्र है।
- पूर्वी अपतटीय क्षेत्र: कृष्णा-गोदावरी और कावेरी नदी के बेसिन में नए तेल भंडारों की खोज हुई है।
- राजस्थान क्षेत्र: बाड़मेर बेसिन (मंगला, भाग्यम और ऐश्वर्या तेल कुएं)।
6. जल विद्युत उत्पादन हेतु अनुकूल भौगोलिक एवं आर्थिक कारकों की विवेचना कीजिये?
- नदियों में वर्ष भर पर्याप्त और तीव्र जल प्रवाह।
- जलप्रपात या पहाड़ी ढाल, जिससे जल को वेग से टरबाइन पर गिराया जा सके।
- जलाशय निर्माण के लिए अनुकूल घाटी और मजबूत भूगर्भिक आधार।
- अवसादन (सिल्ट) से मुक्त स्वच्छ जल।
- बाँध और पावर हाउस निर्माण हेतु विशाल पूँजी निवेश।
- विद्युत पारेषण (Transmission) हेतु सुदृढ़ ग्रिड और आधुनिक तकनीक।
- ऊर्जा की खपत के लिए आस-पास विकसित औद्योगिक व नगरीय बाजार।
7. संक्षिप्त भौगोलिक टिप्पणी लिखिये—
- भाखड़ा-नांगल परियोजना: सतलज नदी पर पंजाब और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर स्थित भारत की विशालतम बहुउद्देशीय परियोजनाओं में से एक है। इसका जलाशय 'गोविन्द सागर' कहलाता है। इससे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश को सिंचाई व विद्युत प्राप्त होती है।
- दामोदर घाटी परियोजना (DVC): स्वतंत्र भारत की पहली बहुउद्देशीय परियोजना (1948) है, जो दामोदर नदी पर बाढ़ नियंत्रण और झारखंड व पश्चिम बंगाल में विद्युत आपूर्ति हेतु बनाई गई थी।
- कोसी परियोजना: उत्तरी बिहार के 'शोक' कही जाने वाली कोसी नदी पर भारत और नेपाल के सहयोग से हनुमान नगर में बाँध बनाकर विकसित की गई, जिसका मुख्य उद्देश्य बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई है।
- हीराकुंड परियोजना: ओडिशा में महानदी पर निर्मित विश्व के सबसे लंबे मिट्टी के बाँधों में से एक है, जो बाढ़ नियंत्रण और बिजली उत्पादन का प्रमुख साधन है।
- रिहन्द परियोजना: उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में रिहन्द नदी (सोन की सहायक) पर बनी है। इसके जलाशय को 'गोविन्द वल्लभ पंत सागर' कहा जाता है।
- तुंगभद्रा परियोजना: दक्षिण भारत (कर्नाटक व आंध्र प्रदेश) में कृष्णा की सहायक तुंगभद्रा नदी पर स्थित एक विशाल सिंचाई व विद्युत परियोजना है।
8. भारत के किन्हीं चार परमाणु विद्युत गृह का उल्लेख कीजिये तथा उनकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये?
- तारापुर परमाणु विद्युत गृह (महाराष्ट्र): यह भारत और पूरे एशिया का सबसे पहला परमाणु ऊर्जा केंद्र है। इसकी स्थापना 1969 में अमेरिकी तकनीक से की गई थी।
- राणा प्रताप सागर / रावतभाटा (राजस्थान): कोटा के समीप चंबल नदी के तट पर कनाडा के सहयोग से स्थापित किया गया भारी जल-आधारित संयंत्र है।
- कलपक्कम (तमिलनाडु): चेन्नई के निकट स्थित पूर्णतः स्वदेशी तकनीक से निर्मित पहला परमाणु ऊर्जा केंद्र है (इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र)।
- नरोरा (उत्तर प्रदेश): गंगा नदी के किनारे बुलंदशहर में स्थित उत्तर भारत का प्रमुख परमाणु ऊर्जा संयंत्र है।
9. शक्ति (ऊर्जा) संसाधनों के संरक्षण हेतु कौन-कौन कदम उठाये जा सकते हैं? आप उसमें कैसे मदद पहुँचा सकते हैं?
- ऊर्जा के गैर-पारंपरिक और नवीकरणीय स्रोतों (सौर, पवन, बायोमास) के उपयोग को बढ़ावा देना।
- ऊर्जा दक्षता वाले उपकरणों (जैसे LED बल्ब, 5-स्टार रेटिंग वाले उपकरण) का प्रयोग करना।
- सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का अधिक से अधिक उपयोग करना।
- खनन और ट्रांसमिशन के दौरान होने वाले ऊर्जा नुकसान को आधुनिक तकनीक से कम करना।
- आवश्यकता न होने पर पंखे, लाइट और कंप्यूटर बंद रखना।
- कम दूरी तय करने के लिए निजी गाड़ी के बजाय पैदल या साइकिल का उपयोग करना।
- परिवार और आस-पड़ोस में ऊर्जा संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना।
मानचित्र कार्य (Map Work - महत्वपूर्ण संकेत)
विद्यार्थी भारत के रेखा मानचित्र में इन स्थानों को निम्नलिखित राज्यों में अंकित करें:
1. कोयला खदानें:
- झरिया, बोकारो: झारखण्ड (दामोदर बेसिन)
- रानीगंज: पश्चिम बंगाल
- कोरबा: छत्तीसगढ़
- तालचर: ओडिशा
- सिंगरेनी: तेलंगाना
- नेवेली: तमिलनाडु
2. तेल क्षेत्र:
- डिगबोई: असम (पूर्वोत्तर भारत)
- कलोल, अंकलेश्वर: गुजरात
- मुम्बई हाई: अरब सागर (महाराष्ट्र तट के पश्चिम में)
3. तेलशोधक कारखाने:
- भटिंडा: पंजाब
- पानीपत: हरियाणा
- मथुरा: उत्तर प्रदेश
- जामनगर: गुजरात
- मंगलोर: कर्नाटक
- हल्दिया: पश्चिम बंगाल
- गुवाहाटी: असम
- बरौनी: बिहार
4. परमाणु शक्ति केन्द्र:
- कैगा: कर्नाटक
- कालपक्कम: तमिलनाडु
- रावतभाटा: राजस्थान
- नरोरा: उत्तर प्रदेश
- काकरापारा: गुजरात
- तारापुर: महाराष्ट्र
0 Comments