बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिन्दी (गद्य खंड) | पाठ 2: "विष के दाँत" — नलिन विलोचन शर्मा
सम्पूर्ण 50 महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
उत्तर: नलिन विलोचन शर्मा।
उत्तर: 18 फरवरी 1916 ई० को बदरघाट, पटना (बिहार) में।
उत्तर: पिता का नाम महामहोपाध्याय पं० रामावतार शर्मा और माता का नाम रत्नावती शर्मा था।
उत्तर: भोजपुरी भाषी।
उत्तर: नलिन विलोचन शर्मा।
उत्तर: 12 सितंबर 1961 ई० में।
उत्तर: 'विष के दाँत तथा अन्य कहानियाँ' से।
उत्तर: काले रंग की, जो साढ़े सात हजार (₹7,500) में आई थी।
उत्तर: 'स्ट्रीमल इंड'।
उत्तर: पाँच लड़कियाँ—सीमा, रजनी, आलो, शेफाली और आरती।
उत्तर: "कठपुतलियाँ" और "तहजीब व तमीज की जीती-जागती मूरत"।
उत्तर: काशू (खोखा)।
उत्तर: बुढ़ापे में, जब उसके पैदा होने की कोई उम्मीद बाकी नहीं रह गई थी (जीवन के नियमों का अपवाद)।
उत्तर: बिजनेसमैन या इंजीनियर।
उत्तर: कारखाने का बढ़ई मिस्त्री (ठोंक-पीट सिखाने के लिए)।
उत्तर: गिरधरलाल, जो सेन साहब की फैक्ट्री में किरानी (क्लर्क) था।
उत्तर: एक कोने में स्थित आउटहाउस (क्वार्टर) में।
उत्तर: पाँच-छह साल।
उत्तर: चमकती हुई गाड़ी को छूने और देखने के कौतूहल से।
उत्तर: सेन साहब के शोफर (ड्राइवर) ने।
उत्तर: काशू (खोखा) ने।
उत्तर: काशू ने।
उत्तर: "ऐसे ही लड़के आगे चलकर गुंडे, चोर और डाकू बनते हैं!"
उत्तर: पड़ोसियों के लड़कों के साथ लट्टू नचा रहा था।
उत्तर: "जा, अपने बाबा की मोटर पर बैठ!"
उत्तर: मदन को एक घूँसा रसीद कर दिया।
उत्तर: दो दाँत।
उत्तर: "हड्डी और मांस की" तथा "बँगले के पिल्ले और गली के कुत्ते की लड़ाई"।
उत्तर: उसे नौकरी से निकाल दिया और क्वार्टर खाली करने का आदेश दिया।
उत्तर: उसे गोद में उठा लिया और कहा—"शाबास बेटा!"
उत्तर: लड़कियों के लिए घर में कड़े नियम, बंदिशें और सिर्फ "क्या नहीं करना चाहिए" की तालीम थी। इसके विपरीत, खोखा बुढ़ापे की संतान होने के कारण सभी नियमों का अपवाद था और उसे स्वच्छंद दुर्ललित छूट दी गई थी।
उत्तर: सेन साहब क्रोधित होने के बजाय मंद-मंद मुस्कुराते हुए गर्व से बोले कि काशू में अभी से इंजीनियरिंग के लक्षण हैं और वह देखना चाह रहा था कि बत्ती के अंदर क्या है।
उत्तर: उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि उनका बच्चा पहले एक 'जेंटलमैन' (सच्चा इंसान) बने, और आगे वह क्या बनेगा, इसका फैसला करने की उसे पूरी आजादी होगी।
उत्तर: मदन सहज बाल-सुलभ कौतूहलवश सेन साहब की नई चमचमाती कार को छूना चाहता था, किंतु शोफर ने डाँटकर उसे धक्का दे दिया जिससे मदन गिर पड़ा और उसका घुटना छिल गया।
उत्तर: यह कथन सेन साहब के संकीर्ण, पूर्वाग्रही और सामंती अहंकार को दर्शाता है। वे गरीब के बच्चे की निर्दोष जिज्ञासा को अपराध मानते हैं, जबकि अपने उद्दंड बेटे के हर कुकृत्य को प्रतिभा समझते हैं।
उत्तर: यहाँ 'हंस' अमीर घर के दुर्ललित बालक खोखा का और 'कौए' गली के साधारण व विपन्न बच्चों का प्रतीक हैं। खोखा अपने ऐश्वर्य को भूलकर गली के बच्चों के साथ लट्टू खेलने के लिए लालायित हो गया था।
उत्तर: क्योंकि कुछ ही समय पहले सेन साहब के दरवाजे पर उसे कार छूने के अपराध में अपमानित और प्रताड़ित किया गया था; मदन का स्वाभिमान खोखा के रोब को सहन नहीं कर सका।
उत्तर: क्योंकि समाज में धन, सत्ता और संसाधनों का प्रभुत्व अमीरों के पास होता है, और कई बार अन्य गरीब लोग भी एकजुट होने के बजाय अपने ही वर्ग के खिलाफ अमीरों का साथ देने लगते हैं।
उत्तर: यह केवल दो बच्चों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि शोषित और पीड़ित सर्वहारा वर्ग द्वारा पूंजीपतियों के घमंड, अत्याचार और सामंती विषैले दंश (विष के दाँत) को चकनाचूर करने का प्रतीक है।
उत्तर: नौकरी छिन जाने के बाद गिरधरलाल का डर समाप्त हो चुका था। उसे गर्व हुआ कि जिस मालिक के सामने वह हमेशा सिर झुकाए खड़ा रहता था, उसके बेटे के अहंकार को उसके पाँच-छह साल के बच्चे ने धूल चटा दी।
उत्तर: उनकी भाषा गठी हुई, व्यंग्यात्मक, संकेतात्मक और मनोवैज्ञानिक है। वे सपाट बयानी के बजाय पात्रों के अंतर्मन और सामाजिक विद्रूपताओं को गहराई से उकेरते हैं।
उत्तर: सेन दंपति लड़कियों को केवल कठपुतली और दायित्व मानते हैं जिन्हें घर की सीमा में बांधकर रखा गया, जबकि बुढ़ापे में जन्मे बेटे को हर प्रकार की उद्दंडता की खुली छूट दी गई।
उत्तर: गिरधरलाल एक साधारण किरानी था और मालिक के आउटहाउस में रहता था। अपनी आजीविका और आश्रय खोने के डर से वह सेन साहब की डाँट सुनकर अपने ही निर्दोष बेटे को पीटता था।
उत्तर: नलिन विलोचन शर्मा, केसरी कुमार और नरेश—इन तीन कवियों के नामों के आद्याक्षरों से बने आंदोलन को 'नकेनवाद' कहते हैं, जिसने प्रयोगवाद को विशुद्ध काव्य-शैली का रूप दिया।
उत्तर: मदन सर्वहारा और शोषित वर्ग के उस स्वाभिमानी, निडर और विद्रोही रूप का प्रतिनिधित्व करता है जो अन्याय और सामंती दमन के आगे कभी झुकना नहीं जानता।
उत्तर: 'विष के दाँत' कहानी मध्यमवर्ग के दोगलेपन, वर्ग-संघर्ष और लिंग-भेद के यथार्थ को उजागर करती है। रईस सेन साहब अपनी पाँच बेटियों को कठपुतली बनाकर रखते हैं, किंतु अपने इकलौते बेटे काशू (खोखा) की हर उद्दंडता को उसका 'इंजीनियरिंग गुण' मानकर बढ़ावा देते हैं। उनके यहाँ काम करने वाले गरीब किरानी गिरधरलाल का बेटा मदन जब सेन साहब की नई कार को छूने की कोशिश करता है, तो ड्राइवर उसे धक्का देकर गिरा देता है। सेन साहब गिरधरलाल को बुलाकर मदन को अपराधी बताते हैं और गिरधर अपने बेटे की पिटाई करता है। अगले दिन शाम को जब काशू गली में मदन के साथ लट्टू खेलने की जिद करता है और मदन के मना करने पर उसे घूँसा मारता है, तो स्वाभिमानी मदन पलटकर काशू के दो दाँत तोड़ देता है। इसके बदले में सेन साहब गिरधर को नौकरी और घर से निकाल देते हैं। रात में जब मदन मार खाने के डर से घर लौटता है, तो गिरधरलाल उसे पीटने के स्थान पर गर्व से सीने से लगा लेता है।
उत्तर: कहानी में स्पष्ट रूप से दो सामाजिक वर्गों का टकराव दिखाया गया है—एक ओर सेन साहब का संपन्न, शोषक और झूठी प्रतिष्ठा वाला अभिजात्य वर्ग है, तो दूसरी ओर गिरधरलाल और मदन का अभावग्रस्त व लाचार सर्वहारा वर्ग। सेन साहब अपने बेटे की गंभीर शरारतों (गाड़ी की बत्ती तोड़ना, पहियों की हवा निकालना) पर पर्दा डालते हैं, किंतु एक गरीब बालक के मासूम कौतूहल को गुंडागर्दी घोषित कर देते हैं। मनोवैज्ञानिक स्तर पर, गिरधरलाल अपनी आर्थिक लाचारी के कारण मालिक के सामने नतमस्तक रहता है और अपनी हताशा अपने बेटे पर निकालता है। किंतु जब मदन काशू के दाँत तोड़कर सामंती अहंकार को चुनौती देता है और गिरधर की नौकरी छूट जाती है, तो गिरधर के भीतर का सदियों पुराना डर टूट जाता है और वह अपने बेटे के साहस पर गर्व महसूस करता है।
उत्तर: दोनों बालक समाज के दो विपरीत ध्रुवों का प्रतिनिधित्व करते हैं:
- काशू (खोखा): वह अमीर माता-पिता का लाडला, जिद्दी, उद्दंड और अहंकारी बच्चा है। उसे घर में हर नियम तोड़ने की छूट है। वह नौकरों और अपनी बहनों पर हाथ उठाने का आदी है और दूसरों पर जबरन अपना रौब जमाना चाहता है।
- मदन: वह अभावों में पला, लेकिन अत्यंत साहसी, आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी बालक है। वह पिता की मार चुपचाप सहता है, किंतु किसी के अनुचित रौब या अन्याय के आगे नहीं झुकता। काशू द्वारा बिना कारण घूँसा मारे जाने पर वह शेर की तरह पलटकर जवाब देता है और उसके अहंकार को तोड़ देता है।
उत्तर: 'विष के दाँत' शीर्षक अत्यंत प्रतीकात्मक, व्यंग्यात्मक और सार्थक है। सामान्यतः विष के दाँत जहरीले साँपों में होते हैं जो उनके घातक होने की पहचान हैं। कहानी में 'विष के दाँत' सेन साहब के पूंजीवादी अहंकार, सामाजिक शोषण, लिंग-भेद और उनके बेटे काशू की उद्दंडता के प्रतीक हैं। काशू अपने पिता के पैसों और संरक्षण के विषैले अहंकार में चूर होकर दूसरों को तुच्छ समझता था। जब मदन उसके दो दाँत तोड़ देता है, तो वह केवल दाँत नहीं टूटते, बल्कि उस सामंती वर्ग के विषैले घमंड और शोषण की शक्ति का हमेशा के लिए अंत हो जाता है। अतः यह शीर्षक कहानी के मूल उद्देश्य और वैचारिक संदेश को पूर्णतः चरितार्थ करता है।
उत्तर:
- प्रसंग: प्रस्तुत गद्यांश नलिन विलोचन शर्मा द्वारा रचित यथार्थवादी कहानी 'विष के दाँत' के अंतिम प्रसंग से उद्धृत है।
- व्याख्या: रात में जब मदन मार खाने के डर से घर लौटता है, तो गिरधरलाल उसे पीटने के लिए आगे बढ़ता है। किंतु अचानक उसे याद आता है कि अब वह सेन साहब का गुलाम नौकर नहीं रहा, क्योंकि उसकी नौकरी जा चुकी है। उसके मन से नौकरी खोने और मकान खाली करने का सारा डर गायब हो जाता है। उसे इस बात का अपार संतोष और गर्व होता है कि जिस क्रूर और अहंकारी मालिक के सामने वह जीवन भर सिर झुकाता रहा, उसके लाडले बेटे के अन्याय का उसके छोटे से बेटे ने मुँहतोड़ जवाब दिया और उसके दो-दो दाँत तोड़ डाले। गिरधर की यह उन्मुक्त हँसी और मदन को गले लगाना सर्वहारा वर्ग के आत्मसम्मान और सामंतवाद पर उसकी नैतिक विजय की अमर घोषणा है।
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