लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक वाले)
प्र. 1
'मङ्गलम्' पाठ में कुल कितने मन्त्र (श्लोक) संकलित हैं और वे कहाँ से लिए गए हैं?
इस पाठ में उपनिषदों से संकलित कुल पाँच (5) पद्यात्मक मन्त्र हैं।
प्र. 2
उपनिषद् किस साहित्य के अंतिम भाग में दर्शनशास्त्र के सिद्धांतों को प्रकट करते हैं?
उपनिषद् वैदिक वाङ्गमय के अंतिम भाग में दर्शनशास्त्र के सिद्धांतों को प्रकट करते हैं।
प्र. 3
उपनिषदों में मुख्य रूप से किसकी महिमा का गान किया गया है?
उपनिषदों में मुख्य रूप से परमपुरुष परमात्मा की महिमा का गान किया गया है।
प्र. 4
सत्य का मुख किस पात्र से ढका हुआ है?
सत्य का मुख सोने जैसे ज्योतिर्मय आवरण/पात्र (हिरण्मयेन पात्रेण) से ढका हुआ है।
प्र. 5
सत्य-धर्म की प्राप्ति के लिए सूर्यदेव से क्या प्रार्थना की गई है?
सत्य और धर्म की प्राप्ति हेतु सूर्यदेव (पूषन्) से प्रार्थना की गई है कि वे सत्य के मुख पर ढके स्वर्णमय आवरण को हटा दें।
प्र. 6
आत्मा का स्वरूप कैसा है? पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।
आत्मा सूक्ष्म से भी अति-सूक्ष्म (अणोरणीयान्) और महान से भी महान (महतो महीयान्) है, जो प्राणी की हृदय रूपी गुफा में स्थित है।
प्र. 7
आत्मा को कौन देख सकता है और वह शोक-रहित कैसे होता है?
कामना-रहित निष्काम पुरुष ईश्वरीय कृपा से आत्मा की महिमा को देख पाता है और शोक-रहित हो जाता है।
प्र. 8
किसकी जय होती है और किसकी जय नहीं होती?
हमेशा सत्य की ही जय होती है, असत्य (अमृतम्) की जय कभी नहीं होती।
प्र. 9
'देवयान' का मार्ग किससे प्रशस्त होता है?
देवयान (देवताओं के लोक का मार्ग) सत्य के आचरण से ही विस्तृत/प्रशस्त होता है।
प्र. 10
ऋषिगण सत्य के परम निधान तक पहुँचने के लिए किस मार्ग का अनुसरण करते हैं?
आप्तकाम (इच्छा-रहित) ऋषिगण परम सत्य को प्राप्त करने के लिए सत्य के मार्ग पर ही चलते हैं।
प्र. 11
नदियाँ अपने नाम और रूप को छोड़कर कहाँ विलीन हो जाती हैं?
बहती हुई नदियाँ अपने नाम और रूप (नामरूपे) को त्यागकर समुद्र में अदृश्य होकर विलीन हो जाती हैं।
प्र. 12
विद्वान पुरुष किस प्रकार दिव्य परमपुरुष (परमात्मा) को प्राप्त करते हैं?
ज्ञानी/विद्वान पुरुष अपने नाम और रूप के मोह से मुक्त होकर दिव्य परमपुरुष परमात्मा को प्राप्त कर लेते हैं।
प्र. 13
'श्वेताश्वतरोपनिषद्' के मन्त्र के अनुसार अज्ञान और ज्ञान का स्वरूप क्या है?
अज्ञान अंधकार-स्वरूप (तमसः) है तथा परमपुरुष परमात्मा आदित्य (सूर्य) के समान प्रकाशमान और अज्ञान से परे हैं।
प्र. 14
मृत्यु को पार करने का एकमात्र मार्ग क्या है?
परमात्मा को जान लेना ही मृत्यु के भय को पार करने और मोक्ष प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग है।
प्र. 15
'मङ्गलम्' पाठ का मुख्य संदेश क्या है?
मुख्य संदेश यह है कि सत्य, आत्म-ज्ञान और ईश्वर की भक्ति ही मानव जीवन के परम लक्ष्य हैं।
प्र. 16
'हिरण्मयेन पात्रेण' मन्त्र किस उपनिषद् से उद्धृत है?
यह मन्त्र ईशावास्योपनिषद् (15) से संकलित है।
प्र. 17
'अणोरणीयान् महतो महीयान्' मन्त्र किस उपनिषद् से लिया गया है?
यह मन्त्र कठोपनिषद् (1.2.20) से लिया गया है।
प्र. 18
'सत्यमेव जयते नानृतम्' मन्त्र किस उपनिषद् से संकलित है?
यह मन्त्र मुण्डकोपनिषद् (3.1.6) से संकलित है।
प्र. 19
'यथा नद्यः स्यन्दमानाः...' मन्त्र किस उपनिषद् से उद्धृत है?
यह मन्त्र मुण्डकोपनिषद् (3.2.8) से उद्धृत है।
प्र. 20
'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्...' मन्त्र किस उपनिषद् से लिया गया है?
यह मन्त्र श्वेताश्वतरोपनिषद् (3.8) से लिया गया है।
प्र. 21
परमात्मा द्वारा क्या अनुशासित और व्याप्त है?
परमात्मा द्वारा यह संपूर्ण संसार व्याप्त और अनुशासित है।
प्र. 22
सभी प्रकार की तपस्याओं का परम लक्ष्य क्या है?
परमात्मा की प्राप्ति ही सभी तपस्याओं का अंतिम एवं परम लक्ष्य है।
प्र. 23
'पूषन्' शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है?
'पूषन्' शब्द का प्रयोग सूर्यदेव (परमेश्वर) के लिए किया गया है।
प्र. 24
'सत्यस्य परमं निधानम्' कहाँ स्थित है?
जहाँ परमपिता परमेश्वर निवास करते हैं, वही सत्य का परम निधान (स्थान) है।
प्र. 25
समुद्र में मिलने पर नदियों का क्या अस्तित्व रह जाता है?
समुद्र में मिलने पर नदियों का अपना नाम और रूप समाप्त हो जाता है और वे समुद्र-रूप बन जाती हैं।
प्र. 26
'वीतशोकः' का क्या अर्थ है?
'वीतशोकः' का अर्थ है— "दुःख या शोक से रहित हो जाना"।
प्र. 27
जंतु की हृदय रूपी गुफा में कौन बंद है?
प्राणी की हृदय रूपी गुफा में 'आत्मा' (अणोरणीयान्) निहित है।
प्र. 28
असत्य का मार्ग मनुष्य को किस ओर ले जाता है?
असत्य का मार्ग मनुष्य को पतन और आध्यात्मिक विनाश की ओर ले जाता है।
प्र. 29
'आदित्यवर्णम्' का क्या तात्पर्य है?
इसका तात्पर्य सूर्य के समान दिव्य और स्वयंप्रकाशित रूप से है।
प्र. 30
उपनिषदों का रचयिता किसे माना जाता है?
उपनिषदों की रचना वैदिक ऋषियों द्वारा ज्ञान परंपरा के अंतर्गत की गई है।
दीर्घ उत्तरीय एवं व्याख्यात्मक प्रश्न (5 अंक वाले)
प्र. 31
'मङ्गलम्' पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
'मङ्गलम्' पाठ में विभिन्न उपनिषदों से संकलित 5 मन्त्र हैं। पहले मन्त्र (ईशावास्योपनिषद्) में प्रार्थना की गई है कि सत्य के मुख से सोने का आवरण हटा दिया जाए। दूसरे मन्त्र (कठोपनिषद्) में आत्मा को सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और महान से भी महान बताया गया है जो हृदय-गुफा में निवास करती है। तीसरे मन्त्र (मुण्डकोपनिषद्) में 'सत्यमेव जयते' का उद्घोष है कि सत्य से ही देवलोक का मार्ग मिलता है। चौथे मन्त्र (मुण्डकोपनिषद्) में नदियों के समुद्र में मिलने के उदाहरण द्वारा समझाया गया है कि विद्वान अपने नाम-रूप को त्यागकर ईश्वर में लीन हो जाते हैं। पाँचवें मन्त्र (श्वेताश्वतरोपनिषद्) में ईश्वर को सूर्य के समान दिव्य मानकर उन्हें जानकर ही मृत्यु पर विजय पाने का मार्ग बताया गया है।
प्र. 32
सत्य के महत्व का वर्णन 'मङ्गलम्' पाठ के आधार पर कीजिए।
पाठ में सत्य को परम मूल्य माना गया है। सत्य का मुख सांसारिक आकर्षणों (स्वर्ण पात्र) से ढका रहता है, जिसे हटाकर ही सत्यधर्म पाया जा सकता है। उपनिषद् कहता है कि "सत्यमेव जयते नानृतम्"—अर्थात जीत हमेशा सत्य की ही होती है, असत्य की नहीं। देवलोक जाने का मार्ग केवल सत्य से ही प्रशस्त होता है। प्राचीन ऋषिगण भी अपने निष्काम कर्मों से सत्य के परम धाम तक पहुँचते थे।
प्र. 33
आत्मा के स्वरूप और उसकी महिमा पर प्रकाश डालें।
कठोपनिषद् के अनुसार आत्मा जीव के हृदय रूपी गुफा में स्थित है। यह सूक्ष्मातिसूक्ष्म और महानातिमहान है। इसे न तो आँखों से देखा जा सकता है और न ही सांसारिक साधनों से वश में किया जा सकता है। जब मनुष्य सांसारिक इच्छाओं और मोह-माया से मुक्त हो जाता है, तब ईश्वर की अनुकंपा से उसे इस निष्कलंक आत्मा और परमात्मा की महिमा का साक्षात्कार होता है, जिससे वह समस्त सांसारिक दुखों और शोक से मुक्त हो जाता है।
प्र. 34
"यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेश्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय..." श्लोक की सप्रसंग व्याख्या करें।
प्रसंग: यह श्लोक 'मङ्गलम्' पाठ (मुण्डकोपनिषद्) से उद्धृत है। इसमें जीव और ब्रह्म के एकाकार होने की स्थिति का वर्णन है।
व्याख्या: जिस प्रकार विभिन्न दिशाओं से बहती हुई नदियाँ जब विशाल समुद्र में गिरती हैं, तो वे अपने नाम और रूप (पहचान) को त्यागकर समुद्र का ही अंग बन जाती हैं, ठीक उसी प्रकार ज्ञानी और तत्वज्ञानी पुरुष इस नश्वर संसार के नाम, पद और रूप के अहंकार को छोड़कर उस दिव्य और सर्वव्यापी परमपुरुष (परमात्मा) में विलीन हो जाते हैं।
प्र. 35
"हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्..." मन्त्र की व्याख्या करें।
प्रसंग: यह मन्त्र 'मङ्गलम्' पाठ (ईशावास्योपनिषद्) से उद्धृत है।
व्याख्या: इस मन्त्र में साधक सूर्यदेव से प्रार्थना करता है कि हे संसार का भरण-पोषण करने वाले प्रभु (पूषन्)! सत्य का मुख सोने जैसे चकाचौंध करने वाले मोह-मयी आवरण से ढका हुआ है। वास्तविक सत्य और धर्म के दर्शन हेतु इस सांसारिक आकर्षण रूपी आवरण को हटा दीजिए ताकि मैं सत्य-धर्म का ज्ञान प्राप्त कर सकूँ।
एक-पंक्तिय (One-Liner) अभ्यास प्रश्न एवं उत्तर
प्र. 36
'मङ्गलम्' पाठ में कितने मन्त्र हैं?
पञ्च (5)।
प्र. 37
सत्य का मुख किससे ढका है?
हिरण्मयेन पात्रेण (स्वर्णमय पात्र से)।
प्र. 38
अणोरणीयान् कः? (अणु से भी सूक्ष्म कौन है?)
आत्मा।
प्र. 39
महतो महीयान् कः? (महान से भी महान कौन है?)
आत्मा।
प्र. 40
किसकी विजय होती है?
सत्यस्य (सत्य की)।
प्र. 41
किसकी विजय नहीं होती?
अनृतम् (असत्य की)।
प्र. 42
'देवयानः पंथा' किससे विस्तृत होता है?
सत्येन (सत्य से)।
प्र. 43
नदियाँ अपने नाम-रूप को छोड़कर कहाँ गिरती हैं?
समुद्र में (समुद्रे)।
प्र. 44
नदियाँ किसे छोड़कर समुद्र में मिलती हैं?
नामरूपे (नाम और रूप को)।
प्र. 45
विद्वान पुरुष किसे प्राप्त करते हैं?
परात्परं दिव्यं पुरुषम् (परमात्मा को)।
प्र. 46
तमसः परस्तात् कः? (अंधकार से परे कौन हैं?)
आदित्यवर्णः परमपुरुषः (सूर्य रूप परमात्मा)।
प्र. 47
मृत्यु को पार करने का क्या उपाय है?
तमेव विदित्वा (परमात्मा को जानकर ही)।
प्र. 48
उपनिषद् किसके अंतिम भाग में स्थित हैं?
वैदिक वाङ्गमय के।
प्र. 49
'अपितिहम्' का क्या अर्थ है?
ढका हुआ (आच्छादितम्)।
प्र. 50
'अपावृणु' का क्या अर्थ है?
हटा दें (अपासस्र्य)।
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