Chapter 2. सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली | BSEB 10 Polity Subjective


बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) कक्षा 10 — राजनीति विज्ञान

अध्याय 2: सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली (Working of Power Sharing)

भाग 1: 50 एक-पंक्ति प्रश्नोत्तर (One-Liners)
सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली का मूल आधार क्या है?
संघवाद और सत्ता का विकेंद्रीकरण।
संघीय शासन व्यवस्था में सत्ता का विभाजन किन स्तरों पर होता है?
केंद्र सरकार और उसकी विभिन्न प्रांतीय/राज्य सरकारों के बीच।
'साथ आकर संघ बनाने' (Coming Together Federation) का प्रमुख उदाहरण कौन-सा देश है?
संयुक्त राज्य अमेरिका (USA), स्विट्ज़रलैंड और ऑस्ट्रेलिया।
'सबको साथ लेकर संघ बनाने' (Holding Together Federation) का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कौन-सा देश है?
भारत, स्पेन और बेल्जियम।
भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद में भारत को 'राज्यों का संघ' घोषित किया गया है?
अनुच्छेद 1 में।
संविधान की किस अनुसूची में केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का विभाजन है?
सातवीं अनुसूची में।
संघ सूची (Union List) में मूल रूप से कितने विषय रखे गए थे?
97 विषय (वर्तमान में गणना अनुसार 100)।
राज्य सूची (State List) में मूल रूप से कितने विषय शामिल थे?
66 विषय (वर्तमान में 61)।
समवर्ती सूची (Concurrent List) में मूल रूप से कितने विषय थे?
47 विषय (वर्तमान में 52)।
रक्षा, विदेश नीति और मुद्रा किस सूची के विषय हैं?
संघ सूची के।
पुलिस, जेल, कृषि और स्थानीय स्वशासन किस सूची के विषय हैं?
राज्य सूची के।
शिक्षा, वन, विवाह और दत्तक ग्रहण किस सूची के अंतर्गत आते हैं?
समवर्ती सूची के।
समवर्ती सूची के किसी विषय पर केंद्र और राज्य के कानूनों में टकराव होने पर किसका कानून मान्य होता है?
केंद्र सरकार (संसद) का कानून।
अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers) किसे सौंपी गई हैं?
केंद्र सरकार (संसद) को (अनुच्छेद 248 के तहत)।
कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और ई-कॉमर्स जैसे नए विषय किस अधिकार क्षेत्र में आते हैं?
अवशिष्ट शक्तियों के तहत केंद्र सरकार के अधीन।
संविधान की 8वीं अनुसूची में वर्तमान में कितनी भाषाओं को मान्यता प्राप्त है?
22 भाषाओं को।
भारत की राजभाषा (Official Language) कौन-सी है?
देवनागरी लिपि में हिंदी (अनुच्छेद 343)।
क्या भारत में किसी भी भाषा को 'राष्ट्रभाषा' (National Language) का संवैधानिक दर्जा दिया गया है?
नहीं, संविधान में किसी भी एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया है।
भाषाई आधार पर गठित होने वाला भारत का पहला राज्य कौन-सा था?
आंध्र प्रदेश (1953 में)।
राज्य पुनर्गठन आयोग (SRC) की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
1953 में (अध्यक्ष: फजल अली; रिपोर्ट लागू: 1956)।
भारत में त्रिस्तरीय पंचायती राज प्रणाली की सिफारिश किस समिति ने की थी?
बलवंत राय मेहता समिति (1957) ने।
स्वतंत्र भारत में पंचायती राज का शुभारंभ सर्वप्रथम कहाँ और कब हुआ?
2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में (पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा)।
पंचायती राज को संवैधानिक मान्यता किस संविधान संशोधन द्वारा मिली?
73वें संविधान संशोधन अधिनियम (1992) द्वारा।
73वाँ संविधान संशोधन कब से पूरे देश में लागू हुआ?
24 अप्रैल 1993 से (इसलिए 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाया जाता है)।
पंचायती राज से संबंधित 11वीं अनुसूची में कुल कितने विषयों का उल्लेख है?
29 विषयों का।
नगरीय स्थानीय स्वशासन से संबंधित 74वाँ संविधान संशोधन किस वर्ष पारित हुआ?
1992 में (लागू: 1 जून 1993)।
74वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ी गई 12वीं अनुसूची में कितने विषय हैं?
18 विषय।
ग्राम पंचायत की कार्यपालिका का प्रधान कौन होता है?
मुखिया (Gram Pradhan/Mukhiya)।
ग्राम पंचायत का सचिव कौन होता है?
पंचायत सचिव (सरकारी कर्मचारी)।
ग्राम कचहरी का प्रधान कौन होता है?
सरपंच।
ग्राम कचहरी में दीवानी और फौजदारी मामलों की सुनवाई की अधिकतम आर्थिक सीमा क्या है?
बिहार पंचायती राज अधिनियम के तहत ₹10,000 तक के मामले।
ग्राम कचहरी के कानूनी सलाहकार को क्या कहा जाता है?
न्याय मित्र।
ग्राम रक्षा दल (दलपति) का कार्य क्या होता है?
गाँव में सुरक्षा, रात्रि गश्त और आपात स्थिति में शांति व्यवस्था बनाए रखना।
प्रखंड (Block) स्तर पर पंचायती राज की संस्था को क्या कहते हैं?
पंचायत समिति।
पंचायत समिति का कार्यपालक पदाधिकारी कौन होता है?
प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO)।
जिला स्तर पर पंचायती राज की सर्वोच्च संस्था कौन-सी है?
जिला परिषद्।
जिला परिषद् का मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी (CEO) कौन होता है?
उप विकास आयुक्त (DDC) अथवा जिला स्तर का वरिष्ठ IAS/प्रशासनिक अधिकारी।
बिहार पंचायती राज अधिनियम किस वर्ष पारित हुआ था?
2006 में।
बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 के तहत महिलाओं को कितने प्रतिशत आरक्षण दिया गया?
50 प्रतिशत आरक्षण (देश में ऐसा करने वाला बिहार पहला राज्य बना)।
नगर निगम के प्रशासनिक और निर्वाचित सर्वोच्च प्रमुख को क्या कहते हैं?
महापौर (Mayor)।
नगर निगम का मुख्य प्रशासनिक अधिकारी (सरकारी) कौन होता है?
नगर आयुक्त (Municipal Commissioner)।
बिहार में पटना नगर निगम की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
1952 में।
पटना नगर निगम में कुल वार्डों की संख्या वर्तमान में कितनी है?
75 वार्ड।
छोटे कस्बों या संक्रमणशील क्षेत्रों के लिए किस नगरीय निकाय का गठन होता है?
नगर पंचायत का।
छोटे शहरों के लिए किस स्थानीय निकाय का गठन किया जाता है?
नगर परिषद् का।
पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनाव कराने का संवैधानिक दायित्व किसका है?
राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) का।
पंचायतों और नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा कौन करता है?
राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission)।
भारतीय संघवाद में केंद्र और राज्यों के बीच विवादों का निपटारा कौन करता है?
भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)।
गठबंधन सरकारों के दौर की शुरुआत केंद्र में मुख्य रूप से किस वर्ष के बाद मानी जाती है?
1989 के आम चुनावों के बाद।
सत्ता के क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution) में सत्ता किनके बीच बँटी होती है?
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच।
भाग 2: 25 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Short Answer Questions)
1. संघीय शासन व्यवस्था (Federal System) की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
  • इसमें सरकार दो या दो से अधिक स्तरों (केंद्र सरकार और राज्य सरकारें) पर विभाजित होती है।
  • दोनों स्तर की सरकारों के अधिकार क्षेत्र, कार्य और राजस्व स्रोत लिखित संविधान द्वारा स्पष्ट रूप से परिभाषित होते हैं।
2. 'साथ आकर संघ बनाना' और 'सबको साथ लेकर संघ बनाना' में क्या अंतर है?
'साथ आकर संघ बनाने' में दो या अधिक स्वतंत्र राष्ट्र अपनी संप्रभुता को साझा कर एक बड़ा संघ बनाते हैं (जैसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया)। 'सबको साथ लेकर संघ बनाने' में एक बड़ा देश अपनी आंतरिक विविधता और प्रशासनिक सुविधा के लिए शक्तियों को केंद्र और राज्यों के बीच बाँट देता है (जैसे भारत, स्पेन)।
3. संघ सूची (Union List) और राज्य सूची (State List) में क्या अंतर है?
संघ सूची में राष्ट्रीय महत्व के विषय (जैसे रक्षा, विदेश मामले, रेलवे, बैंकिंग) होते हैं जिन पर केवल केंद्र की संसद कानून बना सकती है। राज्य सूची में स्थानीय और प्रांतीय महत्व के विषय (जैसे पुलिस, जेल, कृषि, सिंचाई) होते हैं जिन पर राज्य विधानमंडल कानून बनाता है।
4. समवर्ती सूची (Concurrent List) क्या है? यदि इस पर केंद्र और राज्य में मतभेद हो तो क्या होगा?
समवर्ती सूची में वे विषय होते हैं जो केंद्र और राज्य दोनों के लिए समान महत्व के हैं (जैसे शिक्षा, वन, विवाह, बिजली)। इस पर दोनों कानून बना सकते हैं, परंतु विवाद या विरोधाभास की स्थिति में केंद्र सरकार (संसद) का कानून मान्य होता है।
5. अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers) क्या हैं और ये किसे दी गई हैं?
जो विषय संविधान निर्माण के समय अस्तित्व में नहीं थे और तीनों सूचियों में शामिल नहीं हैं (जैसे साइबर कानून, ई-कॉमर्स, सॉफ्टवेयर), उन्हें अवशिष्ट शक्तियाँ कहा जाता है। भारतीय संविधान के अनुसार इन पर कानून बनाने का अनन्य अधिकार केवल केंद्र सरकार (संसद) को प्राप्त है।
6. भारत की भाषा नीति की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  • भारत में किसी भी एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया; हिंदी को राजभाषा बनाया गया और अंग्रेजी का प्रयोग प्रशासनिक कार्यों में जारी रखा गया।
  • आठवीं अनुसूची में 22 प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं को मान्यता दी गई, जिससे भाषाई अल्पसंख्यकों की अस्मिता सुरक्षित रही।
7. भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन से देश को क्या लाभ हुआ?
शुरुआत में आशंका थी कि भाषाई राज्यों से देश टूट जाएगा, परंतु अनुभव ने सिद्ध किया कि इससे देश अधिक एकजुट हुआ, प्रशासन स्थानीय भाषाओं में चलने से सुगम हुआ और विभिन्न भाषाई समूहों का अलगाव समाप्त हुआ।
8. केंद्र-राज्य संबंधों में 1990 के बाद क्या महत्वपूर्ण बदलाव आया?
1990 के बाद केंद्र में एकदलीय प्रभुत्व का अंत हुआ और गठबंधन सरकारों का युग शुरू हुआ। इससे राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का महत्व बढ़ा, केंद्र द्वारा राज्य सरकारों को मनमाने ढंग से बर्खास्त करने (अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग) पर रोक लगी और संघवाद मजबूत हुआ।
9. सत्ता के विकेंद्रीकरण (Decentralization) से आप क्या समझते हैं?
जब सत्ता और निर्णय लेने के अधिकार केंद्र और राज्य सरकारों से लेकर स्थानीय स्तर की संस्थाओं (पंचायतों और नगरपालिकाओं) को सौंप दिए जाते हैं, तो इसे सत्ता का विकेंद्रीकरण कहते हैं।
10. 1992 के 73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज में किए गए दो प्रमुख सुधार क्या थे?
  • पंचायतों के लिए प्रत्येक 5 वर्ष में नियमित चुनाव कराना संवैधानिक रूप से अनिवार्य किया गया।
  • महिलाओं के लिए न्यूनतम एक-तिहाई (33%) सीटें और अनुसूचित जातियों/जनजातियों के लिए जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण सुनिश्चित किया गया।
11. ग्राम सभा क्या है और इसकी क्या भूमिका है?
ग्राम पंचायत के क्षेत्र में रहने वाले सभी वयस्क मतदाता (18 वर्ष या उससे अधिक आयु के) ग्राम सभा के सदस्य होते हैं। यह ग्राम पंचायत के बजट की समीक्षा करती है, विकास योजनाओं की निगरानी करती है और मुखिया पर नियंत्रण रखती है।
12. ग्राम पंचायत के प्रमुख अंगों के नाम लिखिए।
ग्राम पंचायत के चार प्रमुख अंग होते हैं:
  • ग्राम सभा
  • ग्राम पंचायत (कार्यपालिका, जिसका प्रमुख मुखिया होता है)
  • ग्राम कचहरी (न्यायिक अंग, जिसका प्रमुख सरपंच होता है)
  • ग्राम रक्षा दल (सुरक्षा दस्ता)
13. ग्राम कचहरी के गठन और कार्यों का संक्षेप में उल्लेख करें।
ग्राम कचहरी ग्रामीण स्तर पर न्याय प्रदान करने वाली संस्था है, जिसका प्रधान सरपंच होता है। यह 10,000 रुपये तक के छोटे दीवानी और सामान्य फौजदारी मामलों की सुनवाई आपसी सुलह-समझौते और पंचायती न्याय के आधार पर करती है।
14. न्याय मित्र और न्याय सचिव की क्या भूमिका होती है?
  • न्याय मित्र: विधि (कानून) का जानकार व्यक्ति होता है जो ग्राम कचहरी को कानूनी मामलों में सलाह देता है।
  • न्याय सचिव: ग्राम कचहरी के कागजी कार्यों, रजिस्टरों और प्रशासनिक अभिलेखों का रख-रखाव करता है।
15. पंचायत समिति का गठन किस स्तर पर होता है और इसका प्रधान कौन होता है?
पंचायत समिति पंचायती राज व्यवस्था का मध्यवर्ती (प्रखंड/ब्लॉक स्तर) स्तर है। इसके निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने बीच से एक 'प्रमुख' और एक 'उप-प्रमुख' का चुनाव किया जाता है। इसका प्रशासनिक सचिव प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) होता है।
16. जिला परिषद् के क्या कार्य हैं?
जिला परिषद् जिले की सभी पंचायत समितियों और ग्राम पंचायतों के विकास कार्यों में समन्वय स्थापित करती है, पूरे जिले के लिए समेकित विकास योजनाएँ तैयार करती है और सरकारी अनुदान का उचित बँटवारा करती है।
17. बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 की दो ऐतिहासिक विशेषताएँ बताइए।
  • पंचायती राज के सभी पदों पर महिलाओं को 50% आरक्षण प्रदान किया गया।
  • अत्यंत पिछड़े वर्गों (EBC) के लिए भी पंचायती राज संस्थाओं में 20% आरक्षण की व्यवस्था की गई।
18. नगर निगम की आय के दो प्रमुख स्रोत क्या हैं?
  • मकान, जल, प्रकाश, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और वाहनों पर लगाए जाने वाले स्थानीय कर (टैक्स)।
  • राज्य सरकार और केंद्र सरकार से प्राप्त होने वाले वार्षिक वित्तीय अनुदान और ऋण।
19. नगर आयुक्त (Municipal Commissioner) के क्या कार्य हैं?
नगर आयुक्त नगर निगम का मुख्य प्रशासनिक अधिकारी (IAS या राज्य प्रशासनिक सेवा स्तर) होता है। यह नगर निगम द्वारा पारित नीतियों, बजट और विकास परियोजनाओं को धरातल पर लागू करता है तथा कर्मचारियों पर नियंत्रण रखता है।
20. महापौर (Mayor) की क्या स्थिति होती है?
महापौर नगर निगम का निर्वाचित और संवैधानिक प्रथम नागरिक होता है। वह नगर निगम परिषद् की बैठकों की अध्यक्षता करता है और शहर के विकास एवं नीतिगत निर्णयों में मुख्य भूमिका निभाता है।
21. नगर पंचायत और नगर परिषद् में क्या अंतर है?
  • नगर पंचायत: ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्र में बदल रहे संक्रमणकालीन कस्बों (आमतौर पर 12,000 से 40,000 की आबादी) में गठित होती है।
  • नगर परिषद्: छोटे शहरों (40,000 से 2 लाख तक की आबादी) में गठित की जाती है।
22. राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) की क्या भूमिका है?
यह एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है जिसका कार्य राज्यों में पंचायती राज संस्थाओं (ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद्) और नगर निकायों के स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराना तथा मतदाता सूची तैयार करना है।
23. भारतीय संघवाद में न्यायपालिका को 'संविधान का संरक्षक' क्यों कहा जाता है?
क्योंकि यदि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच विधायी शक्तियों या संविधान की व्याख्या को लेकर कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो सर्वोच्च न्यायालय निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में उसका अंतिम और बाध्यकारी निर्णय करता है।
24. भारत में स्थानीय स्वशासन के सामने दो प्रमुख वित्तीय चुनौतियाँ क्या हैं?
  • राज्य सरकारों द्वारा समय पर पर्याप्त वित्तीय संसाधन और अनुदान हस्तांतरित न करना।
  • स्थानीय निकायों द्वारा अपने स्तर पर कर (टैक्स) वसूलने की सीमित क्षमता और तंत्र का अभाव।
25. सत्ता की साझेदारी के 'ऊर्ध्वाधर वितरण' (Vertical Distribution) से क्या तात्पर्य है?
जब सत्ता का विभाजन सरकार के विभिन्न स्तरों—जैसे उच्च स्तर (केंद्र), मध्यम स्तर (राज्य) और निम्न स्तर (स्थानीय निकाय)—के बीच ऊपर से नीचे की ओर किया जाता है, तो इसे सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण या संघवाद कहते हैं।
भाग 3: 15 दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Long Answer Questions)
1. भारतीय संघवाद की प्रमुख विशेषताओं का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।

भारतीय संविधान भारत को औपचारिक रूप से 'राज्यों का संघ' (Union of States) घोषित करता है। इसकी प्रमुख संघीय विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • दोहरी शासन व्यवस्था: भारत में शासन के दो मुख्य स्तर हैं—केंद्र सरकार (पूरे देश के लिए) और राज्य सरकारें (प्रांतीय मामलों के लिए)। 1992 के बाद स्थानीय स्तर (पंचायती राज व नगरपालिका) को जोड़कर इसे त्रिस्तरीय बनाया गया।
  • शक्तियों का लिखित और स्पष्ट विभाजन: संविधान की सातवीं अनुसूची में तीन सूचियों—संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची—के माध्यम से दोनों स्तरों के कार्यक्षेत्र और विधायी अधिकार पूरी तरह सुनिश्चित किए गए हैं।
  • संविधान की सर्वोच्चता: केंद्र और राज्य दोनों ही अपनी शक्तियाँ सीधे संविधान से प्राप्त करते हैं। कोई भी सरकार संविधान के मूल ढाँचे का उल्लंघन नहीं कर सकती।
  • स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका: यदि केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों को लेकर कोई विवाद होता है, तो देश का सर्वोच्च न्यायालय निष्पक्ष पंच की भाँति उसका समाधान करता है।
  • कठोर संविधान संशोधन प्रक्रिया: संघीय ढाँचे से जुड़े संवैधानिक अनुच्छेदों में केंद्र सरकार अकेले संशोधन नहीं कर सकती; इसके लिए संसद के विशेष बहुमत के साथ-साथ कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों की सहमति अनिवार्य होती है।
2. भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के त्रिस्तरीय बँटवारे की विवेचना कीजिए।

संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों को तीन मुख्य सूचियों और एक अवशिष्ट श्रेणी में विभाजित किया गया है:

  • संघ सूची (Union List):
    इसमें राष्ट्रीय महत्व के 97 विषय (वर्तमान में 100) शामिल हैं। इन पर केवल देश की संसद कानून बना सकती है। जैसे—देश की रक्षा, वैदेशिक मामले, युद्ध और संधि, रेलवे, बैंकिंग, डाक-तार, मुद्रा और परमाणु ऊर्जा। इनका उद्देश्य पूरे देश में नीतियों की एकरूपता बनाए रखना है।
  • राज्य सूची (State List):
    इसमें प्रांतीय और स्थानीय महत्व के 66 विषय (वर्तमान में 61) शामिल हैं। इन पर सामान्य परिस्थितियों में राज्य विधानमंडल को कानून बनाने का विशेष अधिकार है। जैसे—पुलिस, जेल, न्याय प्रशासन, स्थानीय स्वशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि और सिंचाई।
  • समवर्ती सूची (Concurrent List):
    इसमें 47 विषय (वर्तमान में 52) शामिल हैं जो राष्ट्रीय और प्रांतीय दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं। संसद और राज्य विधानमंडल दोनों इन पर कानून बना सकते हैं। जैसे—शिक्षा, वन, विवाह और तलाक, दीवानी कानून, ट्रेड यूनियन और बिजली। यदि किसी विषय पर केंद्र और राज्य के कानूनों में अंतर्विरोध पैदा हो, तो केंद्र का कानून प्रभावी होता है।
  • अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers):
    अनुच्छेद 248 के अनुसार, जो विषय इन तीनों सूचियों में दर्ज नहीं हैं (विशेषकर आधुनिक तकनीक से जुड़े विषय जैसे साइबर कानून, अंतरिक्ष अनुसंधान, सॉफ्टवेयर आदि), उन पर कानून बनाने की अनन्य शक्ति केंद्र सरकार (संसद) को दी गई है।
3. भारत की भाषा नीति किस प्रकार राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने में सफल रही है? विस्तार से समझाइए।

भारत जैसी अत्यधिक भाषाई विविधता वाले देश में भाषा नीति का निर्धारण सबसे संवेदनशील कार्य था:

  • राष्ट्रभाषा का अभाव और हिंदी की स्थिति:
    संविधान निर्माताओं ने किसी भी एक भाषा को भारत की राष्ट्रभाषा (National Language) घोषित नहीं किया। हिंदी को 'राजभाषा' (Official Language) का दर्जा दिया गया क्योंकि यह देश की सर्वाधिक आबादी (लगभग 40-44%) द्वारा बोली जाती है। अन्य 60% गैर-हिंदी भाषियों पर हिंदी को थोपा नहीं गया।
  • अंग्रेजी का सह-प्रयोग:
    मूल संविधान में व्यवस्था थी कि 1965 के बाद अंग्रेजी का आधिकारिक प्रयोग बंद कर दिया जाएगा। परंतु दक्षिण भारत (विशेषकर तमिलनाडु) में गैर-हिंदी भाषियों के भारी विरोध और हिंसक आंदोलनों को देखते हुए केंद्र सरकार ने लचीलापन दिखाया और प्रशासनिक कार्यों में हिंदी के साथ अंग्रेजी के निरंतर प्रयोग की अनुमति दी।
  • आठवीं अनुसूची और 22 भाषाएँ:
    संविधान की 8वीं अनुसूची में 22 प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं (जैसे बांग्ला, तमिल, तेलुगु, मराठी, उर्दू, मैथिली आदि) को मान्यता दी गई। केंद्र सरकार की सिविल सेवा परीक्षाओं में उम्मीदवार इनमें से किसी भी भाषा में परीक्षा लिखने का विकल्प चुन सकते हैं।

निष्कर्ष: श्रीलंका के विपरीत, जहाँ बहुसंख्यक सिंहली भाषा को थोपने से गृहयुद्ध छिड़ गया, भारत की लचीली और समावेशी भाषा नीति ने राष्ट्रीय एकता, अखंडता और क्षेत्रीय स्वायत्तता के बीच एक सुंदर संतुलन स्थापित किया।

4. "1990 के बाद के दौर ने भारतीय संघवाद के व्यावहारिक स्वरूप को गहराई से बदल दिया।" इस कथन की समीक्षा कीजिए।

1990 से पूर्व भारत में लंबे समय तक केंद्र और अधिकांश राज्यों में एक ही राजनीतिक दल (कांग्रेस) का शासन रहा। इससे केंद्र सरकार शक्तिशाली थी और राज्यों की स्वायत्तता सीमित थी। परंतु 1990 के बाद ऐतिहासिक परिवर्तन आए:

  • गठबंधन सरकारों का युग:
    1989 के आम चुनावों के बाद किसी एक राष्ट्रीय दल को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। केंद्र में सरकार बनाने के लिए राष्ट्रीय दलों (जैसे BJP और कांग्रेस) को क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करना पड़ा। इससे राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का दबदबा बढ़ा।
  • अनुच्छेद 356 के मनमाने उपयोग पर रोक:
    1990 से पहले केंद्र सरकार अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का दुरुपयोग कर विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को मनमाने ढंग से बर्खास्त कर देती थी। 1994 में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक एस. आर. बोम्मई वाद के फैसले और गठबंधन की मजबूरियों के कारण राज्यों की मनमानी बर्खास्तगी पर लगभग पूर्ण विराम लग गया।
  • राज्यों की सौदेबाजी शक्ति में वृद्धि:
    क्षेत्रीय दलों के समर्थन पर टिकी होने के कारण केंद्र सरकार राज्यों की वित्तीय माँगों, विशेष पैकेजों और विकास प्राथमिकताओं की उपेक्षा नहीं कर सकी। इससे वास्तविक सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बल मिला।
5. 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के प्रमुख प्रावधानों और भारतीय ग्रामीण समाज पर इसके प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए।

73वें संविधान संशोधन (1992) ने भारतीय लोकतंत्र को ज़मीनी स्तर पर संस्थागत रूप दिया:

प्रमुख कानूनी प्रावधान:

  • त्रिस्तरीय ढाँचा: प्रत्येक राज्य में ग्राम, प्रखंड और जिला स्तर पर त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था अनिवार्य की गई (20 लाख से कम आबादी वाले राज्यों में मध्यवर्ती स्तर छोड़ सकते हैं)।
  • नियमित चुनाव: पंचायतों का 5 वर्ष का कार्यकाल निश्चित किया गया और कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व या भंग होने के 6 माह के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य बनाया गया।
  • आरक्षण की व्यवस्था: अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को आबादी के अनुपात में तथा महिलाओं के लिए न्यूनतम 33% सीटों पर आरक्षण दिया गया।
  • स्वतंत्र संस्थाएँ: चुनाव कराने के लिए 'राज्य निर्वाचन आयोग' और वित्तीय संसाधनों की समीक्षा हेतु 'राज्य वित्त आयोग' का गठन अनिवार्य किया गया।
  • ग्यारहवीं अनुसूची: पंचायतों को कार्य करने के लिए 29 विषय सौंपे गए।

ग्रामीण समाज पर प्रभाव:

  • इसने लोकतंत्र को गाँवों के चौपालों तक पहुँचाया। लाखों सामान्य ग्रामीण नागरिक, किसान और मजदूर सीधे नीति निर्माण में भागीदार बने।
  • महिलाओं के सशक्तिकरण में क्रांतिकारी बदलाव आया; घूँघट से निकलकर महिलाएँ मुखिया और सरपंच बनीं और ग्रामीण प्राथमिकताओं (सड़क, जल, शिक्षा) को नई दिशा दी।
6. बिहार में ग्राम पंचायत की संरचना, उसके प्रमुख अंगों और उनके कार्यों का सविस्तार वर्णन कीजिए।

बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 के तहत ग्राम पंचायत ग्रामीण स्वशासन की सबसे निचली और प्रत्यक्ष इकाई है। सामान्यतः 7,000 की आबादी पर एक ग्राम पंचायत का गठन होता है। इसके प्रमुख अंग और कार्य निम्नलिखित हैं:

  • ग्राम सभा: यह ग्राम पंचायत की विधायिका है। गाँव के सभी 18 वर्ष से अधिक आयु के पंजीकृत मतदाता इसके सदस्य होते हैं। इसकी वर्ष में कम से कम चार बैठकें होना अनिवार्य है। यह बजट और विकास योजनाओं का अनुमोदन करती है।
  • ग्राम पंचायत (कार्यपालिका):
    ग्राम पंचायत लगभग 500 की आबादी पर वार्डों में बँटी होती है, जहाँ से 'वार्ड सदस्य' चुने जाते हैं। पूरे पंचायत क्षेत्र के मतदाता प्रत्यक्ष मतदान द्वारा मुखिया और उप-मुखिया (वार्ड सदस्यों द्वारा चयनित) का चुनाव करते हैं। इसका मुख्य कार्य गाँव में प्राथमिक शिक्षा, स्वच्छता, पेयजल, कृषि विकास और मनरेगा जैसी योजनाओं को लागू करना है।
  • ग्राम कचहरी (न्यायपालिका):
    गाँव के मुकदमों के निपटारे हेतु लगभग 500 की आबादी पर 'पंच' और पूरे पंचायत स्तर पर प्रत्यक्ष रूप से सरपंच का चुनाव होता है। यह 10,000 रुपये तक के दीवानी और छोटे आपराधिक विवादों का आपसी सुलह से निपटारा करती है।
  • ग्राम रक्षा दल: गाँव में रात्रि गश्त, प्राकृतिक आपदाओं के समय सहायता और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए 18 से 30 वर्ष के युवकों का एक सुरक्षा दल होता है, जिसका प्रमुख 'दलपति' कहलाता है।
7. ग्राम कचहरी के गठन, शक्तियों और ग्रामीण न्याय व्यवस्था में इसके महत्व की विवेचना कीजिए।

ग्राम कचहरी भारतीय पंचायती राज प्रणाली की एक अनूठी और प्राचीन 'पंच-परमेश्वर' की भावना पर आधारित व्यवस्था है:

गठन की प्रक्रिया:
प्रत्येक ग्राम पंचायत क्षेत्र में न्यायिक कार्यों के संचालन के लिए ग्राम कचहरी होती है। इसके प्रमुख को 'सरपंच' कहा जाता है, जिसका चुनाव प्रत्यक्ष मतदान से होता है। प्रत्येक वार्ड से एक-एक 'पंच' चुना जाता है। सरपंच और पंच मिलकर अपने बीच से एक 'उप-सरपंच' चुनते हैं। इसकी सहायता के लिए सरकार द्वारा एक 'न्याय मित्र' (विधिक सलाहकार) और एक 'न्याय सचिव' (कार्यालयी कर्मचारी) नियुक्त किया जाता है।

शक्तियाँ और क्षेत्राधिकार:

  • दीवानी मामले: यह 10,000 रुपये तक के संपत्ति, जमीन-जायदाद और लेन-देन के मामलों की सुनवाई कर सकती है।
  • फौजदारी मामले: मारपीट, चोरी, गाली-गलौज और शांति भंग से जुड़े सामान्य अपराधों में यह अधिकतम अर्थदंड (जुर्माना) लगा सकती है, परंतु इसे कारावास (जेल) भेजने का अधिकार नहीं है।

ग्रामीण न्याय में महत्व:
यह व्यवस्था गरीबों को उनके घर पर त्वरित, सुलभ और अत्यंत सस्ता न्याय उपलब्ध कराती है। कोर्ट-कचहरी की लंबी प्रक्रियाओं, वकीलों के भारी खर्च और तारीखों के चक्रव्यूह से ग्रामीणों को मुक्ति मिलती है। अधिकांश मामलों का समाधान आपसी भाईचारे और समझौते से हो जाता है।

8. बिहार में पंचायती राज व्यवस्था के त्रिस्तरीय स्वरूप (ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद्) का तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए।

बिहार में 2006 के अधिनियम के तहत त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू है:

स्तर संस्था का नाम जनसंख्या आधार राजनीतिक प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी मुख्य कार्य
प्राथमिक स्तर (गाँव) ग्राम पंचायत लगभग 7,000 मुखिया (सहायक: उप-मुखिया) पंचायत सचिव गाँव में सड़क, नाली, पेयजल, प्रकाश, कृषि और प्राथमिक स्वास्थ्य।
मध्यवर्ती स्तर (प्रखंड) पंचायत समिति लगभग 5,000 (प्रति वार्ड) प्रमुख (सहायक: उप-प्रमुख) प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) प्रखंड के विकास कार्यों का समन्वय, कृषि, सिंचाई और ग्राम पंचायतों का पर्यवेक्षण।
शीर्ष स्तर (जिला) जिला परिषद् लगभग 50,000 (प्रति निर्वाचन क्षेत्र) अध्यक्ष (सहायक: उपाध्यक्ष) उप विकास आयुक्त (DDC) पूरे जिले की समेकित विकास योजना, आपदा राहत, बड़ी सड़कें और सरकारी बजट का बँटवारा।

यह त्रिस्तरीय ढाँचा सत्ता को गाँव से लेकर जिला मुख्यालय तक एकीकृत रूप में संचालित करता है।

9. बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 द्वारा महिला सशक्तिकरण की दिशा में उठाए गए कदमों और उनके सामाजिक प्रभावों का वर्णन कीजिए।

बिहार भारत का पहला ऐसा राज्य है जिसने पंचायती राज में महिलाओं को 50% आरक्षण देने का ऐतिहासिक साहस दिखाया:

प्रमुख प्रावधान:
अधिनियम के तहत ग्राम पंचायत के मुखिया, वार्ड सदस्य, सरपंच, पंच, पंचायत समिति के प्रमुख तथा जिला परिषद् के अध्यक्ष पदों पर महिलाओं के लिए 50% सीटें आरक्षित की गईं। यह आरक्षण सामान्य, पिछड़ी, अत्यंत पिछड़ी (EBC) और दलित महिलाओं के लिए भी श्रेणीवार सुनिश्चित किया गया।

सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव:

  • घरेलू चारदीवारी से राजनीतिक नेतृत्व: सदियों से चूल्हे-चौके और पर्दा प्रथा तक सीमित ग्रामीण महिलाएँ आज बैठकों की अध्यक्षता कर रही हैं, विकास योजनाओं पर हस्ताक्षर कर रही हैं और बीडीओ व पुलिस अधिकारियों से सीधे बातचीत कर रही हैं।
  • विकास प्राथमिकताओं में बदलाव: महिला जनप्रतिनिधियों के आने से प्राथमिक शिक्षा, बालिकाओं की सुरक्षा, पीने का स्वच्छ पानी, शौचालय निर्माण और शराबबंदी जैसे बुनियादी सामाजिक मुद्दे प्राथमिक एजेंडा बने।
  • आत्मविश्वास और आत्मसम्मान में वृद्धि: आरक्षण ने केवल चुनी गई महिलाओं को ही नहीं, बल्कि गाँव की हर सामान्य महिला और किशोरी के मन में यह विश्वास जगाया कि वे सत्ता और समाज का नेतृत्व कर सकती हैं।
10. नगर निगम के गठन, प्रशासनिक संरचना और इसके अनिवार्य व ऐच्छिक कार्यों की विस्तृत व्याख्या कीजिए।

बड़े शहरों (आमतौर पर 2 लाख या 3 लाख से अधिक जनसंख्या) के सुनियोजित विकास और स्थानीय नागरिक सुविधाओं के लिए नगर निगम का गठन किया जाता है।

संरचना:
नगर निगम क्षेत्र को जनसंख्या के आधार पर कई वार्डों में बाँटा जाता है। प्रत्येक वार्ड से जनता प्रत्यक्ष रूप से 'वार्ड पार्षद' (Ward Councillor) चुनती है। सभी निर्वाचित पार्षद मिलकर अपने बीच से एक महापौर (Mayor) और एक उप-महापौर चुनते हैं। सरकार की ओर से निगम का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी नगर आयुक्त (Municipal Commissioner) होता है।

अनिवार्य कार्य (Obligatory Functions):

  • शहर की नियमित सफाई और कचरा प्रबंधन।
  • शुद्ध पेयजल की आपूर्ति और सीवरेज/नालियों की व्यवस्था।
  • सार्वजनिक सड़कों, गलियों और पुलों का निर्माण व रख-रखाव।
  • जन्म और मृत्यु का अनिवार्य पंजीकरण।
  • संक्रामक रोगों की रोकथाम और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र चलाना।
  • स्ट्रीट लाइट (सड़क बत्ती) की व्यवस्था और अग्निशमन सेवा।

ऐच्छिक कार्य (Discretionary Functions):

  • सार्वजनिक पार्क, खेल के मैदान, चिड़ियाघर और पुस्तकालय बनवाना।
  • गरीबों के लिए रैन बसेरे और आश्रय स्थल का निर्माण।
  • नगर सौंदर्यीकरण, वृक्षारोपण और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन।
  • स्थानीय सार्वजनिक परिवहन (नगर बस सेवा) की व्यवस्था करना।
11. पटना नगर निगम के संगठन, इतिहास और इसके आय के प्रमुख स्रोतों पर प्रकाश डालिए।

इतिहास एवं पृष्ठभूमि:
पटना नगर निगम की स्थापना 'पटना नगर निगम अधिनियम, 1951' के तहत वर्ष 1952 में हुई थी। यह बिहार का सबसे पुराना और सबसे बड़ा नगर निगम है।

संगठन और प्रशासनिक ढाँचा:

  • वार्ड संरचना: वर्तमान में पटना नगर निगम का क्षेत्र कुल 75 वार्डों में विभाजित है। प्रत्येक वार्ड से जनता द्वारा एक पार्षद चुना जाता है।
  • महापौर और सशक्त स्थायी समिति: पार्षद अपने बीच से महापौर और उप-महापौर का चुनाव करते हैं। महापौर निगम परिषद् का अध्यक्ष होता है। इसके साथ एक 'सशक्त स्थायी समिति' (Empowered Standing Committee) होती है जो नीतिगत निर्णय लेती है।
  • नगर आयुक्त: भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) स्तर का वरिष्ठ अधिकारी निगम का मुख्य कार्यपालक अधिकारी होता है, जो सभी विभागों (इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य, राजस्व) का प्रशासनिक प्रमुख होता है।

आय के प्रमुख स्रोत:

  • स्थानीय कर: होल्डिंग टैक्स (संपत्ति/मकान कर), जल कर, प्रकाश कर, स्वच्छता कर और विज्ञापन होर्डिंग्स पर लगाए जाने वाले कर।
  • व्यावसायिक शुल्क: दुकानों, शॉपिंग मॉल, होटल, विवाह भवनों और वाहनों के निबंधन एवं लाइसेंस शुल्क।
  • सरकारी अनुदान: बिहार सरकार और केंद्रीय वित्त आयोग से प्राप्त होने वाले विशेष विकास अनुदान और शहरी अवसंरचना फंड।
12. "भारत का संविधान एकात्मक विशेषताओं वाला एक संघात्मक संविधान है।" इस कथन की तर्कपूर्ण व्याख्या कीजिए।

विद्वान के. सी. व्हेयर ने भारतीय संविधान को 'अर्ध-संघीय' (Quasi-Federal) और अन्य विद्वानों ने इसे 'लचीला संघ' कहा है। इसमें संघवाद के साथ-साथ कई मजबूत एकात्मक (केंद्रोन्मुखी) लक्षण शामिल हैं:

एकात्मक (केंद्रीयकृत) विशेषताएँ:

  • एकल नागरिकता: अमेरिका जैसे देशों में दोहरी नागरिकता (देश और राज्य की) होती है, परंतु भारत में केवल एकल भारतीय नागरिकता है।
  • मजबूत केंद्र: संघ सूची में अधिक और महत्वपूर्ण विषय हैं; समवर्ती सूची में टकराव पर केंद्र प्रभावी है और अवशिष्ट शक्तियाँ भी केंद्र के पास हैं।
  • एकीकृत न्यायपालिका: राज्यों के उच्च न्यायालय केंद्र के सर्वोच्च न्यायालय के अधीनस्थ हैं; राज्यों के लिए अलग स्वतंत्र सर्वोच्च अदालत नहीं है।
  • राज्यपाल की नियुक्ति: राज्य के संवैधानिक प्रमुख (राज्यपाल) की नियुक्ति केंद्र सरकार (राष्ट्रपति) द्वारा की जाती है, जो राज्यों पर केंद्र की निगरानी का माध्यम बनता है।
  • आपातकालीन शक्तियाँ (अनुच्छेद 352, 356, 360): राष्ट्रीय आपातकाल या राज्यों में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर समूची शासन व्यवस्था स्वतः एकात्मक हो जाती है और राज्यों की स्वायत्तता समाप्त हो जाती है।
  • अखिल भारतीय सेवाएँ (IAS/IPS): इन अधिकारियों की भर्ती केंद्र (UPSC) करता है, लेकिन वे राज्यों में शीर्ष प्रशासनिक पदों पर कार्य करते हैं।

निष्कर्ष: भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा को अक्षुण्ण रखने के लिए संविधान निर्माताओं ने सामान्य परिस्थितियों में संघीय ढाँचा और आपात स्थितियों में एकात्मक ढाँचे की एक अनूठी समन्वयकारी व्यवस्था बनाई।

13. स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) में जन-भागीदारी का क्या महत्व है? यह लोकतंत्र की प्राथमिक पाठशाला क्यों है?

स्थानीय स्वशासन को लोकतंत्र की प्राथमिक पाठशाला इसलिए कहा जाता है क्योंकि:

  • ज़मीनी समस्याओं का सटीक समाधान:
    गाँव की टूटी नाली, स्कूल में शिक्षक की उपस्थिति, हैंडपंप की खराबी या कच्ची सड़क की समस्या का जितना सही ज्ञान स्थानीय नागरिकों को होता है, उतना दिल्ली या पटना में बैठे नेताओं और नौकरशाहों को नहीं हो सकता। स्थानीय लोग न्यूनतम खर्च में अपनी समस्याओं का श्रेष्ठ समाधान खोज लेते हैं।
  • नागरिक चेतना और नेतृत्व का विकास:
    यह सामान्य नागरिकों को सार्वजनिक नीति, बजट और प्रशासन की जटिलताओं को समझने का व्यावहारिक प्रशिक्षण देता है। आज देश के बड़े-बड़े विधायक, सांसद और मंत्री पहले वार्ड पार्षद या मुखिया के रूप में ही राजनीतिक जीवन का पहला पाठ सीखते हैं।
  • नौकरशाही की मनमानी पर रोक:
    जब स्थानीय स्तर पर ग्राम सभा और वार्ड सभा की खुली बैठकें होती हैं, तो अधिकारियों को जनता के सामने खड़े होकर जवाब देना पड़ता है। इससे बिचौलियों का राज खत्म होता है और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगता है।
  • वास्तविक सहभागी लोकतंत्र:
    यह व्यवस्था नागरिक को 5 वर्ष में केवल एक बार वोट देने वाले मूक मतदाता से बदलकर दैनिक आधार पर फैसले लेने वाले सक्रिय साझेदार में रूपांतरित कर देती है।
14. भारत में केंद्र-राज्य संबंधों में वित्तीय स्वायत्तता और संसाधनों के बँटवारे से जुड़े विवादों का परीक्षण कीजिए।

भारतीय संघवाद में सबसे संवेदनशील मुद्दा केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों का बँटवारा रहा है:

  • राज्यों की वित्तीय निर्भरता:
    संविधान के तहत अधिक राजस्व देने वाले साधन—जैसे आयकर, सीमा शुल्क, कॉर्पोरेट टैक्स और GST का बड़ा हिस्सा—केंद्र सरकार के अधिकार में हैं। इसके विपरीत, जनकल्याणकारी जिम्मेदारियाँ—जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पुलिस और सड़क—राज्यों के कंधों पर हैं जिनका व्यय बहुत अधिक है। इसलिए राज्यों को अपने खर्चों के लिए लगातार केंद्र के अनुदानों पर निर्भर रहना पड़ता है।
  • वित्त आयोग की भूमिका:
    संविधान का अनुच्छेद 280 प्रत्येक 5 वर्ष में एक स्वतंत्र 'वित्त आयोग' के गठन का प्रावधान करता है, जो केंद्रीय करों के विभाज्य कोष (Divisible Pool) में से राज्यों की हिस्सेदारी तय करता है (जैसे 15वें वित्त आयोग ने 41% हिस्सेदारी तय की)।
  • विवाद के प्रमुख बिंदु:
    • सेस और सरचार्ज (उपकर व अधिभार): केंद्र सरकार करों के बजाय सेस और सरचार्ज के जरिए भारी राजस्व जुटाती है, जिसे संविधानतः राज्यों के साथ बाँटना अनिवार्य नहीं होता। राज्य इसका कड़ा विरोध करते हैं।
    • विशेष राज्य का दर्जा: बिहार जैसे पिछड़े और प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़-सूखा) से जूझ रहे राज्य लंबे समय से 'विशेष राज्य के दर्जे' और अतिरिक्त वित्तीय पैकेज की माँग कर रहे हैं ताकि औद्योगिक विकास हो सके।
    • राजनीतिक पक्षपात के आरोप: गैर-भाजपा या गैर-कांग्रेसी शासित राज्य अक्सर आरोप लगाते हैं कि केंद्र सरकार केंद्रीय योजनाओं और आपदा राहत फंड के आवंटन में राजनीतिक आधार पर भेदभाव करती है।
15. सत्ता की साझेदारी के विभिन्न रूपों (क्षैतिज, ऊर्ध्वाधर, सामाजिक समूह और राजनीतिक दल) का तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए।

आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सत्ता की साझेदारी को चार प्रमुख रूपों में वर्गीकृत किया जाता है:

  • 1. सत्ता का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution):
    जब सत्ता का बँटवारा शासन के एक ही स्तर पर स्थित विभिन्न अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच किया जाता है।
    कार्यप्रणाली: प्रत्येक अंग एक-दूसरे पर नियंत्रण रखता है। इसे 'नियंत्रण और संतुलन' (Checks and Balances) की व्यवस्था कहते हैं। जैसे—न्यायपालिका कार्यपालिका के असंवैधानिक आदेशों को निरस्त कर सकती है और संसद न्यायाधीशों पर महाभियोग चला सकती है।
  • 2. सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Distribution):
    जब सत्ता का विभाजन सरकार के विभिन्न स्तरों—केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय निकाय (पंचायत/नगरपालिका)—के बीच ऊपर से नीचे की दिशा में किया जाता है।
    कार्यप्रणाली: इसे ही संघीय शासन प्रणाली (Federalism) कहते हैं। इसमें संविधान द्वारा उच्च स्तर से निम्न स्तर की ओर शक्तियों का कानूनी विकेंद्रीकरण किया जाता है।
  • 3. सामाजिक समूहों के बीच सत्ता की साझेदारी:
    जब सत्ता का बँटवारा समाज के विभिन्न भाषाई, धार्मिक, जातीय या कमजोर सामाजिक समूहों के बीच किया जाता है।
    उदाहरण: भारत में अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अन्य पिछड़ों और महिलाओं के लिए विधायिका और नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था; तथा बेल्जियम में भाषाई आधार पर गठित 'सामुदायिक सरकार' (Community Government)।
  • 4. राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और आंदोलनों के बीच साझेदारी:
    जब सत्ता किसी एक दल के हाथ में न रहकर विभिन्न राजनीतिक दलों के गठबंधनों, किसान संगठनों, छात्र यूनियनों और व्यापारी संघों के बीच विभाजित होती है।
    कार्यप्रणाली: गठबंधन सरकारें बनाकर दल सत्ता साझा करते हैं और दबाव समूह सरकार की नीतियों को प्रभावित कर अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता में हिस्सेदारी निभाते हैं।

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