बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) कक्षा 10 — राजनीति विज्ञान
अध्याय 2: सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली (Working of Power Sharing)
- इसमें सरकार दो या दो से अधिक स्तरों (केंद्र सरकार और राज्य सरकारें) पर विभाजित होती है।
- दोनों स्तर की सरकारों के अधिकार क्षेत्र, कार्य और राजस्व स्रोत लिखित संविधान द्वारा स्पष्ट रूप से परिभाषित होते हैं।
- भारत में किसी भी एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया; हिंदी को राजभाषा बनाया गया और अंग्रेजी का प्रयोग प्रशासनिक कार्यों में जारी रखा गया।
- आठवीं अनुसूची में 22 प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं को मान्यता दी गई, जिससे भाषाई अल्पसंख्यकों की अस्मिता सुरक्षित रही।
- पंचायतों के लिए प्रत्येक 5 वर्ष में नियमित चुनाव कराना संवैधानिक रूप से अनिवार्य किया गया।
- महिलाओं के लिए न्यूनतम एक-तिहाई (33%) सीटें और अनुसूचित जातियों/जनजातियों के लिए जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण सुनिश्चित किया गया।
- ग्राम सभा
- ग्राम पंचायत (कार्यपालिका, जिसका प्रमुख मुखिया होता है)
- ग्राम कचहरी (न्यायिक अंग, जिसका प्रमुख सरपंच होता है)
- ग्राम रक्षा दल (सुरक्षा दस्ता)
- न्याय मित्र: विधि (कानून) का जानकार व्यक्ति होता है जो ग्राम कचहरी को कानूनी मामलों में सलाह देता है।
- न्याय सचिव: ग्राम कचहरी के कागजी कार्यों, रजिस्टरों और प्रशासनिक अभिलेखों का रख-रखाव करता है।
- पंचायती राज के सभी पदों पर महिलाओं को 50% आरक्षण प्रदान किया गया।
- अत्यंत पिछड़े वर्गों (EBC) के लिए भी पंचायती राज संस्थाओं में 20% आरक्षण की व्यवस्था की गई।
- मकान, जल, प्रकाश, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और वाहनों पर लगाए जाने वाले स्थानीय कर (टैक्स)।
- राज्य सरकार और केंद्र सरकार से प्राप्त होने वाले वार्षिक वित्तीय अनुदान और ऋण।
- नगर पंचायत: ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्र में बदल रहे संक्रमणकालीन कस्बों (आमतौर पर 12,000 से 40,000 की आबादी) में गठित होती है।
- नगर परिषद्: छोटे शहरों (40,000 से 2 लाख तक की आबादी) में गठित की जाती है।
- राज्य सरकारों द्वारा समय पर पर्याप्त वित्तीय संसाधन और अनुदान हस्तांतरित न करना।
- स्थानीय निकायों द्वारा अपने स्तर पर कर (टैक्स) वसूलने की सीमित क्षमता और तंत्र का अभाव।
भारतीय संविधान भारत को औपचारिक रूप से 'राज्यों का संघ' (Union of States) घोषित करता है। इसकी प्रमुख संघीय विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- दोहरी शासन व्यवस्था: भारत में शासन के दो मुख्य स्तर हैं—केंद्र सरकार (पूरे देश के लिए) और राज्य सरकारें (प्रांतीय मामलों के लिए)। 1992 के बाद स्थानीय स्तर (पंचायती राज व नगरपालिका) को जोड़कर इसे त्रिस्तरीय बनाया गया।
- शक्तियों का लिखित और स्पष्ट विभाजन: संविधान की सातवीं अनुसूची में तीन सूचियों—संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची—के माध्यम से दोनों स्तरों के कार्यक्षेत्र और विधायी अधिकार पूरी तरह सुनिश्चित किए गए हैं।
- संविधान की सर्वोच्चता: केंद्र और राज्य दोनों ही अपनी शक्तियाँ सीधे संविधान से प्राप्त करते हैं। कोई भी सरकार संविधान के मूल ढाँचे का उल्लंघन नहीं कर सकती।
- स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका: यदि केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों को लेकर कोई विवाद होता है, तो देश का सर्वोच्च न्यायालय निष्पक्ष पंच की भाँति उसका समाधान करता है।
- कठोर संविधान संशोधन प्रक्रिया: संघीय ढाँचे से जुड़े संवैधानिक अनुच्छेदों में केंद्र सरकार अकेले संशोधन नहीं कर सकती; इसके लिए संसद के विशेष बहुमत के साथ-साथ कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों की सहमति अनिवार्य होती है।
संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों को तीन मुख्य सूचियों और एक अवशिष्ट श्रेणी में विभाजित किया गया है:
- संघ सूची (Union List):
इसमें राष्ट्रीय महत्व के 97 विषय (वर्तमान में 100) शामिल हैं। इन पर केवल देश की संसद कानून बना सकती है। जैसे—देश की रक्षा, वैदेशिक मामले, युद्ध और संधि, रेलवे, बैंकिंग, डाक-तार, मुद्रा और परमाणु ऊर्जा। इनका उद्देश्य पूरे देश में नीतियों की एकरूपता बनाए रखना है। - राज्य सूची (State List):
इसमें प्रांतीय और स्थानीय महत्व के 66 विषय (वर्तमान में 61) शामिल हैं। इन पर सामान्य परिस्थितियों में राज्य विधानमंडल को कानून बनाने का विशेष अधिकार है। जैसे—पुलिस, जेल, न्याय प्रशासन, स्थानीय स्वशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि और सिंचाई। - समवर्ती सूची (Concurrent List):
इसमें 47 विषय (वर्तमान में 52) शामिल हैं जो राष्ट्रीय और प्रांतीय दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं। संसद और राज्य विधानमंडल दोनों इन पर कानून बना सकते हैं। जैसे—शिक्षा, वन, विवाह और तलाक, दीवानी कानून, ट्रेड यूनियन और बिजली। यदि किसी विषय पर केंद्र और राज्य के कानूनों में अंतर्विरोध पैदा हो, तो केंद्र का कानून प्रभावी होता है। - अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers):
अनुच्छेद 248 के अनुसार, जो विषय इन तीनों सूचियों में दर्ज नहीं हैं (विशेषकर आधुनिक तकनीक से जुड़े विषय जैसे साइबर कानून, अंतरिक्ष अनुसंधान, सॉफ्टवेयर आदि), उन पर कानून बनाने की अनन्य शक्ति केंद्र सरकार (संसद) को दी गई है।
भारत जैसी अत्यधिक भाषाई विविधता वाले देश में भाषा नीति का निर्धारण सबसे संवेदनशील कार्य था:
- राष्ट्रभाषा का अभाव और हिंदी की स्थिति:
संविधान निर्माताओं ने किसी भी एक भाषा को भारत की राष्ट्रभाषा (National Language) घोषित नहीं किया। हिंदी को 'राजभाषा' (Official Language) का दर्जा दिया गया क्योंकि यह देश की सर्वाधिक आबादी (लगभग 40-44%) द्वारा बोली जाती है। अन्य 60% गैर-हिंदी भाषियों पर हिंदी को थोपा नहीं गया। - अंग्रेजी का सह-प्रयोग:
मूल संविधान में व्यवस्था थी कि 1965 के बाद अंग्रेजी का आधिकारिक प्रयोग बंद कर दिया जाएगा। परंतु दक्षिण भारत (विशेषकर तमिलनाडु) में गैर-हिंदी भाषियों के भारी विरोध और हिंसक आंदोलनों को देखते हुए केंद्र सरकार ने लचीलापन दिखाया और प्रशासनिक कार्यों में हिंदी के साथ अंग्रेजी के निरंतर प्रयोग की अनुमति दी। - आठवीं अनुसूची और 22 भाषाएँ:
संविधान की 8वीं अनुसूची में 22 प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं (जैसे बांग्ला, तमिल, तेलुगु, मराठी, उर्दू, मैथिली आदि) को मान्यता दी गई। केंद्र सरकार की सिविल सेवा परीक्षाओं में उम्मीदवार इनमें से किसी भी भाषा में परीक्षा लिखने का विकल्प चुन सकते हैं।
निष्कर्ष: श्रीलंका के विपरीत, जहाँ बहुसंख्यक सिंहली भाषा को थोपने से गृहयुद्ध छिड़ गया, भारत की लचीली और समावेशी भाषा नीति ने राष्ट्रीय एकता, अखंडता और क्षेत्रीय स्वायत्तता के बीच एक सुंदर संतुलन स्थापित किया।
1990 से पूर्व भारत में लंबे समय तक केंद्र और अधिकांश राज्यों में एक ही राजनीतिक दल (कांग्रेस) का शासन रहा। इससे केंद्र सरकार शक्तिशाली थी और राज्यों की स्वायत्तता सीमित थी। परंतु 1990 के बाद ऐतिहासिक परिवर्तन आए:
- गठबंधन सरकारों का युग:
1989 के आम चुनावों के बाद किसी एक राष्ट्रीय दल को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। केंद्र में सरकार बनाने के लिए राष्ट्रीय दलों (जैसे BJP और कांग्रेस) को क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करना पड़ा। इससे राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का दबदबा बढ़ा। - अनुच्छेद 356 के मनमाने उपयोग पर रोक:
1990 से पहले केंद्र सरकार अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का दुरुपयोग कर विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को मनमाने ढंग से बर्खास्त कर देती थी। 1994 में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक एस. आर. बोम्मई वाद के फैसले और गठबंधन की मजबूरियों के कारण राज्यों की मनमानी बर्खास्तगी पर लगभग पूर्ण विराम लग गया। - राज्यों की सौदेबाजी शक्ति में वृद्धि:
क्षेत्रीय दलों के समर्थन पर टिकी होने के कारण केंद्र सरकार राज्यों की वित्तीय माँगों, विशेष पैकेजों और विकास प्राथमिकताओं की उपेक्षा नहीं कर सकी। इससे वास्तविक सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बल मिला।
73वें संविधान संशोधन (1992) ने भारतीय लोकतंत्र को ज़मीनी स्तर पर संस्थागत रूप दिया:
प्रमुख कानूनी प्रावधान:
- त्रिस्तरीय ढाँचा: प्रत्येक राज्य में ग्राम, प्रखंड और जिला स्तर पर त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था अनिवार्य की गई (20 लाख से कम आबादी वाले राज्यों में मध्यवर्ती स्तर छोड़ सकते हैं)।
- नियमित चुनाव: पंचायतों का 5 वर्ष का कार्यकाल निश्चित किया गया और कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व या भंग होने के 6 माह के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य बनाया गया।
- आरक्षण की व्यवस्था: अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को आबादी के अनुपात में तथा महिलाओं के लिए न्यूनतम 33% सीटों पर आरक्षण दिया गया।
- स्वतंत्र संस्थाएँ: चुनाव कराने के लिए 'राज्य निर्वाचन आयोग' और वित्तीय संसाधनों की समीक्षा हेतु 'राज्य वित्त आयोग' का गठन अनिवार्य किया गया।
- ग्यारहवीं अनुसूची: पंचायतों को कार्य करने के लिए 29 विषय सौंपे गए।
ग्रामीण समाज पर प्रभाव:
- इसने लोकतंत्र को गाँवों के चौपालों तक पहुँचाया। लाखों सामान्य ग्रामीण नागरिक, किसान और मजदूर सीधे नीति निर्माण में भागीदार बने।
- महिलाओं के सशक्तिकरण में क्रांतिकारी बदलाव आया; घूँघट से निकलकर महिलाएँ मुखिया और सरपंच बनीं और ग्रामीण प्राथमिकताओं (सड़क, जल, शिक्षा) को नई दिशा दी।
बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 के तहत ग्राम पंचायत ग्रामीण स्वशासन की सबसे निचली और प्रत्यक्ष इकाई है। सामान्यतः 7,000 की आबादी पर एक ग्राम पंचायत का गठन होता है। इसके प्रमुख अंग और कार्य निम्नलिखित हैं:
- ग्राम सभा: यह ग्राम पंचायत की विधायिका है। गाँव के सभी 18 वर्ष से अधिक आयु के पंजीकृत मतदाता इसके सदस्य होते हैं। इसकी वर्ष में कम से कम चार बैठकें होना अनिवार्य है। यह बजट और विकास योजनाओं का अनुमोदन करती है।
- ग्राम पंचायत (कार्यपालिका):
ग्राम पंचायत लगभग 500 की आबादी पर वार्डों में बँटी होती है, जहाँ से 'वार्ड सदस्य' चुने जाते हैं। पूरे पंचायत क्षेत्र के मतदाता प्रत्यक्ष मतदान द्वारा मुखिया और उप-मुखिया (वार्ड सदस्यों द्वारा चयनित) का चुनाव करते हैं। इसका मुख्य कार्य गाँव में प्राथमिक शिक्षा, स्वच्छता, पेयजल, कृषि विकास और मनरेगा जैसी योजनाओं को लागू करना है। - ग्राम कचहरी (न्यायपालिका):
गाँव के मुकदमों के निपटारे हेतु लगभग 500 की आबादी पर 'पंच' और पूरे पंचायत स्तर पर प्रत्यक्ष रूप से सरपंच का चुनाव होता है। यह 10,000 रुपये तक के दीवानी और छोटे आपराधिक विवादों का आपसी सुलह से निपटारा करती है। - ग्राम रक्षा दल: गाँव में रात्रि गश्त, प्राकृतिक आपदाओं के समय सहायता और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए 18 से 30 वर्ष के युवकों का एक सुरक्षा दल होता है, जिसका प्रमुख 'दलपति' कहलाता है।
ग्राम कचहरी भारतीय पंचायती राज प्रणाली की एक अनूठी और प्राचीन 'पंच-परमेश्वर' की भावना पर आधारित व्यवस्था है:
गठन की प्रक्रिया:
प्रत्येक ग्राम पंचायत क्षेत्र में न्यायिक कार्यों के संचालन के लिए ग्राम कचहरी होती है। इसके प्रमुख को 'सरपंच' कहा जाता है, जिसका चुनाव प्रत्यक्ष मतदान से होता है। प्रत्येक वार्ड से एक-एक 'पंच' चुना जाता है। सरपंच और पंच मिलकर अपने बीच से एक 'उप-सरपंच' चुनते हैं। इसकी सहायता के लिए सरकार द्वारा एक 'न्याय मित्र' (विधिक सलाहकार) और एक 'न्याय सचिव' (कार्यालयी कर्मचारी) नियुक्त किया जाता है।
शक्तियाँ और क्षेत्राधिकार:
- दीवानी मामले: यह 10,000 रुपये तक के संपत्ति, जमीन-जायदाद और लेन-देन के मामलों की सुनवाई कर सकती है।
- फौजदारी मामले: मारपीट, चोरी, गाली-गलौज और शांति भंग से जुड़े सामान्य अपराधों में यह अधिकतम अर्थदंड (जुर्माना) लगा सकती है, परंतु इसे कारावास (जेल) भेजने का अधिकार नहीं है।
ग्रामीण न्याय में महत्व:
यह व्यवस्था गरीबों को उनके घर पर त्वरित, सुलभ और अत्यंत सस्ता न्याय उपलब्ध कराती है। कोर्ट-कचहरी की लंबी प्रक्रियाओं, वकीलों के भारी खर्च और तारीखों के चक्रव्यूह से ग्रामीणों को मुक्ति मिलती है। अधिकांश मामलों का समाधान आपसी भाईचारे और समझौते से हो जाता है।
बिहार में 2006 के अधिनियम के तहत त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू है:
| स्तर | संस्था का नाम | जनसंख्या आधार | राजनीतिक प्रमुख | प्रशासनिक अधिकारी | मुख्य कार्य |
|---|---|---|---|---|---|
| प्राथमिक स्तर (गाँव) | ग्राम पंचायत | लगभग 7,000 | मुखिया (सहायक: उप-मुखिया) | पंचायत सचिव | गाँव में सड़क, नाली, पेयजल, प्रकाश, कृषि और प्राथमिक स्वास्थ्य। |
| मध्यवर्ती स्तर (प्रखंड) | पंचायत समिति | लगभग 5,000 (प्रति वार्ड) | प्रमुख (सहायक: उप-प्रमुख) | प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) | प्रखंड के विकास कार्यों का समन्वय, कृषि, सिंचाई और ग्राम पंचायतों का पर्यवेक्षण। |
| शीर्ष स्तर (जिला) | जिला परिषद् | लगभग 50,000 (प्रति निर्वाचन क्षेत्र) | अध्यक्ष (सहायक: उपाध्यक्ष) | उप विकास आयुक्त (DDC) | पूरे जिले की समेकित विकास योजना, आपदा राहत, बड़ी सड़कें और सरकारी बजट का बँटवारा। |
यह त्रिस्तरीय ढाँचा सत्ता को गाँव से लेकर जिला मुख्यालय तक एकीकृत रूप में संचालित करता है।
बिहार भारत का पहला ऐसा राज्य है जिसने पंचायती राज में महिलाओं को 50% आरक्षण देने का ऐतिहासिक साहस दिखाया:
प्रमुख प्रावधान:
अधिनियम के तहत ग्राम पंचायत के मुखिया, वार्ड सदस्य, सरपंच, पंच, पंचायत समिति के प्रमुख तथा जिला परिषद् के अध्यक्ष पदों पर महिलाओं के लिए 50% सीटें आरक्षित की गईं। यह आरक्षण सामान्य, पिछड़ी, अत्यंत पिछड़ी (EBC) और दलित महिलाओं के लिए भी श्रेणीवार सुनिश्चित किया गया।
सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव:
- घरेलू चारदीवारी से राजनीतिक नेतृत्व: सदियों से चूल्हे-चौके और पर्दा प्रथा तक सीमित ग्रामीण महिलाएँ आज बैठकों की अध्यक्षता कर रही हैं, विकास योजनाओं पर हस्ताक्षर कर रही हैं और बीडीओ व पुलिस अधिकारियों से सीधे बातचीत कर रही हैं।
- विकास प्राथमिकताओं में बदलाव: महिला जनप्रतिनिधियों के आने से प्राथमिक शिक्षा, बालिकाओं की सुरक्षा, पीने का स्वच्छ पानी, शौचालय निर्माण और शराबबंदी जैसे बुनियादी सामाजिक मुद्दे प्राथमिक एजेंडा बने।
- आत्मविश्वास और आत्मसम्मान में वृद्धि: आरक्षण ने केवल चुनी गई महिलाओं को ही नहीं, बल्कि गाँव की हर सामान्य महिला और किशोरी के मन में यह विश्वास जगाया कि वे सत्ता और समाज का नेतृत्व कर सकती हैं।
बड़े शहरों (आमतौर पर 2 लाख या 3 लाख से अधिक जनसंख्या) के सुनियोजित विकास और स्थानीय नागरिक सुविधाओं के लिए नगर निगम का गठन किया जाता है।
संरचना:
नगर निगम क्षेत्र को जनसंख्या के आधार पर कई वार्डों में बाँटा जाता है। प्रत्येक वार्ड से जनता प्रत्यक्ष रूप से 'वार्ड पार्षद' (Ward Councillor) चुनती है। सभी निर्वाचित पार्षद मिलकर अपने बीच से एक महापौर (Mayor) और एक उप-महापौर चुनते हैं। सरकार की ओर से निगम का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी नगर आयुक्त (Municipal Commissioner) होता है।
अनिवार्य कार्य (Obligatory Functions):
- शहर की नियमित सफाई और कचरा प्रबंधन।
- शुद्ध पेयजल की आपूर्ति और सीवरेज/नालियों की व्यवस्था।
- सार्वजनिक सड़कों, गलियों और पुलों का निर्माण व रख-रखाव।
- जन्म और मृत्यु का अनिवार्य पंजीकरण।
- संक्रामक रोगों की रोकथाम और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र चलाना।
- स्ट्रीट लाइट (सड़क बत्ती) की व्यवस्था और अग्निशमन सेवा।
ऐच्छिक कार्य (Discretionary Functions):
- सार्वजनिक पार्क, खेल के मैदान, चिड़ियाघर और पुस्तकालय बनवाना।
- गरीबों के लिए रैन बसेरे और आश्रय स्थल का निर्माण।
- नगर सौंदर्यीकरण, वृक्षारोपण और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन।
- स्थानीय सार्वजनिक परिवहन (नगर बस सेवा) की व्यवस्था करना।
इतिहास एवं पृष्ठभूमि:
पटना नगर निगम की स्थापना 'पटना नगर निगम अधिनियम, 1951' के तहत वर्ष 1952 में हुई थी। यह बिहार का सबसे पुराना और सबसे बड़ा नगर निगम है।
संगठन और प्रशासनिक ढाँचा:
- वार्ड संरचना: वर्तमान में पटना नगर निगम का क्षेत्र कुल 75 वार्डों में विभाजित है। प्रत्येक वार्ड से जनता द्वारा एक पार्षद चुना जाता है।
- महापौर और सशक्त स्थायी समिति: पार्षद अपने बीच से महापौर और उप-महापौर का चुनाव करते हैं। महापौर निगम परिषद् का अध्यक्ष होता है। इसके साथ एक 'सशक्त स्थायी समिति' (Empowered Standing Committee) होती है जो नीतिगत निर्णय लेती है।
- नगर आयुक्त: भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) स्तर का वरिष्ठ अधिकारी निगम का मुख्य कार्यपालक अधिकारी होता है, जो सभी विभागों (इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य, राजस्व) का प्रशासनिक प्रमुख होता है।
आय के प्रमुख स्रोत:
- स्थानीय कर: होल्डिंग टैक्स (संपत्ति/मकान कर), जल कर, प्रकाश कर, स्वच्छता कर और विज्ञापन होर्डिंग्स पर लगाए जाने वाले कर।
- व्यावसायिक शुल्क: दुकानों, शॉपिंग मॉल, होटल, विवाह भवनों और वाहनों के निबंधन एवं लाइसेंस शुल्क।
- सरकारी अनुदान: बिहार सरकार और केंद्रीय वित्त आयोग से प्राप्त होने वाले विशेष विकास अनुदान और शहरी अवसंरचना फंड।
विद्वान के. सी. व्हेयर ने भारतीय संविधान को 'अर्ध-संघीय' (Quasi-Federal) और अन्य विद्वानों ने इसे 'लचीला संघ' कहा है। इसमें संघवाद के साथ-साथ कई मजबूत एकात्मक (केंद्रोन्मुखी) लक्षण शामिल हैं:
एकात्मक (केंद्रीयकृत) विशेषताएँ:
- एकल नागरिकता: अमेरिका जैसे देशों में दोहरी नागरिकता (देश और राज्य की) होती है, परंतु भारत में केवल एकल भारतीय नागरिकता है।
- मजबूत केंद्र: संघ सूची में अधिक और महत्वपूर्ण विषय हैं; समवर्ती सूची में टकराव पर केंद्र प्रभावी है और अवशिष्ट शक्तियाँ भी केंद्र के पास हैं।
- एकीकृत न्यायपालिका: राज्यों के उच्च न्यायालय केंद्र के सर्वोच्च न्यायालय के अधीनस्थ हैं; राज्यों के लिए अलग स्वतंत्र सर्वोच्च अदालत नहीं है।
- राज्यपाल की नियुक्ति: राज्य के संवैधानिक प्रमुख (राज्यपाल) की नियुक्ति केंद्र सरकार (राष्ट्रपति) द्वारा की जाती है, जो राज्यों पर केंद्र की निगरानी का माध्यम बनता है।
- आपातकालीन शक्तियाँ (अनुच्छेद 352, 356, 360): राष्ट्रीय आपातकाल या राज्यों में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर समूची शासन व्यवस्था स्वतः एकात्मक हो जाती है और राज्यों की स्वायत्तता समाप्त हो जाती है।
- अखिल भारतीय सेवाएँ (IAS/IPS): इन अधिकारियों की भर्ती केंद्र (UPSC) करता है, लेकिन वे राज्यों में शीर्ष प्रशासनिक पदों पर कार्य करते हैं।
निष्कर्ष: भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा को अक्षुण्ण रखने के लिए संविधान निर्माताओं ने सामान्य परिस्थितियों में संघीय ढाँचा और आपात स्थितियों में एकात्मक ढाँचे की एक अनूठी समन्वयकारी व्यवस्था बनाई।
स्थानीय स्वशासन को लोकतंत्र की प्राथमिक पाठशाला इसलिए कहा जाता है क्योंकि:
- ज़मीनी समस्याओं का सटीक समाधान:
गाँव की टूटी नाली, स्कूल में शिक्षक की उपस्थिति, हैंडपंप की खराबी या कच्ची सड़क की समस्या का जितना सही ज्ञान स्थानीय नागरिकों को होता है, उतना दिल्ली या पटना में बैठे नेताओं और नौकरशाहों को नहीं हो सकता। स्थानीय लोग न्यूनतम खर्च में अपनी समस्याओं का श्रेष्ठ समाधान खोज लेते हैं। - नागरिक चेतना और नेतृत्व का विकास:
यह सामान्य नागरिकों को सार्वजनिक नीति, बजट और प्रशासन की जटिलताओं को समझने का व्यावहारिक प्रशिक्षण देता है। आज देश के बड़े-बड़े विधायक, सांसद और मंत्री पहले वार्ड पार्षद या मुखिया के रूप में ही राजनीतिक जीवन का पहला पाठ सीखते हैं। - नौकरशाही की मनमानी पर रोक:
जब स्थानीय स्तर पर ग्राम सभा और वार्ड सभा की खुली बैठकें होती हैं, तो अधिकारियों को जनता के सामने खड़े होकर जवाब देना पड़ता है। इससे बिचौलियों का राज खत्म होता है और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगता है। - वास्तविक सहभागी लोकतंत्र:
यह व्यवस्था नागरिक को 5 वर्ष में केवल एक बार वोट देने वाले मूक मतदाता से बदलकर दैनिक आधार पर फैसले लेने वाले सक्रिय साझेदार में रूपांतरित कर देती है।
भारतीय संघवाद में सबसे संवेदनशील मुद्दा केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों का बँटवारा रहा है:
- राज्यों की वित्तीय निर्भरता:
संविधान के तहत अधिक राजस्व देने वाले साधन—जैसे आयकर, सीमा शुल्क, कॉर्पोरेट टैक्स और GST का बड़ा हिस्सा—केंद्र सरकार के अधिकार में हैं। इसके विपरीत, जनकल्याणकारी जिम्मेदारियाँ—जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पुलिस और सड़क—राज्यों के कंधों पर हैं जिनका व्यय बहुत अधिक है। इसलिए राज्यों को अपने खर्चों के लिए लगातार केंद्र के अनुदानों पर निर्भर रहना पड़ता है। - वित्त आयोग की भूमिका:
संविधान का अनुच्छेद 280 प्रत्येक 5 वर्ष में एक स्वतंत्र 'वित्त आयोग' के गठन का प्रावधान करता है, जो केंद्रीय करों के विभाज्य कोष (Divisible Pool) में से राज्यों की हिस्सेदारी तय करता है (जैसे 15वें वित्त आयोग ने 41% हिस्सेदारी तय की)। - विवाद के प्रमुख बिंदु:
- सेस और सरचार्ज (उपकर व अधिभार): केंद्र सरकार करों के बजाय सेस और सरचार्ज के जरिए भारी राजस्व जुटाती है, जिसे संविधानतः राज्यों के साथ बाँटना अनिवार्य नहीं होता। राज्य इसका कड़ा विरोध करते हैं।
- विशेष राज्य का दर्जा: बिहार जैसे पिछड़े और प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़-सूखा) से जूझ रहे राज्य लंबे समय से 'विशेष राज्य के दर्जे' और अतिरिक्त वित्तीय पैकेज की माँग कर रहे हैं ताकि औद्योगिक विकास हो सके।
- राजनीतिक पक्षपात के आरोप: गैर-भाजपा या गैर-कांग्रेसी शासित राज्य अक्सर आरोप लगाते हैं कि केंद्र सरकार केंद्रीय योजनाओं और आपदा राहत फंड के आवंटन में राजनीतिक आधार पर भेदभाव करती है।
आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सत्ता की साझेदारी को चार प्रमुख रूपों में वर्गीकृत किया जाता है:
- 1. सत्ता का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution):
जब सत्ता का बँटवारा शासन के एक ही स्तर पर स्थित विभिन्न अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच किया जाता है।
कार्यप्रणाली: प्रत्येक अंग एक-दूसरे पर नियंत्रण रखता है। इसे 'नियंत्रण और संतुलन' (Checks and Balances) की व्यवस्था कहते हैं। जैसे—न्यायपालिका कार्यपालिका के असंवैधानिक आदेशों को निरस्त कर सकती है और संसद न्यायाधीशों पर महाभियोग चला सकती है। - 2. सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Distribution):
जब सत्ता का विभाजन सरकार के विभिन्न स्तरों—केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय निकाय (पंचायत/नगरपालिका)—के बीच ऊपर से नीचे की दिशा में किया जाता है।
कार्यप्रणाली: इसे ही संघीय शासन प्रणाली (Federalism) कहते हैं। इसमें संविधान द्वारा उच्च स्तर से निम्न स्तर की ओर शक्तियों का कानूनी विकेंद्रीकरण किया जाता है। - 3. सामाजिक समूहों के बीच सत्ता की साझेदारी:
जब सत्ता का बँटवारा समाज के विभिन्न भाषाई, धार्मिक, जातीय या कमजोर सामाजिक समूहों के बीच किया जाता है।
उदाहरण: भारत में अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अन्य पिछड़ों और महिलाओं के लिए विधायिका और नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था; तथा बेल्जियम में भाषाई आधार पर गठित 'सामुदायिक सरकार' (Community Government)। - 4. राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और आंदोलनों के बीच साझेदारी:
जब सत्ता किसी एक दल के हाथ में न रहकर विभिन्न राजनीतिक दलों के गठबंधनों, किसान संगठनों, छात्र यूनियनों और व्यापारी संघों के बीच विभाजित होती है।
कार्यप्रणाली: गठबंधन सरकारें बनाकर दल सत्ता साझा करते हैं और दबाव समूह सरकार की नीतियों को प्रभावित कर अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता में हिस्सेदारी निभाते हैं।
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