बिहार बोर्ड (BSEB) कक्षा 10
राजनीति विज्ञान (लोकतांत्रिक राजनीति-II) — अध्याय 2
सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली (Working of Power Sharing)
पाठ का परिचय एवं अवलोकन (Overview & Introduction)
यह अध्याय लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता के व्यावहारिक वितरण, विकेंद्रीकरण और संस्थागत संतुलन का सविस्तार विश्लेषण करता है। पिछले अध्याय में सत्ता की साझेदारी के सिद्धांतों को समझने के बाद, यह पाठ यह स्पष्ट करता है कि भारत जैसे विशाल, बहु-भाषाई और विविधतापूर्ण देश में सत्ता का व्यावहारिक बँटवारा ज़मीनी स्तर पर किस प्रकार कार्य करता है।
अध्याय के मुख्य वैचारिक स्तंभ:
-
सत्ता के बँटवारे के बुनियादी स्वरूप:
- क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution): शासन के तीनों अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच सत्ता का विभाजन, जो नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances) के सिद्धांत पर कार्य करता है।
- ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Distribution): सरकार के विभिन्न स्तरों—केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय स्वशासन—के बीच सत्ता का बँटवारा, जिसे संघवाद (Federalism) कहा जाता है।
-
संघीय व्यवस्था (Federal System) और भारतीय संदर्भ:
भारत को संविधान के अनुच्छेद 1 में "राज्यों का संघ" (Union of States) कहा गया है। भारतीय संघवाद दोहरे स्तर की शासन प्रणाली से शुरू होकर वर्तमान में त्रि-स्तरीय व्यवस्था (केंद्र, राज्य और स्थानीय निकाय) के रूप में कार्य करता है। शक्तियों के स्पष्ट विभाजन हेतु संविधान की सातवीं अनुसूची में तीन सूचियाँ—संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची—बनाई गई हैं। -
स्थानीय स्वशासन और सत्ता का विकेंद्रीकरण:
सत्ता को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए 73वें और 74वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से पंचायती राज और शहरी निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। बलवंत राय मेहता समिति द्वारा अनुशंसित त्रिस्तरीय व्यवस्था (ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद) ग्रामीण लोकतंत्र की रीढ़ बनी। -
बिहार में पंचायती राज एवं नगरीय प्रशासन का विशिष्ट ढाँचा:
बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 के तहत महिलाओं को स्थानीय निकायों में 50% ऐतिहासिक आरक्षण दिया गया। ग्राम पंचायत का प्रधान 'मुखिया' होता है, जबकि न्यायिक मामलों के निपटारे हेतु 'ग्राम कचहरी' का गठन किया गया है जिसका प्रमुख 'सरपंच' होता है। शहरी क्षेत्रों में नगर पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम (जिसका प्रधान महापौर/मेयर होता है) कार्य करते हैं।
1. सत्ता के बँटवारे के स्वरूप एवं सिद्धांत
1. सत्ता के क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution) के तहत शासन के तीनों अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच शक्तियों का बँटवारा होता है।
2. क्षैतिज वितरण में तीनों अंग एक ही स्तर पर रहकर अपनी-अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हैं।
3. शासन के विभिन्न अंगों द्वारा एक-दूसरे पर निगरानी रखने की प्रक्रिया को 'नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था' (System of Checks and Balances) कहते हैं।
4. विधायिका का प्राथमिक कार्य कानूनों का निर्माण करना है।
5. कार्यपालिका का मुख्य कार्य विधायिका द्वारा निर्मित कानूनों और नीतियों को लागू करना है।
6. न्यायपालिका का कार्य कानूनों की व्याख्या करना, संविधान की रक्षा करना और विवादों का निपटारा करना है।
7. सरकार के उच्च स्तर और निम्न स्तर के बीच सत्ता के विभाजन को 'सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण' (Vertical Distribution) कहा जाता है।
8. सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण ही संघीय शासन व्यवस्था (Federal System) का मूल आधार है।
9. विभिन्न सामाजिक, भाषाई और धार्मिक समूहों के बीच सत्ता की साझेदारी का सबसे उत्कृष्ट वैश्विक उदाहरण बेल्जियम की 'सामुदायिक सरकार' है।
10. विभिन्न राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और जन-आंदोलनों के बीच सत्ता की होड़ लोकतंत्र को प्रतिस्पर्धी और जवाबदेह बनाती है।
2. संघवाद: स्वरूप, विशेषताएँ एवं वैश्विक प्रतिमान
11. संघवाद शासन की वह व्यवस्था है जिसमें सत्ता केंद्रीय सत्ता और उसकी विभिन्न संघटक इकाइयों (राज्यों) के बीच बँटी होती है।
12. संघीय शासन व्यवस्था में आमतौर पर दो या दो से अधिक स्तरों की सरकारें होती हैं।
13. संघीय व्यवस्था में अलग-अलग स्तर की सरकारें एक ही नागरिक समूह पर शासन करती हैं, किंतु उनके अधिकार क्षेत्र अलग-अलग होते हैं।
14. संघीय व्यवस्था में संविधान के मौलिक प्रावधानों में कोई एक स्तर की सरकार अकेले बदलाव नहीं कर सकती।
15. केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों के विवाद की स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायपालिका) संविधान के अंतिम व्याख्याकार के रूप में कार्य करता है।
16. संघीय व्यवस्था के दो मुख्य उद्देश्य हैं: देश की एकता और अखंडता की रक्षा करना तथा क्षेत्रीय विविधताओं का सम्मान करना।
17. स्वतंत्र राष्ट्रों के आपसी समझौते से मिलकर बना संघ 'साथ आकर बनाया गया संघ' (Coming Together Federation) कहलाता है।
18. अमेरिका, स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया 'साथ आकर बनाए गए संघ' के प्रमुख उदाहरण हैं।
19. एक बड़े देश द्वारा अपनी आंतरिक विविधताओं को ध्यान में रखकर शक्तियों को केंद्र और राज्यों में बाँटना 'सबको साथ लेकर चलने वाला संघ' (Holding Together Federation) कहलाता है।
20. भारत, स्पेन और बेल्जियम 'सबको साथ लेकर चलने वाले संघ' के प्रमुख उदाहरण हैं।
21. एकात्मक शासन व्यवस्था (Unitary System) में सत्ता का केवल एक केंद्र होता है और सभी उप-इकाइयाँ केंद्र के अधीन काम करती हैं (जैसे ब्रिटेन, श्रीलंका, फ्रांस)।
3. भारतीय संघवाद और संवैधानिक ढाँचा
22. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को 'राज्यों का संघ' (Union of States) घोषित किया गया है।
23. भारतीय संविधान में कहीं भी 'फेडरेशन' (Federation) शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है।
24. भारतीय संघीय ढाँचा कनाडाई मॉडल से सर्वाधिक प्रेरित है, जहाँ केंद्र सरकार राज्यों की तुलना में अधिक शक्तिशाली है।
25. केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का स्पष्ट विभाजन संविधान की 'सातवीं अनुसूची' (Seventh Schedule) में किया गया है।
26. सातवीं अनुसूची में तीन विधायी सूचियाँ हैं: संघ सूची (Union List), राज्य सूची (State List) और समवर्ती सूची (Concurrent List)।
27. संघ सूची में राष्ट्रीय महत्व के विषय शामिल होते हैं, जिन पर केवल केंद्र की संसद कानून बना सकती है।
28. संघ सूची में मूल संविधान में 97 विषय थे (वर्तमान में गणना अनुसार लगभग 100 विषय हैं)।
29. रक्षा, विदेश नीति, बैंकिंग, रेलवे, मुद्रा और डाक-तार संघ सूची के प्रमुख विषय हैं।
30. राज्य सूची में स्थानीय और प्रांतीय महत्व के विषय शामिल होते हैं, जिन पर राज्य विधानमंडल कानून बनाता है।
31. राज्य सूची में मूल संविधान में 66 विषय थे (वर्तमान में गणना अनुसार 61 विषय हैं)।
32. पुलिस, जेल, कृषि, सिंचाई, स्वास्थ्य और स्थानीय स्वशासन राज्य सूची के प्रमुख विषय हैं।
33. समवर्ती सूची में वे विषय होते हैं जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
34. समवर्ती सूची में मूल संविधान में 47 विषय थे (वर्तमान में गणना अनुसार 52 विषय हैं)।
35. शिक्षा, वन, विवाह, तलाक, ट्रेड यूनियन और गोद लेना समवर्ती सूची के प्रमुख विषय हैं।
36. समवर्ती सूची के किसी विषय पर केंद्र और राज्य के कानूनों में टकराव होने की स्थिति में केंद्र का कानून मान्य होता है।
37. वे नए विषय जो तीनों सूचियों में दर्ज नहीं हैं, 'अवशिष्ट शक्तियाँ' (Resid residuary Powers) कहलाते हैं (जैसे कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, साइबर कानून)।
38. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 248 के तहत अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र सरकार (संसद) को सौंपी गई हैं।
39. भारत में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन करने हेतु 1953 में 'राज्य पुनर्गठन आयोग' का गठन किया गया था, जिसके अध्यक्ष फजल अली थे।
40. राज्य पुनर्गठन अधिनियम वर्ष 1956 में संसद द्वारा पारित किया गया।
41. भाषाई आधार पर गठित होने वाला स्वतंत्र भारत का पहला राज्य 'आंध्र प्रदेश' (1953) था।
42. भारतीय संविधान की 'आठवीं अनुसूची' में वर्तमान में कुल 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है।
43. भारत की कोई एक 'राष्ट्रभाषा' (National Language) घोषित नहीं है; हिंदी को संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत 'राजभाषा' (Official Language) का दर्जा प्राप्त है।
44. केंद्र सरकार के कामकाज में संपर्क भाषा के रूप में हिंदी के साथ अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने की अनुमति दी गई है।
4. केंद्र-राज्य संबंध, वित्तीय पहलू एवं विशेष प्रावधान
45. भारत में 1990 से पूर्व लंबे समय तक केंद्र और अधिकांश राज्यों में एक ही दल का शासन रहने से राज्यों की स्वायत्तता सीमित रही।
46. 1990 के बाद भारतीय राजनीति में 'गठबंधन सरकारों' (Coalition Governments) के युग की शुरुआत हुई, जिससे राज्यों का महत्व बढ़ा।
47. केंद्र-राज्य संबंधों की व्यापक समीक्षा हेतु 1983 में न्यायमूर्ति आर. एस. सरकारिया की अध्यक्षता में 'सरकारिया आयोग' गठित किया गया था।
48. 2007 में केंद्र-राज्य संबंधों पर एक अन्य महत्वपूर्ण आयोग 'पुंछी आयोग' (मदन मोहन पुंछी की अध्यक्षता में) गठित हुआ।
49. भारत में वित्तीय संसाधनों का प्राथमिक नियंत्रण केंद्र के पास है, और राज्यों को वित्तीय अनुदान केंद्रीय अनुशंसा पर मिलते हैं।
50. केंद्र और राज्यों के बीच करों के बँटवारे की सिफारिश करने वाली संवैधानिक संस्था 'वित्त आयोग' (Finance Commission, अनुच्छेद 280) है।
51. चंडीगढ़, लक्षद्वीप, लद्दाख और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह जैसे छोटे क्षेत्रों को 'केंद्र शासित प्रदेश' (Union Territory) कहा जाता है।
52. केंद्र शासित प्रदेशों का सीधा शासन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल या प्रशासक के जरिए केंद्र सरकार चलाती है।
53. दिल्ली को 69वें संविधान संशोधन (1991) द्वारा 'राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र' (NCT) का विशेष दर्जा दिया गया।
54. संविधान के अनुच्छेद 371 के तहत पूर्वोत्तर राज्यों (नागालैंड, मिजोरम आदि) को उनकी विशिष्ट जनजातीय संस्कृति और भूमि अधिकारों के संरक्षण हेतु विशेष प्रावधान दिए गए हैं।
5. विकेंद्रीकरण और संवैधानिक संशोधन (73वाँ और 74वाँ)
55. जब केंद्र और राज्य सरकारों से शक्तियाँ लेकर स्थानीय सरकारों को दी जाती हैं, तो इसे 'सत्ता का विकेंद्रीकरण' (Decentralization) कहते हैं।
56. विकेंद्रीकरण का मुख्य उद्देश्य स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर जनता की भागीदारी से करना है।
57. स्वतंत्र भारत में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की सिफारिश 'बलवंत राय मेहता समिति' ने 1957 में की थी।
58. भारत में पंचायती राज की विधिवत शुरुआत 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा की गई।
59. राजस्थान के बाद पंचायती राज लागू करने वाला भारत का दूसरा राज्य आंध्र प्रदेश (1959) था।
60. अशोक मेहता समिति (1977) ने पंचायती राज के 'द्वि-स्तरीय मॉडल' की सिफारिश की थी, जिसे स्वीकार नहीं किया गया।
61. पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान करने वाला '73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम' वर्ष 1992 में पारित हुआ (प्रभावी 24 अप्रैल 1993)।
62. भारत में प्रत्येक वर्ष 24 अप्रैल को 'राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस' मनाया जाता है।
63. 73वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में 'भाग 9' और '11वीं अनुसूची' जोड़ी गई।
64. 11वीं अनुसूची में पंचायती राज संस्थाओं को कार्य करने हेतु कुल 29 विषय सौंपे गए हैं।
65. 74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम (1992) शहरी स्थानीय स्वशासन (Urban Local Government) से संबंधित है।
66. 74वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में 'भाग 9(क)' और '12वीं अनुसूची' जोड़ी गई।
67. 12वीं अनुसूची में नगरपालिकाओं और शहरी निकायों को कार्य करने हेतु कुल 18 विषय सौंपे गए हैं।
68. स्थानीय निकायों के नियमित चुनाव कराने हेतु प्रत्येक राज्य में एक स्वतंत्र 'राज्य निर्वाचन आयोग' (State Election Commission) के गठन का प्रावधान किया गया।
69. पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा हेतु प्रत्येक पाँच वर्ष पर राज्यपाल द्वारा 'राज्य वित्त आयोग' गठित किया जाता है।
70. 73वें संविधान संशोधन के अनुसार सभी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए न्यूनतम एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित की गईं।
6. बिहार में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था
71. बिहार में पंचायती राज को सुदृढ़ बनाने हेतु राज्य सरकार ने 'बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006' पारित किया।
72. बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 के तहत बिहार भारत का पहला राज्य बना जिसने महिलाओं को पंचायती राज में 50% आरक्षण दिया।
73. बिहार के त्रिस्तरीय पंचायती राज के तीन स्तर हैं: ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद।
74. बिहार में लगभग 7,000 की ग्रामीण आबादी पर एक 'ग्राम पंचायत' का गठन किया जाता है।
75. ग्राम पंचायत को लगभग 500 की आबादी वाले वार्डों में विभाजित किया जाता है, जहाँ से एक 'वार्ड सदस्य' चुना जाता है।
76. ग्राम पंचायत का सर्वोच्च कार्यपालक और औपचारिक प्रधान 'मुखिया' (Mukhiya) होता है।
77. मुखिया की अनुपस्थिति में उसके कार्यों का निर्वहन वार्ड सदस्यों द्वारा अपने में से चुना गया 'उप-मुखिया' करता है।
78. ग्राम पंचायत का प्रशासनिक सचिव 'पंचायत सचिव' होता है, जो एक सरकारी कर्मचारी होता है।
79. ग्राम पंचायत के 18 वर्ष से अधिक आयु वाले सभी पंजीकृत मतदाता स्वतः 'ग्राम सभा' (Village Assembly) के सदस्य होते हैं।
80. ग्राम सभा को पंचायती राज व्यवस्था की 'विधायिका' और सबसे बुनियादी इकाई माना जाता है।
81. ग्राम पंचायत की रक्षा और विधि-व्यवस्था में सहयोग हेतु एक अर्ध-पुलिस बल होता है, जिसे 'दलपति' (Dalpati) के नेतृत्व में 'ग्राम रक्षा दल' कहते हैं।
82. बिहार में ग्रामीण स्तर पर मुकदमों और विवादों की सुनवाई के लिए 'ग्राम कचहरी' (Village Court) की व्यवस्था है।
83. ग्राम कचहरी का प्रधान 'सरपंच' (Sarpanch) होता है, जिसका चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है।
84. सरपंच की सहायता के लिए वार्ड स्तर पर 'पंच' चुने जाते हैं, और वे अपने बीच से एक 'उप-सरपंच' चुनते हैं।
85. ग्राम कचहरी को ₹10,000 तक के दीवानी (Civil) और छोटे फौजदारी (Criminal) मामलों की सुनवाई का अधिकार है।
86. ग्राम कचहरी में कानूनी सलाह और दस्तावेज़ हेतु राज्य सरकार द्वारा 'न्याय मित्र' (विधि स्नातक) और 'न्याय सचिव' नियुक्त किए जाते हैं।
87. त्रिस्तरीय व्यवस्था की मध्यवर्ती कड़ी प्रखंड (Block) स्तर पर 'पंचायत समिति' होती है।
88. बिहार में लगभग 5,000 की आबादी पर पंचायत समिति का एक सदस्य प्रत्यक्ष निर्वाचित होता है।
89. पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्य अपने बीच से एक 'प्रमुख' (Pramukh) और एक 'उप-प्रमुख' का चुनाव करते हैं।
90. प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) पंचायत समिति का पदेन कार्यपालक पदाधिकारी होता है।
91. त्रिस्तरीय पंचायती राज की शीर्ष संस्था जिला स्तर पर 'जिला परिषद' (Zila Parishad) होती है।
92. बिहार में लगभग 50,000 की जनसंख्या पर जिला परिषद का एक सदस्य प्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है।
93. जिला परिषद के सदस्य अपने बीच से एक 'अध्यक्ष' (Chairman) और एक 'उपाध्यक्ष' का चुनाव करते हैं।
94. उप विकास आयुक्त (DDC) जिला परिषद का मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी (CEO) होता है।
7. बिहार में नगरीय स्थानीय स्वशासन एवं समीक्षा
95. बिहार में नगरीय स्थानीय शासन को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है: नगर पंचायत (संक्रमणशील क्षेत्र), नगर परिषद (छोटे शहर) और नगर निगम (बड़े शहर)।
96. 12,000 से 40,000 तक की आबादी वाले ग्रामीण से शहरी बन रहे क्षेत्रों में 'नगर पंचायत' का गठन होता है।
97. 40,000 से 2 लाख तक की जनसंख्या वाले मध्यम शहरों में 'नगर परिषद' गठित की जाती है।
98. 2 लाख से अधिक आबादी वाले बड़े महानगरों/शहरों में 'नगर निगम' (Municipal Corporation) की स्थापना की जाती है।
99. बिहार का सबसे पुराना और प्रमुख नगर निगम 'पटना नगर निगम' है, जिसकी स्थापना वर्ष 1952 में हुई थी।
100. नगर निगम का सर्वोच्च नागरिक और औपचारिक राजनीतिक प्रधान 'महापौर' (Mayor) होता है, जबकि उसका सर्वोच्च प्रशासनिक व कार्यकारी अधिकारी राज्य सरकार द्वारा नियुक्त 'नगर आयुक्त' (Municipal Commissioner) होता है।
अध्ययन सुझाव: बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं बोर्ड परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन हेतु इन सभी 100 महत्वपूर्ण तथ्यों का नियमित अभ्यास करें। यह संकलन वस्तुनिष्ठ (MCQs) और अति-लघु उत्तरीय प्रश्नों की तैयारी के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
0 Comments