बिहार बोर्ड (BSEB) कक्षा 10 — अर्थशास्त्र
अर्थशास्त्र — अध्याय 2
राज्य एवं राष्ट्र की आय (State and National Income)
अध्याय अवलोकन (Overview)
इस अध्याय में किसी राज्य और राष्ट्र की आर्थिक स्थिति, नागरिकों के जीवन स्तर और विकास की गति को मापने वाले प्रमुख संकेतकों—आय, राष्ट्रीय आय (National Income) और प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income)—का गहन विश्लेषण किया गया है। अध्याय में राष्ट्रीय आय से जुड़ी विभिन्न अवधारणाओं जैसे जीडीपी (GDP), जीएनपी (GNP), एनएनपी (NNP) तथा राष्ट्रीय आय के चक्रीय प्रवाह को समझाया गया है। इसके अतिरिक्त, आय की गणना की प्रमुख विधियों (उत्पादन, आय, व्यय विधि), गणना में आने वाली व्यावहारिक व सैद्धांतिक कठिनाइयों (विशेषकर दोहरी गणना की समस्या), तथा भारत के विभिन्न राज्यों एवं बिहार के सभी 38 जिलों के बीच मौजूद क्षेत्रीय आय विषमताओं को रेखांकित किया गया है।
पाठ का परिचय (Introduction):
- आय (Income): जब कोई व्यक्ति कोई शारीरिक अथवा मानसिक कार्य करता है और उस कार्य के बदले में उसे जो पारिश्रमिक (मजदूरी, वेतन, लगान, ब्याज या लाभ के रूप में) प्राप्त होता है, उसे उस व्यक्ति की 'आय' कहते हैं।
- राष्ट्रीय आय (National Income): किसी देश में एक वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल से 31 मार्च) के दौरान उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के मौद्रिक मूल्य के कुल योग को राष्ट्रीय आय कहा जाता है। इसमें विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय भी शामिल होती है।
- प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income): देश की कुल राष्ट्रीय आय में देश की कुल जनसंख्या से भाग देने पर जो औसत आय प्राप्त होती है, उसे प्रति व्यक्ति आय कहते हैं।
- राज्य घरेलू उत्पाद (SDP): किसी राज्य की भौगोलिक सीमा के भीतर एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का मौद्रिक मूल्य राज्य घरेलू उत्पाद कहलाता है।
1. आय एवं राष्ट्रीय आय की मूल अवधारणाएँ
1. शारीरिक या मानसिक कार्य के बदले मिलने वाले पारिश्रमिक को आय कहते हैं।
2. उत्पादन के चार प्रमुख साधन हैं: भूमि, श्रम, पूँजी और संगठन (साहस)।
3. भूमि के उपयोग के बदले मिलने वाले पारिश्रमिक को लगान (Rent) कहते हैं।
4. श्रमिकों को उनके शारीरिक या मानसिक श्रम के बदले मिलने वाला प्रतिफल मजदूरी/वेतन (Wages) कहलाता है।
5. पूँजी के उपयोग के बदले मिलने वाले प्रतिफल को ब्याज (Interest) कहा जाता है।
6. उद्यमी या साहसी को जोखिम उठाने के बदले मिलने वाला शेष प्रतिफल लाभ (Profit) कहलाता है।
7. भारत में वित्तीय वर्ष (Financial Year) की अवधि 1 अप्रैल से 31 मार्च तक होती है।
8. किसी देश में एक वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य को राष्ट्रीय आय कहते हैं।
9. राष्ट्रीय आय में केवल अंतिम वस्तुओं के मूल्य को शामिल किया जाता है, मध्यवर्ती वस्तुओं के मूल्य को नहीं।
10. किसी राष्ट्र के आर्थिक विकास और प्रगति का सबसे प्रामाणिक मापदंड राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय है।
2. प्रमुख अर्थशास्त्रियों की परिभाषाएँ एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
11. प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. अल्फ्रेड मार्शल के अनुसार, किसी देश का श्रम और पूँजी उसके प्राकृतिक साधनों पर कार्य करके प्रतिवर्ष भौतिक और अभौतिक वस्तुओं तथा सेवाओं का जो शुद्ध योग उत्पन्न करते हैं, वही राष्ट्रीय आय है।
12. प्रो. आर्थर सेसिल पीगू (Pigou) के अनुसार, राष्ट्रीय आय समाज की वस्तुगत आय का वह भाग है जिसे मुद्रा के रूप में मापा जा सकता है और जिसमें विदेशों से प्राप्त आय भी शामिल होती है।
13. प्रो. इरविंग फिशर (Fisher) ने राष्ट्रीय आय की गणना उत्पादन के स्थान पर केवल वास्तविक उपभोग के आधार पर की थी।
14. भारत में सबसे पहले राष्ट्रीय आय का अनुमान स्वतंत्रता सेनानी दादाभाई नौरोजी ने लगाया था।
15. दादाभाई नौरोजी ने राष्ट्रीय आय का सर्वप्रथम अनुमान वर्ष 1868 में लगाया था।
16. दादाभाई नौरोजी की विख्यात पुस्तक का नाम 'Poverty and Un-British Rule in India' है।
17. 1868 में दादाभाई नौरोजी के आकलन के अनुसार भारत की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय मात्र ₹20 थी।
18. भारत में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से राष्ट्रीय आय का पहला विश्वसनीय अनुमान डॉ. वी.के.आर.वी. राव (Dr. V.K.R.V. Rao) ने 1931-32 में लगाया था।
19. स्वतंत्रता के पश्चात भारत सरकार ने अगस्त 1949 में एक 'राष्ट्रीय आय समिति' का गठन किया था।
20. 1949 में गठित राष्ट्रीय आय समिति के अध्यक्ष प्रख्यात सांख्यिकीविद प्रो. पी.सी. महालनोबिस थे।
21. राष्ट्रीय आय समिति ने अपनी पहली अंतरिम रिपोर्ट वर्ष 1951 में प्रस्तुत की थी।
22. राष्ट्रीय आय समिति की अंतिम रिपोर्ट वर्ष 1954 में प्रकाशित हुई थी।
23. समिति की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1948-49 में भारत की कुल राष्ट्रीय आय ₹8650 करोड़ तथा प्रति व्यक्ति आय ₹246.90 थी।
24. भारत में राष्ट्रीय आय के आंकड़ों का नियमित संकलन और प्रकाशन केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO) द्वारा किया जाता है।
25. वर्तमान में CSO और NSSO का विलय करके राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) गठित किया गया है।
3. समग्र आर्थिक अवधारणाएँ (GDP, GNP, NNP आदि)
26. GDP का पूर्ण रूप Gross Domestic Product (सकल घरेलू उत्पाद) है।
27. किसी देश की भौगोलिक सीमा के भीतर एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य सकल घरेलू उत्पाद (GDP) कहलाता है।
28. GNP का पूर्ण रूप Gross National Product (सकल राष्ट्रीय उत्पाद) है।
29. GDP में विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय (X - M) जोड़ने पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) प्राप्त होता है।
30. गणितीय रूप में: GNP = GDP + (X - M), जहाँ X = निर्यात से आय और M = आयात पर भुगतान।
31. NNP का पूर्ण रूप Net National Product (शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद) है।
32. सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) में से उत्पादन के दौरान मशीनों की घिसावट या मूल्यह्रास (Depreciation) घटाने पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP) प्राप्त होता है।
33. साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNPFC) को ही वास्तविक अर्थों में राष्ट्रीय आय (National Income) कहा जाता है।
34. कुल राष्ट्रीय आय को देश की कुल जनसंख्या से भाग देने पर प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) प्राप्त होती है।
35. विश्व बैंक अपनी 'विश्व विकास रिपोर्ट' (World Development Report) में देशों के वर्गीकरण का मुख्य आधार प्रति व्यक्ति आय को मानता है।
36. उच्च प्रति व्यक्ति आय वाले देशों को विकसित देश (जैसे—अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन) कहा जाता है।
37. कम प्रति व्यक्ति आय वाले देशों को विकासशील अथवा अविकसित देश (जैसे—भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश) कहा जाता है।
38. जिस देश की राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय अधिक होती है, वह देश स्वतः विकसित कहलाता है।
39. आर्थिक विकास के साथ-साथ किसी देश की प्रति व्यक्ति आय में निरंतर दीर्घकालिक वृद्धि होती है।
40. प्रति व्यक्ति आय नागरिकों के औसत जीवन स्तर (Standard of Living) को दर्शाती है।
4. आय का चक्रीय प्रवाह (Circular Flow of Income)
41. आधुनिक अर्थव्यवस्था में उत्पादन, आय और व्यय का प्रवाह एक निरंतर चक्र के रूप में चलता है जिसे आय का चक्रीय प्रवाह कहते हैं।
42. आय के चक्रीय प्रवाह के मुख्य रूप से दो प्रमुख क्षेत्र होते हैं: पारिवारिक क्षेत्र (Household Sector) और व्यावसायिक फर्म क्षेत्र (Business Sector)।
43. पारिवारिक क्षेत्र फर्मों को उत्पादन के साधन (भूमि, श्रम, पूँजी, उद्यम) उपलब्ध कराता है।
44. फर्में इन साधनों के उपयोग के बदले परिवारों को साधन भुगतान (लगान, मजदूरी, ब्याज, लाभ) देती हैं।
45. पारिवारिक क्षेत्र इस आय को फर्मों द्वारा बनाई गई वस्तुओं और सेवाओं के उपभोग पर व्यय कर देता है।
46. इस प्रकार अर्थव्यवस्था में: कुल उत्पादन = कुल आय = कुल व्यय होता है।
47. उत्पादन साधनों के सहयोग से आय सृजित करता है, आय से उपभोग व्यय होता है, और व्यय पुनः नई वस्तुओं की मांग और उत्पादन को जन्म देता है।
48. इस चक्रीय प्रवाह में कहीं भी रुकावट आने से आर्थिक मंदी या बेरोजगारी की स्थिति उत्पन्न होती है।
49. बचतों का बैंकों में जमा होना चक्रीय प्रवाह से रिसाव (Leakage) कहलाता है, जबकि निवेश इसका अंतःक्षेपण (Injection) है।
50. वित्तीय संस्थाएँ बचतों को निवेश में बदलकर आय के चक्रीय प्रवाह को संतुलित बनाए रखती हैं।
5. राष्ट्रीय आय गणना की प्रमुख विधियाँ (Methods of Measuring National Income)
51. राष्ट्रीय आय की गणना मुख्य रूप से पाँच विधियों से की जा सकती है।
52. उत्पादन गणना विधि (Production Method): इसके अंतर्गत वर्ष भर में प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों में उत्पादित अंतिम वस्तुओं के शुद्ध मूल्य का योग किया जाता है।
53. आय गणना विधि (Income Method): इसके अंतर्गत उत्पादन के सभी साधनों को मिलने वाले पारिश्रमिकों (लगान + मजदूरी + ब्याज + लाभ) को जोड़ा जाता है।
54. व्यय गणना विधि (Expenditure Method): इसके अंतर्गत वर्ष भर में कुल उपभोग व्यय और कुल पूँजीगत निवेश व्यय को जोड़ा जाता है।
55. मूल्य संवर्धन विधि (Value Added Method): प्रत्येक उत्पादन इकाई द्वारा वस्तु के मूल्य में की गई शुद्ध वृद्धि को जोड़कर राष्ट्रीय आय निकालना।
56. व्यावसायिक गणना विधि (Occupational Method): विभिन्न व्यवसायों में संलग्न कार्यशील जनसंख्या की कुल आय के आधार पर आकलन करना।
57. भारत जैसे विकासशील देश में राष्ट्रीय आय की गणना के लिए मुख्य रूप से उत्पादन विधि और आय विधि के मिश्रित रूप का प्रयोग किया जाता है।
58. कृषि और विनिर्माण क्षेत्र में सामान्यतः उत्पादन गणना विधि का प्रयोग होता है।
59. सेवा क्षेत्र (परिवहन, बैंकिंग, शिक्षण, स्वास्थ्य) में सामान्यतः आय गणना विधि का प्रयोग किया जाता है।
60. राष्ट्रीय आय की गणना में गृहणियों (घरेलू महिलाओं) द्वारा घर में की जाने वाली निःशुल्क सेवाओं को शामिल नहीं किया जाता।
6. राष्ट्रीय आय गणना की कठिनाइयाँ (Difficulties in Measurement)
61. राष्ट्रीय आय की गणना में सबसे प्रमुख सैद्धांतिक कठिनाई दोहरी गणना की समस्या (Problem of Double Counting) है।
62. जब किसी वस्तु या उसके कच्चे माल के मूल्य को उत्पादन के अलग-अलग चरणों में एक से अधिक बार जोड़ लिया जाता है, तो उसे दोहरी गणना कहते हैं।
63. उदाहरण के लिए: यदि कपास, उससे बने सूत और सूत से बने कपड़े—तीनों के मूल्यों को अलग-अलग जोड़ा जाए, तो दोहरी गणना का दोष उत्पन्न होगा।
64. दोहरी गणना से बचने के लिए सदैव अंतिम उत्पाद के मूल्य अथवा प्रत्येक स्तर पर मूल्य संवर्धन को ही जोड़ा जाता है।
65. भारत जैसे देशों में विश्वसनीय और सटीक आंकड़ों के संग्रह में भारी कठिनाई आती है।
66. ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कुछ लेन-देन वस्तु विनिमय के माध्यम से होते हैं, जिसे अमौद्रिक क्षेत्र (Non-monetized Sector) कहते हैं।
67. अमौद्रिक क्षेत्र के लेन-देन मुद्रा के रूप में दर्ज न होने के कारण राष्ट्रीय आय की गणना से बाहर रह जाते हैं।
68. किसानों द्वारा अपने स्वयं के उपभोग के लिए रखे गए अनाज का सही बाजार मूल्य तय करने में कठिनाई होती है।
69. अशिक्षा और अज्ञानता के कारण छोटे उत्पादक और दुकानदार अपने आय-व्यय का कोई लिखित हिसाब-किताब नहीं रखते।
70. कर चोरी (Tax Evasion) के कारण उत्पन्न काला धन (Black Money) राष्ट्रीय आय के सही आकलन में बहुत बड़ी बाधा है।
7. भारत में क्षेत्रीय एवं राज्य स्तरीय आय विषमताएँ
71. भारत के विभिन्न राज्यों की प्रति व्यक्ति आय में भारी आर्थिक असमानता पाई जाती है।
72. भारत में छोटे राज्यों में गोवा की प्रति व्यक्ति आय देश में सर्वाधिक है।
73. केंद्रशासित प्रदेशों में दिल्ली और चंडीगढ़ की प्रति व्यक्ति आय सबसे ऊँचे पायदान पर है।
74. बड़े राज्यों में हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक उच्च प्रति व्यक्ति आय वाले समृद्ध राज्य हैं।
75. भारत में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय वाले राज्यों में बिहार सबसे निचले पायदान पर आता है।
76. नीति आयोग और आर्थिक सर्वेक्षणों के अनुसार बिहार, ओडिशा और झारखंड पिछड़े राज्यों की श्रेणी में आते हैं।
77. राज्य घरेलू उत्पाद को संक्षेप में GSDP (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) कहा जाता है।
78. किसी राज्य की संपन्नता उसके औद्योगिक विकास और सेवा क्षेत्र के विस्तार पर निर्भर करती है।
79. गोवा में पर्यटन उद्योग की प्रधानता के कारण प्रति व्यक्ति आय अत्यधिक उच्च है।
80. हरियाणा और पंजाब में उन्नत कृषि तथा महाराष्ट्र और गुजरात में तीव्र औद्योगिकीकरण उनकी उच्च आय का मुख्य आधार है।
8. बिहार के संदर्भ में आय एवं प्रति व्यक्ति आय
81. भारत के सभी राज्यों की तुलना में बिहार की प्रति व्यक्ति आय न्यूनतम है।
82. बिहार एक कृषि-प्रधान राज्य है जहाँ की अधिकांश आबादी कम उत्पादकता वाली कृषि पर निर्भर है।
83. बिहार में प्रति व्यक्ति आय कम होने का मुख्य कारण उद्योगों का अभाव, बाढ़-सूखा की विभीषिका और तीव्र जनसंख्या वृद्धि है।
84. बिहार का उत्तरी भाग प्रायः हर वर्ष विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आता है (विशेषकर कोसी और गंडक नदी बेसिन)।
85. बिहार का दक्षिणी भाग अक्सर सूखे की मार झेलता है, जिससे कृषि आय अनिश्चित रहती है।
86. बिहार के 38 जिलों में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय वाला जिला पटना है।
87. पटना राज्य की राजधानी होने के साथ-साथ बिहार का सबसे बड़ा वाणिज्यिक, वित्तीय और सेवा केंद्र है।
88. बिहार में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय वाला जिला शिवहर है।
89. शिवहर जिला भौगोलिक रूप से छोटा, औद्योगिक रूप से पिछड़ा और बुनियादी ढांचे से वंचित है।
90. पटना के अतिरिक्त मुंगेर, बेगूसराय और भागलपुर तुलनात्मक रूप से बेहतर आय वाले जिले माने जाते हैं।
91. बेगूसराय को बिहार की 'औद्योगिक राजधानी' कहा जाता है (बरौनी तेलशोधक कारखाना और उर्वरक संयंत्र के कारण)।
92. शिवहर, किशनगंज, अररिया और बांका न्यूनतम प्रति व्यक्ति आय वाले पिछड़े जिलों में गिने जाते हैं।
93. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण यहाँ से कार्यशील जनसंख्या का दूसरे राज्यों में भारी पलायन (Migration) होता है।
94. दूसरे राज्यों और विदेशों में काम करने वाले बिहारियों द्वारा घर भेजा गया धन (Remittance) राज्य की अर्थव्यवस्था को सहारा देता है।
95. पिछले कुछ वर्षों में बिहार में निर्माण, सड़क, परिवहन और सेवा क्षेत्र के तेजी से बढ़ने से राज्य की विकास दर में सुधार हुआ है।
9. विविध एवं परीक्षा-उपयोगी स्मरणीय तथ्य
96. नोबेल पुरस्कार विजेता भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने लोक कल्याण और निर्धनता सूचकांक के क्षेत्र में युगांतरकारी कार्य किया।
97. प्रो. अमर्त्य सेन को वर्ष 1998 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था।
98. मानव विकास सूचकांक (HDI) तैयार करने में प्रति व्यक्ति आय (क्रय शक्ति क्षमता के आधार पर) एक अनिवार्य घटक है।
99. जब किसी देश की प्रति व्यक्ति आय बढ़ती है, तो लोगों की बचत और जीवन प्रत्याशा में भी सुधार होता है।
100. "राष्ट्रीय आय में सतत एवं समावेशी वृद्धि ही किसी राज्य और देश से गरीबी व बेरोजगारी मिटाने का एकमात्र स्थायी उपाय है।"
अध्ययन सुझाव: इन सभी 100 वन-लाइनर बिंदुओं का नियमित अभ्यास करें। यह संकलन बिहार बोर्ड मैट्रिक परीक्षा के वस्तुनिष्ठ (MCQ) तथा लघु उत्तरीय प्रश्नों की तैयारी के लिए अत्यंत उपयोगी है।
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