भाषा की सबसे छोटी इकाई को वर्ण कहते हैं। पाणिनि ने वर्णमाला को 14 सूत्रों में प्रस्तुत किया है। परंपरा के अनुसार महेश्वर (शिव जी) ने अपने नृत्य की समाप्ति पर जो 14 बार डमरू बजाया, उससे ये 14 (ध्वनियाँ) सूत्र पाणिनि को प्राप्त हुए—
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धानेतद् विमर्शे शिवसूत्रजालम् ॥
ये 14 माहेश्वर सूत्र इस प्रकार हैं —
- अइउण् (अ, इ, उ)
- ऋऌक् (ऋ, ऌ)
- एओङ् (ए, ओ)
- ऐऔच् (ऐ, औ)
- हयवरट् (ह्, य्, व्, र्)
- लण् (ल्)
- ञमङणनम् (ञ्, म्, ङ्, ण्, न्)
- झभञ् (झ्, भ्)
- घढधष् (घ्, ढ्, ध्)
- जबगडदश् (ज्, ब्, ग्, ड्, द्)
- खफछठथचटतव् (ख्, फ्, छ्, ठ्, थ्, च्, ट्, त्)
- कपय् (क्, प्)
- शषसर् (श्, ष्, स्)
- हल् (ह्)
प्रत्येक सूत्र के अन्त में हल् वर्ण (हलन्त वर्ण) का प्रयोग प्रत्याहार बनाने के उद्देश्य से किया गया है (जैसे— अइउण् में 'ण्' हल् वर्ण है)। इन्हें प्रत्याहारों के अन्तर्गत आने वाले वर्णों के साथ सम्मिलित नहीं किया जाता।
प्रत्याहार
माहेश्वर सूत्रों के आधार पर विभिन्न प्रत्याहारों का निर्माण किया जा सकता है। प्रत्याहार दो वर्णों से बनता है, जैसे— अच्, इक्, यण्, अल्, हल् इत्यादि। इन प्रत्याहारों में आदि वर्ण से लेकर अन्तिम वर्ण के मध्य आने वाले सभी वर्णों की गणना की जाती है। प्रत्याहार के अन्तर्गत आदि वर्ण तो परिगणित होता है, किन्तु अन्तिम वर्ण को छोड़ दिया जाता है। समझने के लिए कुछ प्रत्याहार आगे दिए जा रहे हैं—
यथा— अच् = अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ — यहाँ प्रत्याहार के आदि वर्ण 'अ' का परिगणन किया गया है तथा अन्तिम वर्ण 'च्' को छोड़ दिया गया है।
- (क) हल् (पाँचवें सूत्र के प्रथम वर्ण 'ह्' से लेकर चौदहवें सूत्र के अन्तिम वर्ण 'ल्' के मध्य आने वाले सभी वर्ण):
ह्, य्, व्, र्, ल्, ञ्, म्, ङ्, ण्, न्, झ्, भ्, घ्, ढ्, ध्, ज्, ब्, ग्, ड्, द्, ख्, फ्, छ्, ठ्, थ्, च्, ट्, त्, क्, प्, श्, ष् तथा स् - (ख) इक् (प्रथम सूत्र के द्वितीय वर्ण 'इ' से लेकर द्वितीय सूत्र के अन्तिम वर्ण 'क्' के मध्य आने वाले सभी वर्ण):
इ, उ, ऋ तथा ऌ - (ग) अक् (प्रथम सूत्र के प्रथम वर्ण 'अ' से लेकर द्वितीय सूत्र के अन्तिम वर्ण 'क्' के मध्य आने वाले सभी वर्ण):
अ, इ, उ, ऋ तथा ऌ - (घ) झल् (अष्टम सूत्र के प्रथम वर्ण 'झ्' से लेकर चौदहवें सूत्र के अन्तिम वर्ण 'ल्' के मध्य आने वाले सभी वर्ण):
झ्, भ्, घ्, ढ्, ध्, ज्, ब्, ग्, ड्, द्, ख्, फ्, छ्, ठ्, थ्, च्, ट्, त्, क्, प्, श्, ष्, स् तथा ह् - (ङ) यण् (पञ्चम सूत्र के द्वितीय वर्ण 'य' से लेकर षष्ठ सूत्र के अन्तिम वर्ण 'ण्' के मध्य आने वाले सभी वर्ण):
य्, व्, र् तथा ल्
* सन्धि आदि के नियमों को समझने के लिए प्रत्याहार ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है।
वर्ण के प्रकार
वर्ण दो प्रकार के होते हैं— 1. स्वर तथा 2. व्यञ्जन।
स्वर (अच्)
जो (वर्ण) किसी अन्य (वर्ण) की सहायता के बिना ही बोले जाते हैं, उन्हें स्वर कहते हैं। स्वर के तीन भेद होते हैं— ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत।
- ह्रस्व स्वर— जिस स्वर के उच्चारण में एक मात्रा का समय लगे, उसको ह्रस्व स्वर कहते हैं। ये संख्या में पाँच हैं— अ, इ, उ, ऋ तथा ऌ। इन्हें मूल स्वर भी कहते हैं।
- दीर्घ स्वर— जिस स्वर के उच्चारण में दो मात्राओं का समय लगे उसे दीर्घ स्वर कहते हैं। इनकी संख्या आठ है— आ, ई, ऊ, ॠ, ए, ऐ, ओ तथा औ। इनमें से 'ऌ' ध्वनि का दीर्घ रूप 'ॡ' केवल वेदों में प्राप्त होता है। अन्तिम चार वर्णों को संयुक्त वर्ण (स्वर) भी कहते हैं, क्योंकि ए, ऐ, ओ तथा औ दो स्वरों के मेल से बने हैं।
उदाहरण —- अ + इ = ए
- अ + ए = ऐ
- अ + उ = ओ
- अ + ओ = औ
- प्लुत स्वर— जिस स्वर के उच्चारण में तीन या उससे अधिक मात्राओं का समय लगे उसे प्लुत कहते हैं। जब किसी व्यक्ति को दूर से पुकारते हैं तब सम्बोधन पद के अन्तिम वर्ण को तीन मात्रा का समय लगाकर बोलते हैं, उसे ही प्लुत स्वर कहते हैं। लिपि में प्लुत स्वर को '३' की संख्या से दिखाया जाता है, उदाहरण के लिए एहि कृष्ण३ अत्र गौश्चरति। 'ओ३म्' के ओकार का उच्चारण सर्वत्र प्लुत ही होता है।
सभी ह्रस्व, दीर्घ एवं प्लुत स्वर वर्ण अनुनासिक एवं निरनुनासिक भेद से द्विविध हैं—
- अनुनासिक— जिस स्वर के उच्चारण में मुख के साथ नासिका की भी सहायता ली जाती है, उसे अनुनासिक स्वर कहते हैं। यथा— अँ, इँ, एँ इत्यादि समस्त स्वर वर्ण।
- निरनुनासिक— जो स्वर केवल मुख से उच्चारित होता है, वह निरनुनासिक है (यथा— अ, आ, इ, ई आदि)।
व्यञ्जन (हल्)
जिन वर्णों का उच्चारण स्वर वर्णों की सहायता के बिना नहीं किया जा सकता, उन्हें व्यञ्जन या हल् कहते हैं। स्वर रहित व्यञ्जन को लिखने के लिए वर्ण के नीचे हल् चिह्न (्) लगाते हैं। सम्पूर्ण व्यञ्जन निम्न तालिका में दर्शाए गए हैं—
- कु = क् ख् ग् घ् ङ् (क वर्ग)
- चु = च् छ् ज् झ् ञ् (च वर्ग)
- टु = ट् ठ् ड् ढ् ण् (ट वर्ग)
- तु = त् थ् द् ध् न् (त वर्ग)
- पु = प् फ् ब् भ् म् (प वर्ग)
- अन्तःस्थ = य् र् ल् व्
- ऊष्म = श् ष् स् ह्
व्याकरण सम्प्रदाय में इन पाँच वर्गों को कु, चु, टु, तु, पु नाम से जाना जाता है (इन्हें उदित भी कहते हैं)।
व्यञ्जनों के भेद:
- स्पर्श— उपर्युक्त 'क्' से 'म्' तक के 25 वर्णों को स्पर्श कहते हैं। इनके उच्चारण के समय जिह्वा मुख के विभिन्न स्थानों का स्पर्श करती है। प्रत्येक वर्ग के अन्तिम वर्ण— ङ्, ञ्, ण, न् और म् को अनुनासिक भी कहा जाता है, क्योंकि इनका उच्चारण मुख के साथ नासिका से भी होता है।
- अन्तःस्थ— य्, र्, ल् और व् वर्णों को अन्तःस्थ कहते हैं। इन्हें अर्धस्वर भी कहते हैं।
- ऊष्म— श्, ष्, स्, ह् वर्णों को ऊष्म कहते हैं।
अयोगवाह एवं संयुक्त व्यञ्जन
- अनुस्वार (ं)— इसका उच्चारण नासिका मात्र से होता है। यह सर्वथा स्वर के बाद ही आता है।
यथा— अहम् - अहं। सामान्यतया 'म्' व्यञ्जन वर्ण से पहले अनुस्वार (ं) में परिवर्तित होता है। - विसर्ग (:)— इसका उच्चारण किञ्चित् 'ह्' के सदृश किया जाता है; इसका भी प्रयोग स्वर के बाद ही होता है।
यथा— रामः, देवः, गुरुः। - संयुक्त व्यञ्जन— दो व्यञ्जनों के संयोग से बने वर्ण को संयुक्त व्यञ्जन कहते हैं।
- i) क् + ष् = क्ष्
- ii) त् + र् = त्र्
- iii) ज् + ञ् = ज्ञ्
उच्चारण स्थान
कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ एवं नासिका को उच्चारण स्थान कहते हैं। वर्णों का उच्चारण करने के लिए फेफड़े से निकली निःश्वास वायु इन स्थानों का स्पर्श करती है। कुछ वर्णों का उच्चारण एक साथ दो स्थानों से भी होता है।
| स्थान | स्वर | व्यञ्जन | अयोगवाह | संज्ञा | ||
|---|---|---|---|---|---|---|
| स्पर्श | अन्तःस्थ | ऊष्म | ||||
| कण्ठ | अ, आ | क्, ख्, ग्, घ्, ङ् | — | ह् | : (विसर्ग) | कण्ठ्य |
| तालु | इ, ई | च्, छ्, ज्, झ्, ञ् | य् | श् | — | तालव्य |
| मूर्धा | ऋ, ॠ | ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण् | र् | ष् | — | मूर्धन्य |
| दन्त | ऌ | त्, थ्, द्, ध्, न् | ल् | स् | — | दन्त्य |
| ओष्ठ | उ, ऊ | प्, फ्, ब्, भ्, म् | — | — | ᳲप, ᳲफ (उपध्मानीय)* | ओष्ठ्य |
| नासिका | अनुनासिक स्वर | ङ्, ञ्, ण्, न्, म् | — | — | ं (अनुस्वार) | नासिक्य |
| कण्ठतालु | ए, ऐ | — | — | — | — | कण्ठतालव्य |
| कण्ठोष्ठ | ओ, औ | — | — | — | — | कण्ठोष्ठ्य |
| दन्तोष्ठ | — | — | व् | — | — | दन्तोष्ठ्य |
| जिह्वामूल | — | — | — | — | ᳵक, ᳵख (जिह्वामूलीय)# | जिह्वामूलीय |
* सम्बद्ध स्थानों के साथ नासिका से भी पञ्चम वर्णों का उच्चारण होता है।
# जिह्वामूलीय: विसर्ग का भेद जिह्वामूलीय (जब विसर्ग के बाद क, ख वर्ण रहते हैं, तब अर्धविसर्ग उच्चारण होता है, उदाहरण— प्रातः कालः, दुःखम्)
प्रयत्न (यत्न)
फेफड़े से निकली निःश्वास वायु को मुख, नासिका तथा कण्ठ आदि स्थानों से स्पर्श कराते हुए मनुष्य द्वारा अभीष्ट वर्णों के उच्चारणार्थ किए गए यत्न को प्रयत्न कहते हैं। प्रयत्न के दो भेद होते हैं— आभ्यन्तर तथा बाह्य।
1. आभ्यन्तर प्रयत्न (5 भेद)
वर्णों के उच्चारण काल में मुख के अन्दर मनुष्य की चेष्टापरक क्रिया को आभ्यन्तर प्रयत्न कहते हैं। इसके पाँच भेद हैं—
- स्पृष्ट— वर्णों के उच्चारण काल में जब जिह्वा के विभिन्न भागों द्वारा मुख के अन्दर के विभिन्न स्थानों को स्पर्श किया जाता है तो जिह्वा के इस प्रयत्न को 'स्पृष्ट' प्रयत्न कहते हैं। 'क्' से 'म्' तक सभी व्यञ्जन (25 वर्ण) 'स्पृष्ट' प्रयत्न से उच्चारित होते हैं।
- ईषत् स्पृष्ट— वर्णों के उच्चारण काल में जब जिह्वा द्वारा उच्चारण स्थानों को थोड़ा ही स्पर्श किया जाता है, तो जिह्वा के इस प्रयत्न को ईषत् स्पृष्ट कहते हैं। य्, र्, ल्, तथा व् ईषत् स्पृष्ट से उच्चारित होते हैं।
- विवृत— वर्ण विशेष के उच्चारण काल में जब मुख-विवर खुला रहता है, तो मुख के इस यत्न को विवृत कहते हैं। सभी स्वर 'विवृत' प्रयत्न से उच्चारित होते हैं।
- ईषत् विवृत— वर्णों के उच्चारण काल में जब मुख-विवर थोड़ा खुला रहता है, तो मुख के इस प्रयत्न को ईषत् विवृत कहते हैं। श्, ष्, स्, ह् ईषत् विवृत प्रयत्न से उच्चारित होते हैं।
- संवृत— वर्णों के उच्चारण काल में फेफड़े से निकलने वाले निःश्वास का मार्ग जब बन्द रहता है, तब इसे संवृत कहते हैं। इसका प्रयोग केवल ह्रस्व 'अ' के उच्चारण में (प्रयोगदशा में) होता है।
2. बाह्य प्रयत्न (11 भेद)
वर्णों के उच्चारण का वह यत्न जो फेफड़े से कण्ठ तक होता है, उसे बाह्य प्रयत्न कहते हैं। मुख से बाह्य होने की अपेक्षा से इसे बाह्य कहा जाता है। इसके ग्यारह भेद हैं—
विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित।
| विवार, श्वास, अघोष | संवार, नाद, घोष | अल्पप्राण | महाप्राण | उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित |
|---|---|---|---|---|
| 'खर्' प्रत्याहार के वर्ण = प्रत्येक वर्ग के प्रथम, द्वितीय वर्ण एवं श्, ष्, स् “खरो विवाराः श्वासाः अघोषाश्च” |
'हश्' प्रत्याहार के वर्ण = प्रत्येक वर्ग के तृतीय, चतुर्थ, पंचम वर्ण, अन्तःस्थ एवं ह् “हशः संवारा नादा घोषाश्च” |
वर्गों के प्रथम, तृतीय, पंचम वर्ण एवं अन्तःस्थ संज्ञक वर्ण (यण् = य्, र्, ल्, व्) | वर्गों के द्वितीय, चतुर्थ वर्ण एवं ऊष्म संज्ञक वर्ण (शल् = श्, ष्, स्, ह्) | सभी स्वर वर्ण (अच्) |
महत्त्वपूर्ण 25 वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर (Objective MCQs)
महत्त्वपूर्ण 25 लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Subjective Q&A)
भाषा की सबसे छोटी इकाई, जिसके टुकड़े नहीं किए जा सकते, उसे वर्ण कहते हैं। वर्ण के मुख्य रूप से दो भेद होते हैं—
1. स्वर वर्ण (अच्)
2. व्यञ्जन वर्ण (हल्)
महर्षि पाणिनि ने संस्कृत वर्णमाला को जिन 14 सूत्रों में संकलित किया है, उन्हें माहेश्वर सूत्र (शिवसूत्र) कहते हैं। मान्यता के अनुसार भगवान शिव (नटराज) ने ताण्डव नृत्य के समापन पर सनकादि ऋषियों के उद्धार हेतु 14 बार डमरू बजाया था, जिससे ये ध्वनियाँ प्राप्त हुईं।
1. अइउण् 2. ऋऌक् 3. एओङ् 4. ऐऔच् 5. हयवरट् 6. लण् 7. ञमङणनम् 8. झभञ् 9. घढधष् 10. जबगडदश् 11. खफछठथचटतव् 12. कपय् 13. शषसर् 14. हल्।
विस्तृत वर्ण-समूह को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करने की विधि को प्रत्याहार कहते हैं। यह दो वर्णों से मिलकर बनता है। इसमें प्रथम वर्ण से लेकर अन्तिम इत् वर्ण के बीच के सभी वर्ण गिने जाते हैं (अन्तिम इत् वर्ण को छोड़कर)।
उदाहरण: अच् = अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ।
प्रत्येक सूत्र के अन्त में स्थित हल् वर्ण (जैसे 'अइउण्' में 'ण्') केवल इत्संज्ञक होते हैं। उनका उद्देश्य केवल प्रत्याहार का निर्माण करना है। अतः प्रत्याहार के वर्णों की वास्तविक गणना में उन्हें छोड़ दिया जाता है।
• इक् प्रत्याहार: इ, उ, ऋ, ऌ
• यण् प्रत्याहार: य्, व्, र्, ल्
जिन वर्णों का उच्चारण किसी अन्य वर्ण की सहायता के बिना स्वतंत्र रूप से होता है, उन्हें स्वर कहते हैं। उच्चारण काल (मात्रा) के आधार पर स्वर के तीन भेद होते हैं—
1. ह्रस्व स्वर 2. दीर्घ स्वर 3. प्लुत स्वर।
• ह्रस्व स्वर: जिनके उच्चारण में 1 मात्रा का समय लगे (जैसे— अ, इ, उ, ऋ, ऌ)।
• दीर्घ स्वर: जिनके उच्चारण में 2 मात्रा का समय लगे (जैसे— आ, ई, ऊ, ॠ, ए, ऐ, ओ, औ)।
• प्लुत स्वर: जिनके उच्चारण में 3 या अधिक मात्राओं का समय लगे (जैसे— ओ३म्, एहि कृष्ण३)।
दो भिन्न स्वरों के मेल से बनने वाले स्वरों को संयुक्त स्वर (संध्यक्षर) कहते हैं। इनकी संख्या 4 है—
• अ + इ = ए
• अ + ए = ऐ
• अ + उ = ओ
• अ + ओ = औ
• अनुनासिक स्वर: जिन स्वरों का उच्चारण मुख के साथ नासिका (नाक) की सहायता से भी होता है, जैसे— अँ, इँ, एँ।
• निरनुनासिक स्वर: जिन स्वरों का उच्चारण केवल मुख से होता है, जैसे— अ, आ, इ, ई।
जिन वर्णों का उच्चारण स्वतंत्र रूप से न होकर स्वरों की सहायता से किया जाता है, उन्हें व्यञ्जन कहते हैं। इसके तीन प्रमुख प्रकार हैं—
1. स्पर्श व्यञ्जन (25 वर्ण)
2. अन्तःस्थ व्यञ्जन (4 वर्ण)
3. ऊष्म व्यञ्जन (4 वर्ण)
'क्' से लेकर 'म्' तक के 25 वर्णों के उच्चारण के समय जिह्वा मुख के विभिन्न उच्चारण स्थानों का पूर्ण स्पर्श करती है, इसलिए इन्हें स्पर्श व्यञ्जन कहते हैं। इन्हें पाँच वर्गों में बाँटा गया है—
• कु (क-वर्ग): क्, ख्, ग्, घ्, ङ्
• चु (च-वर्ग): च्, छ्, ज्, झ्, ञ्
• टु (ट-वर्ग): ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्
• तु (त-वर्ग): त्, थ्, द्, ध्, न्
• पु (प-वर्ग): प्, फ्, ब्, भ्, म्
• अन्तःस्थ: य्, र्, ल्, व् वर्णों को अन्तःस्थ कहते हैं। ये स्वर और व्यञ्जन के मध्य स्थित होते हैं, अतः इन्हें अर्धस्वर भी कहा जाता है।
• ऊष्म: श्, ष्, स्, ह् वर्णों के उच्चारण के समय मुख से घर्षणयुक्त गर्म श्वास वायु बाहर निकलती है, अतः इन्हें ऊष्म वर्ण कहते हैं।
वे वर्ण जो न तो शुद्ध स्वर हैं और न ही शुद्ध व्यञ्जन, किन्तु भाषा में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें अयोगवाह कहते हैं।
1. अनुस्वार (ं): यथा— अहं, रामम्।
2. विसर्ग (:): यथा— रामः, देवः।
3. जिह्वामूलीय: ᳵक, ᳵख (यथा— प्रातः कालः)
4. उपध्मानीय: ᳲप, ᳲफ (यथा— तपः फलम्)
• क्ष् = क् + ष्
• त्र् = त् + र्
• ज्ञ् = ज् + ञ्
फेफड़ों से निकलने वाली श्वास वायु मुख के जिस अवयव या भाग से टकराकर किसी वर्ण की विशिष्ट ध्वनि उत्पन्न करती है, उसे उच्चारण स्थान कहते हैं। मुख्य स्थान हैं— कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ और नासिका।
• कण्ठ्य (कण्ठ): अ, आ, क-वर्ग (क्, ख्, ग्, घ्, ङ्), ह् तथा विसर्ग (:)।
• तालव्य (तालु): इ, ई, च-वर्ग (च्, छ्, ज्, झ्, ञ्), य् तथा श्।
• मूर्धन्य (मूर्धा): ऋ, ॠ, ट-वर्ग (ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्), र् तथा ष्।
• कण्ठतालु: ए, ऐ (कण्ठ + तालु)
• कण्ठोष्ठ: ओ, औ (कण्ठ + ओष्ठ)
• दन्तोष्ठ: व् (दन्त + ओष्ठ)
• नासिका + सम्बद्ध वर्ग स्थान: ङ्, ञ्, ण्, न्, म् (नासिक्य पञ्चम वर्ण)
• जिह्वामूलीय: जब विसर्ग के बाद 'क' या 'ख' वर्ण आए, तो विसर्ग का अर्धविसर्ग रूप में उच्चारण होता है। उदा. प्रातः कालः, दुःखम्।
• उपध्मानीय: जब विसर्ग के बाद 'प' या 'फ' वर्ण आए, तो उसे उपध्मानीय कहते हैं। उदा. पुनः पुनः, तपः फलम्।
वर्णों के शुद्ध उच्चारण के लिए मानव द्वारा मुख और कण्ठ के भीतर किए जाने वाले आन्तरिक एवं बाह्य प्रयास को प्रयत्न कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है—
1. आभ्यन्तर प्रयत्न (उच्चारण से पूर्व मुख के अन्दर का यत्न - 5 भेद)
2. बाह्य प्रयत्न (ध्वनि निष्कासन के समय कण्ठ/फेफड़े का यत्न - 11 भेद)
1. स्पृष्ट: स्पर्श वर्ण (क् से म् तक कुल 25 वर्ण)
2. ईषत् स्पृष्ट: अन्तःस्थ वर्ण (य्, र्, ल्, व्)
3. विवृत: सभी स्वर वर्ण (अच्)
4. ईषत् विवृत: ऊष्म वर्ण (श्, ष्, स्, ह्)
5. संवृत: लौकिक प्रयोग में ह्रस्व 'अ'
बाह्य प्रयत्न के 11 भेद हैं—
1. विवार, 2. संवार, 3. श्वास, 4. नाद, 5. घोष, 6. अघोष, 7. अल्पप्राण, 8. महाप्राण, 9. उदात्त, 10. अनुदात्त, तथा 11. स्वरित।
• अल्पप्राण: जिन वर्णों के उच्चारण में श्वास वायु का प्रयोग अल्प (कम) होता है। प्रत्येक वर्ग के 1, 3, 5वें वर्ण तथा अन्तःस्थ वर्ण (य्, र्, ल्, व्) अल्पप्राण हैं।
• महाप्राण: जिन वर्णों के उच्चारण में श्वास वायु अधिक मात्रा में हकारयुक्त निकलती है। प्रत्येक वर्ग के 2, 4थे वर्ण तथा ऊष्म वर्ण (श्, ष्, स्, ह्) महाप्राण हैं।
• खर् प्रत्याहार (वर्गों के 1st, 2nd वर्ण + श्, ष्, स्) = विवार, श्वास और अघोष।
• हश् प्रत्याहार (वर्गों के 3rd, 4th, 5th वर्ण + य्, र्, ल्, व्, ह्) = संवार, नाद और घोष।
ग्रन्थ दशरूपक के अनुसार—
• नृत्त केवल ताल एवं लय (गतिमयता) पर आश्रित शारीरिक क्रिया है।
• जबकि नृत्य रस, भाव और अभिनय पर आश्रित होता है।
0 Comments