Chapter 1. लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी | BSEB 10 Polity Notes


बिहार बोर्ड (BSEB) कक्षा 10

राजनीति विज्ञान (लोकतांत्रिक राजनीति-II) — अध्याय 1

लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी (Power Sharing in Democracy)

पाठ का परिचय एवं अवलोकन (Overview & Introduction)

लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का मूल आधार केवल चुनाव जीतना या बहुमत की सरकार चलाना नहीं है, बल्कि समाज के सभी वर्गों, जातियों, धर्मों और भाषाई समुदायों को शासन प्रक्रिया में यथोचित भागीदारी देना है। जब समाज के विभिन्न समूहों को शासन में हिस्सा मिलता है, तो टकराव की संभावना न्यूनतम हो जाती है और देश की एकता सुदृढ़ होती है। इसीलिए सत्ता की साझेदारी को "लोकतंत्र की आत्मा" (Spirit of Democracy) कहा जाता है।

अध्याय के मुख्य वैचारिक स्तंभ:

  • सामाजिक विभाजन और विविधता का राजनीतिक प्रभाव:
    जन्म, धर्म, भाषा, जाति और लिंग के आधार पर समाज में विभिन्न पहचानें बनती हैं। यह अध्याय स्पष्ट करता है कि हर सामाजिक भिन्नता सामाजिक विभाजन या टकराव का रूप नहीं लेती। जब एक सामाजिक अंतर दूसरे अंतरों से अधिक महत्वपूर्ण और गहरा हो जाता है, तब वह गंभीर सामाजिक विभाजन और तनाव को जन्म देता है।
  • वैश्विक तुलना—बेल्जियम बनाम श्रीलंका:
    • बेल्जियम (समझौते और संतुलन का मॉडल): यूरोप के छोटे से देश बेल्जियम ने डच (59%) और फ्रेंच (40%) भाषाई समूहों के बीच अधिकारों का न्यायसंगत बँटवारा किया। केंद्र में दोनों भाषाओं के मंत्रियों की समान संख्या, राज्यों को स्वायत्तता और सांस्कृतिक मुद्दों के लिए 'सामुदायिक सरकार' बनाकर गृहयुद्ध की आशंका को हमेशा के लिए टाल दिया।
    • श्रीलंका (बहुसंख्यकवाद का विनाशकारी मॉडल): 1948 में स्वतंत्र हुए श्रीलंका ने बहुसंख्यक सिंहली समुदाय (74%) का वर्चस्व थोपने के लिए 1956 में केवल सिंहली को राजभाषा बनाया, बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया और तमिल अल्पसंख्यकों (18%) की उपेक्षा की। इसके परिणामस्वरूप देश में दशकों तक खूनी गृहयुद्ध चला।
  • सत्ता में साझेदारी की अनिवार्यता (दो तर्क):
    • युक्तिपरक तर्क (Prudential Reason): यह लाभ-हानि के व्यावहारिक आकलन पर आधारित है कि सत्ता की साझेदारी से सामाजिक समूहों के बीच टकराव और राजनीतिक अस्थिरता घटती है।
    • नैतिक तर्क (Moral Reason): यह लोकतंत्र के आंतरिक मूल्य पर बल देता है कि जिन लोगों पर कानून लागू होते हैं, उन्हें उन कानूनों के निर्माण में भागीदारी का स्वाभाविक अधिकार है।
  • सामाजिक विषमताएँ और भारतीय परिप्रेक्ष्य:
    • लैंगिक मसले (Gender Issues): श्रम के लैंगिक विभाजन, महिला साक्षरता की स्थिति और विधायिका में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व की पड़ताल।
    • धर्म और संप्रदायवाद (Communalism): धर्म को राजनीति का हथियार बनाकर घृणा फैलाने की प्रवृत्ति और उसके समाधान के रूप में भारतीय पंथनिरपेक्षता (Secularism)।
    • जाति और राजनीति (Caste and Politics): भारतीय समाज में जातिगत पदानुक्रम, राजनीति में जाति का उपयोग और साथ ही जाति व्यवस्था के अंदर आया आधुनिकीकरण व राजनीतिकरण।

1. सामाजिक विविधता, विभाजन एवं नागरिक अधिकार आंदोलन

1. सत्ता की साझेदारी को लोकतंत्र की 'आत्मा' (Spirit of Democracy) कहा जाता है।
2. जब समाज के किसी एक समूह को लगता है कि उसकी पहचान और हितों की लगातार उपेक्षा हो रही है, तब सामाजिक अंतर सामाजिक विभाजन का रूप ले लेता है।
3. सामाजिक भेदभाव और भिन्नता की उत्पत्ति का सबसे प्राथमिक और स्वाभाविक कारण जन्म होता है।
4. कुछ सामाजिक भिन्नताएँ व्यक्तिगत पसंद और चयन पर आधारित होती हैं, जैसे धर्म परिवर्तन, शिक्षा या व्यवसाय का चयन।
5. उत्तरी आयरलैंड और नीदरलैंड दोनों ईसाई बहुल देश हैं, किंतु उत्तरी आयरलैंड में प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक के बीच हिंसक वर्ग-टकराव रहा, जबकि नीदरलैंड में ऐसा नहीं हुआ।
6. अमेरिका में अश्वेतों के नागरिक अधिकारों की बहाली के लिए 1954 से 1968 तक चला संघर्ष 'नागरिक अधिकार आंदोलन' कहलाता है।
7. अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलन का नेतृत्व अहिंसक तरीके से डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने किया था।
8. 1968 के मैक्सिको ओलंपिक खेलों में 200 मीटर दौड़ के पदक वितरण समारोह में टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस ने मानवाधिकार का समर्थन किया था।
9. टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस ने काले मोजे पहनकर और बिना जूतों के पोडियम पर खड़े होकर अमेरिकी अश्वेतों की गरीबी का प्रदर्शन किया था।
10. टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस के साथ एकजुटता दिखाने वाले ऑस्ट्रेलियाई धावक पीटर नॉर्मन थे, जिन्होंने अपनी जर्सी पर मानवाधिकार का बिल्ला लगाया था।
11. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) ने राजनीतिक बयानबाजी का आरोप लगाकर स्मिथ और कार्लोस के पदक वापस ले लिए थे।
12. सैन जोस स्टेट यूनिवर्सिटी में बाद में टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस की ऐतिहासिक विरोध मुद्रा की आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई।
13. युगोस्लाविया में धार्मिक और जातीय आधार पर राजनीतिक होड़ के कारण देश का कई स्वतंत्र टुकड़ों में विखंडन हो गया।
14. हर सामाजिक भिन्नता सामाजिक विभाजन को जन्म नहीं देती; कभी-कभी विभिन्न समूहों के लोग साझे मुद्दों पर एकजुट हो जाते हैं।

2. बेल्जियम का मॉडल: समझदारी और सत्ता की साझेदारी

15. बेल्जियम यूरोप महाद्वीप का एक छोटा सा लोकतांत्रिक देश है, जिसका क्षेत्रफल भारत के हरियाणा राज्य से भी छोटा है।
16. बेल्जियम की सीमाएँ फ्रांस, नीदरलैंड, जर्मनी और लक्जमबर्ग से लगती हैं।
17. बेल्जियम की कुल जनसंख्या लगभग एक करोड़ से थोड़ी अधिक है।
18. बेल्जियम के फ्लेमिश (Flemish) इलाके में देश की 59 प्रतिशत आबादी रहती है और वह डच भाषा बोलती है।
19. बेल्जियम के वेलोनिया (Wallonia) क्षेत्र में 40 प्रतिशत आबादी रहती है और वह फ्रेंच भाषा बोलती है।
20. बेल्जियम में शेष 1 प्रतिशत आबादी जर्मन भाषा बोलती है।
21. बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स है।
22. ब्रुसेल्स में भाषाई समीकरण देश के विपरीत था; यहाँ 80 प्रतिशत लोग फ्रेंच बोलते थे और केवल 20 प्रतिशत डच भाषी थे।
23. आर्थिक और शैक्षणिक रूप से फ्रेंच भाषी अल्पसंख्यक समुदाय डच भाषियों की तुलना में अधिक समृद्ध और शक्तिशाली था।
24. 1950 और 1960 के दशक में ब्रुसेल्स में डच और फ्रेंच भाषी समुदायों के बीच तीव्र तनाव पैदा हुआ।
25. बेल्जियम के नेताओं ने टकराव टालने के लिए 1970 से 1993 के बीच अपने संविधान में चार बार संशोधन किए।
26. बेल्जियम के मॉडल के तहत केंद्रीय सरकार में डच और फ्रेंच भाषी मंत्रियों की संख्या समान कर दी गई।
27. कई विशेष कानून केवल तभी पारित हो सकते हैं जब दोनों भाषाई समूहों के सांसदों का अलग-अलग बहुमत उनके पक्ष में हो।
28. केंद्र सरकार की अनेक शक्तियाँ दोनों भाषाई क्षेत्रों की क्षेत्रीय सरकारों को सुपुर्द कर दी गईं।
29. राजधानी ब्रुसेल्स में एक अलग संयुक्त सरकार बनाई गई, जिसमें दोनों समुदायों को समान प्रतिनिधित्व स्वीकार हुआ।
30. बेल्जियम में तीसरे स्तर की सरकार को 'सामुदायिक सरकार' (Community Government) कहा जाता है।
31. सामुदायिक सरकार का चुनाव एक ही भाषा (डच, फ्रेंच या जर्मन) बोलने वाले लोग करते हैं, चाहे वे देश में कहीं भी रहते हों।
32. सामुदायिक सरकार को संस्कृति, शिक्षा और भाषा जैसे मामलों पर स्वतंत्र निर्णय लेने का संवैधानिक अधिकार है।
33. जब यूरोपीय देशों ने मिलकर 'यूरोपीय संघ' (European Union) का गठन किया, तो उसका मुख्यालय बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स को चुना गया।

3. श्रीलंका का बहुसंख्यकवाद और गृहयुद्ध

34. श्रीलंका भारत के दक्षिणी तट से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक द्वीपीय देश है।
35. श्रीलंका को वर्ष 1948 में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता प्राप्त हुई।
36. श्रीलंका की कुल आबादी में सिंहली (Sinhala) समुदाय का अनुपात लगभग 74 प्रतिशत है।
37. श्रीलंका में तमिल भाषियों की कुल हिस्सेदारी लगभग 18 प्रतिशत है।
38. श्रीलंका के तमिलों में दो समूह हैं: मूल श्रीलंकाई तमिल (13%) और भारतीय मूल के तमिल (5%)।
39. भारतीय तमिल वे हैं जिनके पूर्वज औपनिवेशिक काल में चाय-कॉफ़ी के बागानों में काम करने भारत से श्रीलंका गए थे।
40. श्रीलंका के अधिकांश सिंहली भाषी लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं।
41. श्रीलंका के तमिल भाषी लोगों में अधिकांश हिंदू और मुस्लिम हैं।
42. श्रीलंका में ईसाई धर्म के लोग लगभग 7 प्रतिशत हैं, जो सिंहली और तमिल दोनों भाषाएँ बोलते हैं।
43. 1956 में श्रीलंकाई संसद ने एक कानून पारित कर सिंहली को देश की एकमात्र 'राजभाषा' (Official Language) घोषित कर दिया।
44. 1956 के कानून के तहत विश्वविद्यालयों और सरकारी नौकरियों में सिंहली आवेदकों को प्राथमिकता देने की नीति अपनाई गई।
45. श्रीलंका के नए संविधान में बौद्ध धर्म को राज्य द्वारा संरक्षण और बढ़ावा देने का विशेष प्रावधान जोड़ा गया।
46. सरकारी नीतियों द्वारा अलग-थलग किए जाने के विरोध में श्रीलंकाई तमिलों ने अपने राजनीतिक दल बनाए।
47. तमिलों ने 'तमिल ईलम' (Tamil Eelam - स्वतंत्र तमिल राज्य) बनाने की माँग को लेकर सशस्त्र संघर्ष शुरू किया।
48. लिट्टे (LTTE - Liberation Tigers of Tamil Eelam) श्रीलंका का प्रमुख तमिल उग्रवादी अलगाववादी संगठन था।
49. बहुसंख्यकवाद (Majoritarianism) की नीतियों के कारण श्रीलंका में कई दशकों तक भीषण गृहयुद्ध (Civil War) चला।
50. श्रीलंका का यह गृहयुद्ध वर्ष 2009 में सैन्य कार्रवाई और लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण की मृत्यु के साथ समाप्त हुआ।

4. सत्ता की साझेदारी के तर्क एवं प्रकार

51. सत्ता की साझेदारी के पक्ष में दिए जाने वाले तर्कों को दो श्रेणियों में बाँटा जाता है: युक्तिपरक (Prudential) और नैतिक (Moral)।
52. युक्तिपरक तर्क इस बात पर जोर देता है कि सत्ता का बँटवारा सामाजिक टकराव और हिंसा को रोककर बेहतर परिणाम लाता है।
53. नैतिक तर्क इस बात को रेखांकित करता है कि सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र की मूल भावना और अधिकार का विषय है।
54. शासन के विभिन्न अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच सत्ता का बँटवारा 'क्षैतिज बँटवारा' (Horizontal Sharing) कहलाता है।
55. क्षैतिज बँटवारे को 'नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था' (Checks and Balances) भी कहा जाता है क्योंकि कोई एक अंग असीमित शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता।
56. केंद्र सरकार, प्रांतीय (राज्य) सरकार और स्थानीय निकायों के बीच सत्ता का बँटवारा 'ऊर्ध्वाधर बँटवारा' (Vertical Sharing) कहलाता है।
57. विभिन्न सामाजिक समूहों (धार्मिक, भाषाई या कमजोर वर्गों) को दिया गया आरक्षण सत्ता की साझेदारी का सामाजिक स्वरूप है।
58. विभिन्न राजनीतिक दलों के आपसी तालमेल से बनने वाली 'गठबंधन सरकार' (Coalition Government) राजनीतिक साझेदारी का प्रत्यक्ष रूप है।
59. दबाव समूह, हित समूह और सामाजिक आंदोलन सरकारी नीतियों को प्रभावित करके अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता में भागीदारी करते हैं।

5. लैंगिक मसले और राजनीति

60. समाज में पुरुष और महिला के बीच काम के बँटवारे को 'श्रम का लैंगिक विभाजन' (Sexual Division of Labour) कहा जाता है।
61. घर के अंदर के सारे काम (खाना बनाना, सफाई, बच्चों की देखभाल) महिलाओं के जिम्मे और बाहर के काम पुरुषों के जिम्मे मानना लैंगिक विभाजन का मुख्य लक्षण है।
62. नारीवादी (Feminist) वह व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) है जो स्त्री और पुरुष के समान अधिकारों और समान अवसरों में विश्वास रखता है।
63. भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार पुरुषों की साक्षरता दर लगभग 82.14% और महिलाओं की लगभग 65.46% थी।
64. भारतीय समाज आज भी व्यापक रूप से एक 'पितृसत्तात्मक' (Patriarchal) समाज है, जहाँ परिवार का मुखिया पुरुष होता है।
65. भारत में 'समान पारिश्रमिक अधिनियम' (Equal Remuneration Act) वर्ष 1976 में पारित किया गया, जिसके तहत समान काम के लिए समान वेतन अनिवार्य है।
66. भारत में बाल लिंगानुपात (0-6 वर्ष) में गिरावट का मुख्य कारण कन्या भ्रूण हत्या और बालकों के प्रति सामाजिक प्राथमिकता है।
67. भारत में लिंग परीक्षण पर रोक लगाने हेतु 1994 में PC-PNDT अधिनियम पारित किया गया।
68. भारत की संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व ऐतिहासिक रूप से 10 से 14 प्रतिशत के बीच ही सिमटा रहा है।
69. 73वें और 74वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा भारत में पंचायती राज और नगर निकायों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण अनिवार्य किया गया।
70. बिहार भारत का पहला राज्य है जिसने वर्ष 2006 में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 50% आरक्षण दिया।
71. बिहार में प्राथमिक शिक्षक नियुक्ति और नगर निकायों में भी महिलाओं के लिए 50% आरक्षण लागू है।
72. भारतीय संसद ने सितंबर 2023 में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाला 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (106वाँ संविधान संशोधन) पारित किया।

6. धर्म, संप्रदायवाद और पंथनिरपेक्षता

73. जब धर्म को राष्ट्र का मुख्य आधार मान लिया जाता है और एक धर्म को दूसरे से श्रेष्ठ बताया जाता है, तो उसे 'संप्रदायवाद' (Communalism) कहते हैं।
74. महात्मा गांधी का प्रसिद्ध कथन था: "धर्म को कभी भी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता; धर्म से मेरा अभिप्राय नैतिक मूल्यों से है।"
75. सांप्रदायिक राजनीति इस मान्यता पर आधारित होती है कि एक विशेष धर्म के लोगों के हित समान होते हैं और वे एक अलग समुदाय बनाते हैं।
76. सांप्रदायिकता का सबसे विकृत और भयानक रूप सांप्रदायिक दंगे, नरसंहार और विभाजन के समय की हिंसा है।
77. भारत का कोई राजकीय या आधिकारिक धर्म नहीं है; भारत एक 'पंथनिरपेक्ष' (Secular) राज्य है।
78. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 'पंथनिरपेक्ष' (Secular) शब्द 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा जोड़ा गया।
79. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है।
80. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव का निषेध करता है।
81. पाकिस्तान (इस्लाम), इंग्लैंड (ईसाई धर्म) और श्रीलंका (बौद्ध धर्म) ने एक निश्चित धर्म को राजकीय धर्म का दर्जा दिया है, जबकि भारत ने ऐसा नहीं किया।
82. संविधान राज्य को यह अधिकार देता है कि वह सामाजिक सुधार हेतु धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर सके (जैसे अस्पृश्यता उन्मूलन)।

7. जाति व्यवस्था और भारतीय राजनीति

83. जाति व्यवस्था श्रम विभाजन के साथ-साथ 'श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन' भी है (यह विचार डॉ. भीमराव अंबेडकर का है)।
84. भारत में जाति व्यवस्था सामाजिक असमानता और ऊँच-नीच के पदानुक्रम पर आधारित एक कठोर व्यवस्था रही है।
85. ज्योतिराव फुले, महात्मा गांधी, डॉ. बी. आर. अंबेडकर और पेरियार रामास्वामी ने जातिविहीन और समतामूलक समाज के लिए संघर्ष किया।
86. शहरीकरण, साक्षरता का प्रसार, औद्योगिकीकरण और आर्थिक विकास के कारण पारंपरिक जातिगत बंधन ढीले पड़े हैं।
87. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता (छुआछूत) को पूर्णतः समाप्त कर दंडनीय अपराध घोषित किया गया है।
88. जब राजनीतिक दल चुनाव में उम्मीदवारों का चयन केवल जातिगत मतदाताओं की संख्या के आधार पर करते हैं, तो इसे राजनीति का 'जातिवादी रूप' कहा जाता है।
89. केवल जाति के आधार पर कोई भी दल चुनाव नहीं जीत सकता क्योंकि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में केवल एक जाति का पूर्ण बहुमत नहीं होता।
90. एक ही जाति के विभिन्न लोग अपनी आर्थिक स्थिति, वर्ग और व्यक्तिगत सोच के आधार पर अलग-अलग दलों को वोट दे सकते हैं।
91. राजनीति केवल जाति को प्रभावित नहीं करती, बल्कि राजनीति के संपर्क में आकर जातियाँ भी अपना राजनीतिकरण करती हैं।
92. राजनीतिक लाभ के लिए कई उप-जातियाँ आपस में मिलकर बड़े जातिगत संगठन या गठबंधन बना लेती हैं।
93. भारतीय राजनीति में जातियों को 'अगड़ी जाति' (Forward) और 'पिछड़ी जाति' (Backward) की श्रेणियों में लामबंद किया जाता रहा है।
94. द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग, जिसे 'मंडल आयोग' कहा जाता है, की सिफारिशों को वी. पी. सिंह सरकार ने वर्ष 1990 में लागू किया।
95. मंडल आयोग की सिफारिशों के तहत अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को केंद्रीय सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण प्रदान किया गया।

8. संवैधानिक प्रावधान एवं सत्ता साझेदारी के विशिष्ट आयाम

96. भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं में सीटें आरक्षित की गई हैं (अनुच्छेद 330 और 332)।
97. भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बँटवारा संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में किया गया है।
98. भारत का सर्वोच्च न्यायालय केंद्र और राज्यों अथवा विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच संवैधानिक विवादों का अंतिम मध्यस्थ है।
99. सत्ता में साझेदारी केवल विभिन्न सामाजिक समूहों को संतुष्ट करने का माध्यम नहीं, बल्कि यह देश के विखंडन को रोकने का अचूक अस्त्र है।
100. एक परिपक्व लोकतंत्र वही है जहाँ बहुसंख्यकों के शासन का अर्थ अल्पसंख्यकों की उपेक्षा न हो, बल्कि दोनों के हितों का सामंजस्य हो।
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