अध्याय 16: प्राकृतिक संसाधनों का संपोषित प्रबंधन
BSEB Class 10 विज्ञान (Science) | सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री एवं प्रश्नोत्तरी
- गंगा सफाई योजना (Ganga Action Plan) की शुरुआत किस वर्ष की गई थी? — वर्ष 1985 में।
- जल में किस जीवाणु की उपस्थिति संदूषण एवं मानव मल की उपस्थिति दर्शाती है? — कोलीफॉर्म (Coliform जीवाणु वर्ग)।
- कोलीफॉर्म जीवाणु शरीर के किस अंग में सामान्यतः पाया जाता है? — मानव की आंत में।
- जल का pH मान ज्ञात करने के लिए किस सूचक का प्रयोग किया जाता है? — सार्वत्रिक सूचक (Universal Indicator)।
- पर्यावरण संरक्षण हेतु 5 'R' नियम कौन-से हैं? — Refuse, Reduce, Reuse, Repurpose, Recycle।
- 'पुनः चक्रण' (Recycle) और 'पुनः उपयोग' (Reuse) में कौन अधिक श्रेष्ठ माना जाता है? — पुनः उपयोग (Reuse), क्योंकि इसमें ऊर्जा व्यय नहीं होती।
- जैव विविधता के विशिष्ट स्थल (Hotspots) किसे कहा जाता है? — वनों को।
- 'चिपको आंदोलन' किस वर्ष और कहाँ प्रारंभ हुआ था? — 1970 के दशक में गढ़वाल के 'रेनी' ग्राम (उत्तराखंड) में।
- चिपको आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से किसने किया था? — सुंदरलाल बहुगुणा तथा चंडी प्रसाद भट्ट ने।
- सन् 1731 में राजस्थान के जोधपुर में खेजड़ी वृक्षों की रक्षा हेतु 363 लोगों के साथ किसने बलिदान दिया? — अमृता देवी विश्नोई ने।
- भारत सरकार द्वारा वन्यजीव संरक्षण के लिए दिया जाने वाला राष्ट्रीय पुरस्कार कौन-सा है? — अमृता देवी विश्नोई राष्ट्रीय पुरस्कार।
- वन प्रबंधन में स्थानीय निवासियों की भागीदारी का सर्वोत्तम उदाहरण 1972 में कहाँ देखा गया? — पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के अराबाड़ी वन क्षेत्र में।
- अराबाड़ी वन क्षेत्र को पुनर्जीवित करने में किस वन अधिकारी की प्रमुख भूमिका थी? — ए. के. बनर्जी।
- अराबाड़ी वन क्षेत्र में किस प्रमुख वृक्ष का पुनरुद्धार किया गया था? — साल (Sal) वृक्ष।
- टिहरी बांध का निर्माण किस नदी पर किया गया है? — भागीरथी नदी (उत्तराखंड)।
- सरदार सरोवर बांध किस नदी पर निर्मित है? — नर्मदा नदी (गुजरात)।
- बांध निर्माण के विरोध में नर्मदा नदी हेतु चलाए गए आंदोलन का नाम क्या है? — नर्मदा बचाओ आंदोलन।
- नर्मदा बचाओ आंदोलन का नेतृत्व किसने किया था? — मेधा पाटकर ने।
- राजस्थान में वर्षा जल संचयन की प्राचीनतम संरचना क्या कहलाती है? — खादिन तथा नाडी।
- बिहार में वर्षा जल संचयन तथा सिंचाई की पारंपरिक प्रणाली क्या है? — अहार तथा पाइन।
- हिमाचल प्रदेश में स्थानीय नहर सिंचाई प्रणाली को क्या कहा जाता है? — कुल्ह (Kulhs)।
- महाराष्ट्र में जल संचयन की पारंपरिक संरचनाएं कौन-सी हैं? — बंधारस एवं ताल।
- मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में पारंपरिक जल संग्रहण प्रणाली क्या है? — बंधिश।
- तमिलनाडु में जल संग्रहण के लिए प्रयुक्त पारंपरिक तालाब क्या कहलाते हैं? — एरिस (Eris)।
- केरल में जल संचयन की प्राचीन विधि क्या कहलाती है? — सुरंगम (Surangams)।
- कर्नाटक में जल संचयन की प्राचीन संरचना क्या है? — कट्टा (Katta)।
- भौम जल (Groundwater) का मुख्य लाभ क्या है? — यह वाष्पीकृत नहीं होता तथा मच्छरों के प्रजनन से मुक्त रहता है।
- जीवाश्म ईंधन के मुख्य उदाहरण कौन-से हैं? — कोयला और पेट्रोलियम।
- कोयला और पेट्रोलियम में कार्बन के अतिरिक्त कौन-से तत्व विद्यमान होते हैं? — हाइड्रोजन (H), ऑक्सीजन (O), नाइट्रोजन (N) तथा सल्फर (S)।
- जीवाश्म ईंधनों के अपूर्ण दहन से कौन-सी अत्यंत विषैली गैस उत्पन्न होती है? — कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)।
- कोयले तथा पेट्रोलियम के पूर्ण दहन से उत्पन्न प्रमुख ग्रीनहाउस गैस कौन-सी है? — कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)।
- अम्लीय वर्षा (Acid Rain) के लिए उत्तरदायी मुख्य ऑक्साइड कौन-से हैं? — सल्फर के ऑक्साइड (SO2) तथा नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NOx)।
- वर्तमान दर से उपभोग होने पर पेट्रोलियम के ज्ञात भंडार लगभग कितने वर्षों तक शेष रहेंगे? — लगभग 40 वर्ष।
- कोयले के वर्तमान ज्ञात भंडार लगभग कितने वर्षों तक पर्याप्त माने जाते हैं? — लगभग 200 वर्ष।
- वन्यजीवों तथा प्राकृतिक संसाधनों के प्रमुख दावेदार (Stakeholders) कितने वर्गों में बांटे जाते हैं? — चार वर्ग।
- प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में किसका दृष्टिकोण केवल वर्तमान लाभ तक सीमित न होकर दीर्घकालिक होना चाहिए? — संपोषित विकास (Sustainable Development) का।
- सीएनजी (CNG) का पूर्ण रूप क्या है? — संपीड़ित प्राकृतिक गैस (Compressed Natural Gas)।
- एलपीजी (LPG) का मुख्य रासायनिक घटक क्या है? — ब्यूटेन (C4H10)।
- जल संभर प्रबंधन (Watershed Management) का मुख्य उद्देश्य क्या है? — भूमि एवं जल के प्राथमिक संसाधनों का वैज्ञानिक विकास।
- वनों की कटाई से वायुमंडल में किस गैस की मात्रा बढ़ती है? — कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)।
- गंगा नदी की कुल लंबाई हिमालय में गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी तक लगभग कितनी है? — 2500 किलोमीटर से अधिक।
- प्लास्टिक किस प्रकार का अपशिष्ट है? — अजैव-निम्नीकरणीय (Non-biodegradable)।
- कागज के उत्पादन के लिए मुख्य रूप से किस पौधे की लकड़ी का बड़े पैमाने पर दोहन होता है? — बांस तथा नीलगिरी (Eucalyptus)।
- मोनोकल्चर (Monoculture) से जैव विविधता पर क्या असर पड़ता है? — जैव विविधता नष्ट हो जाती है।
- अमृता देवी विश्नोई किस राज्य की निवासी थीं? — राजस्थान (खेजड़ली गांव)।
- खादिन प्रणाली में फसलें मुख्यतः कहाँ बोई जाती हैं? — जल भराव वाले बांध के निचले नमीयुक्त क्षेत्र में।
- बड़े बांधों के निर्माण से विस्थापित लोगों की मुख्य समस्या क्या होती है? — उचित पुनर्वास तथा मुआवजे का अभाव।
- ग्लोबल वॉर्मिंग का प्रमुख कारण क्या है? — वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों जैसे CO2 तथा CH4 की वृद्धि।
- प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन का मूल दर्शन क्या है? — संसाधनों का समान वितरण एवं भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षण।
- जल प्रदूषण मापने की एक जैविक विधि क्या है? — जल में BOD (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) तथा कोलीफॉर्म संख्या का मापन।
5 'R' पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली के सिद्धांत हैं: 1. Refuse (इनकार): पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली वस्तुओं (जैसे पॉलीथिन) को मना करना। 2. Reduce (कम उपयोग): संसाधनों का अपव्यय रोकना। 3. Reuse (पुनः उपयोग): वस्तुओं को बार-बार प्रयोग करना। 4. Repurpose (पुनः प्रयोजन): किसी वस्तु का मूल उद्देश्य समाप्त होने पर अन्य कार्य में उपयोग। 5. Recycle (पुनः चक्रण): कचरे को प्रक्रमित कर नई वस्तु बनाना।
कोलीफॉर्म (Coliform) मानव की आंत में पाया जाने वाला जीवाणुओं का एक वर्ग है। जल में इसकी उपस्थिति यह स्पष्ट संकेत देती है कि जल मानव मल या सीवेज द्वारा संदूषित हो चुका है। ऐसा जल पीने योग्य नहीं होता और इससे हैजा, टायफाइड और पीलिया जैसी जल-जनित संक्रामक बीमारियां फैल सकती हैं।
पुनः चक्रण प्रक्रिया में ऊर्जा, जल तथा रासायनिक पदार्थों की खपत होती है और कुछ मात्रा में प्रदूषण भी उत्पन्न होता है (जैसे प्लास्टिक या धातु को पिघलाना)। इसके विपरीत, पुनः उपयोग की प्रक्रिया में किसी भी अतिरिक्त ऊर्जा का उपभोग नहीं होता; केवल वस्तु को फेंकने के बजाय किसी अन्य कार्य में बार-बार इस्तेमाल किया जाता है (जैसे जैम की कांच की बोतलों में दालें रखना)।
वनों में पौधों, जंतुओं, कवक, फर्न, आवृत्तबीजी, कीटों और सूक्ष्मजीवों की अनगिनत प्रजातियां पाई जाती हैं। जैव विविधता का एक प्रमुख आधार प्रजातियों की विविधता और उनकी आनुवंशिक प्रचुरता है। चूंकि वन विभिन्न जैविक प्रजातियों के प्राकृतिक आवास होते हैं, इसलिए इन्हें जैव विविधता के तप्त स्थल (Hotspots) कहा जाता है।
वन संसाधनों के चार मुख्य दावेदार हैं:
1. स्थानीय निवासी: जो वनों के आस-पास रहते हैं और जलावन, चारा, फल और लकड़ी पर निर्भर हैं।
2. वन विभाग: जो सरकारी स्तर पर वनों का नियंत्रण और दोहन करता है।
3. उद्योगपति: जो लकड़ी, बीड़ी (तेंदू पत्ता), कागज और लाख के लिए कच्चे माल पर निर्भर हैं।
4. प्रकृति एवं वन्यजीव प्रेमी: जो वनों को उनके प्राकृतिक स्वरूप में संरक्षित देखना चाहते हैं।
चिपको आंदोलन 1970 के दशक की शुरुआत में उत्तराखंड के चमोली जिले के रेनी ग्राम में शुरू हुआ था। जब ठेकेदार के कुल्हाड़ीधारी मजदूर वन काटने आए, तो स्थानीय महिलाएं पेड़ों से लिपट गईं और उन्हें काटने से रोक दिया। इस आंदोलन ने दुनिया भर में संदेश दिया कि स्थानीय समुदाय की भागीदारी के बिना वन संरक्षण असंभव है। सरकार को अंततः वनों की कटाई पर प्रतिबंध लगाना पड़ा।
1972 में पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के अराबाड़ी वन प्रभाग में वन अधिकारी ए. के. बनर्जी ने 1,272 हेक्टेयर के बुरी तरह उजड़ चुके साल (Sal) वनों को पुनर्जीवित करने के लिए स्थानीय ग्रामीणों को संरक्षण कार्य में शामिल किया। ग्रामीणों को बदले में 25% उपज और न्यूनतम मजदूरी दी गई। 1983 तक यह उजड़ा हुआ वन 12.5 करोड़ रुपये के मूल्यवान वन क्षेत्र में बदल गया।
बड़े बांधों से जुड़ी मुख्य समस्याएं निम्नलिखित हैं:
1. सामाजिक समस्याएं: हजारों किसानों और आदिवासियों का विस्थापन होना तथा उचित पुनर्वास न मिलना।
2. आर्थिक समस्याएं: अत्यधिक सार्वजनिक धन का व्यय और उस अनुपात में अपेक्षित लाभ न मिलना।
3. पर्यावरणीय समस्याएं: विशाल वन क्षेत्रों का जलमग्न होना, वनों की कटाई और जैव विविधता का पूर्ण विनाश।
भौम जल संचयन के मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं:
1. यह जल वाष्पीकृत होकर व्यर्थ नहीं उड़ता।
2. यह रिसकर आस-पास के कुओं के जलस्तर को रिचार्ज करता है और वनस्पतियों को नमी प्रदान करता है।
3. यह मच्छरों और कीटों के प्रजनन का केंद्र नहीं बनता।
4. यह भूमिगत परतों से छनने के कारण मानव एवं जंतु अपशिष्टों के संदूषण से सुरक्षित रहता है।
'अहार-पाइन' बिहार की अत्यंत प्राचीन एवं वैज्ञानिक जल संचयन व्यवस्था है। 'अहार' तीन तरफ से मिट्टी के तटबंधों से घिरी हुई आयताकार जल संचयन संरचना होती है, जबकि 'पाइन' प्राकृतिक जलधाराओं या नदियों से जल को खेतों और अहारों तक लाने वाली मानवनिर्मित नहरें या नालियां होती हैं। यह व्यवस्था बाढ़ नियंत्रण और सुखाड़ दोनों में सिंचाई हेतु उपयोगी है।
खादिन एक ढलानदार कृषि भूमि पर आधारित पारंपरिक वर्षा जल संचयन तकनीक है। ढलान के निचले भाग पर मिट्टी का लंबा तटबंध (बांध) बनाया जाता है, जिससे बहता वर्षा जल रुक जाता है। अतिरिक्त जल निकास मार्ग से आगे निकल जाता है। जल जब पूरी तरह भूमि में रिस जाता है, तो उस नमीयुक्त भूमि पर रबी फसलें (जैसे गेहूं, चना) बिना किसी बाहरी सिंचाई के उगाई जाती हैं।
संपोषित विकास का अर्थ ऐसे आर्थिक और सामाजिक विकास से है जो वर्तमान पीढ़ी की सभी आवश्यकताओं (भोजन, ऊर्जा, आवास) की पूर्ति इस प्रकार करे कि पर्यावरण को स्थायी क्षति न पहुंचे और भावी पीढ़ियों के लिए भी संसाधन सुरक्षित व समृद्ध बने रहें। यह संसाधनों के न्यायसंगत और विवेकपूर्ण वितरण पर बल देता है।
कोयला और पेट्रोलियम लाखों वर्ष पूर्व भूगर्भ में दबे जैव अवशेषों (पादपों और समुद्री जीवों) के उच्च ताप और अत्यधिक दाब पर अपघटन से बने हैं। इस निर्माण प्रक्रिया में करोड़ों वर्ष का भूवैज्ञानिक समय लगता है। चूंकि प्रकृति में इनका निर्माण तुरंत संभव नहीं है और इनके ज्ञात भंडार अत्यंत सीमित हैं, अतः इन्हें अनवीकरणीय संसाधन कहा जाता है।
जीवाश्म ईंधनों के दहन से निम्नलिखित दुष्प्रभाव होते हैं:
1. कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के उत्सर्जन से भूमंडलीय तापन (ग्लोबल वॉर्मिंग) बढ़ता है।
2. सल्फर और नाइट्रोजन के ऑक्साइड (SO2, NO2) जलवाष्प से क्रिया कर अम्लीय वर्षा कराते हैं।
3. अपूर्ण दहन से अत्यधिक विषैली गैस कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और कालिख के कण निकलते हैं, जो श्वसन रोग उत्पन्न करते हैं।
सन् 1731 में राजस्थान के जोधपुर के खेजड़ली गांव में राजा के सैनिकों द्वारा खेजड़ी (Prosopis cineraria) वृक्षों को काटे जाने से बचाने के लिए अमृता देवी विश्नोई ने अपनी तीन पुत्रियों और 363 ग्रामीणों के साथ पेड़ों से लिपटकर प्राणों की आहुति दे दी थी। उनके इस अद्वितीय बलिदान की स्मृति में भारत सरकार द्वारा वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में यह पुरस्कार दिया जाता है।
गंगा नदी में इसके प्रवाह मार्ग पर बसे 100 से अधिक नगरों द्वारा प्रतिदिन करोड़ों लीटर अशोधित घरेलू वाहित मल, औद्योगिक जहरीले रासायनिक अपशिष्ट और शवों का विसर्जन किया जा रहा था। इसके कारण गंगा का जल अत्यधिक संदूषित हो गया, उसमें घुलित ऑक्सीजन का स्तर घट गया और कोलीफॉर्म जीवाणुओं की संख्या खतरनाक स्तर तक पहुंच गई। अतः 1985 में जल शुद्धिकरण हेतु यह योजना शुरू की गई।
ब्रिटिश काल तथा वन विभाग द्वारा विविध प्राकृतिक वनों को काटकर उनके स्थान पर केवल आर्थिक लाभ वाले एकल वृक्षों (जैसे पाइन, टीक या यूकेलिप्टस) का रोपण किया गया। इसे मोनोकल्चर कहते हैं। इससे प्राकृतिक जैव विविधता पूर्णतः नष्ट हो जाती है, स्थानीय वन्यजीवों का आहार और आवास छिन जाता है तथा स्थानीय निवासियों की चारा, फल और औषधि संबंधी आवश्यकताएं बाधित होती हैं।
जलसंभर प्रबंधन का उद्देश्य जल और मृदा जैसे प्राथमिक संसाधनों का इस प्रकार वैज्ञानिक संवर्धन करना है ताकि द्वितीयक संसाधनों (पादप और जंतु) का उत्पादन टिकाऊ रूप से बढ़ सके। इससे सूखे और बाढ़ की विभीषिका कम होती है, निचले जलाशयों का जीवनकाल बढ़ता है तथा स्थानीय समुदायों की आय में सतत वृद्धि होती है।
हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में लगभग 400 वर्ष पूर्व नहर सिंचाई की एक स्थानीय प्रणाली विकसित की गई जिसे 'कुल्ह' कहा जाता है। इसमें ऊंचे ग्लेशियरों और झरनों से बहने वाले प्राकृतिक जल को मानव-निर्मित छोटी नालियों द्वारा ढलान से नीचे स्थित दूरदराज के गांवों तक लाया जाता था। इसका प्रबंधन गांव वालों की आपसी सहमति से होता था।
व्यक्तिगत स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:
1. निजी वाहनों के स्थान पर सार्वजनिक परिवहन (बस, मेट्रो) या साइकिल का प्रयोग करना।
2. घरों में पारंपरिक तापदीप्त बल्बों के स्थान पर ऊर्जा-दक्ष LED लाइटों का उपयोग करना।
3. कम दूरी के लिए पैदल चलना।
4. अनावश्यक पंखे, हीटर और बल्ब तुरंत बंद करना तथा सौर ऊर्जा उपकरणों को अपनाना।
खनन गतिविधियों के कारण बड़े पैमाने पर वन क्षेत्रों का विनाश होता है और उपजाऊ मृदा की ऊपरी परत नष्ट हो जाती है। इसके अतिरिक्त, अयस्कों के निष्कर्षण के दौरान निकलने वाले अपशिष्ट और स्लैग (धातुमल) के विशाल ढेर भूमि और जल स्रोतों को भारी धातुओं से विषैला बना देते हैं, जिससे जलीय पारितंत्र बर्बाद हो जाता है।
पर्यावरण मित्र बनने के लिए:
1. एकल उपयोग प्लास्टिक (Single-use plastic) का बहिष्कार कर कपड़े या जूट के थैलों का उपयोग करना।
2. भोजन, जल और बिजली का किसी भी रूप में अपव्यय न करना।
3. जैव-निम्नीकरणीय (गीला कचरा) और अजैव-निम्नीकरणीय (सूखा कचरा) अपशिष्टों को अलग-अलग निस्तारित करना।
स्थानीय निवासी पीढ़ियों से वनों के साथ सामंजस्य बनाकर रहते आए हैं। वे वृक्षों की केवल शाखाएं और सूखी पत्तियां काटते हैं, कभी पूरा वृक्ष नहीं काटते। उनकी पारंपरिक मान्यताएं वनों को देवताओं का वास मानकर उनकी रक्षा करती हैं। वे संसाधनों का उपभोग अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए करते हैं, व्यावसायिक शोषण के लिए नहीं।
जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक दहन से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) और मीथेन (CH4) जैसी गैसें पृथ्वी द्वारा उत्सर्जित अवरक्त (Infrared) किरणों को अवशोषित कर लेती हैं। इस ताप-रोधी आवरण के कारण पृथ्वी का औसत वैश्विक तापमान निरंतर बढ़ रहा है, जिसे भूमंडलीय तापन (ग्लोबल वॉर्मिंग) कहते हैं।
खुले गड्ढों में संचित जल सूर्य की धूप से तेजी से वाष्पीकृत होकर उड़ जाता है। इसके अलावा खुले खड़े जल में एनोफिलीज़ और एडीज़ मच्छर अंडे देते हैं, जिससे मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियां फैलती हैं। खुले जल में धूल, पत्तियां और मलमूत्र मिलने से वह संदूषित हो जाता है, जबकि भूमिगत रिचार्ज से जल पूर्णतः शुद्ध और सुरक्षित रहता है।
प्राकृतिक संसाधनों का संपोषित प्रबंधन: प्राकृतिक संसाधनों का इस प्रकार विवेकपूर्ण, वैज्ञानिक और नियंत्रित उपयोग करना ताकि वर्तमान मानव समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति भी हो सके और पर्यावरण को नष्ट किए बिना भावी पीढ़ियों के लिए भी इन संसाधनों की गुणवत्ता और प्रचुरता बनी रहे, संपोषित प्रबंधन कहलाता है।
इसके प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं:
- दीर्घकालिक दृष्टिकोण: संसाधनों का दोहन तात्कालिक वित्तीय लाभ या अल्पकालिक शोषण के आधार पर न होकर आगामी कई दशकों और शताब्दियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
- न्यायसंगत और समान वितरण: प्राकृतिक संपदा पर केवल कुछ धनी या शक्तिशाली व्यक्तियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एकाधिकार न हो, बल्कि इसका समान लाभ समाज के सबसे निर्धन और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
- अपशिष्टों का सुरक्षित निपटान: संसाधनों के दोहन और प्रसंस्करण के समय उत्पन्न होने वाले सह-उत्पादों और विषाक्त अपशिष्टों का पर्यावरण-अनुकूल वैज्ञानिक निस्तारण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- पारिस्थितिक संतुलन: दोहन की दर प्रकृति की स्वतः पुनरुत्पादन क्षमता की सीमा के भीतर होनी चाहिए।
लाभ: संपोषित प्रबंधन से जैव विविधता सुरक्षित रहती है, मृदा अपरदन रुकता है, जल संकट दूर होता है तथा ऊर्जा के अक्षय स्रोतों का विकास होने से भावी ऊर्जा संकट का स्थायी समाधान प्राप्त होता है।
वनों का संरक्षण केवल प्रशासनिक कानूनों, वन रक्षकों और बंदूकों के बल पर नहीं किया जा सकता। जब तक वनों से जुड़े स्थानीय निवासियों को संरक्षण प्रक्रिया में भागीदार नहीं बनाया जाता, तब तक वन संपदा की रक्षा असंभव है। इसे दो ऐतिहासिक उदाहरणों से भली-भांति समझा जा सकता है:
1. चिपको आंदोलन (उत्तराखंड, 1970 का दशक):
गढ़वाल के रेनी गांव में वन विभाग ने स्थानीय ग्रामीणों को कृषि यंत्र बनाने हेतु अंगू के पेड़ काटने की अनुमति नहीं दी, परंतु खेल का सामान बनाने वाली एक निजी कंपनी को पूरा वन क्षेत्र आवंटित कर दिया। जब ठेकेदार के कुल्हाड़ीधारी मजदूर वन काटने आए, तो गांव के पुरुष काम पर बाहर गए थे। गांव की महिलाओं ने गौरा देवी के नेतृत्व में निडर होकर पेड़ों को अपनी बांहों में घेर लिया (चिपक गईं)। उनके इस अभूतपूर्व अहिंसक प्रतिरोध के सामने ठेकेदार को पीछे हटना पड़ा। इस आंदोलन ने सिद्ध किया कि स्थानीय महिलाएं और ग्रामीण ही वनों के वास्तविक संरक्षक हैं।
2. अराबाड़ी वन प्रभाग का पुनरुद्धार (पश्चिम बंगाल, 1972):
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में स्थानीय ग्रामीणों और वन अधिकारियों के बीच हिंसक टकराव के कारण 1,272 हेक्टेयर का साल (Sal) वन पूर्णतः उजड़ चुका था। दूरदर्शी वन अधिकारी ए. के. बनर्जी ने रणनीति बदली और ग्रामीणों को संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) के तहत वन रक्षा दल में शामिल किया। ग्रामीणों को वेतन के अतिरिक्त अंतिम उपज का 25% हिस्सा और मामूली शुल्क पर ईंधन व चारा लेने का अधिकार दिया गया। परिणामस्वरूप, ग्रामीणों के सक्रिय सहयोग से मात्र 10 वर्षों (1983) में नष्ट प्राय वन 12.5 करोड़ रुपये की बहुमूल्य हरित संपदा में रूपांतरित हो गया।
नदियों पर विशाल कंक्रीट संरचनाएं बनाकर जल संचयन करने वाले बड़े बांध आधुनिक औद्योगिक विकास के प्रमुख स्तंभ माने गए हैं।
बड़े बांधों के प्रमुख लाभ:
- विशाल जल भंडारण: इनसे विशाल मात्रा में जल एकत्रित कर लंबी नहरों (जैसे राजस्थान की इंदिरा गांधी नहर) द्वारा सैकड़ों किलोमीटर दूर मरुस्थलीय व शुष्क क्षेत्रों तक जलापूर्ति और सिंचाई सुनिश्चित की जाती है।
- जलविद्युत उत्पादन: टर्बाइन चलाकर प्रदूषण-मुक्त जलविद्युत का उत्पादन किया जाता है जो उद्योगों और शहरों को ऊर्जा प्रदान करती है।
- बाढ़ नियंत्रण: अत्यधिक वर्षा के समय अतिरिक्त जल को रोककर निचले मैदानी इलाकों को जलमग्न होने से बचाया जाता है।
बांधों के निर्माण से जुड़ी त्रिविध गंभीर समस्याएं:
- 1. सामाजिक समस्याएं: बांध के विशाल जलाशयों में डूबने के कारण लाखों स्थानीय किसानों, आदिवासियों और ग्रामीणों को अपनी पैतृक भूमि, घर और आजीविका गंवानी पड़ती है। सरकारों द्वारा उनका समुचित पुनर्वास और मुआवजा प्रायः नहीं दिया जाता, जिससे वे विस्थापित होकर शहरों में दयनीय जीवन जीने को विवश होते हैं।
- 2. आर्थिक समस्याएं: इन परियोजनाओं में जनता की गाढ़ी कमाई और सार्वजनिक करों के अरबों-खरबों रुपये खर्च होते हैं। नौकरशाही की अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार के कारण लागत बढ़ती जाती है और जिस अनुपात में लाभ का दावा किया जाता है, वह धरातल पर कभी प्राप्त नहीं होता।
- 3. पर्यावरणीय समस्याएं: बांध के डूब क्षेत्र में आने वाले हजारों वर्ग किलोमीटर के सघन प्राकृतिक वन, वन्यजीवों के आवास और दुर्लभ वनस्पतियां जलमग्न होकर सदा के लिए समाप्त हो जाती हैं। जलमग्न जैविक पदार्थों के सड़ने से भारी मात्रा में मीथेन (CH4) गैस निकलती है जो ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ाती है। इसके अतिरिक्त नदी का प्राकृतिक जलीय पारिस्थितिकी तंत्र छिन्न-भिन्न हो जाता है और भूगर्भीय प्लेटों पर दबाव से भूकंप का खतरा बढ़ता है।
वर्षा जल संचयन: वर्षा के जल को व्यर्थ बहकर नालों और नदियों में जाने देने के बजाय उसे विभिन्न जल संरचनाओं (तालाबों, कुओं, टांकों, गड्ढों) में एकत्र कर भूगर्भ में पुनर्भरण (रिचार्ज) करने की वैज्ञानिक और पारंपरिक तकनीक को वर्षा जल संचयन कहते हैं।
भारत में सदियों से विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों की जलवायु के अनुसार अद्भुत प्रणालियां विकसित की गईं:
- राजस्थान (खादिन एवं टांका): मरुस्थलीय ढलानों पर मिट्टी का ऊंचा मेढ़ बनाकर 'खादिन' बनाया जाता है जहां पानी रिसकर भूमि में समा जाता है और रबी फसल उगाई जाती है। घरों के आंगनों में 'टांका' (भूमिगत पक्के टैंक) बनाकर छत का जल संचित किया जाता है।
- बिहार (अहार और पाइन): यह व्यवस्था गंगा के मैदानी बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों के लिए आदर्श है। 'अहार' तीन तरफ से बंधे जलकुंड होते हैं तथा 'पाइन' नदियों से जल को अहारों और सुदूर खेतों तक पहुंचाने वाली विशिष्ट नहरें होती हैं।
- हिमाचल प्रदेश (कुल्ह): पहाड़ी ढलानों पर बहने वाले ग्लेशियर पिघलन जल को मानव-निर्मित छोटी नालियों (कुल्ह) द्वारा पहाड़ों से गांवों तक लाया जाता है।
- महाराष्ट्र (बंधारस एवं ताल): नदियों और नालों पर छोटे-छोटे चेकडैम (बंधारस) बनाकर विशाल गड्ढों या झीलों (ताल) में जल संचित किया जाता है।
- तमिलनाडु (एरिस): एरिस प्राचीन तालाब हैं जो परस्पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं; यदि एक एरिस भर जाता है तो अतिरिक्त जल स्वतः अगले एरिस में चला जाता है।
- केरल (सुरंगम): यह लाल लेटराइट मिट्टी की पहाड़ियों में खोदी गई क्षैतिज सुरंगें होती हैं, जिनसे रिसता हुआ स्वच्छ शीतल जल बाहर लाया जाता है।
वन संसाधनों के प्रबंधन में मुख्य रूप से चार प्रकार के हितधारक होते हैं, जिनके हित और दृष्टिकोण परस्पर अत्यंत भिन्न और विरोधाभासी हैं:
- 1. वनों के अंदर एवं आस-पास रहने वाले स्थानीय लोग: इनका जीवन वनों पर पूर्णतः निर्भर है। वे भोजन हेतु कंद-मूल, पशुओं के लिए चारा, छप्पर के लिए बांस और ईंधन के लिए सूखी लकड़ियों का उपयोग करते हैं। इनका दोहन अत्यंत सीमित होता है और वे कभी वृक्षों को जड़ से नहीं काटते।
- 2. सरकार का वन विभाग: इनके पास वनों का प्रशासनिक स्वामित्व होता है। इनका प्राथमिक दृष्टिकोण वनों से अधिकतम राजस्व प्राप्त करना होता है। ऐतिहासिक रूप से वन विभाग ने स्थानीय लोगों के अधिकारों की उपेक्षा कर एकल प्रजाति रोपण (Monoculture) को बढ़ावा दिया।
- 3. उद्योगपति एवं व्यापारी: ये टिंबर, पेपर मिल, दियासलाई, प्लाईवुड और बीड़ी निर्माण के कारखानों के मालिक होते हैं। ये वनों को केवल कच्चे माल की खान मानते हैं। इन्हें वन के भविष्य से कोई सरोकार नहीं होता; यदि एक जंगल की लकड़ी समाप्त हो जाए तो वे दूसरे जंगल का ठेका ले लेते हैं।
- 4. वन्यजीव एवं प्रकृति प्रेमी: ये लोग वनों पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर नहीं होते, परंतु वे जैव विविधता के संरक्षण, लुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा और वनों को उनकी आदिम सुंदरता में बनाए रखने के पक्षधर होते हैं।
निष्कर्ष: संपोषित प्रबंधन का वास्तविक दायित्व सरकार और नीति-निर्माताओं का है। उन्हें उद्योगपतियों के अंधाधुंध लालच पर अंकुश लगाकर स्थानीय निवासियों के पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देनी होगी तथा प्रकृति प्रेमियों के वैज्ञानिक सुझावों को नीति का हिस्सा बनाना होगा।
गंगा भारत की सबसे पवित्र और सबसे महत्वपूर्ण नदी है, जो उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के करोड़ों लोगों को जल और जीवन प्रदान करती है। परंतु औद्योगीकरण और अनियंत्रित शहरीकरण ने इसे विश्व की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में से एक बना दिया है।
प्रदूषण के प्रमुख कारण:
- घरेलू सीवेज का निकास: कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, पटना और कोलकाता जैसे घनी आबादी वाले 100 से अधिक नगरों का प्रतिदिन अरबों लीटर अनुपचारित गंदा जल सीधे गंगा में उड़ेला जाता है।
- औद्योगिक अपशिष्ट: कानपुर के चमड़ा उद्योग, बरौनी के रिफाइनरी, कागज मिलों और वस्त्र उद्योगों से निकलने वाले अत्यधिक विषैले भारी तत्व (क्रोमियम, लेड, पारा) नदी में बहाए जाते हैं।
- धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां: अस्थि विसर्जन, शवों और अधजले शवों को नदी में प्रवाहित करना, मूर्तियों का विसर्जन और साबुन-डिटर्जेंट से नहाना।
- कृषि अपशिष्ट: खेतों से बहकर आने वाले रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक (DDT आदि)।
सुधार कार्यक्रम:
1. गंगा कार्य योजना (GAP, 1985): केंद्र सरकार द्वारा करोड़ों रुपये की लागत से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) स्थापित करने और कोलीफॉर्म स्तर घटाने हेतु यह योजना लाई गई। यद्यपि इसने जागरूकता फैलाई, परंतु भ्रष्टाचार और बिजली की कमी से एसटीपी बंद रहने के कारण पूर्ण सफलता नहीं मिली।
2. नमामि गंगे कार्यक्रम (2014 से प्रारंभ): यह एक एकीकृत संरक्षण मिशन है। इसके मुख्य स्तंभ हैं—नदी सतह की सफाई, ग्रामीण गंगा ग्राम विकास, वनीकरण, जैव विविधता संरक्षण, औद्योगिक बहिस्राव की 24×7 रियल-टाइम ऑनलाइन निगरानी और आधुनिक सीवेज संरचनाओं का निर्माण।
निर्माण की पृष्ठभूमि: कोयला और पेट्रोलियम जैवभार (Biomass) के रूपांतरण से बने हैं। लगभग 30 करोड़ वर्ष पूर्व कार्बोनिफेरस युग में घने वन और विशालकाय पादप भूगर्भीय उथल-पुथल के कारण दलदलों और पृथ्वी की परतों के नीचे दब गए। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में उच्च ताप और अत्यधिक दाब के प्रभाव से लाखों वर्षों में पादपों के रेशे और सेल्युलोज धीरे-धीरे कार्बन के यौगिकों में बदल गए, जिसे कार्बनीकरण कहते हैं; इससे कोयला बना। इसी प्रकार समुद्र में रहने वाले सूक्ष्म पादप और प्लवक जब तलहटी में दबकर गाद के नीचे फंस गए, तो अवायवीय परिस्थितियों में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का निर्माण हुआ।
रासायनिक घटक: इनमें मुख्यतः कार्बन (C) और हाइड्रोजन (H) होते हैं, साथ ही सूक्ष्म मात्रा में नाइट्रोजन (N) और सल्फर (S) उपस्थित रहते हैं।
संरक्षण की तात्कालिक आवश्यकता क्यों है?
- अत्यंत सीमित भंडार: वैज्ञानिकों के अनुसार जिस द्रुत गति से वर्तमान में ऊर्जा का उपभोग हो रहा है, पेट्रोलियम के ज्ञात भंडार अगले लगभग 40-50 वर्षों में और कोयले के भंडार लगभग 200 वर्षों में समाप्त हो जाएंगे। यदि हमने इनका संरक्षण नहीं किया तो भावी पीढ़ियों के लिए औद्योगिक विकास ठप हो जाएगा।
- पारिस्थितिक संकट: जीवाश्म ईंधन का दहन वायुमंडल में भारी मात्रा में CO2 छोड़ता है जो वैश्विक तापमान में अनियंत्रित वृद्धि कर रहा है, जिसके कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं और समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। साथ ही SO2 और NOx गैसें अम्लीय वर्षा का कारण बनती हैं।
संरक्षण के उपाय: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और बायोगैस जैसे गैर-पारंपरिक स्रोतों का युद्धस्तर पर प्रसार, इलेक्ट्रॉनिक वाहनों (EVs) का विस्तार तथा ऊर्जा संरक्षण के व्यक्तिगत प्रयासों को बढ़ावा देना अनिवार्य है।
जलसंभर प्रबंधन: जलसंभर (वाटरशेड) एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र होता है जहां की समस्त वर्षा का अपवाह जल एक ही जलधारा, नाले या नदी के माध्यम से एक साझा निकास बिंदु की ओर बहता है। इस संपूर्ण घाटी के भूमि और जल का समन्वित और वैज्ञानिक प्रबंधन ही 'जलसंभर प्रबंधन' कहलाता है।
मूलभूत वैज्ञानिक सिद्धांत:
- वर्षा की प्रत्येक बूंद को उसी स्थान पर रोकना जहाँ वह गिरती है ("जल को दौड़ने से चलने पर लाओ, चलने से रेंगने पर लाओ और रेंगने से भूमि में समा दो")।
- ढलानों पर समोच्च जुताई (Contour bunding) करना और छोटे-छोटे चेकडैम (Check dams) बनाकर मृदा अपरदन को रोकना।
- बंजर भूमि पर घास और स्थानीय वृक्ष लगाकर हरित आवरण का विस्तार करना।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव:
- भूजल पुनर्भरण: चेकडैमों और खाइयों के कारण भौम जलस्तर नाटकीय रूप से ऊपर उठ जाता है, जिससे सूखे कुएं और बोरवेल फिर से जीवित हो जाते हैं।
- कृषि उत्पादन में क्रांतिकारी वृद्धि: जहां किसान पूर्व में केवल मानसून की एक फसल पर निर्भर रहते थे, वहीं जल उपलब्धता के कारण वर्ष में दो या तीन फसलें (रबी, खरीफ और जायद) लेने में सक्षम होते हैं।
- दुग्ध उत्पादन और पशुपालन को प्रोत्साहन: हरियाली बढ़ने से चारा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है, जिससे ग्रामीण दुग्ध क्रांति और पशुपालन के माध्यम से अपनी आय दोगुनी कर लेते हैं।
- पलायन पर रोक: स्थानीय स्तर पर कृषि और वानिकी में रोजगार के अवसर उत्पन्न होने से ग्रामीणों का महानगरों की ओर होने वाला बाध्यकारी पलायन रुक जाता है।
अपशिष्ट उत्पादन को न्यूनतम करने और संसाधनों के अत्यधिक दोहन को रोकने के लिए '5-R' रणनीति आधुनिक पर्यावरण संरक्षण की आधारशिला है:
- 1. Refuse (इनकार करना): ऐसी वस्तुओं को स्वीकार करने से मना करना जो पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।
दैनिक उदाहरण: दुकानदारों द्वारा दी जाने वाली सिंगल-यूज प्लास्टिक की थैलियों को अस्वीकार करना और अपने साथ कपड़े का थैला ले जाना; प्लास्टिक के डिस्पोजेबल चम्मच, स्ट्रॉ और प्लेटों को मना करना। - 2. Reduce (कम उपयोग करना): संसाधनों का अपव्यय रोकना और अपनी आवश्यकताओं को संयमित करना।
दैनिक उदाहरण: कमरे से बाहर जाते ही पंखे, कूलर और ट्यूबलाइट बंद करना; ब्रश करते समय नल खुला न छोड़ना; भोजन की बर्बादी न करना। - 3. Reuse (पुनः उपयोग करना): किसी वस्तु को कूड़ेदान में फेंकने के बजाय उसे बार-बार काम में लेना।
दैनिक उदाहरण: लिफाफों को उलटा करके पुनः उपयोग करना; प्लास्टिक और कांच के डिब्बों (हॉर्लिक्स या जैम की शीशियों) को धोकर रसोई में मसाले और दालें रखने के उपयोग में लाना। - 4. Repurpose (पुनः प्रयोजन): जब कोई वस्तु अपने मूल कार्य के लिए अनुपयोगी हो जाए, तो रचनात्मक रूप से उसका किसी अन्य उपयोगी उद्देश्य में प्रयोग करना।
दैनिक उदाहरण: टूटे हुए चीनी मिट्टी के मग या बाल्टी का उपयोग छोटे गमले (पौध रोपण) के रूप में करना; फटे पुराने कपड़ों से पायदान या डस्टर बनाना। - 5. Recycle (पुनः चक्रण): ठोस अपशिष्ट को प्रक्रमित कर उससे नई उपयोगी सामग्री का निर्माण करना।
दैनिक उदाहरण: पुराने अखबारों और कॉपियों को रद्दी वाले को देना ताकि उन्हें रिसाइकिल कर पुनः कागज या गत्ता बनाया जा सके; धातु के टूटे बर्तनों और प्लास्टिक को पिघलाकर नए उपकरण तैयार करना।
जैव विविधता: किसी विशिष्ट पारिस्थितिक तंत्र या संपूर्ण पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवों (पादपों, जंतुओं, कवकों एवं सूक्ष्मजीवों) की प्रजातीय प्रचुरता, विविधता और उनके अंतःसंबंधों की समग्रता को जैव विविधता कहते हैं।
जैव विविधता ह्रास के प्रमुख कारण:
- प्राकृतिक आवासों का विनाश: कृषि विस्तार, शहरीकरण, सड़कों और रेलवे लाइनों के निर्माण हेतु वनों की भीषण कटाई से वन्यजीवों का आवास नष्ट हो रहा है।
- अति-दोहन: व्यावसायिक लाभ के लिए औषधीय पौधों, चंदन, कस्तूरी मृग और बाघों का अंधाधुंध शिकार व तस्करी।
- प्रदूषण: कीटनाशकों, औद्योगिक विषैले अपशिष्टों और प्लास्टिक कचरे से थलीय और जलीय पारितंत्रों का विषाक्त होना।
- विदेशी प्रजातियों का आक्रमण: स्थानीय वातावरण में बाहरी आक्रामक प्रजातियों (जैसे जलकुंभी, लैंटाना और यूकेलिप्टस) के प्रवेश से देशी प्रजातियों का विलुप्त होना।
संरक्षण के उपाय:
1. स्व-स्थाने संरक्षण (In-situ Conservation): जीवों को उनके प्राकृतिक आवास में ही संरक्षित करना; जैसे राष्ट्रीय उद्यानों (National Parks), वन्यजीव अभयारण्यों (Sanctuaries) और बायोस्फीयर रिजर्व की स्थापना।
2. उत्-स्थाने संरक्षण (Ex-situ Conservation): संकटग्रस्त जीवों को उनके मूल स्थान से हटाकर विशेष कृत्रिम केंद्रों में सुरक्षा और प्रजनन कराना; जैसे चिड़ियाघर, वनस्पति उद्यान (Botanical Gardens), जीन बैंक और बीज बैंक।
3. स्थानीय स्तर पर सामाजिक वानिकी और जनभागीदारी से 'पवित्र उपवनों' (Sacred Groves) की रक्षा करना।
प्रकृति ने संसाधनों का वितरण किसी भौगोलिक या राजनीतिक सीमा को देखकर नहीं किया है। कुछ क्षेत्रों में खनिज, वन और जल प्रचुर मात्रा में हैं, जबकि अन्य क्षेत्र अत्यंत निर्धन हैं। इस असमान वितरण के साथ-साथ मानव के असीम लालच ने गंभीर वैश्विक विसंगतियां उत्पन्न कर दी हैं:
- धनी और निर्धन के बीच बढ़ती खाई: विकसित देश और समाज का उच्च वर्ग प्राकृतिक संसाधनों (ऊर्जा, ईंधन, लकड़ी, जल) के 80% भाग का उपभोग कर रहा है, जबकि वैश्विक आबादी के बहुसंख्यक निर्धन वर्ग को अपनी आधारभूत आवश्यकताओं (स्वच्छ पेयजल, स्वच्छ ईंधन) के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।
- संसाधन-जनित युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव: पेट्रोलियम और तेल भंडारों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए पश्चिमी एशिया में दशकों से युद्ध और अशांति की स्थिति बनी हुई है। भविष्य में स्वच्छ जल स्रोतों को लेकर देशों और राज्यों के बीच "जल युद्ध" (Water Wars) की गंभीर आशंका है।
- पर्यावरणीय शरणार्थी (Environmental Refugees): वनों के विनाश, बांधों के निर्माण और जलवायु परिवर्तन जनित सूखे के कारण लाखों आदिवासी और किसान अपनी आजीविका खोकर शहरों की झुग्गी-झोपड़ियों में अमानवीय परिस्थितियों में रहने को विवश हो गए हैं।
- पर्यावरणीय अन्याय: विडंबना यह है कि अत्यधिक प्रदूषण और संसाधनों का दोहन धनी औद्योगिक वर्ग करता है, परंतु उसके दुष्परिणाम (बाढ़, सूखा, वायु प्रदूषण, जलजनित बीमारियां) समाज के निर्धन और वंचित वर्ग को सबसे पहले और सबसे घातक रूप में भुगतने पड़ते हैं।
विश्नोई समुदाय की पृष्ठभूमि: 15वीं शताब्दी में गुरु जंभेश्वर (जाम्भोजी) ने 29 नियमों की एक जीवन पद्धति की स्थापना की, जिसे मानने वाले 'विश्नोई' (बीस+नौ) कहलाए। इन 29 नियमों में हरे वृक्षों को न काटना और सभी जीव-जंतुओं पर दया करना सर्वोपरि धार्मिक कर्तव्य माना गया है। विश्नोई समाज का यह प्रकृति प्रेम केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि उनके रक्त में समाया हुआ है।
खेजड़ली का ऐतिहासिक बलिदान (1731):
जोधपुर के महाराजा अभय सिंह को अपने नए महल के निर्माण हेतु चूने के भट्ठों को पकाने के लिए प्रचुर लकड़ी की आवश्यकता थी। राजा के दीवान गिरधर भंडारी सैनिकों के साथ खेजड़ली गांव पहुंचे जहाँ खेजड़ी (Prosopis cineraria) के घने वृक्ष थे। ग्रामीण महिला अमृता देवी विश्नोई ने सैनिकों का विरोध किया और प्रसिद्ध उद्घोष किया:
"सिर साठे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण" (अर्थात यदि सिर कटवाने के बदले भी एक वृक्ष बच जाए, तो यह सौदा सस्ता ही है)।
अमृता देवी वृक्ष से लिपट गईं और सैनिकों ने निर्ममता से उनका सिर काट दिया। उनकी तीन पुत्रियों (आसू, रत्नी और भागू) ने भी अपनी माता के पदचिह्नों पर चलते हुए पेड़ों से लिपटकर प्राण दे दिए। इस समाचार के फैलते ही 84 गांवों के विश्नोई उमड़ पड़े और एक-एक करके 363 स्त्री-पुरुषों ने वृक्षों की रक्षा में अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। राजा को जब इस वीभत्स नरसंहार का पता चला, तो उन्होंने तुरंत आदेश वापस लिया और संपूर्ण विश्नोई क्षेत्र में वृक्षों की कटाई व शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
आधुनिक पर्यावरण चेतना: आज भी विश्नोई बाहुल्य क्षेत्रों में हिरण, काले हिरण (Blackbuck) और मोर निडर होकर ग्रामीणों के आंगनों में घूमते हैं। विश्नोई महिलाएं अनाथ हिरण के बच्चों को अपने स्तन से दूध पिलाकर पालती हैं। यह समाज संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
भारत विश्व में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। हरित क्रांति के बाद से देश के अधिकांश भागों, विशेषकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भूजल स्तर खतरनाक रूप से पाताल में चला गया है।
भूजल स्तर में गिरावट के मुख्य कारण:
- गहन नलकूप सिंचाई: निशुल्क या सस्ती बिजली के कारण किसानों द्वारा अंधाधुंध शक्तिशाली सबमर्सिबल पंपों से दिन-रात भूजल का दोहन करना।
- नगरीकरण एवं पक्कीकरण: शहरों में कंक्रीट की सड़कें, पक्के फुटपाथ और बहुमंजिला इमारतों के कारण वर्षा जल के रिसकर जमीन में समाने का प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध हो जाना।
- पारंपरिक जलाशयों का विनाश: गांवों और कस्बों के प्राचीन तालाबों, बावड़ियों और पोखरों पर अतिक्रमण कर कॉलोनियां बना देना।
- जल-गहन फसलों की खेती: कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी धान और गन्ने जैसी अत्यधिक जल खपत वाली फसलों का उत्पादन करना।
वैज्ञानिक पुनर्भरण की विधियां:
- छत वर्षा जल संचयन (Rooftop Harvesting): मकानों और भवनों की छतों से गिरने वाले वर्षा जल को पीवीसी पाइपों के माध्यम से एक फिल्टर चैंबर (रेत, बजरी और चारकोल) से गुजारकर सूखे कुओं या बोरवेल में सीधे उतारना।
- पुनर्भरण खाइयां एवं शाफ्ट (Recharge Trenches & Shafts): सड़कों और खुले मैदानों के किनारे 1-2 मीटर चौड़ी और गहरी खाइयां बनाकर उनमें कंकड़-पत्थर भर देना ताकि अपवाह जल तुरंत भूगर्भ में समा जाए।
- चेकडैम एवं गल्ली प्लग (Check Dams & Gully Plugs): मौसमी नालों पर पत्थरों और बोरियों से छोटे अवरोधक बांधना ताकि बहते जल का वेग थमे और वह जमीन में रिस सके।
पर्यावरण संरक्षण केवल सम्मेलनों या सरकारी नीतियों से संभव नहीं है; इसकी शुरुआत प्रत्येक नागरिक के व्यक्तिगत आचरण से होती है। एक व्यावहारिक कार्य-योजना निम्नलिखित है:
1. ऊर्जा संरक्षण के उपाय:
- पारंपरिक बल्बों को हटाकर पूर्णतः फाइव-स्टार रेटेड LED लाइटों और ऊर्जा-दक्ष उपकरणों का प्रयोग करना।
- प्राकृतिक प्रकाश और वेंटिलेशन का अधिकतम उपयोग करना ताकि दिन में लाइट व पंखे न चलाने पड़ें।
- गीजर और एयर कंडीशनर (AC) का सीमित और आवश्यकतानुसार उपयोग (AC का तापमान 24°C-26°C पर सेट करना)।
2. जल संरक्षण के उपाय:
- बाथटब या शावर के स्थान पर बाल्टी और मग से नहाना।
- रसोई में सब्जियां धोने के बाद बचे जल को गमलों और बागवानी में डालना।
- आर.ओ. (RO) वाटर प्यूरीफायर से निकलने वाले रिजेक्ट पानी को पोछा लगाने और बर्तन धोने में उपयोग करना।
- घरों के टपकते नलों और पाइपों की तुरंत मरम्मत कराना।
3. अपशिष्ट प्रबंधन के उपाय:
- रसोई के जैविक कचरे (सब्जी, फलों के छिलके, बची चायपत्ती) को फेंकने के बजाय उससे गमलों के लिए उच्च कोटि की जैविक कम्पोस्ट खाद तैयार करना।
- बाजार जाते समय सदा जूट या कपड़े का झोला साथ रखना; पॉलीथिन थैलियों को पूरी तरह नकारना।
- कागज के दोनों पृष्ठों पर लिखना और डिजिटल दस्तावेजों को प्राथमिकता देना।
4. परिवहन में बदलाव:
- पास के बाजार जाने के लिए मोटरसाइकिल या कार के बजाय पैदल चलना या साइकिल का उपयोग करना।
- लंबी दूरी के लिए कार-पूलिंग या सार्वजनिक परिवहन (मेट्रो, बस) का उपयोग करना।
बिहार की भौगोलिक स्थिति अत्यंत विशिष्ट है। गंगा नदी राज्य को दो भागों में बांटती है। उत्तरी बिहार हिमालयी नदियों (कोशी, गंडक, बागमती) के कारण प्रतिवर्ष विनाशकारी बाढ़ की विभीषिका झेलता है, जबकि दक्षिणी बिहार (गया, नवादा, औरंगाबाद, जमुई) अल्प वर्षा के कारण गंभीर सुखाड़ और गिरते भूजल स्तर से त्रस्त रहता है। इस दोहरी आपदा का स्थायी समाधान पारंपरिक और आधुनिक प्रणालियों के समन्वय में निहित है:
पारंपरिक अहार-पाइन प्रणाली का पुनरुद्धार:
- दक्षिणी बिहार की प्राचीन 'अहार-पाइन' व्यवस्था बाढ़ के अतिरिक्त जल को संचित कर सूखे के समय सिंचाई प्रदान करने का सर्वोत्तम उदाहरण रही है। विगत दशकों में उपेक्षा और गाद जमने के कारण अधिकांश पाइन (नहरें) अवरुद्ध हो गई हैं और अहारों पर अतिक्रमण हो गया है।
- मनरेगा (MGNREGA) और 'जल-जीवन-हरियाली' मिशन के तहत इन पाइन तंत्रों की युद्धस्तर पर गाद उड़ाही (Dredging) कर इन्हें आपस में जोड़ा जाना चाहिए। इससे बाढ़ का पानी स्वतः अहारों में भर जाएगा और सुखाड़ से सुरक्षा मिलेगी।
आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का एकीकरण:
- नदी जोड़ो और नहर नेटवर्क: उत्तरी बिहार की अधिशेष जल वाली नदियों के अतिरिक्त जल को आधुनिक पक्के कैनाल और पाइपलाइन नेटवर्क द्वारा दक्षिणी बिहार के सूखाग्रस्त अहारों और जलाशयों तक मोड़ना।
- रिमोट सेंसिंग एवं जीआईएस (GIS): उपग्रह चित्रों के माध्यम से प्राचीन प्राकृतिक जलधाराओं और जलभराव वाले निम्न क्षेत्रों (वेटलैंड्स/चौर) का मानचित्रण करना और उन्हें पुनर्जीवित करना।
- सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली (Micro-irrigation): संचित जल का अपव्यय रोकने हेतु ड्रिप (टपकन) और स्प्रिंकलर (फव्वारा) सिंचाई पर 90% तक सब्सिडी देकर इसे अनिवार्य बनाना।
निष्कर्ष: यदि बिहार अपने ऐतिहासिक 'अहार-पाइन' ढांचे को आधुनिक हाइड्रोलॉजिकल इंजीनियरिंग, डिसिल्टिंग मशीनों और जन-भागीदारी से जोड़ दे, तो बाढ़ का विनाशकारी अभिशाप राज्य के लिए समृद्धि के वरदान में बदल सकता है।
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