अध्याय 15: हमारा पर्यावरण (Our Environment)
BSEB Class 10 विज्ञान (जीव विज्ञान) | सम्पूर्ण अध्याय नोट्स एवं महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
- ओजोन (O3) का एक अणु ऑक्सीजन के कितने परमाणुओं से मिलकर बनता है? — तीन (3) परमाणुओं से।
- वायुमंडल के किस भाग (परत) में ओजोन परत पाई जाती है? — समताप मंडल (Stratosphere) में।
- ओजोन परत पृथ्वी को सूर्य से आने वाले किस हानिकारक विकिरण से बचाती है? — पराबैंगनी विकिरण (UV Rays) से।
- पराबैंगनी विकिरण के प्रभाव से मनुष्यों में कौन-सा घातक रोग उत्पन्न होता है? — त्वचा कैंसर (Skin Cancer) तथा मोतियाबिंद।
- ओजोन परत के ह्रास (अपक्षय) के लिए उत्तरदायी मुख्य रसायन कौन-सा है? — क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs)।
- CFC का उपयोग मुख्यतः किन उपकरणों में शीतलक के रूप में किया जाता था? — रेफ्रिजरेटर, एसी और अग्निशामक यंत्रों में।
- ओजोन निर्माण का रासायनिक समीकरण क्या है? — O2 →UV O + O तथा O + O2 → O3।
- UNEP का पूर्ण रूप क्या है? — United Nations Environment Programme (संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम)।
- UNEP द्वारा CFC के उत्पादन को 1986 के स्तर पर स्थिर रखने का समझौता किस वर्ष हुआ? — वर्ष 1987 में (मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल)।
- पारितंत्र (Ecosystem) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किसने किया था? — ए. जी. टैंसले (A.G. Tansley) ने (1935 में)।
- किसी पारितंत्र के दो प्रमुख घटक कौन-से होते हैं? — जैविक घटक (Biotic) एवं अजैविक घटक (Abiotic)।
- पारितंत्र के अजैविक घटकों के दो प्रमुख उदाहरण दें। — तापमान, वर्षा, प्रकाश, वायु, मृदा और खनिज।
- हरे पौधे सौर ऊर्जा के कितने प्रतिशत भाग को खाद्य ऊर्जा में बदलते हैं? — लगभग 1% भाग को।
- एक पोषी स्तर से अगले पोषी स्तर में केवल कितने प्रतिशत ऊर्जा स्थानांतरित होती है? — 10% (लिंडेमान का नियम)।
- ऊर्जा स्थानांतरण का '10% का नियम' (Ten Percent Law) किसने प्रतिपादित किया था? — रेमंड लिंडेमान (1942 में)।
- पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह सदैव कैसा होता है? — एकदिशिक (Unidirectional) होता है।
- आहार श्रृंखला में प्रथम पोषी स्तर (T1) पर सदैव कौन उपस्थित होते हैं? — उत्पादक (हरे पौधे एवं नील-हरित शैवाल)।
- शाकाहारी जंतु आहार श्रृंखला के किस पोषी स्तर का निर्माण करते हैं? — द्वितीय पोषी स्तर (T2), प्राथमिक उपभोक्ता।
- मांसाहारी जंतु जो शाकाहारियों का भक्षण करते हैं, कौन-से स्तर पर आते हैं? — तृतीय पोषी स्तर (T3), द्वितीयक उपभोक्ता।
- आहार श्रृंखला में सामान्यतः कितने पोषी स्तर हो सकते हैं? — अधिकतम 3 से 4 पोषी स्तर।
- खाद्य श्रृंखला में पोषी स्तरों की संख्या सीमित क्यों होती है? — क्योंकि प्रत्येक स्तर पर ऊर्जा का भारी ह्रास होता है।
- पारितंत्र में परस्पर जुड़ी हुई अनेक आहार श्रृंखलाओं के जाल को क्या कहते हैं? — आहार जाल (Food Web)।
- मृत जैव अवशेषों और मल-मूत्र का अपघटन करने वाले सूक्ष्मजीव क्या कहलाते हैं? — अपघटक (Decomposers) जैसे जीवाणु व कवक।
- अपघटकों को पर्यावरण का क्या कहा जाता है? — 'प्राकृतिक सफाईकर्मी' (Natural Scavengers)।
- अपघटक जटिल कार्बनिक पदार्थों को किसमें परिवर्तित करते हैं? — सरल अकार्बनिक पदार्थों में।
- आहार श्रृंखला द्वारा हानिकारक अजैव निम्नीकरणीय रसायनों का उत्तरोत्तर सांद्रण क्या कहलाता है? — जैव आवर्धन (Biological Magnification)।
- जैव आवर्धन का सर्वप्रमुख उदाहरण कौन-सा कीटनाशक रसायन है? — DDT (डाइक्लोरो डाइफेनिल ट्राइक्लोरोएथेन)।
- किसी आहार श्रृंखला में जैव आवर्धन का सर्वाधिक सांद्रण किस जीव में होता है? — शीर्ष उपभोक्ता (मानव) में।
- वे पदार्थ जो जैविक प्रक्रम (जीवाणुओं) द्वारा सरलता से अपघटित हो जाते हैं, क्या कहलाते हैं? — जैव निम्नीकरणीय (Biodegradable)।
- जैव निम्नीकरणीय अपशिष्टों के दो उदाहरण दें। — सब्जी के छिलके, कागज, गोबर, सूती कपड़ा।
- वे पदार्थ जिनका सूक्ष्मजीवों द्वारा प्राकृतिक अपघटन नहीं होता, क्या कहलाते हैं? — अजैव निम्नीकरणीय (Non-biodegradable)।
- अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्टों के दो प्रमुख उदाहरण दें। — प्लास्टिक, पॉलीथिन, डीडीटी, कांच, धातुएं।
- प्राकृतिक पारितंत्र के दो उदाहरण दें। — वन (Forest), तालाब (Pond), झील तथा समुद्र।
- मानव-निर्मित (कृत्रिम) पारितंत्र के दो उदाहरण दें। — खेत (Crop field) तथा जलजीवशाला (Aquarium)।
- पारितंत्र का सबसे बड़ा और स्थाई उदाहरण कौन-सा है? — महासागर (Ocean)।
- एक स्थलीय खाद्य श्रृंखला का उदाहरण: घास → हिरण → ? — बाघ (या शेर)।
- एक जलीय खाद्य श्रृंखला का सही क्रम क्या है? — प्लवक (Phytoplankton) → जलीय कीट → छोटी मछली → बड़ी मछली।
- ओजोन दिवस (World Ozone Day) प्रतिवर्ष किस तिथि को मनाया जाता है? — 16 सितंबर को।
- पर्यावरण दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है? — 5 जून को।
- अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत में छिद्र (Ozone Hole) की खोज पहली बार कब हुई? — 1985 में।
- कचरे के भस्मीकरण (Incineration) द्वारा किस प्रकार के अपशिष्ट को नष्ट किया जाता है? — अस्पतालों के जैव-चिकित्सीय कचरे (Biomedical Waste) को।
- कंपोस्टिंग प्रक्रिया द्वारा कचरे को किसमें बदला जाता है? — जैविक खाद (Organic Manure) में।
- रेलगाड़ियों में प्लास्टिक के कप के स्थान पर मिट्टी के कुल्हड़ बंद करने का मुख्य कारण क्या था? — उपजाऊ ऊपरी मिट्टी (Topsoil) का अत्यधिक नुकसान।
- कुल्हड़ के बाद वर्तमान में किसका उपयोग डिस्पोजेबल कप के रूप में सुरक्षित माना गया? — कागज के डिस्पोजेबल कप का।
- हमारे द्वारा उत्पादित कचरे के दो प्रमुख वर्ग कौन-से हैं? — गीला कचरा (जैविक) और सूखा कचरा (अजैविक)।
- सूक्ष्मजीव प्लास्टिक का अपघटन क्यों नहीं कर पाते? — क्योंकि उनके पास प्लास्टिक के विशिष्ट सहसंयोजक बंधों को तोड़ने वाले एंजाइम नहीं होते।
- गहरे समुद्र के पारितंत्र में उत्पादक का कार्य कौन करता है? — रसायन-संश्लेषी जीवाणु (Chemosynthetic Bacteria)।
- यदि किसी खाद्य श्रृंखला से सभी शाकाहारी जीवों को समाप्त कर दिया जाए तो क्या होगा? — उत्पादक अत्यधिक बढ़ जाएंगे और मांसाहारी भूख से मर जाएंगे।
- विश्व पर्यावरण संरक्षण के 3 'R' कौन-से हैं? — Reduce, Reuse, Recycle।
- ओजोन गैस वायुमंडल के निचले स्तर (क्षोभमंडल) पर कैसी गैस मानी जाती है? — एक घातक विष (Lethal Poison) और प्रदूषक।
किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले सभी जीवधारी (पौधे, जंतु, सूक्ष्मजीव) तथा उनके भौतिक पर्यावरण (ताप, जल, वायु, मृदा आदि) परस्पर अन्योन्यक्रिया करके एक स्वतंत्र व स्वपोषी इकाई बनाते हैं, जिसे पारितंत्र कहते हैं।
इसके दो प्रमुख घटक हैं:
1. जैविक घटक: उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक।
2. अजैविक घटक: जलवायुवीय कारक (तापमान, वर्षा, प्रकाश) तथा अकार्बनिक व कार्बनिक पदार्थ (मृदा, लवण, जल, गैसें)।
उत्पादक: वे स्वपोषी जीव (हरे पौधे, नील-हरित शैवाल) जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
उपभोक्ता: वे परपोषी जीव (शाकाहारी, मांसाहारी) जो पोषण के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उत्पादकों पर निर्भर रहते हैं।
अपघटक: वे सूक्ष्मजीव (जीवाणु, कवक) जो मृत जीवों एवं उनके उत्सर्जी पदार्थों को सरल अकार्बनिक तत्वों में तोड़कर पुनः प्रकृति को लौटा देते हैं।
पारितंत्र में विभिन्न जीवों की वह सीधी कड़ी जिसके माध्यम से खाद्य ऊर्जा का स्थानांतरण 'एक जीव से दूसरे जीव' में भक्षण के क्रम में होता है, आहार श्रृंखला कहलाती है।
स्थलीय आहार श्रृंखला का उदाहरण:
घास (उत्पादक) → टिड्डा (प्राथमिक उपभोक्ता) → मेंढक (द्वितीयक उपभोक्ता) → सांप (तृतीयक उपभोक्ता) → बाज (शीर्ष उपभोक्ता)।
आहार श्रृंखला के प्रत्येक चरण या स्तर को पोषी स्तर कहते हैं, जहाँ ऊर्जा का स्थानांतरण होता है।
1. प्रथम पोषी स्तर (T1): उत्पादक (हरे पौधे)।
2. द्वितीय पोषी स्तर (T2): प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी)।
3. तृतीय पोषी स्तर (T3): द्वितीयक उपभोक्ता (छोटे मांसाहारी)।
4. चतुर्थ पोषी स्तर (T4): तृतीयक उपभोक्ता (शीर्ष मांसाहारी)।
सन् 1942 में रेमंड लिंडेमान द्वारा प्रतिपादित इस नियम के अनुसार, एक पोषी स्तर से अगले पोषी स्तर में केवल 10% संचित ऊर्जा ही स्थानांतरित होती है। शेष 90% ऊर्जा जीव के स्वयं के जीवन प्रक्रमों (श्वसन, पाचन, वृद्धि, गति) और ऊष्मा के रूप में पर्यावरण में लुप्त हो जाती है।
10% ऊर्जा नियम के अनुसार, प्रत्येक पोषी स्तर पर ऊर्जा का भारी ह्रास होता है। 3 या 4 चरणों के बाद चौथे अथवा पांचवें स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा की मात्रा इतनी क्षीण (नगण्य) हो जाती है कि वह किसी अन्य जीव के जीवन चक्र और उत्तरजीविता को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं होती। अतः आहार श्रृंखलाएं छोटी होती हैं।
प्रकृति में कोई भी जीव केवल एक ही प्रजाति के जीव पर निर्भर नहीं रहता। किसी पारितंत्र में जब कई आहार श्रृंखलाएं परस्पर एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं, तो वह एक शाखित जाल का रूप ले लेती हैं, जिसे आहार जाल कहते हैं।
महत्व: आहार जाल पारितंत्र को स्थिरता प्रदान करता है; यदि किसी आपदा से एक प्रजाति नष्ट हो जाए तो उपभोक्ताओं के पास भोजन का वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध रहता है।
सूर्य द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा को उत्पादक ग्रहण करते हैं, परंतु यह ऊर्जा पुनः सूर्य को वापस नहीं लौटाई जा सकती। इसी प्रकार, जो ऊर्जा शाकाहारियों में स्थानांतरित हो जाती है, वह कभी वापस स्वपोषी पौधों को नहीं मिल सकती। ऊर्जा सदैव निचले पोषी स्तर से उच्च स्तर की ओर ही बहती है, विपरीत दिशा में कभी नहीं; अतः यह एकदिशिक है।
फसलों को रोगों से बचाने के लिए उपयोग किए जाने वाले अजैव निम्नीकरणीय रसायन (जैसे DDT, कीटनाशक) मिट्टी और जल से होकर पौधों में प्रवेश करते हैं। चूंकि ये रसायन जीवों द्वारा न तो पचते हैं और न ही उत्सर्जित होते हैं, अतः आहार श्रृंखला के प्रत्येक अगले पोषी स्तर पर इनका सांद्रण निरंतर बढ़ता जाता है। इसे जैव आवर्धन कहते हैं।
मनुष्य सर्वाहारी है और अधिकांश आहार श्रृंखलाओं के सबसे शीर्ष पोषी स्तर (Top Consumer) पर स्थित होता है। आहार श्रृंखला के निचले स्तरों से होकर स्थानांतरित होने वाले रासायनिक अवशेष अंततः मानव शरीर में सबसे अधिक सांद्रता में जमा हो जाते हैं, जिससे यकृत, वृक्क और तंत्रिका तंत्र को भारी नुकसान पहुँचता है।
जैव निम्नीकरणीय: वे कार्बनिक पदार्थ जिन्हें जीवाणु और कवक जैसे अपघटक सरल पदार्थों में तोड़ सकते हैं (जैसे—सब्जियों के छिलके, पत्तियां, कागज, मल-मूत्र)। ये पर्यावरण को स्थायी हानि नहीं पहुँचाते।
अजैव निम्नीकरणीय: वे मानव-निर्मित पदार्थ जिनका सूक्ष्मजीवों के एंजाइम द्वारा अपघटन संभव नहीं है (जैसे—प्लास्टिक, कांच, डीडीटी, धातुएं)। ये सैकड़ों वर्षों तक पर्यावरण में प्रदूषण फैलाते हैं।
ओजोन ऑक्सीजन का त्रि-परमाणुक अपररूप (O3) है। वायुमंडल के उच्च स्तर (समताप मंडल) पर सूर्य के उच्च-ऊर्जा पराबैंगनी विकिरण (UV) आण्विक ऑक्सीजन (O2) को स्वतंत्र ऑक्सीजन परमाणुओं (O) में तोड़ देते हैं। यह मुक्त परमाणु तुरंत अन्य ऑक्सीजन अणु से संयुक्त होकर ओजोन का निर्माण करता है:
ओजोन परत सूर्य के प्रकाश में उपस्थित हानिकारक अत्यधिक ऊर्जावान पराबैंगनी (UV-B) विकिरणों को अवशोषित कर लेती है और उन्हें पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से रोकती है। यदि ये विकिरण सीधे धरती पर आएं तो मनुष्यों में त्वचा का कैंसर, आंखों में मोतियाबिंद, प्रतिरक्षा तंत्र का विनाश और पौधों में प्रकाश संश्लेषण की दर घट जाएगी।
जब CFCs वाष्पीकृत होकर समताप मंडल में पहुँचते हैं, तो UV विकिरण उन पर क्रिया करके अत्यंत सक्रिय क्लोरीन मुक्त मूलक (Cl•) उत्पन्न करते हैं। यह अकेला क्लोरीन परमाणु एक उत्प्रेरक की भांति व्यवहार करते हुए ओजोन के लगभग 1,00,000 अणुओं को तोड़कर ऑक्सीजन में बदल देता है:
1980 के दशक में अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत में भयानक छिद्र देखा गया। इसे रोकने के लिए 1987 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के तहत दुनिया के प्रमुख देशों ने एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत सभी उद्योगों के लिए CFCs के उत्पादन को 1986 के स्तर पर ही फ्रीज (स्थिर) कर दिया गया और बाद में इसे पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया गया।
अपघटक मृत पादपों, मृत पशुओं और उत्सर्जी मलों को विघटित कर उनके जटिल अणुओं को कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस जैसे सरल अकार्बनिक तत्वों में बदल देते हैं। ये तत्व मृदा और वायुमंडल में मिलकर पुनः पौधों को उपलब्ध हो जाते हैं। यदि अपघटक न हों, तो पृथ्वी पर मृत शरीरों के विशाल ढेर लग जाएंगे और पोषक तत्वों का चक्रण रुक जाएगा।
यदि किसी एक पोषी स्तर के जीवों को समाप्त कर दिया जाए, तो पारिस्थितिक संतुलन पूर्णतः बिगड़ जाएगा।
उदाहरणार्थ: यदि सभी शाकाहारी जीवों (हिरणों) को मार दिया जाए, तो पौधों को खाने वाला कोई नहीं बचेगा जिससे वनों में असंतुलन होगा; और उच्च मांसाहारी (बाघ) भोजन के अभाव में भूखे मरकर विलुप्त हो जाएंगे।
प्लास्टिक डिस्पोजेबल कप अजैव निम्नीकरणीय हैं जो सैकड़ों वर्षों तक प्रदूषण फैलाते हैं। जब इनके विकल्प के रूप में मिट्टी के कुल्हड़ चलाए गए, तो करोड़ों कुल्हड़ बनाने हेतु खेतों की उपजाऊ ऊपरी मिट्टी (Topsoil) नष्ट होने लगी। अतः कागज के कप सर्वश्रेष्ठ हैं क्योंकि कागज जैव निम्नीकरणीय है और इसका सुरक्षित पुनर्चक्रण संभव है।
भस्मीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें कचरे (विशेष रूप से अस्पतालों के संक्रमित अपशिष्ट, पट्टियां, सुई, सिरिंज और दवाएं) को विशेष भट्टियों में 1000°C से अधिक उच्च तापमान पर नियंत्रित रूप से जलाकर राख (Ash) में बदल दिया जाता है। इससे रोगजनक कीटाणु पूरी तरह जलकर भस्म हो जाते हैं और कचरे का आयतन 90% तक कम हो जाता है।
शहरों से निकलने वाले गैर-पुनर्चक्रण योग्य ठोस कचरे को शहर की सीमा से दूर किसी निचले बंजर इलाके में खोदे गए गहरे खड्डों में बिछाया जाता है। कचरे की परतों को भारी रोलरों से दबाकर ऊपर से मिट्टी की मोटी परत से ढक दिया जाता है। इस वैज्ञानिक प्रक्रिया को सैनिटरी लैंडफिल कहते हैं।
1. मृदा प्रदूषण एवं जल अवरोध: खेतों और शहरों में पॉलीथिन नालियों को जाम कर देती है तथा भूमि में मिलकर जल के रिसाव को रोकती है जिससे भूमिगत जलस्तर घटता है।
2. जीवों की अकाल मृत्यु: सड़कों पर फेंके गए प्लास्टिक कचरे और पॉलीथिन को चारे के साथ खा लेने से मवेशियों (गायों) की आंतें अवरुद्ध हो जाती हैं और उनकी तड़पकर मृत्यु हो जाती है।
जलजीवशाला एक कृत्रिम और अपूर्ण पारितंत्र है, जिसमें प्राकृतिक अपघटक (Decomposers) उपस्थित नहीं होते। मछलियों द्वारा उत्सर्जित अपशिष्ट (अमोनिया, मल) और बिना खाया भोजन जल में जमा होकर विषैला बन जाता है, अतः उसे साफ करना अनिवार्य है। इसके विपरीत तालाब एक प्राकृतिक व पूर्ण पारितंत्र है, जहाँ अपघटक कचरे को निरंतर स्वतः रीसाइकिल करते रहते हैं।
प्राथमिक उपभोक्ता: वे शाकाहारी जीव होते हैं जो सीधे स्वपोषी उत्पादकों (हरे पौधों) को अपना भोजन बनाते हैं (जैसे—गाय, बकरी, टिड्डा)। ये द्वितीय पोषी स्तर पर होते हैं।
द्वितीयक उपभोक्ता: वे छोटे मांसाहारी जीव होते हैं जो पोषण के लिए शाकाहारी जीवों का शिकार करते हैं (जैसे—मेंढक, लोमड़ी, छोटी मछली)। ये तृतीय पोषी स्तर पर होते हैं।
शहरों के गंदे सीवेज जल को सीधे नदियों या झीलों में बहाने से जलीय जीवन नष्ट हो जाता है और महामारी फैलती है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में प्राथमिक (भौतिक छनन), द्वितीयक (जैविक अपघटन) और तृतीयक (रासायनिक क्लोरीनीकरण) विधियों द्वारा गंदे जल को शुद्ध किया जाता है ताकि नदियों का पारिस्थितिक तंत्र स्वस्थ बना रहे।
घरों से निकलने वाले कचरे को स्रोत पर ही दो श्रेणियों में अलग-अलग करना कचरा पृथक्करण कहलाता है:
1. गीला कचरा (हरा डिब्बा): जैविक कचरा, जिससे सीधे जैविक खाद (कम्पोस्ट) बनाई जा सके।
2. सूखा कचरा (नीला डिब्बा): प्लास्टिक, कांच, धातुएं, जिन्हें पुनः चक्रण (Recycling) के लिए भेजा जा सके। यह लैंडफिल का भार घटाने हेतु आवश्यक है।
पारितंत्र (Ecosystem): जैवमंडल की वह मूलभूत संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई जहाँ एक विशिष्ट क्षेत्र के समस्त जीवित जीव अपने निर्जीव भौतिक पर्यावरण के साथ निरंतर अंतःक्रिया करते हैं और ऊर्जा तथा पदार्थों का आदान-प्रदान करते हैं, पारितंत्र कहलाती है।
1. अजैविक घटक (Abiotic Components):
- जलवायुवीय कारक: सूर्य का प्रकाश, तापमान, वर्षा, आर्द्रता तथा पवन जो जीवों की जीवन प्रक्रियाओं को सीधे नियंत्रित करते हैं।
- अकार्बनिक पदार्थ: जल, ऑक्सीजन (O2), कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), नाइट्रोजन तथा खनिज लवण जो विभिन्न जैव-भूरासायनिक चक्रों द्वारा जीवों और पर्यावरण के बीच घूमते रहते हैं।
- कार्बनिक पदार्थ: प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, लिपिड और ह्यूमस जो मृत शरीरों से बनते हैं और मृदा को उपजाऊ बनाते हैं।
2. जैविक घटक (Biotic Components):
- उत्पादक (स्वपोषी): पर्णहरित युक्त हरे पौधे तथा साइनोबैक्टीरिया जो प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अकार्बनिक पदार्थों से कार्बनिक भोजन बनाते हैं:
6CO2 + 6H2O →सूर्य प्रकाश / क्लोरोफिल C6H12O6 + 6O2
- उपभोक्ता (परपोषी): जो भोजन स्वयं नहीं बना सकते। इन्हें चार उप-वर्गों में विभाजित किया जाता है: (क) शाकाहारी (प्राथमिक उपभोक्ता—हिरण, खरगोश), (ख) मांसाहारी (द्वितीयक व तृतीयक उपभोक्ता—मेंढक, बाघ), (ग) सर्वाहारी (मनुष्य, कौवा), (घ) परजीवी (अमरबेल, जूँ, फीताकृमि)।
- अपघटक (मृतोपजीवी): जीवाणु और कवक जो मृत जीवों को सड़ा-गलाकर खनिज तत्वों को पुनः मिट्टी व वायुमंडल में मुक्त कर देते हैं।
पारस्परिक संबंध: अजैविक तत्व उत्पादकों द्वारा ग्रहण किए जाते हैं, उत्पादकों से यह उपभोक्ताओं में जाते हैं और अंततः अपघटकों द्वारा पुनः अजैविक वातावरण को लौटा दिए जाते हैं। इस प्रकार प्रकृति में संतुलन बना रहता है।
लिंडेमान का 10% नियम (1942): किसी पारितंत्र की आहार श्रृंखला में जब ऊर्जा एक पोषी स्तर से अगले उच्च पोषी स्तर में जाती है, तो केवल 10% ऊर्जा ही अगले जीव के शरीर के नए ऊतकों (जैविक भार) में संचित हो पाती है। शेष 90% ऊर्जा का एक बड़ा भाग जीव के उपापचयी कार्यों (जैसे श्वसन, पाचन, गति) में खर्च हो जाता है और कुछ भाग ऊष्मा के रूप में पर्यावरण में अपव्यय हो जाता है।
आहार श्रृंखला: घास (उत्पादक) → टिड्डा (शाकाहारी) → मेंढक (मांसाहारी) → बाज (शीर्ष मांसाहारी)
ऊर्जा की गणना:
- प्रथम पोषी स्तर (T1) - घास (उत्पादक):
उपलब्ध ऊर्जा = 20,000 Joules - द्वितीय पोषी स्तर (T2) - टिड्डा (प्राथमिक उपभोक्ता):
20,000 का 10% = 20,000 × (10 / 100) = 2,000 Joules - तृतीय पोषी स्तर (T3) - मेंढक (द्वितीयक उपभोक्ता):
2,000 का 10% = 2,000 × (10 / 100) = 200 Joules - चतुर्थ पोषी स्तर (T4) - बाज (शीर्ष उपभोक्ता):
200 का 10% = 200 × (10 / 100) = 20 Joules
निष्कर्ष: घास में मौजूद 20,000 जूल में से शीर्ष उपभोक्ता (बाज) तक केवल 20 जूल ऊर्जा ही पहुँच पाती है। यह सिद्ध करता है कि उच्च स्तरों पर ऊर्जा की उपलब्धता अत्यधिक कम हो जाती है।
जैव आवर्धन: फसलों को नाशीजीवों से बचाने हेतु छिड़के जाने वाले हानिकारक अजैव-निम्नीकरणीय कीटनाशकों, पीड़कनाशियों (जैसे DDT) और भारी धातुओं (पारा, सीसा) का आहार श्रृंखला के विभिन्न पोषी स्तरों के माध्यम से उत्तरोत्तर जीवों के शरीर में संचित होते जाना और शीर्ष स्तर पर इसकी सांद्रता का अत्यधिक बढ़ जाना जैव आवर्धन कहलाता है।
जलीय खाद्य श्रृंखला में DDT के सांद्रण का उदाहरण:
- 1. जल में DDT की सांद्रता: लगभग 0.000003 ppm (पार्ट्स पर मिलियन)।
- 2. पादप प्लवक (Phytoplankton): जल से अवशोषण के बाद सांद्रता बढ़कर 0.04 ppm हो जाती है।
- 3. छोटी मछलियाँ (Zooplankton/Small Fish): कई प्लवकों को खाने से सांद्रता 0.5 ppm तक पहुँच जाती है।
- 4. बड़ी मछलियाँ (Large Fish): कई छोटी मछलियों के भक्षण से यह बढ़कर 2 ppm हो जाती है।
- 5. मछली-भक्षी शीर्ष पक्षी (जैसे समुद्री चील/पेलिकन) अथवा मानव: इनके वसीय ऊतकों में DDT का स्तर बढ़कर 25 ppm तक पहुँच जाता है (लगभग 1 करोड़ गुना वृद्धि!)।
घातक प्रभाव: पक्षियों में DDT की उच्च सांद्रता उनके कैल्शियम उपापचय को बाधित कर देती है, जिससे उनके अंडों के कवच (Shell) समय से पूर्व पतले होकर फूट जाते हैं और उनकी आबादी तेजी से गिरने लगती है। मनुष्यों में इससे कैंसर, हार्मोनल असंतुलन, बांझपन और यकृत विकृतियां उत्पन्न होती हैं।
ओजोन (O3) का निर्माण: समताप मंडल में सूर्य के उच्च ऊर्जा वाले पराबैंगनी विकिरण आण्विक ऑक्सीजन (O2) पर टकराकर उसे दो नवजात ऑक्सीजन परमाणुओं में विखंडित कर देते हैं। यह मुक्त परमाणु अत्यधिक क्रियाशील होने के कारण तुरंत आण्विक ऑक्सीजन से मिलकर ओजोन बनाते हैं:
ओजोन का महत्व: यह परत सूर्य से निकलने वाले घातक UV-B विकिरणों के 99% भाग को अवशोषित कर लेती है, जो पृथ्वी के समस्त जीवों के लिए जीवन-रक्षक ढाल है।
क्षरण की रासायनिक क्रियाविधि (Mechanism of Depletion):
मानव निर्मित क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CF2Cl2 या फ्रियॉन) वायुमंडल में नष्ट नहीं होते और समताप मंडल में पहुँच जाते हैं। वहाँ UV विकिरण क्लोरीन के बंध को तोड़कर सक्रिय क्लोरीन परमाणु (Cl•) बनाते हैं:
यह क्लोरीन मुक्त मूलक ओजोन के साथ श्रृंखला अभिक्रिया (Chain Reaction) आरंभ करता है:
इस अभिक्रिया में क्लोरीन मूलक नष्ट नहीं होता बल्कि पुनः मुक्त होकर अन्य ओजोन अणुओं को तोड़ने के लिए स्वतंत्र हो जाता है। एक अकेला क्लोरीन परमाणु लाखों ओजोन अणुओं को नष्ट करने में सक्षम होता है, जिससे ओजोन परत पतली हो जाती है (ओजोन छिद्र)।
कचरा उत्पादन के कारण: बढ़ती जनसंख्या, उपभोक्तावादी जीवनशैली, डिब्बाबंद और रेडी-टू-ईट भोजन का अत्यधिक उपयोग, डिस्पोजेबल प्लास्टिक की वस्तुओं की निर्भरता और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों (E-Waste) के अत्यधिक उपयोग से शहरों में प्रतिदिन हजारों टन ठोस कचरा पैदा हो रहा है।
कचरा निस्तारण की वैज्ञानिक विधियां:
- 1. कम्पोस्टिंग एवं वर्मीकम्पोस्टिंग (Composting): घरों, होटलों और सब्जी मंडियों से निकलने वाले गीले कार्बनिक कचरे को एक गहरे गड्ढे में दबा दिया जाता है। केंचुओं (Eisenia fetida) और जीवाणुओं की सहायता से 60 दिनों में यह कचरा अत्यधिक पोषक जैविक खाद में बदल जाता है, जो खेतों की उर्वरता बढ़ाता है।
- 2. भस्मीकरण (Incineration): अस्पतालों से निकलने वाले अत्यधिक संक्रमित अपशिष्टों (बैंडेज, मानव अंग, इंजेक्शन) को विशेष भट्टियों में 1000°C से ऊपर जलाकर राख में बदला जाता है। इससे रोगजनक सूक्ष्मजीव समूल नष्ट हो जाते हैं और राख को सुरक्षित भूमिगत कर दिया जाता है।
- 3. सैनिटरी लैंडफिल (Sanitary Landfills): गैर-पुनर्चक्रण योग्य सूखे कचरे को शहर से बाहर निचले इलाकों में बिछाया जाता है। भूमिगत जल को दूषित होने से बचाने के लिए गड्ढे के तल पर प्लास्टिक की अभेद्य लाइनिंग बिछाई जाती है। कचरा भरने के बाद ऊपर मिट्टी दबाकर वहां पार्क या खेल के मैदान बनाए जाते हैं।
- 4. पुनः चक्रण (Recycling): प्लास्टिक, कांच, धातु और पुराने कागजों को कबाड़ी के माध्यम से कारखानों में भेजा जाता है। वहां इन्हें गलाकर या प्रक्रमित करके नई वस्तुएं (जैसे पुनर्चक्रित कागज, प्लास्टिक के पाइप) बनाई जाती हैं, जिससे प्राकृतिक संसाधनों की बचत होती है।
| विशेषता | आहार श्रृंखला (Food Chain) | आहार जाल (Food Web) |
|---|---|---|
| संरचना | यह जीवों की एक सीधी और एकल रेखीय कड़ी होती है। | यह अनेक आहार श्रृंखलाओं का एक जटिल और शाखित संजाल होता है। |
| भोजन का विकल्प | एक पोषी स्तर का जीव केवल एक विशिष्ट जीव को ही खाता है; कोई विकल्प नहीं होता। | जीवों के पास भोजन के कई वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध होते हैं। |
| पारितंत्र की स्थिरता | यह पारितंत्र को स्थिरता प्रदान नहीं करती; एक जीव के हटने से श्रृंखला टूट जाती है। | यह पारितंत्र को उच्च स्थिरता प्रदान करता है; एक जीव की कमी से तंत्र नष्ट नहीं होता। |
| पोषी स्तरों की संख्या | पोषी स्तरों की संख्या सीमित (सामान्यतः 3 से 4) होती है। | अनेक स्तर और अनगिनत अंतर-संबंधित कड़ियां पाई जाती हैं। |
अपघटक पारितंत्र के अदृश्य परंतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण 'प्राकृतिक मेहतर' (Scavengers) हैं। यदि किसी आपदा से पृथ्वी के सभी अपघटक (जीवाणु व कवक) नष्ट हो जाएं, तो निम्नलिखित प्रलयंकारी प्रभाव उत्पन्न होंगे:
- मृत शरीरों के विशाल ढेर: जो भी वृक्ष, पत्तियां, जंतु अथवा मनुष्य मरेंगे, उनके शरीर कभी नहीं सड़ेंगे। पृथ्वी की समस्त सतह कुछ ही वर्षों में मृत अवशेषों और मलमूत्र के विशाल पहाड़ों से पट जाएगी और जीवों के चलने-फिरने का स्थान समाप्त हो जाएगा।
- पोषक चक्रण (Biogeochemical Cycles) का ठप होना: पौधों द्वारा मृदा से लिए गए आवश्यक पोषक तत्व (नाइट्रोजन, कार्बन, सल्फर, फास्फोरस) मृत पादपों और जंतुओं के ऊतकों में स्थायी रूप से बंद (Lock) हो जाएंगे। मिट्टी की उर्वरता पूर्णतः समाप्त हो जाएगी क्योंकि नए पोषक तत्व मृदा में कभी लौटेंगे ही नहीं।
- प्रकाश संश्लेषण और उत्पादकों का अंत: जब मिट्टी में नाइट्रोजन और अकार्बनिक लवण नहीं बचेंगे, तो हरे पौधे भोजन नहीं बना पाएंगे और सूखकर नष्ट हो जाएंगे।
- जीवन का पूर्ण विलोपन: पौधों के नष्ट होते ही शाकाहारी भूख से मर जाएंगे और उनके पीछे-पीछे मांसाहारी भी विलुप्त हो जाएंगे। कुछ ही समय में पृथ्वी से जीवन का नामोनिशान मिट जाएगा।
संकट का कारण: प्लास्टिक एक सिंथेटिक बहुलक (Polymer) है जिसके कार्बन-कार्बन सहसंयोजक बंध अत्यधिक मजबूत होते हैं। प्रकृति में ऐसा कोई भी ज्ञात एंजाइम या सूक्ष्मजीव नहीं है जो प्लास्टिक को तेजी से पचा सके। परिणामस्वरूप, मानव द्वारा पिछले 70 वर्षों में निर्मित प्लास्टिक का प्रत्येक टुकड़ा आज भी पर्यावरण में किसी न किसी रूप में विद्यमान है।
प्लास्टिक के गंभीर दुष्परिणाम:
- माइक्रोप्लास्टिक (Microplastics) का खतरा: प्लास्टिक टूटकर 5 मिमी से छोटे कणों में बदल जाता है। ये कण समुद्री मछलियों, नल के पानी और यहाँ तक कि मानव रक्त तथा फेफड़ों में पाए गए हैं, जो गंभीर विषाक्तता और अंतःस्रावी ग्रंथियों में विकृति पैदा कर रहे हैं।
- मृदा की जल पारगम्यता का नाश: खेतों में पॉलीथिन की थैलियां भूमि की जल सोखने की क्षमता को नष्ट कर देती हैं, जिससे फसलें सूखती हैं और भूजल रिचार्ज नहीं हो पाता।
- जहरीली गैसों का उत्सर्जन: खुले में प्लास्टिक जलाने से डायॉक्सीन (Dioxins) और फ्यूरान जैसी अत्यंत कैंसरकारी गैसें निकलती हैं।
वैज्ञानिक विकल्प और प्रयास: कॉर्न स्टार्च (मक्के के मांड) और गन्ने के बगास से बायो-प्लास्टिक (PLA) का निर्माण किया जा रहा है जो 6 महीने में मिट्टी में सड़ जाता है। इसके अतिरिक्त, प्लास्टिक खाने वाले जीवाणु Ideonella sakaiensis के एंजाइमों (PETase) पर गहन शोध जारी है ताकि प्लास्टिक का जैविक अपघटन किया जा सके।
एक वन पारितंत्र में विविध पादप और जंतु प्रजातियां परस्पर एक जटिल जाल द्वारा गुंथी होती हैं। यहाँ कोई भी आहार श्रृंखला स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करती:
उत्पादक स्तर: वन के हरे वृक्ष, झाड़ियां और घास सूर्य के प्रकाश में भोजन बनाते हैं।
उपभोक्ता स्तरों का जटिल अंतर्संबंध:
- घास को खरगोश, टिड्डा और हिरण तीनों खाते हैं।
- टिड्डे को मेंढक भी खा सकता है और गिरगिट या पक्षी भी खा सकते हैं।
- मेंढक को सांप खाता है, और सांप को सीधे गरुड़ या बाज खा लेता है।
- खरगोश को लोमड़ी भी खा सकती है और जंगली कुत्ता या तेंदुआ भी।
- हिरण को भेड़िया, चीता और बाघ सभी अपना शिकार बना सकते हैं।
पारिस्थितिक संतुलन का नियम: यदि किसी वर्ष वन में कीटों की संख्या अचानक बढ़ जाती है, तो मेंढकों और पक्षियों को प्रचुर भोजन मिलता है जिससे उनकी संख्या बढ़ती है और वे कीटों को खाकर पुनः नियंत्रित कर देते हैं। यदि मेंढक कम हो जाएं, तो सांप चूहों और गिलहरियों पर निर्भर होकर अपना जीवन बचा लेते हैं। यह आहार जाल वन को किसी भी प्राकृतिक असंतुलन से स्वतः उबारने (Homeostasis) की अद्भुत क्षमता प्रदान करता है।
ओजोन परत के क्षरण से जब पराबैंगनी किरणें (UV-B) बेरोकटोक पृथ्वी की सतह पर पहुँचती हैं, तो यह सजीवों के डीएनए (DNA) और प्रोटीनों को खंडित कर देती हैं:
- 1. मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव:
• त्वचा की कोशिकाओं का डीएनए म्यूटेट होने से घातक त्वचा कैंसर (Melanoma) का प्रसार।
• आंखों के कॉर्निया को क्षति पहुँचने से मोतियाबिंद (Cataract) तथा असमय अंधापन।
• मानव शरीर के श्वेत रक्त कणिकाओं (WBCs) की कार्यक्षमता घटने से प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System) का कमजोर होना। - 2. कृषि एवं पादपों पर प्रभाव:
• पत्तियों में स्थित क्लोरोफिल नष्ट होने से प्रकाश संश्लेषण की दर 30% से 50% तक घट जाती है।
• फसलों के बीजों का अंकुरण रुक जाता है और पैदावार में भारी गिरावट आती है।
• पादपों के रंध्रों (Stomata) की गति विकृत होने से जल की खपत बढ़ जाती है। - 3. जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव:
• पराबैंगनी किरणें समुद्र की ऊपरी सतह में कई मीटर तक प्रवेश कर जाती हैं, जिससे समुद्री खाद्य श्रृंखला के आधार पादप प्लवकों (Phytoplankton) की मृत्यु हो जाती है।
• मछलियों, केकड़ों और झींगों के लार्वा नष्ट हो जाते हैं, जिससे संपूर्ण वैश्विक मत्स्य उद्योग संकट में पड़ जाता है।
जैव-चिकित्सीय कचरा: अस्पतालों, नर्सिंग होम, पैथोलॉजी लैब और पशु चिकित्सालयों में रोगियों के निदान, उपचार या अनुसंधान के दौरान उत्पन्न होने वाला संक्रामक कचरा (जैसे प्रयुक्त पट्टियां, सुइयां, ब्लेड, मानव अंग, रक्त की थैलियां, एक्सपायर्ड दवाएं) जैव-चिकित्सीय कचरा कहलाता है।
अनुचित निस्तारण के खतरे: खुले में फेंकने से हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी और HIV जैसे असाध्य जानलेवा वायरस फैल सकते हैं। कचरा बीनने वाले बच्चे सुई चुभने से संक्रमित हो सकते हैं और आवारा पशु अंगों को खाकर महामारी फैला सकते हैं।
प्रबंधन की रंग-कोडिंग प्रणाली:
- पीला डिब्बा (Yellow): अत्यधिक संक्रामक जैविक अपशिष्ट जैसे मानव शारीरिक अंग, प्लेसेंटा, रक्त से सनी पट्टियां और रुई। (उपचार: उच्च ताप भस्मीकरण / Incineration)।
- लाल डिब्बा (Red): दूषित प्लास्टिक अपशिष्ट जैसे ड्रिप की बोतलें, कैथेटर, सीरिंज (बिना सुई के), दस्ताने। (उपचार: ऑटोक्लेविंग और रीसाइक्लिंग)।
- सफेद पारदर्शी डिब्बा (White): नुकीली धातुएं जैसे सुइयां, स्कैल्पेल, ब्लेड। (उपचार: श्रेडिंग और गहरी कंक्रीट समाधि)।
- नीला डिब्बा (Blue): कांच की टूटी दवा की शीशियां (Vials) और धातु के प्रत्यारोपण (Implants)। (उपचार: कीटाणुनाशन और रीसाइक्लिंग)।
हरित क्रांति के बाद उपज बढ़ाने के लालच में नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों (यूरिया) और कीटनाशकों (एंडोसल्फान, डीडीटी) का अनियंत्रित उपयोग हुआ, जिसके भयावह पर्यावरणीय परिणाम सामने आए:
- सुपोषण (Eutrophication): खेतों से बहकर आने वाले उर्वरक जब तालाबों में गिरते हैं, तो जल में नाइट्रेट और फास्फेट की मात्रा बढ़ जाती है। इससे शैवालों की अत्यधिक वृद्धि (Algal Bloom) होती है, जो जल की सारी ऑक्सीजन खींच लेते हैं और दम घुटने से मछलियां मर जाती हैं।
- मित्र कीटों का विनाश: रासायनिक जहरों से फसलों के मित्र कीट जैसे केंचुए, मधुमक्खियां और तितलियां समाप्त हो गईं, जिससे फसलों का प्राकृतिक परागण ठप हो गया।
- भूमिगत जल का संदूषण: नाइट्रेट रिसकर कुओं और बोरवेल के जल में मिलकर बच्चों में 'ब्लू बेबी सिंड्रोम' (Methemoglobinemia) नामक जानलेवा रोग उत्पन्न करता है।
जैविक खेती द्वारा समाधान: जैविक खेती में रासायनिक जहरों के स्थान पर गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद (ढैंचा), नीम की खली और जैव-उर्वरकों (राइजोबियम, एजोटोबैक्टर) का प्रयोग किया जाता है। कीट नियंत्रण हेतु नीम का काढ़ा और जैविक परभक्षियों का उपयोग होता है। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनी रहती है, जैव आवर्धन नहीं होता और मनुष्य को विष-मुक्त पौष्टिक आहार प्राप्त होता है।
वायुमंडल में गैसों का संतुलन उत्पादकों और अपघटकों की विपरीत परंतु पूरक प्रक्रियाओं पर टिका हुआ है:
1. उत्पादकों (हरे पौधों) की भूमिका:
- हरे पौधे सौर ऊर्जा की सहायता से वायुमंडल की अकार्बनिक कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को अवशोषित करके कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज C6H12O6) के रूप में कार्बन को 'स्थिर' (Fix) करते हैं।
- इस प्रकाश-रासायनिक अभिक्रिया के दौरान जल का प्रकाशीय अपघटन (Photolysis) होता है, जिससे शुद्ध आण्विक ऑक्सीजन (O2) वायुमंडल में मुक्त होती है, जो सभी जीवों के श्वसन का आधार है।
2. उपभोक्ताओं एवं अपघटकों की भूमिका:
- जंतु श्वसन क्रिया में ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और भोजन के ऑक्सीकरण द्वारा पुनः CO2 निष्कासित करते हैं।
- जब पादप और जंतु मर जाते हैं, तो उनके शरीर में बंद विशाल कार्बनिक कार्बन को अपघटक (जीवाणु) कोशिकीय अपघटन द्वारा तोड़कर गैसीय CO2 के रूप में वापस वायुमंडल को लौटा देते हैं।
निष्कर्ष: यदि उत्पादक न हों तो ऑक्सीजन समाप्त हो जाएगी और वायुमंडल में CO2 का दमघोंटू भंडार जमा हो जाएगा। यदि अपघटक न हों तो सारा कार्बन मृत शरीरों में हमेशा के लिए कैद हो जाएगा और प्रकाश संश्लेषण हेतु पौधों को कार्बन नहीं मिलेगा। अतः दोनों मिलकर वायुमंडलीय संतुलन बनाए रखते हैं।
शून्य अपशिष्ट (Zero Waste) का लक्ष्य तभी प्राप्त किया जा सकता है जब हम 5-R सिद्धांतों को अपनी दैनिक आदतों में शामिल करें:
1. विद्यालय स्तर पर रणनीतियां:
- प्लास्टिक-मुक्त परिसर: विद्यालय की कैंटीन में डिस्पोजेबल प्लेट्स, कप और प्लास्टिक बोतलों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध। सभी छात्रों के लिए स्टील की पानी की बोतलें और टिफिन अनिवार्य करना।
- कागज का मितव्ययी उपयोग: डिजिटल असाइनमेंट को बढ़ावा देना। उत्तर पुस्तिकाओं और रफ कार्य हेतु एकतरफा इस्तेमाल हो चुके कागजों (One-side blank papers) की बाइंडिंग कराकर नोटबुक बनाना।
- स्कूल कम्पोस्ट पिट: दोपहर के भोजन के बचे छिलकों, जूठन और बगीचे की सूखी पत्तियों को स्कूल के एक कोने में बने कम्पोस्ट गड्ढे में डालकर खाद बनाना, जिसका उपयोग स्कूल की फुलवारी में किया जाए।
2. घरेलू स्तर पर रणनीतियां:
- कचरा पृथक्करण: घर में दो कूड़ेदान रखना—हरा (गीला जैविक कचरा) और नीला (सूखा पुनर्चक्रण योग्य कचरा)।
- थैला संस्कृति: बाजार या सब्जी मंडी जाते समय सदैव घर से मजबूत सूती या जूट का झोला साथ ले जाना।
- रीयूज एवं रीपर्पज: पुराने कपड़ों से थैले, पोछा और डस्टर बनाना। प्लास्टिक और कांच के खाली डिब्बों का उपयोग पौधे उगाने अथवा रसोई में सामग्री रखने हेतु करना।
सामान्य जनमानस में यह भारी भ्रांति है कि ओजोन छिद्र के कारण ही ग्लोबल वॉर्मिंग हो रही है या दोनों एक ही समस्या हैं। वास्तव में ये दोनों पूर्णतः भिन्न वायुमंडलीय परिघटनाएं हैं:
| तुलना का आधार | ग्लोबल वॉर्मिंग (भूमंडलीय तापन) | ओजोन परत अपक्षय (Ozone Hole) |
|---|---|---|
| वायुमंडलीय क्षेत्र | यह सबसे निचली परत क्षोभमंडल (Troposphere) की घटना है। | यह ऊपरी परत समताप मंडल (Stratosphere) की घटना है। |
| मुख्य उत्तरदायी कारक | ग्रीनहाउस गैसें: कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मीथेन (CH4), नाइट्रस ऑक्साइड। | क्लोरीन और ब्रोमीन युक्त रसायन: क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), हैलोन। |
| क्रियाविधि | ग्रीनहाउस गैसें पृथ्वी से परावर्तित होने वाली अवरक्त (Infrared) उष्मीय विकिरणों को अवशोषित कर तापमान बढ़ाती हैं। | CFCs सूर्य से आने वाली पराबैंगनी (UV-B) किरणों को सोखने वाली ओजोन परत को रासायनिक रूप से नष्ट करते हैं। |
| प्राथमिक प्रभाव | वैश्विक तापमान बढ़ना, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र का जलस्तर उठना और अनियंत्रित बाढ़-सूखा। | घातक UV विकिरण सीधे पृथ्वी पर पहुँचने से त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद और आनुवंशिक उत्परिवर्तन होना। |
वैज्ञानिक स्पष्टीकरण: ओजोन परत का पतला होना सीधे तौर पर पृथ्वी के तापमान को नहीं बढ़ाता; इसका मुख्य खतरा विकिरण जनित जैविक बीमारियों से है। यद्यपि CFC गैसें दोनों समस्याओं में योगदान देती हैं, परंतु दोनों के घटित होने का विज्ञान और वायुमंडलीय क्षेत्र पूरी तरह अलग हैं।
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