अध्याय 14: ऊर्जा के स्रोत (Sources of Energy)
BSEB Class 10 विज्ञान (भौतिकी) | सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री एवं महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरी
- किसी भी अच्छे ईंधन का उष्मीय मान (Calorific Value) कैसा होना चाहिए? — उच्च (High) होना चाहिए।
- एक अच्छे ईंधन का ज्वलन ताप (Ignition Temperature) कैसा होना चाहिए? — मध्यम (न बहुत कम, न बहुत अधिक)।
- बायोगैस (जैव गैस) का सर्वप्रमुख रासायनिक घटक क्या है? — मीथेन (CH4), लगभग 75%।
- बायोगैस में मीथेन के अतिरिक्त पाई जाने वाली अन्य गैसें कौन-सी हैं? — कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), हाइड्रोजन (H2) तथा हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S)।
- लकड़ी को सीमित वायु की आपूर्ति में जलाने पर क्या अवशेष प्राप्त होता है? — चारकोल (Charcoal)।
- चारकोल लकड़ी की तुलना में श्रेष्ठ ईंधन क्यों है? — क्योंकि यह बिना धुएं के जलता है और इसका उष्मीय मान अधिक होता है।
- पवन चक्की से विद्युत उत्पादन हेतु वायु की न्यूनतम चाल कितनी होनी चाहिए? — लगभग 15 km/h।
- विश्व में 'पवनों का देश' (Country of Winds) किसे कहा जाता है? — डेनमार्क (Denmark) को।
- भारत में विशालतम पवन ऊर्जा फार्म कहाँ स्थापित किया गया है? — तमिलनाडु में कन्याकुमारी के निकट (क्षमता: 380 MW)।
- सौर सेल (Solar Cell) बनाने के लिए किस अर्धचालक तत्व का मुख्य रूप से प्रयोग किया जाता है? — सिलिकॉन (Si)।
- सौर सेलों को जोड़कर सौर पैनल बनाने में किस धातु का प्रयोग संयोजक तार के रूप में होता है? — चांदी (Ag)।
- धूप में रखने पर एक मानक सौर सेल कितनी वोल्टता (V) उत्पन्न करता है? — 0.5 से 1.0 V।
- एक एकल सौर सेल द्वारा लगभग कितनी विद्युत शक्ति उत्पन्न की जा सकती है? — लगभग 0.7 Watt।
- सौर कुकर के बक्से की आंतरिक सतह को काले रंग से क्यों रंगा जाता है? — क्योंकि काला रंग उष्मा का सर्वोत्तम अवशोषक होता है।
- सौर कुकर के ढक्कन पर प्रयुक्त कांच की पट्टी का मुख्य कार्य क्या है? — ग्रीनहाउस प्रभाव उत्पन्न कर उष्मा को अंदर रोके रखना।
- सौर कुकर में सूर्य की किरणों को केंद्रित करने के लिए किस दर्पण का प्रयोग किया जाता है? — समतल अथवा अवतल दर्पण।
- साधारण बॉक्स-नुमा सौर कुकर के अंदर 2-3 घंटे में कितना तापमान प्राप्त हो जाता है? — 100°C से 140°C तक।
- OTEC का पूर्ण विस्तारित नाम क्या है? — Ocean Thermal Energy Conversion (सागरीय तापीय ऊर्जा रूपांतरण)।
- OTEC संयंत्र को संचालित करने के लिए सतह तथा 2 km गहराई के जल में न्यूनतम तापान्तर कितना होना चाहिए? — 20°C या उससे अधिक।
- OTEC विद्युत संयंत्रों में टर्बाइन चलाने के लिए किस वाष्पशील द्रव का प्रयोग किया जाता है? — तरल अमोनिया (NH3)।
- पृथ्वी के आंतरिक तप्त स्थलों (Hot Spots) से प्राप्त उष्मा से उत्पन्न ऊर्जा क्या कहलाती है? — भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal Energy)।
- विश्व में भू-तापीय ऊर्जा पर आधारित सर्वाधिक विद्युत संयंत्र किन देशों में हैं? — न्यूजीलैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)।
- नाभिकीय विखंडन में यूरेनियम के किस समस्थानिक पर धीमे न्यूट्रॉनों की बमबारी की जाती है? — यूरेनियम-235 (23592U)।
- अल्बर्ट आइंस्टीन का द्रव्यमान-ऊर्जा तुल्यता समीकरण क्या है? — E = Δm × c2 (जहाँ c = 3 × 108 m/s)।
- परमाणु द्रव्यमान इकाई (1 amu / 1 u) के तुल्य कितनी ऊर्जा मुक्त होती है? — लगभग 931 MeV।
- सूर्य एवं अन्य तारों में अपार ऊर्जा की उत्पत्ति किस प्रक्रिया द्वारा होती है? — नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) द्वारा।
- हाइड्रोजन बम किस नाभिकीय अभिक्रिया पर आधारित है? — अनियंत्रित नाभिकीय संलयन पर।
- परमाणु बम (Nuclear Bomb) किस अभिक्रिया के सिद्धांत पर आधारित है? — अनियंत्रित नाभिकीय विखंडन पर।
- नाभिकीय विखंडन रिएक्टर में न्यूट्रॉनों की गति को मंद करने हेतु किसका प्रयोग होता है? — भारी जल (D2O) अथवा ग्रेफाइट।
- नाभिकीय रिएक्टर में विखंडन दर को नियंत्रित करने वाली छड़ें किसकी बनी होती हैं? — कैडमियम (Cd) अथवा बोरॉन (B)।
- जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) किस प्रकार के ऊर्जा स्रोत हैं? — अनवीकरणीय (Non-renewable) ऊर्जा स्रोत।
- जल विद्युत संयंत्र में जल की किस ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित किया जाता है? — गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा को।
- भारत की कुल विद्युत ऊर्जा मांग का लगभग कितना प्रतिशत भाग जल विद्युत संयंत्रों से पूरा होता है? — लगभग 25% (एक-चौथाई)।
- तापीय विद्युत संयंत्र (Thermal Power Plant) में कोयला जलाकर पहले क्या उत्पन्न किया जाता है? — उच्च दाब वाली भाप (Steam)।
- प्राकृतिक गैस का मुख्य घटक कौन-सा हाइड्रोकार्बन है? — मीथेन (CH4)।
- एलपीजी (LPG) का मुख्य रासायनिक घटक क्या है? — ब्यूटेन (C4H10)।
- एलपीजी के रिसाव की पहचान के लिए उसमें कौन-सा गंधयुक्त यौगिक मिलाया जाता है? — एथिल मरकैप्टन (C2H5SH)।
- जीवाश्म ईंधनों के दहन से उत्पन्न अम्लीय ऑक्साइड कौन-से हैं? — SO2 और NO2।
- ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी गैस कौन-सी है? — कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)।
- ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy) का दोहन सागर के किस भाग पर बांध बनाकर किया जाता है? — संकीर्ण खाड़ी (मुहाने) पर।
- सौर स्थिरांक (Solar Constant) का सन्निकट मान कितना है? — लगभग 1.4 kW/m2।
- बायोगैस संयंत्र से निकलने वाली स्लरी (Slurry) में किन पोषक तत्वों की प्रचुरता होती है? — नाइट्रोजन (N) तथा फास्फोरस (P)।
- सीएनजी (CNG) का पूर्ण रूप क्या है? — Compressed Natural Gas (संपीड़ित प्राकृतिक गैस)।
- भारत में स्थित तारापुर परमाणु ऊर्जा केंद्र किस राज्य में है? — महाराष्ट्र में।
- राणा प्रताप सागर परमाणु विद्युत गृह किस राज्य में स्थित है? — राजस्थान (कोटा) में।
- कलपक्कम परमाणु ऊर्जा संयंत्र किस राज्य में स्थित है? — तमिलनाडु में।
- नरोरा नाभिकीय विद्युत संयंत्र किस राज्य में स्थित है? — उत्तर प्रदेश में।
- काकरापार परमाणु ऊर्जा केंद्र किस राज्य में अवस्थित है? — गुजरात में।
- कैगा नाभिकीय विद्युत संयंत्र भारत के किस राज्य में है? — कर्नाटक में।
- ऊर्जा संरक्षण का सार्वत्रिक नियम क्या कहता है? — ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट; केवल रूपांतरित हो सकती है।
ऊर्जा का उत्तम स्रोत वह है जो:
1. प्रति एकांक आयतन अथवा प्रति एकांक द्रव्यमान अधिक कार्य करे (उच्च कैलोरी मान)।
2. जो सरलता से उपलब्ध और सुलभ हो।
3. जिसके भंडारण तथा परिवहन में सुगमता और सुरक्षा हो।
4. जो सस्ता हो और जिसके उपयोग से न्यूनतम प्रदूषण उत्पन्न हो।
जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम) की प्रमुख हानियाँ हैं:
1. वायु प्रदूषण: इनके दहन से सल्फर व नाइट्रोजन के अम्लीय ऑक्साइड (SO2, NO2) निकलते हैं, जो अम्लीय वर्षा कराते हैं।
2. ग्लोबल वॉर्मिंग: भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) निकलने से पौधा-घर प्रभाव बढ़ता है।
3. सीमित भंडार: ये अनवीकरणीय स्रोत हैं, जो अत्यधिक दोहन के कारण निकट भविष्य में समाप्त हो जाएंगे।
जल विद्युत संयंत्र में ऊंचे बांधों में रोके गए वर्षा अथवा नदी के जल में गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा संचित होती है। जब इस जल को पाइपों के माध्यम से तीव्र वेग से नीचे गिराया जाता है, तो स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में बदल जाती है। यह तीव्र गतिज ऊर्जा टर्बाइन के पंखों को घुमाती है, जिससे जनरेटर द्वारा गतिज ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित हो जाती है।
जब लकड़ी को वायु की सीमित मात्रा में गर्म किया जाता है, तो उसमें उपस्थित वाष्पशील पदार्थ और नमी बाहर निकल जाते हैं और अवशेष के रूप में चारकोल बचता है। चारकोल लकड़ी से श्रेष्ठ है क्योंकि:
1. यह बिना ज्वाला और बिना धुएं के जलता है (प्रदूषण-मुक्त)।
2. इसका उष्मीय मान लकड़ी से कहीं अधिक होता है।
बायोगैस संयंत्र में गोबर और जल के अवायवीय किण्वन के पश्चात बची स्लरी में से केवल कार्बनिक भाग ही गैसीकृत होता है। इसमें नाइट्रोजन (N) और फास्फोरस (P) जैसे महत्वपूर्ण पादप पोषक तत्व अत्यधिक सांद्रित रूप में सुरक्षित बचे रहते हैं। अतः यह रासायनिक खादों की तुलना में मृदा की संरचना सुधारने वाली उत्कृष्ट जैविक खाद है।
पवन ऊर्जा फार्म की प्रमुख सीमाएं निम्नलिखित हैं:
1. यह केवल उन्हीं क्षेत्रों में लगाया जा सकता है जहां वर्ष के अधिकांश दिनों में पवन की चाल न्यूनतम 15 km/h से अधिक हो।
2. 1 MW विद्युत उत्पादन हेतु लगभग 2 हेक्टेयर विशाल भूखंड की आवश्यकता होती है।
3. प्रारंभिक स्थापना लागत अत्यधिक होती है तथा आंधी-तूफान व वर्षा के कारण टर्बाइनों में टूट-फूट का खतरा बना रहता है।
कांच की शीट सूर्य से आने वाले लघु तरंगदैर्घ्य के प्रकाश और ऊष्मीय विकिरणों को बक्से के अंदर सरलता से प्रवेश करने देती है। परंतु जब बक्से की काली सतह गर्म होकर दीर्घ तरंगदैर्घ्य वाले अवरक्त (Infrared) विकिरण उत्सर्जित करती है, तो कांच की शीट उन्हें बाहर जाने से रोक देती है। इस प्रकार उत्पन्न ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण बक्से का ताप 100°C–140°C तक बढ़ जाता है।
सौर सेल एक ऐसी युक्ति है जो प्रकाश-विद्युत प्रभाव द्वारा सौर ऊर्जा को सीधे दिष्ट धारा (DC) विद्युत में बदल देती है।
लाभ:
1. इनमें कोई गतिमान पुर्जा नहीं होता, अतः रख-रखाव का खर्च नगण्य है।
2. इन्हें सुदूर, बीहड़ और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में सरलता से लगाया जा सकता है जहां बिजली की लाइनें बिछाना असंभव है।
सौर सेल बनाने के लिए आवश्यक विशेष ग्रेड के अति-शुद्ध सिलिकॉन (Si) की उपलब्धता सीमित और अत्यधिक महंगी है। इसके अतिरिक्त, कई सौर सेलों को आपस में जोड़कर सौर पैनल का रूप देने के लिए संयोजक तार के रूप में चांदी (Ag) का प्रयोग किया जाता है, जिससे इसके निर्माण की प्रारंभिक लागत बहुत बढ़ जाती है।
समुद्र की सतह का जल सूर्य द्वारा गर्म हो जाता है जबकि 2 किलोमीटर तक की गहराई का जल अत्यंत ठंडा रहता है। यदि इन दोनों परतों में तापमान का अंतर 20°C या अधिक हो, तो सतह के गर्म जल से कम क्वथनांक वाले द्रव जैसे अमोनिया (NH3) को उबाला जाता है। बनी वाष्प से टर्बाइन घुमाकर विद्युत जनरेट की जाती है, और ठंडे जल से वाष्प को पुनः द्रवित किया जाता है।
भौमिकीय परिवर्तनों के कारण पृथ्वी की गहराई में स्थित तप्त चट्टानें पिघलकर ऊपर उठती हैं और कुछ क्षेत्रों में एकत्र हो जाती हैं, जिन्हें तप्त स्थल (Hot Spots) कहते हैं। जब भूमिगत जल इन तप्त स्थलों के संपर्क में आता है, तो उच्च दाब पर भाप बनती है। इस भाप को चट्टानों में पाइप डालकर बाहर निकाला जाता है और टर्बाइन चलाकर विद्युत उत्पन्न की जाती है।
वह नाभिकीय अभिक्रिया जिसमें एक भारी रेडियोएक्टिव नाभिक (जैसे 23592U) पर कम ऊर्जा वाले धीमे न्यूट्रॉन की बमबारी की जाती है, तो वह दो लगभग समान मध्यम नाभिकों में टूट जाता है और विशाल मात्रा में ऊर्जा तथा न्यूट्रॉन उत्सर्जित होते हैं।
जब दो अत्यंत हल्के नाभिक (जैसे हाइड्रोजन के समस्थानिक) आपस में जुड़कर एक भारी नाभिक (हीलियम) का निर्माण करते हैं, तो उसे नाभिकीय संलयन कहते हैं। धनावेशित नाभिकों के बीच अत्यधिक स्थिरवैद्युत प्रतिकर्षण बल कार्य करता है। इस प्रतिकर्षण को पार कर नाभिकों को परस्पर संलयित करने हेतु करोड़ों डिग्री तापमान (∼ 107 K) और अत्यधिक उच्च दाब की आवश्यकता होती है।
नाभिकीय संयंत्रों की मुख्य चिंता विखंडन के बाद बचे रेडियोधर्मी अपशिष्ट का सुरक्षित भंडारण और निपटान है। इन अपशिष्टों से निकलने वाले हानिकारक विकिरण (α, β, γ) कई हजार वर्षों तक जीवित रहते हैं, जिससे कैंसर, अनुवांशिक उत्परिवर्तन (Genetic Mutations) और पर्यावरण विनाश का भारी जोखिम बना रहता है।
नवीकरणीय स्रोत: वे स्रोत जो प्रकृति में निरंतर बनते रहते हैं और जिनका कभी क्षय नहीं होता (जैसे—सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा)।
अनवीकरणीय स्रोत: वे स्रोत जिनके भंडार सीमित हैं और जिन्हें दोबारा बनने में करोड़ों वर्ष लगते हैं, अतः उपयोग के साथ समाप्त हो जाते हैं (जैसे—कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस)।
लाभ: 1. ईंधन पर कोई खर्च नहीं होता (शून्य लागत)। 2. भोजन के पोषक तत्व धीमी आंच पर पकने के कारण नष्ट नहीं होते।
सीमाएं: 1. इसका उपयोग रात्रि में अथवा बादलों वाले दिनों में नहीं किया जा सकता। 2. इसमें भोजन को तला (Frying) या रोटी सेकी नहीं जा सकती।
चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण सागर में प्रतिदिन ज्वार-भाटा (उभार और गिरावट) आते हैं। समुद्र के किसी संकीर्ण मुहाने पर बांध बनाकर उच्च ज्वार के समय जल को रोक लिया जाता है। जब जल बांध के द्वारों से अंदर या बाहर बहता है, तो रास्ते में लगे टर्बाइन घूमते हैं और जनरेटर विद्युत उत्पादन करता है।
तरंग ऊर्जा का व्यावसायिक दोहन केवल वहीं व्यावहारिक है जहां समुद्र तट पर चलने वाली पवनें अत्यंत प्रबल हों और तरंगे अत्यंत शक्तिशाली हों। इसके अतिरिक्त, समुद्र के खारे पानी से संयंत्र के यांत्रिक पुर्जों में जंग (Corrosion) लगना और समुद्री तूफानों से उपकरणों की सुरक्षा करना बहुत खर्चीला होता है।
समान दूरी तक कोयले अथवा भारी पेट्रोलियम ईंधन के रेल या सड़क मार्ग द्वारा परिवहन की तुलना में विद्युत ऊर्जा का संचरण लाइनों (Wires) द्वारा तारों से करना कहीं अधिक सस्ता, सुगम और ऊर्जा-दक्ष होता है। अतः परिवहन व्यय कम करने के लिए इन संयंत्रों को खदानों के समीप स्थापित किया जाता है।
बायोगैस एक धुआं-रहित ईंधन है जिसमें 75% मीथेन होती है। इसका उष्मीय मान उच्च होता है, यह जलने पर कोई राख या कालिख नहीं छोड़ती और इसे पाइपों द्वारा सीधे रसोईघर के चूल्हों तक सुरक्षित रूप से पहुंचाया जा सकता है। यह ग्रामीण स्वच्छता बनाए रखने में भी सहायक है।
वास्तव में ऊर्जा का कोई भी स्रोत 100% प्रदूषण-मुक्त नहीं हो सकता। यद्यपि सौर सेल या पवन चक्की कार्य करते समय कोई प्रदूषण उत्सर्जित नहीं करते, परंतु सौर सेल के लिए शुद्ध सिलिकॉन प्राप्त करने और पवन चक्की के भारी ढांचे के औद्योगिक निर्माण के दौरान पर्यावरण को व्यापक नुकसान और कार्बन उत्सर्जन होता है।
सीएनजी का मुख्य घटक मीथेन (CH4) है। इसके पूर्ण दहन से केवल CO2 और जलवाष्प बनते हैं। इसमें सल्फर और लेड जैसे हानिकारक तत्व नहीं होते, जिससे वाहनों से सल्फर डाइऑक्साइड या शीशे का उत्सर्जन नहीं होता। यह इंजन में कार्बन जमा नहीं होने देती और अपेक्षाकृत बहुत सस्ती है।
लाभ: हाइड्रोजन (H2) का उष्मीय मान संसार में सर्वाधिक (लगभग 150 kJ/g) है और इसका दहन उत्पाद केवल जल (H2O) है, जो पूर्णतः प्रदूषण रहित है।
सीमा: हाइड्रोजन गैस अत्यंत विस्फोटक और ज्वलनशील है; इसका सुरक्षित भंडारण और परिवहन अत्यंत कठिन तथा अत्यधिक तकनीकी रूप से जटिल है।
नाभिकीय विखंडन अथवा संलयन में, अभिक्रिया के पश्चात उत्पादों का कुल द्रव्यमान प्रारंभिक अभिकारकों के कुल द्रव्यमान से थोड़ा कम होता है। इस द्रव्यमान अंतर को द्रव्यमान क्षति (Δm) कहते हैं। आइंस्टीन के समीकरण E = Δm × c2 के अनुसार यही लुप्त द्रव्यमान विशाल ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है।
बढ़ती ऊर्जा मांग की पूर्ति हेतु जीवाश्म ईंधनों के दहन से वायु प्रदूषण, अम्लीय वर्षा और ओजोन परत क्षरण जैसी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। इसे कम करने हेतु हमें ऊर्जा दक्षता बढ़ानी होगी, अनावश्यक ऊर्जा अपव्यय रोकना होगा और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाकर अक्षय ऊर्जा स्रोतों को अपनाना होगा।
बायोगैस (जैव गैस): विभिन्न जैव-मात्रा (जैसे गोबर, वनस्पति अपशिष्ट, सीवेज आदि) के ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में सूक्ष्मजीवों द्वारा अवायवीय अपघटन के फलस्वरूप उत्पन्न गैसों के मिश्रण को बायोगैस कहते हैं। इसका प्रमुख अवयव मीथेन (CH4 75%) है।
संयंत्र की संरचना: गुंबदनुमा बायोगैस संयंत्र ईंटों और सीमेंट से बना एक भूमिगत ढांचा होता है, जिसके मुख्य भाग हैं:
- मिश्रण कक्ष (Mixing Tank): जमीन के ऊपर स्थित वह कक्ष जहाँ गोबर और जल को 1:1 के समान अनुपात में मिलाकर गाढ़ा घोल (Slurry) बनाया जाता है।
- प्रवेश कक्ष (Inlet Chamber): ढलानदार मार्ग जिससे स्लरी संपाचित्र (डाइजेस्टर) के पेंदे तक पहुंचती है।
- संपाचित्र (Digester): यह एक सीलबंद भूमिगत कमरा होता है जिसमें ऑक्सीजन का पूर्ण अभाव होता है। यहाँ अवायवीय जीवाणु कार्य करते हैं।
- गैस गुंबद (Gas Dome): संपाचित्र के ऊपर ईंटों से बना उल्टे प्याले के आकार का गुंबद जहाँ उत्पन्न गैस एकत्रित होती है। इसके शीर्ष पर गैस वाल्व युक्त निकास पाइप लगा होता है।
- निर्गम कक्ष एवं निकास कुंड (Outlet Tank): प्रयुक्त हो चुकी शेष पोषक स्लरी को बाहर निकालने का मार्ग।
कार्यप्रणाली एवं जैव-रासायनिक प्रक्रम:
गोबर और जल के मिश्रण को संपाचित्र में भरकर छोड़ दिया जाता है। वायु की अनुपस्थिति में अवायवीय सूक्ष्मजीव जटिल कार्बनिक यौगिकों (कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा) को पहले कार्बनिक अम्लों में और अंततः मीथेन (CH4), कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), हाइड्रोजन (H2) तथा हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S) गैस में विघटित कर देते हैं। कुछ ही दिनों में गुंबद में गैस का दबाव बढ़ जाता है, जो बची हुई स्लरी को निर्गम कक्ष की ओर धकेल देता है।
विखंडन एवं संलयन में तुलना:
- प्रक्रिया: नाभिकीय विखंडन में एक भारी नाभिक (जैसे 23592U) दो हल्के नाभिकों में टूटता है; जबकि नाभिकीय संलयन में दो अत्यंत हल्के नाभिक (जैसे 21H + 31H) मिलकर भारी हीलियम नाभिक बनाते हैं।
- तापमान की आवश्यकता: विखंडन सामान्य कमरे के ताप पर धीमे न्यूट्रॉन द्वारा आरंभ हो सकता है; संलयन हेतु 107 K के अति-उच्च तापमान की आवश्यकता होती है।
- ऊर्जा उत्पादन: संलयन में प्रति इकाई द्रव्यमान मुक्त ऊर्जा विखंडन की तुलना में कई गुना अधिक होती है।
- रेडियोधर्मी अपशिष्ट: विखंडन में खतरनाक रेडियोधर्मी अपशिष्ट बचते हैं; संलयन के उत्पाद (हीलियम) पर्यावरण के लिए पूर्णतः सुरक्षित होते हैं।
नाभिकीय रिएक्टर की कार्यविधि:
रिएक्टर के क्रोड में यूरेनियम की छड़ें ईंधन का कार्य करती हैं। विखंडन से तीव्र गति वाले न्यूट्रॉन निकलते हैं। इन्हें भारी जल (D2O) या ग्रेफाइट रूपी मंदक (Moderator) से गुजारकर धीमा किया जाता है। अभिक्रिया की दर को नियंत्रित करने के लिए कैडमियम (Cd) अथवा बोरॉन (B) की नियंत्रक छड़ें अंदर-बाहर की जाती हैं, जो अतिरिक्त न्यूट्रॉनों को अवशोषित कर लेती हैं। मुक्त ऊष्मा से शीतलक (द्रव सोडियम या जल) भाप बनाता है, जो टर्बाइन चलाकर जनरेटर से बिजली पैदा करती है।
सुरक्षा चुनौतियां: रिएक्टर में आकस्मिक रिसाव (जैसे चेरनोबिल या फुकुशिमा हादसा) से लाखों लोगों की जान जा सकती है। इसके अलावा बचे हुए रेडियोधर्मी कचरे को हजारों वर्षों तक विकिरण-मुक्त रखना अत्यंत कठिन समस्या है।
सौर ऊर्जा के प्रत्यक्ष उपयोग हेतु सौर कुकर (उष्मीय प्रभाव) तथा सौर सेल (प्रकाश-विद्युत प्रभाव) दो प्रमुख युक्तियां हैं।
1. सौर कुकर (Solar Cooker):
- सिद्धांत: यह सूर्य के प्रकाश के ऊष्मीय प्रभाव तथा ग्रीनहाउस प्रभाव पर कार्य करता है।
- संरचना: एक रोधित बक्सा, जिसकी आंतरिक दीवारें काली होती हैं। ऊपर एक समतल परावर्तक दर्पण और बक्से के मुंह पर पारदर्शी कांच की प्लेट होती है।
- सीमाएं: धीमी गति से पकना, रात में या बादलों में अनुपयोगी होना, तलने और चपाती बनाने के अयोग्य होना।
2. सौर सेल (Solar Cell):
- सिद्धांत: यह अर्धचालक तकनीक पर आधारित प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photovoltaic Effect) पर कार्य करता है, जो प्रकाश ऊर्जा को सीधे विद्युत धारा में बदलता है।
- संरचना: सिलिकॉन (Si) की p-n संधि से बना होता है। कई सेलों को चांदी के तारों से जोड़कर सौर पैनल बनता है।
- लाभ: कोई गतिमान पुर्जा नहीं, प्रदूषण-रहित, दूरदराज के क्षेत्रों और कृत्रिम उपग्रहों में ऊर्जा आपूर्ति।
- सीमाएं: अति-शुद्ध सिलिकॉन और चांदी के उपयोग के कारण अत्यधिक महंगा होना तथा रात में ऊर्जा संचित करने हेतु बैटरियों पर निर्भरता।
कार्यप्रणाली: सूर्य के विकिरण द्वारा थल और जल के असमान रूप से गर्म होने के कारण वायुमंडलीय दाब में अंतर आता है, जिससे हवाएं (पवन) चलती हैं। बहती पवन में विशाल गतिज ऊर्जा होती है। जब यह पवन चक्की के विशिष्ट पंखों से टकराती है, तो पंखों की घूर्णन गति रोटर को घुमाती है। रोटर का शाफ्ट गियर-बॉक्स के माध्यम से जनरेटर से जुड़ा होता है, जो यांत्रिक गतिज ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित कर देता है।
भौगोलिक एवं तकनीकी आवश्यकताएं:
- पवन की निरंतरता एवं न्यूनतम चाल: पवन टर्बाइन की आवश्यक गति बनाए रखने हेतु हवा की गति निरंतर न्यूनतम 15 km/h होनी चाहिए।
- विशाल भूमि की आवश्यकता: एक एकल पवन चक्की से बहुत कम बिजली मिलती है। अतः व्यावसायिक उत्पादन के लिए विशाल क्षेत्र पर सैकड़ों पवन चक्कियां लगाकर 'पवन ऊर्जा फार्म' बनाया जाता है। 1 MW क्षमता हेतु लगभग 2 हेक्टेयर समतल भूमि चाहिए।
- बैक-अप व्यवस्था: हवा न चलने वाले शांत दिनों के लिए संचायक बैटरियों या अन्य पारंपरिक ऊर्जा ग्रिड की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
- पर्यावरणीय चुनौतियां: विशाल पंखों के चक्रवात से टकराकर प्रवासी पक्षियों की मृत्यु होती है और टर्बाइन का तेज शोर ध्वनि प्रदूषण पैदा करता है। अत्यधिक नमी और खारे तटीय वातावरण से ब्लेडों का संक्षारण (जंग) तीव्र होता है।
| विशेषता | जल विद्युत संयंत्र (Hydro Plant) | तापीय विद्युत संयंत्र (Thermal Plant) |
|---|---|---|
| मूल ईंधन | बहता हुआ जल (नवीकरणीय स्रोत) | कोयला, गैस या तेल (अनवीकरणीय स्रोत) |
| ऊर्जा रूपांतरण | स्थितिज ऊर्जा → गतिज ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा | रासायनिक ऊर्जा → ऊष्मीय ऊर्जा → गतिज ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा |
| प्रदूषण | प्रचालन के दौरान कोई धुआं या रासायनिक उत्सर्जन नहीं | अत्यधिक मात्रा में CO2, SO2, राख और कालिख का उत्सर्जन |
| स्थापना एवं प्रचालन व्यय | प्रारंभिक पूंजीगत व्यय अत्यधिक, परंतु ईंधन खर्च शून्य | प्रारंभिक व्यय मध्यम, परंतु निरंतर ईंधन क्रय का भारी खर्च |
| पर्यावरणीय प्रभाव | विशाल वनों का डूबना, जन-विस्थापन और नदी पारिस्थितिकी का विनाश | ग्लोबल वॉर्मिंग, अम्लीय वर्षा और भारी वायु प्रदूषण |
समुद्र अपार ऊर्जा के विशाल प्राकृतिक भंडार हैं, जिनसे ऊर्जा का दोहन निम्नलिखित तीन रूपों में किया जाता है:
- 1. ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy): पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बलों के कारण समुद्र में दिन में दो बार जलस्तर चढ़ता (ज्वार) और उतरता (भाटा) है। संकीर्ण समुद्री खाड़ी पर तटबंध बनाकर इस जल को रोका जाता है। ज्वार और भाटे के समय जल के प्रवाह से टर्बाइन घुमाकर विद्युत उत्पन्न की जाती है। इसकी सीमा यह है कि उपयुक्त खाड़ियों की संख्या संसार में बहुत कम है।
- 2. तरंग ऊर्जा (Wave Energy): समुद्र की सतह पर तेज हवाओं के घर्षण से निरंतर विशाल तरंगें उठती हैं। इन तरंगों की दोलन गति में अत्यधिक गतिज ऊर्जा होती है। विशिष्ट फ्लोटिंग युक्तियों या वायु-स्तंभों के माध्यम से तरंगों के ऊपर-नीचे होने से टर्बाइन चलाए जाते हैं। यह केवल वहीं संभव है जहाँ तरंगें अत्यंत शक्तिशाली हों।
- 3. सागरीय तापीय ऊर्जा (OTEC): सूर्य की धूप से समुद्र की ऊपरी सतह का जल गर्म (∼ 25°C - 30°C) रहता है, जबकि 2 किमी गहराई पर जल ठंडा (∼ 5°C) होता है। इस न्यूनतम 20°C के तापांतर का उपयोग कर बंद चक्र प्रणाली में अमोनिया (NH3) को वाष्पीकृत किया जाता है। वाष्प से टर्बाइन चलता है और ठंडे पानी से वाष्प पुनः द्रव बन जाती है। यह प्रणाली वर्षभर 24 घंटे लगातार विद्युत दे सकती है।
अवधारणा: भू-तापीय शब्द दो ग्रीक शब्दों—'Geo' (पृथ्वी) और 'Therme' (ऊष्मा) से मिलकर बना है। पृथ्वी के केंद्रीय क्रोड में रेडियोएक्टिव तत्वों के क्षय और अत्यधिक दाब के कारण भीषण गर्मी है। यह ऊष्मा आंतरिक पिघली चट्टानों (मैग्मा) द्वारा पृथ्वी की ऊपरी परतों की ओर धकेली जाती है।
विद्युत उत्पादन की प्रक्रिया:
- जिन क्षेत्रों में गर्म चट्टानें भू-पर्पटी के अपेक्षाकृत पास आ जाती हैं, उन्हें 'तप्त स्थल' (Hot Spots) कहते हैं।
- जब प्राकृतिक भूमिगत जल इन तप्त स्थलों के संपर्क में आता है, तो वह अत्यधिक दाब पर भाप (Steam) में बदल जाता है।
- चट्टानों में गहरे छिद्र (Boreholes) करके पाइपों द्वारा इस उच्च-दाब भाप को सीधे बाहर निकाला जाता है।
- यह भाप सीधे विद्युत जनरेटर से जुड़े टर्बाइन के पंखों से टकराती है, जिससे टर्बाइन घूमता है और स्वच्छ विद्युत पैदा होती है।
लाभ: 1. यह ऊर्जा का पूर्णतः स्वच्छ और हरित स्रोत है जिससे कोई ग्रीनहाउस गैस नहीं निकलती। 2. यह मौसम पर निर्भर नहीं है और 24 घंटे निरंतर कार्य कर सकता है।
हानि: 1. व्यावसायिक दृष्टि से व्यावहारिक तप्त स्थल बहुत कम स्थानों पर उपलब्ध हैं। 2. अत्यधिक गहराई में ड्रिलिंग करने की प्रारंभिक लागत बहुत अधिक होती है।
जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोल, डीजल) मुख्यतः कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और सल्फर के जटिल मिश्रण होते हैं। इनके दहन से पर्यावरण पर निम्नलिखित विनाशकारी प्रभाव पड़ते हैं:
- ग्रीनहाउस प्रभाव एवं ग्लोबल वॉर्मिंग: पूर्ण दहन से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) पृथ्वी की ऊष्मा को अंतरिक्ष में जाने से रोकती है, जिससे ध्रुवीय बर्फ पिघल रही है।
- अपूर्ण दहन और विषाक्त गैसें: कम वायु में जलने पर कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) बनती है, जो रक्त के हीमोग्लोबिन से मिलकर कार्बोक्सी-हीमोग्लोबिन बनाती है, जिससे दम घुटने से मृत्यु हो सकती है।
अम्लीय वर्षा (Acid Rain) का रासायनिक प्रक्रम:
जीवाश्म ईंधनों में उपस्थित सल्फर और नाइट्रोजन जलने पर वायु में अपने गैसीय ऑक्साइड छोड़ते हैं:
आइंस्टीन का समीकरण: 1905 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने विशेष सापेक्षता सिद्धांत के अंतर्गत यह प्रतिपादित किया कि द्रव्यमान (m) और ऊर्जा (E) अलग-अलग सत्ताएं नहीं हैं, बल्कि द्रव्यमान वास्तव में ऊर्जा का ही एक अत्यधिक संकेंद्रित रूप है। यदि किसी नाभिकीय प्रक्रम में द्रव्यमान क्षति Δm हो, तो मुक्त ऊर्जा:
यहाँ c = 3 × 108 m/s (निर्वात में प्रकाश की चाल) है। चूंकि c2 = 9 × 1016 m2/s2 एक अत्यंत विशाल संख्या है, अतः अत्यंत सूक्ष्म द्रव्यमान के लुप्त होने पर भी प्रचंड ऊर्जा मुक्त होती है।
परमाणु द्रव्यमान इकाई (1 u) की ऊर्जा गणना:
1 u = 1.6605 × 10-27 kg
E = (1.6605 × 10-27) × (3 × 108)2 ≈ 1.49 × 10-10 Joules
चूंकि 1 eV = 1.602 × 10-19 J (तथा 1 MeV = 106 eV):
E = (1.49 × 10-10) / (1.602 × 10-13) ≈ 931.5 MeV
यूरेनियम विखंडन में ऊर्जा: जब यूरेनियम-235 का एक नाभिक विखंडित होता है, तो लगभग 0.215 u द्रव्यमान की क्षति होती है। अतः यूरेनियम के मात्र एक नाभिक के टूटने से लगभग 200 MeV ऊर्जा निकलती है, जो कोयले के एक कार्बन परमाणु के जलने से प्राप्त ऊर्जा (∼ 4 eV) से लगभग 5 करोड़ गुना अधिक है!
भारत में परमाणु ऊर्जा विकास कार्यक्रम डॉ. होमी जहांगीर भाभा के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ था। भारत के प्रमुख सक्रिय परमाणु विद्युत केंद्र निम्नलिखित हैं:
- तारापुर परमाणु ऊर्जा केंद्र: महाराष्ट्र (भारत का प्रथम परमाणु संयंत्र)।
- राणा प्रताप सागर संयंत्र: रावतभाटा (राजस्थान)।
- कलपक्कम तथा कुडनकुलम संयंत्र: तमिलनाडु।
- नरोरा परमाणु शक्ति केंद्र: बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश)।
- काकरापार परमाणु केंद्र: गुजरात।
- कैगा संयंत्र: कर्नाटक।
परमाणु ऊर्जा से जुड़ी गंभीर समस्याएं:
- नाभिकीय अपशिष्ट का भंडारण: यूरेनियम विखंडन के बाद बचे ईंधन छड़ों में प्लूटोनियम और अन्य भारी आइसोटोप होते हैं जो अत्यधिक रेडियोएक्टिव होते हैं। इन्हें सीसे के मोटे बक्सों में भरकर भूगर्भ में हजारों फीट गहरे विशेष गड्ढों में दबाना पड़ता है ताकि भूजल रेडियोधर्मी न हो।
- दुर्घटना का जोखिम: रिएक्टर में शीतलन प्रणाली विफल होने पर 'मेल्टडाउन' का खतरा रहता है। वातावरण में रेडियोधर्मी धूल फैलने से आने वाली कई पीढ़ियां अपंग और कैंसरग्रस्त हो सकती हैं।
- ईंधन की सीमित उपलब्धता: भारत में उच्च कोटि के यूरेनियम के भंडार बहुत कम हैं, अतः हमें अंतर्राष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहना पड़ता है।
आंतरिक बनावट एवं सिद्धांत: सौर सेल ठोस-अवस्था (Solid State) की एक अर्धचालक युक्ति है। यह सिलिकॉन (Si) में अल्प मात्रा में आर्सेनिक या बोरॉन जैसे तत्वों का अपमिश्रण (Doping) करके बनाई गई एक विशिष्ट p-n संधि डायोड (p-n Junction) होती है। जब सूर्य के फोटॉन (प्रकाश कण) इस संधि पर गिरते हैं, तो उनकी ऊर्जा से इलेक्ट्रॉन-होल युग्म उत्पन्न होते हैं। आंतरिक विद्युत क्षेत्र के कारण इलेक्ट्रॉन n-क्षेत्र की ओर और होल p-क्षेत्र की ओर गति करते हैं, जिससे दोनों सिरों के मध्य एक विभवांतर (0.5 - 1.0 V) उत्पन्न हो जाता है और बाह्य परिपथ में विद्युत धारा बहने लगती है।
ऊर्जा संकट समाधान में भूमिका:
- यह सूर्य की असीम और निःशुल्क सौर ऊर्जा का सीधे बिजली में रूपांतरण करती है।
- यह पूर्णतः नीरव (ध्वनि-रहित) और धुआं-रहित काम करती है।
- कृत्रिम उपग्रहों, अंतरिक्ष स्टेशनों, समुद्री प्रकाश-स्तंभों और सुदूर ग्रामीण वायरलेस नेटवर्क टावरों के लिए यह ऊर्जा का एकमात्र स्थायी स्रोत है।
सीमाएं एवं चुनौतियां: सौर सेल की दक्षता आज भी प्रयोगशालाओं में 15% से 22% के बीच ही सीमित है। सौर पैनलों के निर्माण में लगने वाले अति-शुद्ध सिलिकॉन के निष्कर्षण में भारी ऊर्जा खर्च होती है और सेलों को आपस में जोड़ने के लिए चांदी (Ag) की आवश्यकता इसे अत्यधिक खर्चीला बनाती है। इसके अलावा वर्षा और रात के समय ऊर्जा प्राप्ति शून्य हो जाती है।
किसी भी पदार्थ को उत्कृष्ट ईंधन तभी माना जा सकता है जब वह निम्नलिखित वैज्ञानिक, आर्थिक और पर्यावरणीय मानदंडों पर खरा उतरे:
- 1. उच्च उष्मीय मान (High Calorific Value): ईंधन के प्रति एकांक द्रव्यमान के पूर्ण दहन से अधिकतम ऊष्मा उत्पन्न होनी चाहिए, ताकि कम मात्रा में ईंधन का उपयोग कर अधिक कार्य किया जा सके।
- 2. उपयुक्त ज्वलन ताप (Moderate Ignition Temperature): ईंधन का ज्वलन ताप कमरे के ताप से अधिक होना चाहिए ताकि वह स्वतः आग न पकड़े, परंतु इतना अधिक भी न हो कि उसे जलाने के लिए अत्यधिक पूर्व-उष्मा देनी पड़े।
- 3. नियंत्रित दहन की दर (Controlled Rate of Burning): ईंधन न तो बारूद की तरह अति-विस्फोटक गति से जले और न ही उपलों की तरह मंद गति से सुलगता रहे। इसका दहन स्थिर और नियंत्रित होना चाहिए।
- 4. न्यूनतम हानिकारक अवशेष (Zero/Low Residue): दहन के उपरांत विषैली गैसें (CO, SO2) नहीं निकलनी चाहिए तथा जलने के बाद कोई राख या कालिख नहीं बचनी चाहिए।
- 5. सुलभता, वहनीयता एवं भंडारण सुरक्षा: ईंधन सस्ता और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो तथा उसके भंडारण और लंबी दूरी तक परिवहन में कोई बड़ा जोखिम न हो।
जैव-मात्रा (Biomass): पादपों और जंतुओं के मृत शरीरों, उनके अपशिष्टों (जैसे गोबर, फसलों के डंठल, छिलके, लकड़ी, जलकुंभी और सीवेज) से प्राप्त कार्बनिक पदार्थों को सम्मिलित रूप से जैव-मात्रा कहते हैं। यह रासायनिक रूप में संचित सौर ऊर्जा का ही एक रूप है।
ग्रामीण भारत हेतु बायोगैस संयंत्रों का बहुआयामी योगदान:
- स्वच्छ ईंधन की प्राप्ति: ग्रामीण महिलाएं सदियों से उपलों और गीली लकड़ियों के धुएं में भोजन बनाती रही हैं, जिससे वे दमा, टीबी और नेत्र रोगों की शिकार होती थीं। बायोगैस से उन्हें धुआं-रहित स्वच्छ रसोई गैस मिलती है, जिससे उनके जीवन स्तर और स्वास्थ्य में क्रांतिकारी सुधार हुआ है।
- मृदा स्वास्थ्य और उत्तम जैविक खाद: गोबर को सीधे कंडे (उपले) बनाकर जलाने से उसमें उपस्थित अमूल्य नाइट्रोजन और फास्फोरस जलकर नष्ट हो जाते थे। बायोगैस संयंत्र में ऊर्जा भी मिल जाती है और बची हुई स्लरी के रूप में अत्यंत समृद्ध जैविक खाद प्राप्त होती है, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है।
- ग्रामीण स्वच्छता एवं रोग निवारण: खुले में गोबर और मानव मल के ढेर रहने से मक्खी-मच्छर और हैजा-पेचिश फैलते थे। इन सभी अपशिष्टों को सीलबंद संयंत्र में डालने से गांवों में संपूर्ण स्वच्छता स्थापित होती है।
- वनों की सुरक्षा: ग्रामीण क्षेत्रों में जलावन की लकड़ी की मांग घटने से स्थानीय जंगलों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगी है।
जीवाश्म ईंधनों के तेजी से रिक्त होते भंडारों और जलवायु परिवर्तन के भयानक खतरे को देखते हुए भविष्य के ऊर्जा संकट से निपटने हेतु हमें त्रि-आयामी रणनीति अपनानी होगी:
1. आपूर्ति पक्ष: ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण:
- कोयला और पेट्रोलियम पर निर्भरता तेजी से घटाकर सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen) के बुनियादी ढांचे में भारी निवेश करना।
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) जैसी पहलों के माध्यम से उष्णकटिबंधीय देशों में बड़े सोलर पार्कों का निर्माण करना।
- सुरक्षित और उन्नत चतुर्थ पीढ़ी के परमाणु विखंडन रिएक्टरों तथा अंतरराष्ट्रीय प्रयोगात्मक थर्मोन्यूक्लियर रिएक्टर (ITER) जैसे नाभिकीय संलयन अनुसंधानों को गति देना।
2. मांग पक्ष: ऊर्जा दक्षता और संरक्षण:
- औद्योगिक इंजनों, विद्युत मोटरों और कृषि पंपों को अत्याधुनिक ऊर्जा-दक्ष रेटिंग में बदलना।
- परिवहन क्षेत्र का तीव्र विद्युतीकरण करना—पेट्रोल-डीजल वाहनों के स्थान पर ई-वाहनों (EVs) और उन्नत रेल नेटवर्कों का विस्तार।
- भवनों के निर्माण में 'हरित वास्तुकला' (Green Architecture) का प्रयोग करना ताकि प्राकृतिक प्रकाश और वेंटिलेशन मिले और एसी-हीटर की आवश्यकता न्यूनतम हो।
3. नीतिगत एवं सामाजिक स्तर: विद्यालयों और जनसंचार माध्यमों द्वारा जन-जागरूकता फैलाना, जीवाश्म ईंधनों पर दी जाने वाली सब्सिडी समाप्त कर अक्षय ऊर्जा अनुसंधान पर कर-छूट प्रदान करना।
ऊर्जा स्रोत की पर्यावरणीय लागत: किसी ऊर्जा स्रोत से उपयोगी ऊर्जा प्राप्त करने की संपूर्ण प्रक्रिया (संसाधनों का खनन, संयंत्र का निर्माण, प्रचालन, अपशिष्ट निस्तारण और विखंडन) के दौरान पर्यावरण को पहुंचने वाली कुल संचयी क्षति को उस स्रोत की 'पर्यावरणीय लागत' कहा जाता है।
विभिन्न स्रोतों का तुलनात्मक विश्लेषण:
- जीवाश्म ईंधन: इनकी पर्यावरणीय लागत सर्वाधिक है। खनन से वन विनाश, दहन से वायु प्रदूषण, अम्लीय वर्षा और CO2 से वैश्विक तापमान वृद्धि होती है।
- विशाल बांध: यद्यपि परिचालन में स्वच्छ हैं, परंतु निर्माण के समय विशाल जैव विविधता जलमग्न हो जाती है और सड़े बायोमास से भारी मात्रा में मीथेन गैस निकलती है।
- सौर एवं पवन ऊर्जा: इनकी परिचालन लागत शून्य प्रदूषणकारी है, परंतु सौर पैनलों हेतु सिलिकॉन शोधन और पवन चक्कियों के ब्लेड निर्माण में प्रयुक्त प्लास्टिक व धातुओं का निस्तारण कुछ सीमा तक पर्यावरणीय पदचिह्न छोड़ता है।
पर्यावरण-अनुकूल स्रोत के वैज्ञानिक मापदंड: कोई स्रोत पूर्णतः प्रदूषण-मुक्त नहीं हो सकता, परंतु हम उसे अपेक्षाकृत 'पर्यावरण-अनुकूल' तभी मानते हैं जब:
1. ऊर्जा उत्पादन के दौरान ग्रीनहाउस गैसों और विषैले रसायनों का उत्सर्जन न्यूनतम या शून्य हो।
2. वह स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को स्थायी या अपरिवर्तनीय क्षति न पहुंचाए।
3. उसके अपशिष्टों का पुनर्चक्रण या सुरक्षित प्राकृतिक अपघटन सरलता से संभव हो।
0 Comments