Chapter 5. संसारमोहः | BSEB 10 Sanskrit Subjective


संसारमोहः (पाठ-5) - 50 महत्वपूर्ण विषयनिष्ठ प्रश्नोत्तर

पीयूषम् द्रुतपाठाय | BSEB कक्षा 10 संस्कृत | परीक्षा उपयोगी उत्तर सूची

1. गद्यांश आधारित प्रत्यक्ष प्रश्नोत्तर (1 से 20)
प्रश्न 1: भगवान् नृसिंह ने अपने प्रिय भक्त प्रह्लाद से क्या माँगने को कहा?
उत्तर: भगवान् नृसिंह ने प्रह्लाद से कहा— "कोई भी वरदान माँग लो" (किमपि वरं याचस्व)।
प्रश्न 2: प्रह्लाद ने भगवान् नृसिंह से क्या वरदान माँगा?
उत्तर: प्रह्लाद ने माँगा कि "संसार के दीन-दुःखी जीवों को छोड़कर मैं अकेला मुक्त (वैकुंठ) नहीं होना चाहता; कृपया सभी जीवों को वैकुंठ ले जाने की अनुमति दें"।
प्रश्न 3: प्रह्लाद की बात पर भगवान् नृसिंह ने क्या तर्क दिया?
उत्तर: भगवान् ने कहा कि "जो जीव स्वयं वैकुंठ जाना नहीं चाहते, उन्हें बलपूर्वक वैकुंठ कैसे ले जाया जा सकता है?"
प्रश्न 4: प्रह्लाद ने भगवान् से क्या पूछा और फिर क्या करने चले गए?
उत्तर: प्रह्लाद ने कहा कि "ऐसा कौन होगा जो वैकुंठ न जाना चाहे?" फिर वे लोगों से वैकुंठ चलने के विषय में पूछने चले गए।
प्रश्न 5: ब्राह्मणों ने वैकुंठ जाने से मना करने का क्या कारण बताया?
उत्तर: ब्राह्मणों ने कहा कि अभी यजमान का यज्ञ कराना है और पुत्र के गुरुकुल से लौटने पर उसका विवाह कराना है, इसलिए अभी नहीं जा सकते।
प्रश्न 6: संन्यासियों/परिव्राजकों ने तुरंत वैकुंठ जाने से क्यों इनकार किया?
उत्तर: संन्यासियों ने कहा कि यद्यपि हम मुक्त हैं, परंतु अभी शिष्यों को तत्त्वज्ञान देना बाकी है, इसलिए वे अभी नहीं जा सकते।
प्रश्न 7: राजाओं और व्यापारियों (वणिक्) ने वैकुंठ जाने के संबंध में क्या कहा?
उत्तर: राजाओं ने राज्य के कार्यों में व्यस्तता तथा व्यापारियों ने अपने व्यापार/वाणिज्य के कार्यों का बहाना बनाया।
प्रश्न 8: सेवकों तथा पशु-पक्षियों की वैकुंठ न जाने में क्या व्यस्तता थी?
उत्तर: सेवक अपने घर के काम में और पशु-पक्षी अपने परिवार का पालन-पोषण करने में मग्न थे।
प्रश्न 9: क्या कोई भी प्राणी तुरंत वैकुंठ जाने के लिए तैयार (उद्युक्तः) हुआ?
उत्तर: यद्यपि सब वैकुंठ की इच्छा रखते थे, परंतु तुरंत (झटिति) जाने के लिए कोई भी जीव तैयार नहीं हुआ।
प्रश्न 10: अंत में प्रह्लाद किस जीव के पास पहुँचे?
उत्तर: अंत में प्रह्लाद एक सूअर/वराह (वराहस्य) के पास पहुँचे।
प्रश्न 11: प्रह्लाद ने वराह (सूअर) को वैकुंठ के बारे में क्या बताया?
उत्तर: प्रह्लाद ने बताया कि "वैकुंठ में अनंत आनंद (अनन्तः आनन्दः) है"।
प्रश्न 12: वराह ने अपनी पत्नी (सूकरी) से क्या पूछने को कहा?
उत्तर: वराह ने कहा कि "मेरी पत्नी से पूछो, मैं अकेला वैकुंठ नहीं जाना चाहता"।
प्रश्न 13: वराह की पत्नी (सूकरी) ने वैकुंठ के भोजन के बारे में क्या प्रश्न किया?
उत्तर: सूकरी ने पूछा— "क्या वहाँ (वैकुंठ में) हमें भोजन प्राप्त होगा?"
प्रश्न 14: जब प्रह्लाद ने कहा कि वैकुंठ में भूख ही नहीं लगती, तो सूकरी ने क्या उत्तर दिया?
उत्तर: सूकरी ने कहा कि "जहाँ भूख नहीं लगती, वहाँ जाकर हम बीमार पड़ जाएँगे; जहाँ भोजन ही न मिले, हम ऐसे स्थान पर नहीं जाना चाहते"।
प्रश्न 15: निराश होकर प्रह्लाद ने भगवान् के पास लौटकर क्या कहा?
उत्तर: प्रह्लाद ने कहा— "भगवन्! सभी प्राणी अपने-अपने पारिवारिक प्रपंच और मोह में मग्न हैं, कोई भी वैकुंठ जाने के लिए तैयार नहीं है"।
प्रश्न 16: 'संसारमोहः' पाठ किस पुस्तक का भाग है?
उत्तर: यह बिहार बोर्ड (BSEB) कक्षा 10 संस्कृत की पूरक पुस्तक 'पीयूषम् (द्रुतपाठाय)' का पाठ-5 (पञ्चमः पाठः) है।
प्रश्न 17: 'परिब्राजकाः' और 'बुभुक्षा' शब्दों का क्या अर्थ है?
उत्तर: 'परिब्राजकाः' का अर्थ "संन्यासी/घूमने वाले साधु" तथा 'बुभुक्षा' का अर्थ "भूख" है।
प्रश्न 18: 'कौटुम्बिकव्यापारे मग्नाः' का क्या तात्पर्य है?
उत्तर: इसका तात्पर्य अपने-अपने परिवार के भरण-पोषण और गृहस्थी के प्रपंच में डूबे रहने से है।
प्रश्न 19: 'झटिति' और 'रुग्णाः' शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 'झटिति' का अर्थ "शीघ्र/तुरंत" और 'रुग्णाः' का अर्थ "बीमार/रोगी" होता है।
प्रश्न 20: प्रह्लाद का स्वभाव कैसा दर्शाया गया है?
उत्तर: प्रह्लाद का स्वभाव परदुःखकातर, करुणामय और निस्वार्थ लोक-कल्याणकारी दर्शाया गया है।
2. अभ्यास (Exercises) पर आधारित प्रश्नोत्तर (21 से 23)
प्रश्न 21: (अभ्यास प्रश्न 1) अनया कथया कः संदेशः प्राप्यते?
(इस कथा से क्या संदेश मिलता है?)
उत्तर: अनया कथया सन्देशः प्राप्यते यत् संसारे सर्वे अपि जीविनः स्व-स्व पारिवारिक मोहे, सांसारिक कर्तव्येषु च आबद्धाः सन्ति। ते मुक्तिं तु इच्छन्ति, किन्तु मोहस्य कारणात् संसारात् झटिति निर्गन्तुं न इच्छन्ति।
प्रश्न 22: (अभ्यास प्रश्न 2) संसारस्य मोहः कीदृशः भवति?
(संसार का मोह कैसा होता है?)
उत्तर: संसारस्य मोहः अतीव प्रबलग्रन्थिस्वरूपः, भ्रमकारकः, बन्धनकारी च भवति, यः बुद्धिमन्तम् ज्ञानीनं शूद्रं च सर्वं जनं मोहे बद्ध्वा ईश्वरमार्गात् विचलितं करोति।
प्रश्न 23: (अभ्यास प्रश्न 3) संसारस्य मोहः कथं वैकुण्ठस्य मार्गेऽपि बाधकः अस्ति?
(संसार का मोह वैकुंठ के मार्ग में कैसे बाधक है?)
उत्तर: यतो हि जनाः परमसुखं वैकुण्ठं प्राप्तुम् इच्छन्तः अपि, स्वपरिवारस्य, धनस्य, यशसः, कामादि-संसारविषयाणां मोहात् जीवनं त्यक्तुं मुक्तिं ग्रहीतुं च उद्युक्ताः न भवन्ति। अतः मोहः मुक्तिमार्गे मुख्यः बाधकः अस्ति।
3. भावार्थ, व्याख्यात्मक एवं अति-महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (24 से 50)
प्रश्न 24: प्रह्लाद ने स्वयं अकेले मुक्ति पाने के स्थान पर सभी जीवों के लिए वरदान क्यों माँगा?
उत्तर: प्रह्लाद एक सच्चे भक्त थे। उनके मन में समस्त दुःखी जीवों के प्रति अपार करुणा थी, इसलिए उन्होंने केवल अपने मोक्ष के स्थान पर सर्व-मुक्ति की कामना की।
प्रश्न 25: ज्ञानी संन्यासी और विद्वान होकर भी परिब्राजक वैकुंठ क्यों नहीं जाना चाहते थे?
उत्तर: क्योंकि वे भी शिष्यों को उपदेश देने और अपने आचार्यत्व के मोह में फँसे थे। यह दर्शाता है कि अज्ञान के साथ-साथ ज्ञान का अहंकार भी सांसारिक मोह का एक रूप है।
प्रश्न 26: सूकरी (सूअर की पत्नी) का उत्तर मानव स्वभाव के किस पहलू को उजागर करता है?
उत्तर: सूकरी का उत्तर यह उजागर करता है कि अज्ञानी जीव अपनी सीमित और तुच्छ सुख-सुविधाओं (जैसे मल-भोजन) को ही सर्वोपरि मानकर परम-आनंद (मोक्ष) को भी अस्वीकार कर देते हैं।
प्रश्न 27: "संसारमोहः" पाठ का दार्शनिक भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इसका दार्शनिक भाव यह है कि माया और मोह का बंधन इतना सुदृढ़ है कि जीव दुःखी रहकर भी इस नश्वर संसार को छोड़ना नहीं चाहता और मोक्ष के अमर सुख से वंचित रह जाता है।
प्रश्न 28: भगवान् नृसिंह ने प्रह्लाद को स्वयं लोगों से पूछने का सुझाव क्यों दिया?
उत्तर: ताकि प्रह्लाद को व्यावहारिक रूप से समझ आ सके कि ईश्वर किसी को जबरदस्ती मुक्ति नहीं देते; जीव का स्वयं सांसारिक आसक्ति से मुक्त होना आवश्यक है।
प्रश्न 29: 'याचस्व' किस लकार और पुरुष का रूप है?
उत्तर: यह याच (माँगना) धातु का लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन रूप है।
प्रश्न 30: 'निरंकुश' या 'असाधारण' मोह का शिकार कौन-कौन से प्राणी हैं?
उत्तर: मनुष्य, पशु, पक्षी, ज्ञानी, मूर्ख, राजा और रंक— सभी प्राणी सांसारिक मोह से ग्रसित हैं।
प्रश्न 31: 'दृष्ट्वा' और 'पृष्ट्वा' शब्दों में कौन सा प्रत्यय है?
उत्तर: इन दोनों में 'क्त्वा' प्रत्यय लगा है (दृश् + क्त्वा = दृष्ट्वा, प्रच्छ् + क्त्वा = पृष्ट्वा)।
प्रश्न 32: 'वैकुण्ठम्' का भारतीय परंपरा में क्या अर्थ माना जाता है?
उत्तर: 'वैकुण्ठम्' भगवान् विष्णु का परम धाम है, जहाँ जीव जन्म-मरण के चक्र और दुःखों से मुक्त होकर अमर आनंद प्राप्त करता है।
प्रश्न 33: 'दीनदुःखिनः' शब्द में कौन सा समास है?
उत्तर: दीनाः च ते दुःखिनः च = कर्मधारय/द्वंद्व समास (दीन और दुःखी जीव)।
प्रश्न 34: 'कौटुम्बिकव्यापारे' का समास विग्रह क्या होगा?
उत्तर: कुटुम्बस्य व्यापारे = षष्ठी तत्पुरुष समास (परिवार के कार्यों में)।
प्रश्न 35: इस कहानी में हास्य और व्यंग्य का पुट कहाँ दिखाई देता है?
उत्तर: जब सूअर की पत्नी (सूकरी) कहती है कि "जहाँ भूख नहीं लगेगी वहाँ हम बीमार पड़ जाएँगे," यहाँ अज्ञानता पर व्यंग्य और हास्य दोनों दिखाई देते हैं।
प्रश्न 36: 'उद्युक्तः' शब्द का गद्यांश में क्या अर्थ है?
उत्तर: 'उद्युक्तः' का अर्थ "तैयार/उद्यत होना" है।
प्रश्न 37: 'आदाय' शब्द में कौन सा प्रत्यय है?
उत्तर: आ (उपसर्ग) + दा (धातु) + 'ल्यप्' (प्रत्यय) = आदाय (लेकर)।
प्रश्न 38: 'शक्नुयात्' किस लकार का रूप है?
उत्तर: शक (सकने अर्थ में) धातु का विधिलिङ् लकार का रूप है।
प्रश्न 39: प्रह्लाद के चरित्र से हमें क्या सीख लेनी चाहिए?
उत्तर: हमें केवल अपने स्वार्थ या अपने कल्याण की नहीं, बल्कि समाज के सभी पीड़ित लोगों की निस्वार्थ भलाई की सोच रखनी चाहिए।
प्रश्न 40: 'असुचयत्' किस लकार का रूप है?
उत्तर: यह लङ् लकार (भूतकाल) का रूप है।
प्रश्न 41: 'संसार' शब्द की उत्पत्ति या अर्थ क्या है?
उत्तर: 'संसारति इति संसारः' अर्थात् जो निरंतर बदलता और बहता रहता है, वह संसार है।
प्रश्न 42: मनुष्य के जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या माना गया है और 'संसारमोह' उसमें कैसे बाधा डालता है?
उत्तर: अंतिम लक्ष्य 'मोक्ष' है, परंतु पुत्र, स्त्री, धन और गृहस्थी का मोह मनुष्य को ईश्वर-चिंतन से दूर रखता है।
प्रश्न 43: 'त्यक्त्वा' में कौन सा प्रत्यय है?
उत्तर: त्यज् (धातु) + 'क्त्वा' (प्रत्यय) = त्यक्त्वा (छोड़कर)।
प्रश्न 44: 'सर्वान् अपि' का संधि-विच्छेद क्या होगा?
उत्तर: सर्वान् + अपि = सर्वानपि (व्यंजन संधि)।
प्रश्न 45: 'अनास्था' या 'निराशाम्' शब्द का विलोम पाठ के आधार पर क्या होगा?
उत्तर: निराशा का विलोम 'आशा' या 'उत्साहः' होगा।
प्रश्न 46: 'विश्रुतवान्' या 'विवृतवान्' का क्या अर्थ है?
उत्तर: 'विवृतवान्' का अर्थ "स्पष्ट किया" या "वर्णन किया" है।
प्रश्न 47: प्रह्लाद ने अपनी विफलता का दोषी किसे माना?
उत्तर: उन्होंने किसी को दोषी नहीं माना, बल्कि भगवान् से आकर जीवों के प्रबल सांसारिक मोह का यथार्थ वर्णन कर दिया।
प्रश्न 48: इस कथा की शैली कैसी है?
उत्तर: यह एक सरस, व्यंग्यात्मक, पौराणिक और बोधप्रद नीति-कथा शैली है।
प्रश्न 49: 'संसारमोहः' पाठ का मूल नैतिक मूल्य क्या है?
उत्तर: सांसारिक मोह-माया के क्षणिक सुखों से ऊपर उठकर आत्मा के वास्तविक और स्थायी कल्याण (ईश्वर भक्ति) की ओर अग्रसर होना।
प्रश्न 50: 'संसारमोहः' पाठ का एक पंक्ति में मुख्य सार लिखिए।
उत्तर: "सांसारिक मोह-माया का बंधन इतना प्रबल है कि प्राणी दुःख सहकर भी नश्वर संसार से बंधे रहना पसंद करता है और परम सुख (मोक्ष) को अस्वीकार कर देता है"।

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