14. शास्त्रकाराः (शास्त्रकार)
[भारते वर्षे शास्त्राणां महती परम्परा श्रूयते । शास्त्राणि प्रमाणभूतानि समस्तज्ञानस्य स्रोतःस्वरूपाणि सन्ति । अस्मिन् पाठे प्रमुखशास्त्राणां निर्देशपूर्वकं तत्प्रवर्तकानाञ्च निरूपणं विद्यते । मनोरञ्जनाय पाठेऽस्मिन् प्रश्नोत्तरशैली आसादिता वर्तते ।]
(शिक्षकः कक्षायां प्रविशति, छात्राः सादरमुत्थाय तस्याभिवादनम् कुर्वन्ति ।)
हिन्दी व्याख्या :- [भारतवर्ष में शास्त्रों के महान परंपरा सुने जाते हैं । शास्त्र, प्रमाण के रूप में समस्त ज्ञान का स्रोत स्वरूप हैं । इस पाठ में प्रमुख शास्त्रों एवं उनके प्रवर्तकों के नाम निर्देश पूर्वक निरूपित हैं । इस पाठ में मनोरंजन व शास्त्रों के सम्यक ज्ञान के लिए प्रश्नोत्तर शैली अपनाई गई हैं ।]
( शिक्षक कक्षा में प्रवेश करते हैं, छात्र आदर सहित खड़े होकर उनका अभिवादन करते हैं ।)
शिक्षकः – उपविशन्तु सर्वे । अद्य युष्माकं परिचयः संस्कृतशास्त्रैः भविष्यति ।
हिन्दी व्याख्या :- सभी बैठ जाए । आज आपलोगों का परिचय संस्कृत शास्त्रों से होगी ।
युवराजः – गुरुदेव ! शास्त्रं किं भवति ।
हिन्दी व्याख्या :- गुरूदेव ! शास्त्र क्या होता है ?
शिक्षकः – शास्त्रं नाम ज्ञानस्य शासकमस्ति । मानवानां कर्त्तव्याकर्त्तव्यवषयान् तत् शिक्षयति । शास्त्रमेव अधुना अध्ययनविषयः (Subject) कथ्यते, पाश्चात्यदेशेषु अनुशासनम् (Discipline) अपि अभिधीयते । तथापि शास्त्रस्य लक्षणं धर्मशास्त्रेषु इत्थं वर्तते –
पुंसां येनोपदिश्यते तच्छास्त्रमभिधीयते ।।
हिन्दी व्याख्या :- शास्त्र नाम ही ज्ञान का शासक है । वे मानवों के कर्तव्य और अकर्तव्य विषयों की शिक्षा देती है । शास्त्र को ही इस समय अध्ययन का विषय कहा जाता है । पश्चिमी देशों में इसे अनुशासन भी कहा जाता है । वैसे भी शास्त्रों का लक्षण धर्मशास्त्रों में इस प्रकार हैं :-
जिसमें मनुष्यों को प्रवृत्ति (कर्म करने) या निवृत्ति (संन्यास/विरक्ति), नित्य कर्म या नैमित्तिक कर्म – किसी भी प्रकार के आचरण का उपदेश दिया जाता है, उसे ही शास्त्र कहा जाता है।
सरल अर्थ:- जो ग्रन्थ मनुष्य को क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए—इसका मार्गदर्शन करता है, वही शास्त्र कहलाता है।
अभिनव: – अर्थात् शास्त्रं मानवेभ्य: कर्त्तव्यम् अकर्त्तव्यञ्च बोधयति । शास्त्रं नित्यं भवतु वेदरूपम्, अथवा कृतकं भवतु ऋष्यादिप्रणीतम् ।
हिन्दी व्याख्या :- अर्थात् शास्त्र मानवों के कर्तव्य और अकर्तव्य का बोध कराती है । शास्त्र वेद के रूप में ऋषि आदि के द्वारा रचित होते हैं ।
शिक्षक:– सम्यक् जानासि वत्स ! कृतकं शास्त्रं ऋषय: अन्ये विद्वांस: वा रचितवन्त: । सर्वप्रथमं षट् वेदाङ्गानि शास्त्राणि सन्ति । तानि – शिक्षा, कल्प:, व्याकरणम्, निरुक्तम्, छन्द:, ज्योतिषं चेति ।
हिन्दी व्याख्या :- सही जानते हो वत्स ! बनावटी शास्त्र ऋषि तथा अन्य विद्वानों के द्वारा रचित हैं । सर्वप्रथम छः वेदांग शास्त्र हैं । उनमें – शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष हैं ।
इमरान: – गुरुदेव ! एतेषां विषयाणां के-के प्रणेतार:?
हिन्दी व्याख्या :- इन सभी विषयों के लेखक कौन-कौन हैं ?
शिक्षक: – श्रृणुत यूयं सर्वे सावहितम् । शिक्षा उच्चारणप्रक्रियां बोधयति । पाणिनीयशिक्षा तस्या: प्रसिद्धो ग्रन्थ: । कल्प: कर्मकाण्डग्रन्थ: सूत्रात्मक: । बौधायन-भारद्वाज-गौतम-वसिष्ठादय: ऋषय: अस्य शास्त्रस्य रचयितार: । व्याकरणं तु पाणिनिकृतं प्रसिद्धं । निरुक्तस्य कार्यं वेदार्थबोध: । तस्य रचयिता यास्क: छन्द: पिङ्गलरचिते सूत्रग्रन्थे प्रारब्धम्। ज्योतिषं लगधरचितेन वेदाङ्गज्योतिषग्रन्थेन प्रावर्तत।
हिन्दी व्याख्या :- सभी छात्र एवं छात्राएँ सावधान होकर सुनें। शिक्षा उच्चारण प्रक्रिया का बोध कराता है। “पाणिनीयशिक्षा” इसका प्रसिद्ध ग्रंथ है। कल्प कर्मकाण्डि सुत्रात्मक ग्रंथ है। बौधायन, भारद्वाज, गौतम, वसिष्ठ आदि ऋषिगण इस शास्त्र के रचनाकार हैं। व्याकरण तो महर्षि पाणिनि द्वारा रचित प्रसिद्ध हैं। निरूक्त वेद के अर्थों का बोध कराता है। उसका रचनाकार महर्षि यास्क हैं एवं छन्द “महर्षि पिङ्गल” द्वारा रचित सुत्रग्रन्थ में प्रारंभ हुआ। ज्योतिष “महर्षि लगध” द्वारा रचित वेदाङ्ग ज्योतिषग्रन्थ के द्वारा प्रारंभ हुआ।
अब्राहम: – किमेतावन्त: एव शास्त्रकारा: सन्ति ?
हिन्दी व्याख्या :- क्या इतने ही शास्त्रकार हैं ?
शिक्षक: – नहि नहि । एते प्रवर्त्तका: एव। वस्तुतः महती परम्परा एतेषां शास्त्राणां परवर्त्तिभि: सञ्चालिता। किञ्च, दर्शनशास्त्राणि षट् देशेऽस्मिन् उपक्रान्तानि ।
हिन्दी व्याख्या :- नहीं नहीं । ये सब प्रवर्तक ही हैं । वास्तव में शास्त्रों का महान परंपरा है ये सब शास्त्र प्रवर्तकों के द्वारा संचालित हैं । और कुछ दर्शनशास्त्र छ: देशों में आरंभ हुए ।
श्रुति: – आचार्यवर ! दर्शनानां के-के प्रवर्तका: शास्त्रकारा: ?
हिन्दी व्याख्या :- आचार्यवर दर्शन शास्त्रों के प्रवर्तक व शास्त्रकर कौन-कौन हैं ।
शिक्षक:– सांख्यदर्शनस्य प्रवर्तक: कपिल: । योगदर्शनस्य पतञ्जलि:। एवं गौतमेन न्यायदर्शनं रचितं कणादेन च वैशेषिकदर्शनम् ।जैमिनिना मीमांसादर्शनम्, बादरायणेन च वेदान्तदर्शनं प्रणीतम् । सर्वेषां शताधिका: व्याख्यातार: स्वतन्त्रग्रन्थकाराश्च वर्तन्ते ।
हिन्दी व्याख्या :- सांख्यदर्शन के प्रवर्तक “महर्षि कपिल” है । योग दर्शन के “महर्षि पतंजलि” एवं “महर्षि गौतम” के द्वारा न्यायदर्शन और “महर्षि कणाद” के द्वारा वैशेषिक दर्शन का रचना किया गया । “महर्षि जैमिनी” द्वारा मीमांसादर्शन और “बादरायण” द्वारा वेदांतदर्शन का रचना किया गया है । सभी सौ से अधिक व्याख्याता और स्वतंत्रग्रंथकार हैं ।
गार्गी – गुरूदेव ! भवान् वैज्ञानिकानि शास्त्राणि कथं न वदति ?
हिन्दी व्याख्या :- गुरूदेव ! आप वैज्ञानिक शास्त्र को क्यों नहीं बोलते हैं ?
शिक्षक:– उक्तं कथयसि । प्राचीनभारते विज्ञानस्य विभिन्नशाखानां शास्त्राणि प्रावर्तन्त । आयुर्वेदशास्त्रे चकरसंहिता, सुश्रुतसंहिता चेति शास्त्रकारनाम्नैव प्रसिद्धे स्त: । तत्रैव रसायनविज्ञानम्, भौतिकविज्ञानञ्च अन्तरर्भू स्त: । ज्योतिषशास्त्रेऽपि खगोलविज्ञानं गणितम् इत्यादीनि शास्त्राणि सन्ति । आर्यभटस्य ग्रन्थ: आर्यभटीयनामा प्रसिद्ध: । एवं वराहमिहिरस्य बृहत्संहिता विशालो ग्रन्थ: यत्र नाना विषया: समन्विता: । वास्तुशास्त्रमपि अत्र व्यापं शास्त्रमासीत् । कृषिविज्ञानं च पराशरेण रचितम् । वस्तुतो नास्ति शास्त्रकाराणाम् अल्पा संख्या ।
हिन्दी व्याख्या :- सही कहते हो । प्राचीन भारत में विज्ञान के विभिन्न शाखा शास्त्र से प्रारंभ हुआ । आयुर्वेद शास्त्र में “चकरसंहिता और सुश्रुतसंहिता” ये शास्त्रकारों के नाम से प्रसिद्ध हैं । वहीं रसायन विज्ञान और भौतिक विज्ञान अंतर्निहित हैं । ज्योतिष शास्त्र में भी खगोल विज्ञान, गणित इत्यादि शास्त्र हैं । आर्यभट्ट का ग्रन्थ “आर्यभटीय” नाम से प्रसिद्ध है । इसप्रकार “वराहमिहिर” के वृहतसंहिता विशाल ग्रंथ है । इसमें अनेक विषय सम्मिलित है । यहाँ वास्तुशास्त्र भी व्यापक शास्त्र था । कृषिविज्ञान के रचनाकार “महर्षि पराशर” है । वास्तव में शास्त्रकारों के संख्या कम नहीं हैं ।
वर्गनायक: – गुरुदेव ! अद्य बहुज्ञातम् । प्राचीनस्य भारतस्य गौरवं सर्वथा समृद्धम् ।
(शिक्षक: वर्गात् निष्क्रामति । छात्रा: अनुगच्छन्ति ।)
हिन्दी व्याख्या :- गुरूदेव ! आज बहुत ज्ञात हुआ । प्राचीन भारत का गौरव सर्वथा समृद्ध रहा है ।
(शिक्षक वर्ग से बाहर निकलते हैं । छात्र पीछे जाते हैं ।)
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