बिहार बोर्ड कक्षा 10 संस्कृत 'पीयूषम्' (भाग 2)
द्वादशः पाठः – "कर्णस्य दानवीरता" | 50 महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर (MCQs)
1. शक्रः कर्णाय किं आशीर्वादं ददाति? / शक्र (इंद्र) कर्ण को क्या आशीर्वाद देते हैं?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (B) सूर्य इव, चन्द्र इव, हिमवान् इव, सागर इव तिष्ठतु ते यशः
स्पष्टीकरण: शक्र सोचते हैं कि 'दीर्घायुर्भव' कहने पर कर्ण दीर्घायु होगा, इसलिए वे कहते हैं— "सूर्य इव, चन्द्र इव, हिमवान् इव, सागर इव तिष्ठतु ते यशः"।
2. शक्रः कर्णं किं याचते? / शक्र (इंद्र) कर्ण से क्या मांगते हैं?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) महत्तरां भिक्षाम्
स्पष्टीकरण: शक्र कर्ण के पास जाकर कहते हैं— "महत्तरां भिक्षां याचे" (मैं बहुत बड़ी भिक्षा मांगता हूँ)।
3. कर्णः प्रथमतः शक्राय किं दातुं इच्छति? / कर्ण सबसे पहले इंद्र को क्या देने की इच्छा व्यक्त करता है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) सालङ्कारं गोसहस्रम्
स्पष्टीकरण: कर्ण सबसे पहले आभूषणों से अलंकृत हजार गाएँ देने का प्रस्ताव रखता है— "सालङ्कारं गोसहस्रं ददामि"।
4. "गोसहस्रम् इति। मुहूर्तंक क्षीरं पिबामि। नेच्छामि कर्ण! नेच्छामि।" – इति कः वदति? / "हजार गाएँ! थोड़ी देर दूध पीऊँगा, नहीं चाहिए कर्ण!" यह कौन कहता है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (B) शक्रः
स्पष्टीकरण: हजार गायों के दान पर शक्र यह कहकर मना कर देते हैं।
5. कर्णः द्वितीये वारे शक्राय किं प्रदातुं प्रयतते? / कर्ण दूसरी बार इंद्र को क्या देने का प्रस्ताव रखता है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) बहुसहस्रं वाजिनाम् (अश्वान्)
स्पष्टीकरण: कर्ण कहता है— "बहुसहस्रं वाजिनां ते ददामि" (हजारों घोड़े देता हूँ)।
6. 'वाजिनाम्' इति पदस्य कः अर्थः? / 'वाजिनाम्' शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (B) अश्वानाम् (घोड़ों का)
स्पष्टीकरण: शक्र इसके उत्तर में कहते हैं— "अश्वमिति! मुहूर्तकम आरोहामि।" (घोड़ा! थोड़ी देर चढ़ूँगा)।
7. कर्णः तृतीये वारे शक्राय किं दातुम् इच्छति? / तीसरी बार कर्ण इंद्र को क्या देने की पेशकश करता है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) वारणानामनेकं वृन्दम् (हाथियों का समूह)
स्पष्टीकरण: कर्ण कहता है— "वारणानामनेकं वृन्दमपि ते ददामि"।
8. 'वारणाम्' इति शब्दस्य पर्यायपदं किम्? / 'वारणाम्' शब्द का अर्थ क्या है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (B) गजानाम् (हाथियों का)
स्पष्टीकरण: शक्र कहते हैं— "गजमिति! मुहूर्तकम आरोहामि, नेच्छामि कर्ण! नेच्छामि।"
9. चतुर्थे वारे कर्णः शक्राय किं प्रदातुं वदति? / चौथी बार कर्ण इंद्र को क्या देने की बात कहता है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) अपर्याप्तं कनकम् (अपरिमितं स्वर्णम्)
स्पष्टीकरण: कर्ण कहता है— "अपर्याप्तं कनकं ददामि" (अथाह सोना देता हूँ)।
10. कर्णस्य 'जित्वा पृथ्वीं ददामि' इति प्रस्तावे शक्रः किं वदति? / "पृथ्वी जीतकर देता हूँ" प्रस्ताव पर शक्र क्या कहते हैं?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) पृथिव्या किं करिष्यामि
स्पष्टीकरण: शक्र कहते हैं— "पृथिव्या किं करिष्यामि" (मैं पृथ्वी का क्या करूँगा?)।
11. "तेन हि अग्निष्टोमफलं ददामि" – इत्युक्ते शक्रः किं वदति? / "अग्निष्टोम यज्ञ का फल देता हूँ" कहने पर शक्र क्या कहते हैं?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) अग्निष्टोमफलेन किं कार्यम्
स्पष्टीकरण: शक्र उत्तर देते हैं— "अग्निष्टोमफलेन किं कार्यम्" (अग्निष्टोम फल से मेरा क्या काम?)।
12. यदा कर्णः "तेन हि मच्छिरः ददामि" इति वदति, तदा शक्रः किं वदति? / जब कर्ण कहता है कि "मैं अपना सिर काट कर देता हूँ", तब शक्र क्या कहते हैं?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) अविहा अविहा! (अहो! अहो!)
स्पष्टीकरण: कर्ण द्वारा सिर देने की बात सुनकर भयभीत होकर शक्र बोलते हैं— "अविहा अविहा"।
13. कर्णस्य देहेन सह किं जनितम् आसीत्? / कर्ण के शरीर के साथ क्या उत्पन्न हुआ था?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) कवचः कुण्डले च
स्पष्टीकरण: श्लोक के अनुसार— "अङ्गैः सहैव जनितं मम देहरक्षा... देयं तथापि कवचं सह कुण्डलाभ्याम्"।
14. कर्णस्य कवचकुण्डले कैः अपि भेद्यं नासीत्? / कर्ण के कवच-कुंडल किनके द्वारा भी नहीं भेदे जा सकते थे?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) देवासुरैरपि
स्पष्टीकरण: श्लोक में वर्णित है— "देवासुरैरपि न भेद्यमिदं सहस्रैः" (देवता और असुर भी इसे नहीं भेद सकते)।
15. यदा कर्णः कवचकुण्डले दातुं प्रयतते, तदा शक्रः सहर्षं किं वदति? / जब कर्ण कवच-कुंडल देने की बात कहता है, तब इंद्र प्रसन्न होकर क्या कहते हैं?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) ददातु, ददातु!
स्पष्टीकरण: पाठ में लिखा है— "शक्रः- (सहर्षम्) ददातु, ददातु।"
16. कपटबुद्धेः कृष्णस्य उपायः कस्य अस्ति इति कर्णः मन्यते? / छली कृष्ण का यह उपाय (कपट) है, ऐसा कौन सोचता है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) कर्णः (आत्मगतम्)
स्पष्टीकरण: कर्ण मन ही मन सोचता है— "एष एवास्य कामः! किं नु खल्वनेककपटबुद्धेः कृष्णस्योपायः?"
17. "अङ्गराज ! न दातव्यम्, न दातव्यम्" इति कः कर्णं वारयति? / "अंगराज! मत दीजिए, मत दीजिए" कहकर कर्ण को कौन रोकता है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) शल्यराजः
स्पष्टीकरण: मद्रराज शल्य कर्ण को कवच-कुंडल दान करने से रोकते हुए कहते हैं— "अङ्गराज ! न दातव्यं न दातव्यम्।"
18. कर्णः शल्यराजं किं वदति? / कर्ण शल्यराज से क्या कहता है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) शल्यराज ! अलमलम् वारयितुम्
स्पष्टीकरण: कर्ण शल्य को रोकते हुए कहता है— "शल्यराज ! अलमलम् वारयितुम्। पश्य -" (शल्यराज! रोकने की आवश्यकता नहीं है, देखो-)।
19. कालपर्ययात् का क्षयं गच्छति? / समय बीतने पर किसका नाश (क्षय) हो जाता है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) शिक्षा
स्पष्टीकरण: श्लोक के अनुसार— "शिक्षा क्षयं गच्छति कालपर्ययात्" (समय बीतने पर शिक्षा भी नष्ट हो जाती है)।
20. कालपर्ययात् के निपतन्ति? / समय बदलने पर कौन गिर जाते हैं?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) सुबद्धमूलाः पादपाः (वृक्षाः)
स्पष्टीकरण: श्लोक में उल्लिखित है— "सुबद्धमूला निपतन्ति पादपाः" (मजबूत जड़ों वाले पेड़ भी गिर जाते हैं)।
21. जलस्थानगतं जलं किं भवति? / जलाशय या स्थान में स्थित जल क्या होता है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) शुष्यति (सूख जाता है)
स्पष्टीकरण: श्लोक की पंक्ति है— "जलं जलस्थानगतं च शुष्यति"।
22. किं सदैव तथैव तिष्ठति? / क्या सदैव वैसा ही (स्थायी) रहता है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) हुतं दत्तं च (हवि और दान)
स्पष्टीकरण: श्लोकांश के अनुसार— "हुतं च दत्तं च तथैव तिष्ठति" (यज्ञ में दी गई आहुति और किया गया दान हमेशा बना रहता है)।
23. "धर्मो हि यत्नैः पुरुषेण साध्यः..." इति श्लोकः केन कथितः? / "धर्मो हि यत्नैः पुरुषेण साध्यः..." श्लोक किसके द्वारा कहा गया है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) कर्णेन
स्पष्टीकरण: यह श्लोक कर्ण द्वारा इंद्र को धर्म और गुणों की महत्ता समझाने के लिए कहा गया है।
24. नृपशriyः (राजाओं की लक्ष्मी) कीदृशी भवति? / राजाओं की धन-संपत्ति कैसी होती है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) भुजङ्गजिह्वाचपला (साँप की जीभ के समान चंचल)
स्पष्टीकरण: श्लोक के अनुसार— "भुजङ्गजिह्वाचपला नृपश्रियः"।
25. हतेषु देहेषु के धरन्ते? / शरीर के नष्ट हो जाने पर भी क्या धारण/जीवित रहते हैं?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) गुणाः
स्पष्टीकरण: श्लोक की पंक्ति है— "तस्मात्प्रजापालनमात्रबुद्ध्या हतेषु देहेषु गुणा धरन्ते"।
26. कर्णः अङ्गराजः कस्य देशस्य राजा आसीत्? / कर्ण किस देश का राजा था?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) अङ्गदेशस्य
स्पष्टीकरण: पाठ में कर्ण को "अङ्गराज" कहकर संबोधित किया गया है।
27. कर्णः कवचं कुण्डले च निकृत्य कस्मै ददाति? / कर्ण अपना कवच और कुंडल काटकर किसे दे देता है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) शक्राय (इन्द्राय)
स्पष्टीकरण: कर्ण शरीर से काटकर छद्मवेशी इंद्र (शक्र) को कवच-कुंडल सौंप देता है ("निकृत्य ददाति")।
28. 'निकृत्य' पदस्य कः अर्थः? / 'निकृत्य' पद का क्या अर्थ है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) छित्त्वा / कर्तनं कृत्वा (काटकर)
स्पष्टीकरण: कर्ण अपने अंग से कवच-कुंडल को अलग/काटकर देता है।
29. 'भुजङ्गः' शब्दस्य कः अर्थः शब्दार्थसूच्यां दत्तः अस्ति? / दिए गए शब्दार्थ सूची में 'भुजङ्गः' का क्या अर्थ है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) सर्पः (सांप)
स्पष्टीकरण: पृष्ठ 105 की शब्दार्थ सारणी में अंकित है— "भुजङ्गः - सर्पः / सांप"।
30. 'इव' शब्दस्य अर्थः कः अस्ति? / 'इव' अव्यय पद का अर्थ क्या है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) सदृशः (जैसा, समान)
स्पष्टीकरण: शब्दार्थ तालिका में उल्लिखित है— "इव - सदृश - जैसा, समान"।
31. 'परिहृत्य' शब्दस्य कः अर्थः? / 'परिहृत्य' पद का क्या अर्थ दिया गया है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) परिहारं कृत्वा (हटाकर)
स्पष्टीकरण: शब्दार्थ में लिखा है— "परिहृत्य - परिहारं कृत्वा - हटाकर"।
32. 'निवर्त्य' इति पदस्य कः अर्थः? / 'निवर्त्य' शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) गत्वा (जाकर)
स्पष्टीकरण: शब्दार्थ सारणी के अनुसार— "निवर्त्य - गत्वा - जाकर"।
33. 'प्रीत:' इति शब्दस्य अर्थः कः? / 'प्रीत:' पद का अर्थ क्या है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) प्रसन्नः (खुश)
स्पष्टीकरण: शब्दार्थ तालिका के अनुसार— "प्रीत: - प्रसन्नः - खुश"।
34. 'महत्तराम्' शब्दस्य अर्थः कः? / 'महत्तराम्' का क्या अर्थ है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) अधिकतरम् (और बड़ी)
स्पष्टीकरण: शब्दार्थ सारणी में दिया है— "महत्तराम् - अधिकतरम् - और बड़ी"।
35. 'वक्ष्ये' इति क्रियापदस्य कः अर्थः? / 'वक्ष्ये' पद का अर्थ क्या है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) कथयिष्यामि (कहूँगा)
स्पष्टीकरण: शब्दार्थ में अंकित है— "वक्ष्ये - कथयिष्यामि - कहूँगा"।
36. 'कर्णस्य दानवीरता' पाठः कस्य रूपकस्य भागः अस्ति? / 'कर्णस्य दानवीरता' पाठ किस नाटक/रूपक का भाग है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) कर्णभारम्
स्पष्टीकरण: यह पाठ महाकवि भास द्वारा रचित 'कर्णभारम्' नामक रूपक से संकलित है।
37. 'कर्णभारम्' नाटकस्य रचयिता कः अस्ति? / 'कर्णभारम्' नाटक के रचयिता कौन हैं?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) भासः
स्पष्टीकरण: 'कर्णभारम्' महाकवि भास के १३ नाटकों में से एक प्रमुख नाटक है।
38. शक्रः कस्य छद्मवेषं धृत्वा आयाति? / शक्र (इंद्र) किसका छद्मवेश धारण करके आते हैं?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) ब्राह्मणस्य
स्पष्टीकरण: इंद्र कपटपूर्वक ब्राह्मण का रूप धारण करके कर्ण के पास भिक्षा मांगने आते हैं।
39. कर्णः कस्य पुत्रः आसीत्? / कर्ण किसका पुत्र था?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) सूर्यस्य (कुन्त्याश्च)
स्पष्टीकरण: कर्ण सूर्यदेव के वरदान से कुंती का पुत्र बना था और जन्म से ही सूर्यप्रदत्त कवच-कुंडल धारण करता था।
40. कर्णः कस्य पक्षतः युद्धं करोति स्म? / कर्ण किसकी ओर से युद्ध कर रहा था?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) कौरवपक्षतः
स्पष्टीकरण: महाभारत में कर्ण कौरवों (दुर्योधन) की ओर से युद्ध कर रहा था।
41. "न भेतव्यं न भेतव्यम्" इति कः वदति? / "डरिए मत, डरिए मत" यह कौन कहता है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) कर्णः
स्पष्टीकरण: शक्र द्वारा 'अविहा अविहा' कहने पर कर्ण आश्वासन देते हुए कहता है— "न भेतव्यं न भेतव्यम्, प्रसीदतु भवान्"।
42. "पादपाः" पदस्य कः अर्थः? / 'पादपाः' पद का अर्थ क्या है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) वृक्षाः (पेड़)
स्पष्टीकरण: श्लोक में 'पादपाः' शब्द पेड़ों के लिए प्रयुक्त हुआ है— "सुबद्धमूला निपतन्ति पादपाः"।
43. "सुबद्धमूलाः" इति पदं कस्य विशेषणम् अस्ति? / 'सुबद्धमूलाः' किस पद का विशेषण है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) पादपाः
स्पष्टीकरण: पाठ्यांश में कहा गया है— "सुबद्धमूला निपतन्ति पादपाः" (दृढ़/मजबूत जड़ों वाले वृक्ष)।
44. "कुण्डलाभ्याम्" पदे का विभक्तिः अस्ति? / 'कुण्डलाभ्याम्' पद में कौन-सी विभक्ति है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) तृतीया / चतुर्थी / पञ्चमी (द्विवचनम्)
स्पष्टीकरण: कुंडल शब्द के द्विवचन में 'सह' अव्यय के योग में तृतीया द्विवचन "कुण्डलाभ्याम्" का प्रयोग हुआ है ("कवचं सह कुण्डलाभ्याम्")।
45. "कृष्णस्योपायः" पदस्य सन्धि-विच्छेदः कः? / 'कृष्णस्योपायः' का सही संधि विच्छेद क्या है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) कृष्णस्य + उपायः
स्पष्टीकरण: गुण संधि के नियमानुसार (अ + उ = ओ), 'कृष्णस्य + उपायः' से 'कृष्णस्योपायः' बनता है।
46. "तथैव" पदस्य सन्धि-विच्छेदः कः अस्ति? / 'तथैव' पद का संधि विच्छेद क्या है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) तथा + एव
स्पष्टीकरण: वृद्धि स्वर संधि (आ + ए = ऐ) के अनुसार 'तथा + एव' से 'तथैव' पद बनता है।
47. "देहरक्षा" इति पदस्य समास-विग्रहः कः? / 'देहरक्षा' का सही समास विग्रह क्या होगा?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) देहस्य रक्षा (षष्ठी तत्पुरुषः)
स्पष्टीकरण: देह (शरीर) की रक्षा, अतः यह षष्ठी तत्पुरुष समास का उदाहरण है।
48. "गृह्यताम्" इति क्रियापदं कसमिन् लकारे अस्ति? / 'गृह्यताम्' क्रियापद किस लकार में है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) लोट् लकारे
स्पष्टीकरण: 'गृह्यताम्' कर्मणि प्रयोग के लोट् लकार (आज्ञा/स्वीकृति अर्थ) का रूप है।
49. 'दानवीरः' इति नाम्ना कः प्रसिद्धः अस्ति? / 'दानवीर' के नाम से कौन प्रसिद्ध है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) कर्णः
स्पष्टीकरण: अपनी अतुलनीय दानशीलता एवं प्राणों की चिंता किए बिना कवच-कुंडल दान करने के कारण कर्ण को 'दानवीर' कहा जाता है।
50. अस्मात् पाठात् का शिक्षा लभ्यते? / इस पाठ से क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर एवं स्पष्टीकरण देखें
उत्तर: (A) दानस्य सर्वोपरि महत्ता (दानं सर्वदा अमरा भवति)
स्पष्टीकरण: पाठ का मुख्य संदेश यही है कि भौतिक वस्तुएं, शक्ति और शरीर नष्ट हो जाते हैं, लेकिन यज्ञ की आहुति (हुतम्) और सुपात्र को दिया गया दान (दत्तम्) सदैव अमर रहते हैं।
0 Comments