Chapter 5. अर्थ-व्यवस्था और आजीविका | BSEB 10 History Subjective


बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) कक्षा 10 इतिहास

अध्याय 5: "अर्थ-व्यवस्था और आजीविका" (औद्योगीकरण का युग) — 50 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

अति-लघु उत्तरीय प्रश्न (One-Liner / 1 अंक वाले प्रश्न)
1. औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) की शुरुआत सबसे पहले किस देश में हुई?
इंग्लैंड में (18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सूती वस्त्र उद्योग से)।
2. 'औद्योगिक क्रांति' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किसने किया था?
फ्रांसीसी दार्शनिक लुई ब्लॉ (Louis Blanc) ने (बाद में इसे अर्नोल्ड टॉयनबी ने लोकप्रिय बनाया)।
3. स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny) का आविष्कार किसने और कब किया?
1764 ई. में जेम्स हारग्रीव्स ने।
4. वाष्प इंजन (Steam Engine) का आविष्कार किसने किया था?
1769 ई. में जेम्स वाट ने (थॉमस न्यूकोमेन के मॉडल में सुधार करके)।
5. फ्लाइंग शटल (Flying Shuttle) का आविष्कार किसने किया था?
1733 ई. में जॉन के (John Kay) ने।
6. वाटर फ्रेम (Water Frame) का आविष्कार किसने किया था?
1769 ई. में रिचर्ड आर्कराइट ने (जल शक्ति से चलने वाली कताई मशीन)।
7. पावरलूम (Powerloom / वाष्पचालित करघा) का निर्माण किसने किया?
1785 ई. में एडमंड कार्टराइट ने।
8. सेफ्टी लैम्प (Safety Lamp) का आविष्कार किसने किया था?
1815 ई. में हम्फ्री डेवी ने (खदानों में काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा हेतु)।
9. भारत में पहला सूती वस्त्र मिल कब और कहाँ स्थापित किया गया?
1854 ई. में बंबई (मुंबई) में कावसजी नानाभाई डाबर द्वारा।
10. भारत में पहली जूट मिल कब और कहाँ खुली थी?
1855 ई. में बंगाल के रिशरा में (जॉर्ज ऑकलैंड द्वारा)।
11. टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) की स्थापना कब और कहाँ हुई?
1907 ई. में जमशेदजी नौशेरवानजी टाटा द्वारा साक्षी (वर्तमान जमशेदपुर, झारखंड) में।
12. अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना कब हुई?
31 अक्टूबर 1920 को (लाला लाजपत राय इसके प्रथम अध्यक्ष बने)।
13. न्यूनतम मजदूरी कानून (Minimum Wages Act) किस वर्ष पारित हुआ?
1948 ई. में।
14. भारत में पहला फैक्ट्री एक्ट (Factory Act) कब पारित हुआ?
1881 ई. में (लॉर्ड रिपन के कार्यकाल में)।
15. राष्ट्रीय श्रम आयोग (National Commission on Labour) की स्थापना कब हुई थी?
1962 ई. में।
16. कोयला उद्योग का प्रारंभ भारत में कब और कहाँ से हुआ?
1814 ई. में पश्चिम बंगाल के रानीगंज से।
17. 1917 ई. में कलकत्ता में भारत की पहली देशी जूट मिल किसने स्थापित की?
सेठ हुकुमचंद ने।
18. इंग्लैंड में सभी वयस्क पुरुषों और महिलाओं को मताधिकार (Adult Suffrage) कब प्राप्त हुआ?
1918 ई. में (रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट के तहत)।
19. बाड़ेबंदी या नाकाबंदी प्रथा (Enclosure Movement) की शुरुआत कहाँ हुई थी?
इंग्लैंड में।
20. स्लम पद्धति (Slum System) की शुरुआत किस क्रांति के फलस्वरूप हुई?
औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप।
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions / 2-3 अंक वाले प्रश्न)
21. औद्योगिक क्रांति से आप क्या समझते हैं?
मानव श्रम और हाथ के औजारों के स्थान पर वाष्प शक्ति तथा मशीनों द्वारा बड़े पैमाने पर कारखानों में उत्पादन की प्रक्रिया को 'औद्योगिक क्रांति' कहा जाता है। इससे उत्पादन की गति में भारी वृद्धि हुई और घरेलू उत्पादन प्रणाली का स्थान कारखाना प्रणाली ने ले लिया।
22. औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम इंग्लैंड में ही क्यों शुरू हुई? कोई दो कारण लिखें।
  • कच्चे माल और ऊर्जा स्रोतों की उपलब्धता: इंग्लैंड में लोहे और कोयले की खदानें पास-पास स्थित थीं, जिससे मशीन निर्माण और उन्हें चलाने के लिए ईंधन आसानी से उपलब्ध हुआ।
  • विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य: इंग्लैंड के पास भारत और अमेरिका जैसे विशाल उपनिवेश थे, जहाँ से सस्ता कच्चा माल (जैसे कपास) मिलता था और तैयार माल बेचने के लिए सुरक्षित बाजार उपलब्ध था।
23. स्लम पद्धति (Slum System) क्या थी और यह कैसे विकसित हुई?
औद्योगिक क्रांति के दौरान कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए शहरों में रहने की समुचित व्यवस्था नहीं थी। मिल मालिकों ने सस्ते और छोटे-छोटे कमरों वाली बस्तियां बसाईं, जहाँ न स्वच्छ हवा थी, न पानी और न ही शौचालय की व्यवस्था। गंदगी और घनी आबादी वाले इन अस्वास्थ्यकर आवासीय क्षेत्रों को 'स्लम' कहा गया।
24. फैक्ट्री प्रणाली (Factory System) के विकास के दो प्रमुख कारणों का उल्लेख करें।
  • विशाल एवं भारी मशीनों का आगमन: वाष्प शक्ति से चलने वाली नई मशीनें (जैसे पावरलूम, वाटर फ्रेम) इतनी बड़ी और महंगी थीं कि उन्हें कारीगर अपने घरों में नहीं लगा सकते थे।
  • पूंजीपतियों का नियंत्रण: बड़े पैमाने पर कच्चा माल खरीदने, उत्पादन लागत घटाने और एक ही छत के नीचे सैकड़ों मजदूरों की निगरानी के लिए पूंजीपतियों ने कारखाने स्थापित किए।
25. निरौद्योगीकरण (De-industrialization) क्या है?
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान मशीन निर्मित सस्ते और बारीक ब्रिटिश वस्त्रों के भारतीय बाजार में प्रवेश के कारण भारत के पारंपरिक हथकरघा, बुनाई और कुटीर उद्योग पूरी तरह बर्बाद हो गए। भारतीय कारीगरों और दस्तकारों के बेरोजगार होकर कृषि पर निर्भर होने की इस विनाशकारी प्रक्रिया को 'निरौद्योगीकरण' कहा जाता है।
26. 1881 के प्रथम फैक्ट्री एक्ट के प्रमुख प्रावधान क्या थे?
  • 7 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के कारखानों में काम करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया।
  • 7 से 12 वर्ष के बच्चों के लिए काम के घंटे प्रतिदिन अधिकतम 9 घंटे तय किए गए।
  • बच्चों को महीने में 4 दिन का अनिवार्य अवकाश देने और खतरनाक मशीनों की घेराबंदी (Fencing) का नियम बना।
27. AITUC (ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस) की स्थापना क्यों और कब हुई थी?
कारखानों में भारतीय मजदूरों के अमानवीय शोषण, कम मजदूरी और लंबे कार्य-घंटों के खिलाफ श्रमिकों को एकजुट करने के उद्देश्य से 31 अक्टूबर 1920 को बंबई में AITUC की स्थापना हुई। इसके पहले अध्यक्ष लाला लाजपत राय बने।
28. फ्लाईंग शटल और स्पिनिंग जेनी ने कपड़ा उत्पादन को कैसे बदला?
  • जॉन के के फ्लाईंग शटल (1733) ने कम समय में चौड़े कपड़े बुनना संभव बनाया और बुनाई की गति दोगुनी कर दी।
  • जब धागे की कमी होने लगी, तो जेम्स हारग्रीव्स की स्पिनिंग जेनी (1764) ने एक साथ आठ या अधिक तकलियों को घुमाकर धागा कातना शुरू किया, जिससे धागे का उत्पादन कई गुना बढ़ गया।
29. औद्योगिकीकरण ने मजदूरों की आजीविका को किस तरह संकट में डाल दिया?
मशीनों के आते ही जहां पहले सौ मजदूर काम करते थे, वहां केवल एक मशीन और दो मजदूर पर्याप्त हो गए। इससे भयंकर बेरोजगारी फैली। काम की तलाश में शहरों में आए मजदूरों को 14-16 घंटे तक नाममात्र की मजदूरी पर नारकीय स्थितियों में काम करना पड़ा।
30. भारत में सूती वस्त्र उद्योग के विकास में 1914-1918 (प्रथम विश्व युद्ध) का क्या योगदान था?
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश मिलें युद्ध सामग्री और सेना की वर्दी बनाने में व्यस्त हो गईं। ब्रिटेन से भारत आने वाले कपड़ों का आयात लगभग बंद हो गया। इस खालीपन को भरने और सेना की जरूरतों की आपूर्ति के लिए भारतीय कपड़ा मिलों को बड़े ऑर्डर मिले, जिससे भारतीय सूती उद्योग को तीव्र गति से फलने-फूलने का अवसर मिला।
31. जमशेदजी टाटा का भारत के औद्योगिक विकास में क्या योगदान है?
जमशेदजी टाटा ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए आधुनिक भारी उद्योग की नींव रखी। उन्होंने 1907 में जमशेदपुर में 'टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी' (TISCO) की स्थापना की, जिसने भारत में रेल लाइनों, पुलों और मशीनरी निर्माण के लिए उच्च गुणवत्ता वाले इस्पात का उत्पादन शुरू किया।
32. औपनिवेशिक काल में 'गुमाश्ता' (Gumastha) कौन थे?
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा भारतीय बुनकरों की निगरानी करने, कच्चा माल अग्रिम (पेशगी) देने और तैयार कपड़ा एकत्र करने के लिए नियुक्त वेतनभोगी एजेंटों को 'गुमाश्ता' कहा जाता था। ये अक्सर बुनकरों पर अत्याचार करते थे और उन्हें कंपनी के अलावा किसी अन्य को कपड़ा बेचने से रोकते थे।
33. 'कार्डिंग' (Carding) और 'कताई' (Spinning) से क्या अभिप्राय है?
  • कार्डिंग (धुनाई): कपास या ऊन के रेशों को सुलझाकर और साफ करके कताई के लिए तैयार करने की प्रक्रिया।
  • कताई (Spinning): सुलझाए गए रेशों को खींचकर और ऐंठकर धागा तैयार करने की प्रक्रिया।
34. इंग्लैंड में बाड़ेबंदी (Enclosure Acts) ने औद्योगीकरण को कैसे बल दिया?
संसद द्वारा कानून बनाकर साझा और खुली जमीनों को बड़े जमींदारों द्वारा घेर लिया गया। इससे छोटे किसान और खेत मजदूर भूमिहीन हो गए। उनके पास जीविका का कोई साधन नहीं बचा, इसलिए वे सस्ते श्रम के रूप में शहरों की ओर भागे और कारखानों को प्रचुर मात्रा में मजदूर मिल गए।
35. भारत में कोयला और लोहा उद्योग के विकास का क्या महत्व था?
कोयला और लोहा किसी भी देश के औद्योगीकरण की रीढ़ होते हैं। 1853 में रेलवे के विस्तार के बाद इंजनों के ईंधन के लिए कोयले तथा पटरियों और वैगनों के निर्माण के लिए लोहे की भारी मांग पैदा हुई, जिसने भारत में भारी खनन और इंजीनियरिंग उद्योगों को जन्म दिया।
36. लुडिज्म (Luddism) आंदोलन क्या था?
1811 से 1817 के बीच इंग्लैंड में नेड लुड के नेतृत्व में मजदूरों का एक आंदोलन था। मशीनों के कारण बेरोजगार हुए कारीगरों और मजदूरों ने भुखमरी से तंग आकर रात के अंधेरे में कारखानों में घुसकर मशीनों को तोड़ना शुरू कर दिया था।
37. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम (1948) का क्या महत्व है?
स्वतंत्र भारत में पारित इस कानून का उद्देश्य असंगठित और औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूरों को उचित मजदूरी दिलाना था। इसके तहत सरकार ने तय किया कि मजदूरी इतनी जरूर हो जिससे एक मजदूर और उसके परिवार को रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य और बुनियादी शिक्षा मिल सके।
38. औद्योगिक क्रांति के दौरान बाल श्रम और महिला श्रम का शोषण क्यों बढ़ गया?
मिल मालिक पुरुषों की तुलना में महिलाओं और छोटे बच्चों को प्राथमिकता देते थे क्योंकि वे कम मजदूरी में काम करने को तैयार हो जाते थे, मशीनों की संकरी जगहों में आसानी से हाथ डाल सकते थे और पुरुषों की तरह हड़ताल या विरोध नहीं करते थे।
39. कुटीर उद्योग और लघु उद्योग में क्या अंतर है?
  • कुटीर उद्योग: यह पूर्णतः परिवार के सदस्यों द्वारा पारंपरिक औजारों और स्थानीय कच्चे माल से घर पर ही चलाया जाता है (जैसे— टोकरी बनाना, खादी बुनाई)।
  • लघु उद्योग: इसमें कुछ भाड़े के मजदूरों, बिजली चालित छोटी मशीनों और बाहरी पूंजी का उपयोग होता है (जैसे— सिलाई इकाई, चमड़े के जूते का कारखाना)।
40. मजदूर वर्ग के अधिकारों की रक्षा में 'ट्रेड यूनियनों' (श्रम संघों) की क्या भूमिका रही?
ट्रेड यूनियनों ने मजदूरों को संगठित मंच दिया। सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) और हड़तालों के माध्यम से उन्होंने काम के घंटे 8 घंटे तय करवाए, मजदूरी में वृद्धि कराई और कार्यस्थल पर सुरक्षा व स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएं हासिल कीं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions / 4-5 अंक वाले प्रश्न)
41. औद्योगिक क्रांति के कारणों एवं इसके बहुआयामी प्रभावों की विस्तृत विवेचना करें।
18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इंग्लैंड से शुरू हुई औद्योगिक क्रांति ने मानव इतिहास को नई दिशा दी:
  • प्रमुख कारण:
    • कृषि क्रांति और सस्ता श्रम: बाड़ेबंदी प्रथा से विस्थापित हुए भूमिहीन किसान सस्ते श्रम के रूप में शहरों में उपलब्ध हुए।
    • कोयला एवं लोहे के भंडार: ब्रिटेन में लोहे और कोयले की प्रचुरता ने वाष्प शक्ति और मशीनों के निर्माण को तेज किया।
    • वैज्ञानिक आविष्कार: फ्लाईंग शटल, स्पिनिंग जेनी, वाटर फ्रेम और जेम्स वाट के स्टीम इंजन ने उत्पादन को अभूतपूर्व गति दी।
    • उपनिवेशों का विस्तार: कच्चे माल की सस्ती आपूर्ति और तैयार माल की खपत के लिए ब्रिटेन के पास भारत जैसे विशाल बाजार थे।
  • प्रमुख प्रभाव:
    • आर्थिक प्रभाव: कुटीर उद्योग नष्ट हुए और कारखाना प्रणाली स्थापित हुई; उत्पादन में कई गुना वृद्धि हुई तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार बढ़ा।
    • सामाजिक प्रभाव: समाज दो विरोधी वर्गों में बंट गया— पूंजीपति (Bourgeoisie) और सर्वहारा मजदूर वर्ग (Proletariat)। स्लम बस्तियों और बाल शोषण में वृद्धि हुई।
    • राजनीतिक प्रभाव: पूंजीपतियों का संसद पर प्रभाव बढ़ा और बाद में अधिकारों के लिए चार्टिस्ट व ट्रेड यूनियन आंदोलन उभरे।
42. ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में पारंपरिक हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों के पतन के कारणों का विश्लेषण करें।
ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों ने भारत के विश्वप्रसिद्ध कपड़ा और हस्तशिल्प उद्योग को तहस-नहस कर दिया:
  • मशीन निर्मित सस्ते माल से असमान प्रतिस्पर्धा: इंग्लैंड के मैनचेस्टर और लंकाशायर की मिलों में वाष्प चालित मशीनों से बना कपड़ा भारत के हाथ से बुने कपड़ों की तुलना में बहुत सस्ता और चमकीला था, जिसका भारतीय बुनकर मुकाबला नहीं कर सके।
  • भेदभावपूर्ण सीमा शुल्क नीति (Tariff Policy): ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटेन आने वाले भारतीय तैयार माल पर 70% से 80% तक भारी आयात शुल्क लगाया, जबकि ब्रिटेन से भारत आने वाले कपड़े पर नाममात्र का शुल्क रखा गया।
  • देसी रियासतों और राजाओं का अंत: पारंपरिक दस्तकारों और शिल्पकारों के सबसे बड़े संरक्षक और खरीदार भारत के राजा, नवाब और सामंत थे। ब्रिटिश साम्राज्य में रियासतों के विलय से यह संरक्षण समाप्त हो गया।
  • कच्चे माल का कृत्रिम अभाव: ब्रिटिश व्यापारियों ने भारत के कच्चे कपास को ऊंचे दामों पर खरीदकर सीधे इंग्लैंड भेजना शुरू कर दिया, जिससे भारतीय स्थानीय बुनकरों को कच्चा माल मिलना बंद या अत्यधिक महंगा हो गया।
43. भारत में आधुनिक बड़े उद्योगों (सूती वस्त्र, जूट एवं लोहा-इस्पात) के विकास के प्रमुख चरणों का वर्णन करें।
19वीं सदी के मध्य से भारत में आधुनिक उद्योगों का सूत्रपात हुआ:
  • सूती वस्त्र उद्योग: 1854 में कावसजी डाबर ने बंबई में पहली सफल मिल लगाई। 1870 के बाद यह उद्योग अहमदाबाद, शोलापुर और कानपुर तक फैला। प्रथम विश्व युद्ध के समय विदेशी माल की कमी ने इसे तीव्र विस्तार दिया।
  • जूट उद्योग: 1855 में रिशरा (बंगाल) में पहली जूट मिल स्थापित हुई। यह उद्योग मुख्यतः यूरोपीय पूंजीपतियों के हाथ में था। 1917 में सेठ हुकुमचंद ने पहली देशी जूट मिल कलकत्ता में शुरू की।
  • लोहा और इस्पात उद्योग: 1907 में जमशेदजी टाटा द्वारा स्थापित TISCO ने 1911 में कच्चा लोहा (Pig Iron) और 1912 में स्टील का उत्पादन शुरू किया। प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार द्वारा रेल पटरियों के भारी ऑर्डर मिलने से TISCO को ऐतिहासिक संबल मिला।
  • सरकारी नीतियों की बाधाएं: ब्रिटिश सरकार ने भारतीय उद्योगों को कोई संरक्षण नहीं दिया, फिर भी भारतीय उद्योगपतियों (जैसे बिड़ला, टाटा) ने स्वदेशी आंदोलन की भावना से इनका विस्तार किया।
44. "औद्योगीकरण ने एक नए समाज और नई जीवनशैली को जन्म दिया।" इस कथन के आलोक में औद्योगीकरण के सामाजिक परिणामों की समीक्षा करें।
औद्योगीकरण केवल उत्पादन की तकनीक नहीं, बल्कि एक संपूर्ण सामाजिक क्रांति थी:
  • दो नए सामाजिक वर्गों का उदय:
    • पूंजीपति वर्ग: जिनके पास मिलें, खदानें और अकूत पूंजी थी; इन्होंने राजनीति और अर्थव्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया।
    • सर्वहारा श्रमिक वर्ग: जिनके पास अपनी आजीविका चलाने के लिए केवल अपना श्रम बेचने का विकल्प था।
  • महिलाओं और बच्चों की स्थिति: पारिवारिक आय पूरी न पड़ने के कारण महिलाओं और 5-6 वर्ष के बच्चों को भी खदानों और कताई मिलों में 14-16 घंटे काम पर झोंक दिया गया, जिससे उनका स्वास्थ्य बर्बाद हुआ।
  • शहरीकरण और स्लम का नारकीय जीवन: ग्रामीण आबादी के शहरों में उमड़ने से गंदगी, बदबूदार नालियों और अंधेरे कमरों वाले स्लम बने। हैजा और तपेदिक (टीबी) जैसी महामारियों ने मजदूरों के जीवन को लील लिया।
  • पारिवारिक ताने-बाने का टूटना: काम के अलग-अलग घंटों और अत्यधिक थकावट ने पारंपरिक संयुक्त परिवार प्रणाली को नष्ट कर दिया और व्यक्तिवाद को बढ़ावा दिया।
45. भारत में मजदूर आंदोलन के विकास और श्रम कानूनों के क्रमिक सुधारों पर एक सारगर्भित निबंध लिखें।
अमानवीय शोषण के खिलाफ भारतीय मजदूरों का संघर्ष कई चरणों में विकसित हुआ:
  • प्रारंभिक चरण (19वीं सदी): एन.एम. लोखंडे ने 1890 में 'बॉम्बे मिलहैंड्स एसोसिएशन' बनाकर रविवार की छुट्टी और भोजन अवकाश की मांग उठाई। इस दबाव में 1881 और 1891 के फैक्ट्री एक्ट बने, जिनमें कार्य-घंटों पर कुछ सीमाएं लगीं।
  • संगठित चरण (1920 का दशक): 1920 में AITUC की स्थापना हुई। इसके बाद कम्युनिस्ट और राष्ट्रवादी नेताओं (जैसे लाला लाजपत राय, एन.एम. जोशी) ने मजदूरों को लामबंद किया। 1926 में 'ट्रेड यूनियन एक्ट' पारित हुआ, जिसने श्रमिक संघों को कानूनी मान्यता दी।
  • राष्ट्रवादी आंदोलनों से जुड़ाव: असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन में रेलवे, बंदरगाह और कपड़ा मिल मजदूरों ने व्यापक राजनीतिक हड़तालें कीं।
  • स्वतंत्रता पश्चात सुधार: 1948 में 'फैक्ट्री एक्ट 1948' और 'न्यूनतम मजदूरी कानून 1948' लागू हुए, जिसने प्रतिदिन 8 घंटे का कार्य समय, काम की मानवीय परिस्थितियां, मातृत्व अवकाश और न्यूनतम वेतन अनिवार्य कर दिया।
46. स्वदेशी आंदोलन (1905) ने भारतीय उद्योगों को किस प्रकार पुनर्जीवित किया?
1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में उपजे स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को क्रांतिकारी मोड़ दिया:
  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार: मैनचेस्टर के विदेशी कपड़ों, नमक और चीनी की होली जलाई गई, जिससे विदेशी आयात में अचानक भारी गिरावट आई।
  • स्वदेशी मिलों की मांग में उछाल: भारतीयों द्वारा केवल देश में बने वस्त्र पहनने की प्रतिज्ञा से भारतीय कपड़ा मिलों और हथकरघा बुनकरों के तैयार माल की मांग अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई।
  • नए देशी उद्यमों की स्थापना: भारतीय पूंजीपतियों ने कपड़ा मिलें, साबुन के कारखाने, माचिस उद्योग, राष्ट्रीय बैंक (जैसे पंजाब नेशनल बैंक) और स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनियां शुरू कीं।
  • आत्मनिर्भरता का संदेश: इस आंदोलन ने सिद्ध किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता अनिवार्य शर्त है।
47. प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने ब्रिटिश और भारतीय दोनों अर्थव्यवस्थाओं के स्वरूप को कैसे बदल दिया?
प्रथम विश्व युद्ध ने वैश्विक औद्योगिक संतुलन को पलट कर रख दिया:
  • ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर असर:
    • युद्ध के खर्चों ने ब्रिटेन को कर्जदार बना दिया। मिलें केवल गोला-बारूद बनाने में लग गईं।
    • युद्ध के बाद ब्रिटेन कभी भी भारत और विश्व बाजार में अपनी पुरानी इजारेदारी (एकाधिकार) वापस नहीं पा सका; जापान और अमेरिका उससे आगे निकल गए।
  • भारतीय उद्योगों का कायाकल्प:
    • ब्रिटिश आयात ठप होने से भारतीय घरेलू बाजार पूरी तरह भारतीय मिलों के हाथ में आ गया।
    • भारतीय कारखानों को सेना के लिए जूट की बोरियां, फौजियों की वर्दियां, चमड़े के जूते और तंबू बनाने के विशाल सरकारी ठेके मिले।
    • नए कारखाने स्थापित हुए और पुराने कारखानों में कई पालियों (Shifts) में काम होने लगा, जिससे उद्योगपतियों को अभूतपूर्व मुनाफा हुआ।
48. इंग्लैंड में औद्योगीकरण से पहले की 'आदि-औद्योगीकरण' (Proto-industrialization) प्रणाली की विशेषताएं स्पष्ट करें।
कारखानों की स्थापना से पूर्व यूरोप में बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए होने वाले उत्पादन को 'आदि-औद्योगीकरण' कहा जाता है:
  • शहरों के गिल्ड्स (Guilds) का नियंत्रण: शहरों में शक्तिशाली व्यापारिक गिल्ड्स का उत्पादन और कीमतों पर एकाधिकार था, और वे नए लोगों को व्यापार में नहीं आने देते थे।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादन: व्यापारी गांवों की ओर रुख करते थे। वे गरीब किसानों और काश्तकारों को अग्रिम पेशगी (पूंजी) देकर उनसे अपने घरों में ही कताई और बुनाई का काम करवाते थे।
  • पारिवारिक श्रम का उपयोग: इसमें पूरा परिवार (स्त्री, पुरुष, बच्चे) खेतों के खाली समय में उत्पादन में हाथ बंटाता था, जिससे उनकी आय में सुधार होता था।
  • लंदन एक फिनिशिंग सेंटर के रूप में: गांवों से कच्चा धागा और कपड़ा तैयार होकर लंदन आता था, जहाँ कपड़ों की रंगाई और फिनिशिंग करके उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात किया जाता था।
49. 'उपनिवेशवाद' और 'औद्योगीकरण' के बीच के अंतर्संबंधों को रेखांकित करें।
औद्योगीकरण और उपनिवेशवाद एक-दूसरे के पूरक बनकर फले-फूले:
  • कच्चे माल की अनवरत आपूर्ति: औद्योगिक क्रांति को चलाने के लिए कपास, रबर, नील, जूट और खनिज जैसे कच्चे माल की असीम आवश्यकता थी, जिसे ब्रिटेन ने भारत और अफ्रीका जैसे उपनिवेशों का शोषण करके पूरा किया।
  • संरक्षित और बंधुआ बाजार: मशीनों द्वारा उत्पादित विशाल माल को खपाने के लिए उपनिवेशों को एक सुरक्षित बाजार बनाया गया, जहाँ विदेशी प्रतिस्पर्धा को कानूनन रोक दिया गया।
  • पूंजी का पुनर्निवेश: उपनिवेशों से निचोड़े गए राजस्व (Drain of Wealth) को ब्रिटिश पूंजीपतियों ने पुनः रेलवे, खदानों और बागानों में लगाकर और अधिक मुनाफा कमाया। इस प्रकार औद्योगीकरण ने उपनिवेशवाद को जन्म दिया और उपनिवेशवाद ने औद्योगीकरण को पोषित किया।
50. घरेलू प्रणाली (Putting-out System) और कारखाना प्रणाली (Factory System) के बीच तुलनात्मक अंतर स्पष्ट करें।
आधार घरेलू / पुटिंग-आउट प्रणाली (Putting-out) कारखाना प्रणाली (Factory System)
कार्यस्थल कारीगर का अपना घर या छोटी ग्रामीण कार्यशाला। पूंजीपति द्वारा निर्मित विशाल केंद्रीय कारखाना।
उपकरण एवं ऊर्जा हाथ से चलने वाले पारंपरिक औजार; मानव या पशु श्रम। वाष्प या बिजली शक्ति से चलने वाली विशाल एवं जटिल मशीनें।
पूंजी एवं स्वामित्व व्यापारी केवल कच्चा माल देता था; औजार कारीगर के अपने होते थे। भवन, मशीनरी, कच्चा माल—सब कुछ पूंजीपति का होता है; मजदूर केवल वेतनभोगी होता है।
उत्पादन का पैमाना सीमित और धीमी गति से उत्पादन; स्थानीय या सीमित निर्यात हेतु। भारी मात्रा में मानकीकृत (Standardized) बड़े पैमाने का उत्पादन।
निगरानी एवं अनुशासन कारीगर अपने समय और गति के अनुसार काम करने के लिए स्वतंत्र था। कड़े नियम, निश्चित समय (शिफ्ट), और फोरमैन द्वारा निरंतर निगरानी व अनुशासन।

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