Chapter 5. अर्थ-व्यवस्था और आजीविका | BSEB 10 History Notes


BSEB कक्षा 10 इतिहास — अध्याय 5: अर्थ-व्यवस्था और आजीविका

1. अध्याय परिचय (Introduction)

मानव इतिहास में उत्पादन प्रणाली के विकास ने अर्थव्यवस्था और आम लोगों की आजीविका को समय-समय पर गहराई से प्रभावित किया है। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटेन से शुरू हुई औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) ने हाथ से उत्पादन करने की कुटीर व्यवस्था को मशीनी कारखानों में बदल दिया।

अध्याय 'अर्थ-व्यवस्था और आजीविका' औद्योगीकरण की शुरुआत, प्रमुख वैज्ञानिक आविष्कारों, फैक्ट्री प्रणाली की स्थापना, भारतीय पारंपरिक हस्तशिल्प उद्योग के विनाश, औपनिवेशिक काल में आधुनिक भारतीय उद्योगों के उदय तथा श्रमिक वर्ग के संघर्ष एवं मजदूर आंदोलनों का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

2. अध्याय का संक्षिप्त विवरण (Overview)

  • आदि-औद्योगीकरण (Proto-industrialization): कारखानों की स्थापना से पहले का दौर, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए उत्पादन बड़े पैमाने पर गांवों में घरों के भीतर होता था और इसका नियंत्रण व्यापारियों के पास था।
  • औद्योगिक क्रांति का आरंभ: 18वीं सदी के उत्तरार्ध में सबसे पहले इंग्लैंड में वाष्प इंजन, कताई और बुनाई की मशीनों के आगमन से कारखानों का विकास।
  • भारत में वि-औद्योगीकरण (De-industrialization): ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक एकाधिकार नीति और ब्रिटेन से आयातित सस्ते मशीन-निर्मित कपड़ों के कारण भारत के विश्व-प्रसिद्ध सूती वस्त्र एवं हस्तशिल्प उद्योगों का पतन।
  • भारत में आधुनिक उद्योगों की स्थापना: 19वीं सदी के मध्य से सूती वस्त्र मिलों, जूट मिलों, कोयला खनन और 20वीं सदी के आरंभ में लौह-इस्पात उद्योग (TISCO) की स्थापना।
  • मजदूर वर्ग की स्थिति और कानून: कारखानों में 14-16 घंटे काम, कम मजदूरी और महिलाओं-बच्चों के शोषण के खिलाफ मजदूर आंदोलन, 1881 का पहला फैक्ट्री एक्ट और 1920 में AITUC का गठन।

3. प्रमुख बिंदु एवं महत्वपूर्ण वन-लाइनर (Important One-Liners)

औद्योगिक क्रांति एवं प्रमुख तकनीकी आविष्कार

  • औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग: फ्रांसीसी समाजवादी लुई ब्लां (Louis Blanc) ने किया; बाद में अंग्रेज इतिहासकार अर्नोल्ड टॉयनबी (Arnold Toynbee) ने इसे लोकप्रिय बनाया।
  • औद्योगिक क्रांति की शुरुआत: 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इंग्लैंड में (सूती वस्त्र उद्योग से)।
  • इंग्लैंड में शुरुआत के कारण: विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य, कोयले और लोहे की प्रचुरता, अनुकूल भौगोलिक स्थिति (प्राकृतिक बंदरगाह), पूंजी की उपलब्धता तथा तकनीकी आविष्कार।
  • फ्लाइंग शटल (Flying Shuttle): 1733 ई. में जॉन के (John Kay) द्वारा आविष्कार (धागा बुनने की गति तेज हुई)।
  • स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny): 1764 ई. में जेम्स हारग्रीव्स (James Hargreaves) द्वारा आविष्कार (एक साथ कई तकलियों पर सूत कातने की मशीन)।
  • वाटर फ्रेम (Water Frame): 1769 ई. में रिचर्ड आर्कराइट (Richard Arkwright) द्वारा आविष्कार (जल-शक्ति से चलने वाला कताई फ्रेम)।
  • स्पिनिंग म्यूल (Spinning Mule): 1779 ई. में सैमुअल क्रॉम्पटन (Samuel Crompton) द्वारा आविष्कार (महीन और मजबूत धागा बनाने की मशीन)।
  • पावरलूम (Powerloom / वाष्प-चालित करघा): 1785 ई. में एडमंड कार्टराइट (Edmund Cartwright) द्वारा आविष्कार।
  • वाष्प इंजन (Steam Engine): 1769 ई. में जेम्स वाट (James Watt) द्वारा पेटेंट कराया गया (न्यूकॉमन के पुराने मॉडल में सुधार करके)।
  • सेफ्टी लैम्प (Safety Lamp): 1815 ई. में हम्फ्री डेवी (Humphry Davy) द्वारा आविष्कार (कोयले की खानों में काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा हेतु)।
  • बेसेमर प्रक्रिया (Bessemer Process): 1855 ई. में हेनरी बेसेमर द्वारा लोहे से सस्ता इस्पात बनाने की तकनीक।

भारत में पारंपरिक उद्योगों का पतन (वि-औद्योगीकरण)

  • गुमाश्ता (Gumastha): ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियुक्त वेतनभोगी कर्मचारी, जो भारतीय बुनकरों से जबरन कपड़ा इकट्ठा करते थे और माल की गुणवत्ता की जांच करते थे।
  • ढाका और मुर्शिदाबाद: औपनिवेशिक काल से पूर्व विश्व-प्रसिद्ध मलमल और सूती वस्त्र के प्रमुख केंद्र थे, जो मशीनी प्रतिस्पर्धा के कारण वीरान हो गए।
  • दादाभाई नौरोजी: अपनी पुस्तक 'Poverty and Un-British Rule in India' में भारतीय धन की निकासी (Drain of Wealth) का सिद्धांत दिया।
  • औपनिवेशिक भेदभाव: ब्रिटेन में भारतीय कपड़ों पर भारी आयात शुल्क (Tariff) लगाया गया, जबकि भारत में ब्रिटिश मशीन-निर्मित कपड़े बिना किसी आयात कर के बेचे गए।

भारत में आधुनिक उद्योगों की स्थापना

  • भारत की पहली सफल सूती कपड़ा मिल: 1854 ई. में कावसजी नानाभाई दावर (K.N. Dawar) द्वारा बंबई (मुंबई) में स्थापित की गई। (1818 में फोर्ट ग्लॉस्टर, कोलकाता में पहला प्रयास असफल रहा था)।
  • भारत की पहली जूट (पटसन) मिल: 1855 ई. में जॉर्ज ऑकलैंड द्वारा बंगाल के रिशरा (Rishra) में स्थापित की गई।
  • पहला भारतीय जूट मिल मालिक: 1917 ई. में कलकत्ता में पहली भारतीय जूट मिल सेठ हुकुमचंद ने स्थापित की।
  • कोयला उद्योग की शुरुआत: 1814 ई. में पश्चिम बंगाल के रानीगंज से व्यावसायिक कोयला खनन आरंभ हुआ।
  • टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO):
    • स्थापना: 1907 ई.
    • संस्थापक: जमशेदजी नसरवानजी टाटा (J.N. Tata)
    • स्थान: साकची (वर्तमान जमशेदपुर, झारखंड)
    • उत्पादन आरंभ: 1911 ई. में पिग आयरन और 1912 ई. में इस्पात (Steel) का उत्पादन शुरू हुआ।
  • स्वदेशी आंदोलन (1905): बंग-भंग विरोध में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार से भारतीय कपड़ा मिलों और स्वदेशी उद्यमों को जबरदस्त प्रोत्साहन मिला।
  • औद्योगिक आयोग (Industrial Commission): भारतीय उद्योगों के विकास और संरक्षण पर सुझाव देने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा 1916 ई. में गठित किया गया।
  • टैरिफ बोर्ड (संरक्षण नीति): 1921 में सरकार ने एक राजस्व आयोग नियुक्त किया, जिसकी सिफारिश पर 1923 में सूती वस्त्र और इस्पात जैसे भारतीय उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से 'संरक्षण' (Protection) दिया गया।

श्रमिक आंदोलन, संगठन एवं श्रम कानून

  • चार्टिज्म आंदोलन (Chartism): 1838 में इंग्लैंड के कारखानों में काम करने वाले मजदूरों द्वारा मताधिकार और बेहतर कार्यदशाओं के लिए शुरू किया गया ऐतिहासिक आंदोलन।
  • 1881 का प्रथम फैक्ट्री एक्ट (First Factory Act):
    • गवर्नर जनरल: लॉर्ड रिपन
    • मुख्य प्रावधान: 7 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के कारखानों में काम करने पर रोक, 7 से 12 वर्ष के बच्चों के लिए कार्य-घंटे 9 घंटे प्रतिदिन तय, और खतरनाक मशीनों की घेराबंदी अनिवार्य।
  • 1891 का द्वितीय फैक्ट्री एक्ट: महिलाओं के लिए कार्य के घंटे 11 घंटे प्रतिदिन निश्चित किए गए और सप्ताह में एक दिन की छुट्टी तय की गई।
  • अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC):
    • स्थापना: 31 अक्टूबर 1920 (बंबई)
    • प्रथम अध्यक्ष: लाला लाजपत राय
    • प्रथम महासचिव: दीवान चमन लाल
  • अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO): प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1919 ई. में राष्ट्रसंघ के तहत जिनेवा में स्थापित।
  • ट्रेड यूनियन एक्ट (Trade Union Act): 1926 ई. में पारित हुआ, जिसके तहत भारत में मजदूर संघों (मजदूर यूनियनों) को कानूनी मान्यता दी गई।
  • न्यूनतम मजदूरी कानून (Minimum Wages Act): स्वतंत्र भारत की सरकार द्वारा 1948 ई. में पारित किया गया, जिसमें निश्चित जीवन-निर्वाह मजदूरी की व्यवस्था की गई।
  • राष्ट्रीय श्रम आयोग (National Commission on Labour): श्रमिकों की दशा सुधारने के लिए 1962 ई. (कार्यकाल 1966-69) में स्थापित किया गया।

4. महत्वपूर्ण पारिभाषिक शब्दावली (Key Terms)

शब्द अर्थ / परिभाषा
औद्योगीकरण (Industrialization) उत्पादन की वह प्रणाली जिसमें मानव श्रम के स्थान पर भारी मशीनों, वाष्प/विद्युत शक्ति और कारखानों का उपयोग किया जाता है।
आदि-औद्योगीकरण (Proto-industrialization) कारखानों के युग से पहले की वह उत्पादन प्रणाली, जब बड़े पैमाने पर उत्पादन घर-आधारित विकेंद्रीकृत इकाइयों में होता था।
वि-औद्योगीकरण (De-industrialization) मशीनी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा के कारण किसी देश के पारंपरिक घरेलू व हस्तशिल्प उद्योगों का समाप्त होना।
स्लम पद्धति (Slum System) औद्योगीकरण के दौर में कारखानों के आसपास मजदूरों के रहने के लिए बनी अस्वस्थ, संकीर्ण और बुनियादी सुविधाओं से विहीन बस्तियाँ।
पूंजीपति वर्ग (Capitalist Class) वह वर्ग जिसका उत्पादन के साधनों (कारखाने, मशीनें, कच्चा माल और पूंजी) पर निजी स्वामित्व होता है।
श्रमिक वर्ग (Proletariat / Working Class) वह संपत्तिहीन वर्ग जो अपनी आजीविका चलाने के लिए कारखानों में दैनिक मजदूरी पर श्रम बेचता है।

5. सामाजिक व आर्थिक प्रभाव (परीक्षा उपयोगी सारांश)

✔ सकारात्मक प्रभाव
  • उत्पादन की गति और मात्रा में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।
  • अंतरराष्ट्रीय व्यापार, रेल परिवहन और संचार के साधनों का तीव्र विकास हुआ।
  • भारत में राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग और संगठित श्रमिक वर्ग का उदय हुआ, जिसने आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी।
✖ नकारात्मक प्रभाव
  • भारतीय बुनकरों, दस्तकारों और शिल्पकारों की आजीविका छिन गई, जिससे लाखों लोग बेरोजगार होकर कृषि पर निर्भर हो गए।
  • समाज मुख्य रूप से दो विरोधी वर्गों—पूंजीपति वर्ग और सर्वहारा (श्रमिक) वर्ग—में विभाजित हो गया।
  • मजदूरों का अत्यधिक आर्थिक शोषण हुआ और गंदी बस्तियों (Slums) के फैलने से स्वास्थ्य व मानवीय संकट उत्पन्न हुआ।

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