BSEB Class 10 History Chapter 2 Solutions: समाजवाद एवं साम्यवाद (Socialism and Communism)
बिहार बोर्ड मैट्रिक परीक्षा (BSEB Class 10th) के इतिहास विषय (इतिहास की दुनिया - भाग 2) का दूसरा अध्याय "समाजवाद एवं साम्यवाद" अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। इस अध्याय में 19वीं सदी के यूटोपियन समाजवाद, कार्ल मार्क्स के वैज्ञानिक समाजवाद, 1917 की महान रूसी बोल्शेविक क्रांति, लेनिन की नई आर्थिक नीति (NEP) तथा वैश्विक स्तर पर साम्यवाद के उदय का विशद अध्ययन शामिल है। यहाँ बिहार राज्य पाठ्यपुस्तक के अभ्यास खंड के सभी प्रश्नों—वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ), रिक्त स्थानों की पूर्ति, अतिलघु उत्तरीय (20 शब्द), लघु उत्तरीय (60 शब्द), दीर्घ उत्तरीय (150 शब्द), सुमेलित प्रश्न और वर्ग परिचर्चा—के संपूर्ण, सटीक व सरल भाषा में समाधान दिए गए हैं।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions)
बोर्ड परीक्षा के लिए एक-एक अंक वाले वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के सही विकल्प:
-
रूस में कृषक दास प्रथा का अंत कब हुआ?
उत्तर: (क) 1861 (ज़ार अलेक्जेंडर द्वितीय द्वारा) -
रूस में ज़ार का अर्थ क्या होता था?
उत्तर: (घ) रूस का सम्राट -
कार्ल मार्क्स का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर: (ख) जर्मनी (ट्रियर नगर में 5 मई 1818 को) -
साम्यवादी शासन का पहला प्रयोग कहाँ हुआ?
उत्तर: (क) रूस -
यूटोपियन समाजवादी कौन नहीं था?
उत्तर: (ग) कार्ल मार्क्स (वे वैज्ञानिक समाजवाद के जनक थे) -
'वार एंड पीस' किसकी रचना है?
उत्तर: (ख) टॉलस्टाय -
बोल्शेविक क्रांति कब हुई?
उत्तर: (ख) नवंबर 1917 (रूसी पुराने कैलेंडर अनुसार 25 अक्टूबर 1917) -
लाल सेना का गठन किसने किया था?
उत्तर: (ग) ट्रॉटस्की -
लेनिन की मृत्यु कब हुई?
उत्तर: (घ) 1924 -
ब्रेस्टलिटोवस्क की संधि किन देशों के बीच हुआ था?
उत्तर: (घ) रूस और जर्मनी (मार्च 1918 में)
रिक्त स्थानों की पूर्ति करें (Fill in the Blanks)
ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित रिक्त स्थानों की सटीक पूर्ति:
- रूसी क्रांति के समय शासक ज़ार निकोलस द्वितीय था।
- बोल्शेविक क्रांति का नेतृत्व लेनिन ने किया था।
- नई आर्थिक नीति 1921 ई० में लागू हुआ था।
- रॉबर्ट ओवन ब्रिटेन (इंग्लैंड) का निवासी था।
- वैज्ञानिक समाजवाद का जनक कार्ल मार्क्स को माना जाता है।
अति लघुउत्तरीय प्रश्न (लगभग 20 शब्दों में उत्तर दें)
संक्षिप्त और सारगर्भित शब्दावली आधारित उत्तर:
1. पूँजीवाद क्या है?
उत्तर: वह आर्थिक प्रणाली जिसमें उत्पादन के साधनों (कारखानों, भूमि, पूंजी) पर निजी व्यक्तियों का स्वामित्व होता है और इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ कमाना होता है।
2. खूनी रविवार क्या है?
उत्तर: 9 जनवरी 1905 को रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में जार के महल की ओर शांतिपूर्ण रोटी की मांग कर रहे निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर जार की सेना द्वारा गोलियां चलाकर हजारों लोगों को मार देने की घटना।
3. अक्टूबर क्रांति क्या है?
उत्तर: 7 नवंबर 1917 (रूसी पुराने कैलेंडर के अनुसार 25 अक्टूबर) को लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों द्वारा केरेंस्की की अनंतिम सरकार का तख्तापलट कर सोवियत साम्यवादी सत्ता स्थापित करने की घटना।
4. सर्वहारा वर्ग किसे कहते हैं?
उत्तर: समाज का वह निर्धन एवं श्रमजीवी वर्ग जिसमें गरीब किसान, औद्योगिक मजदूर, खेत-मजदूर और आम कामगार शामिल होते हैं, जिनके पास उत्पादन का कोई निजी साधन नहीं होता।
5. क्रांति से पूर्व रूसी किसानों की स्थिति कैसी थी?
उत्तर: क्रांति से पूर्व रूसी किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी; उनके खेत बहुत छोटे थे, खेती के पुराने तरीके थे, वे भारी करों और ऋणों के बोझ से दबे थे तथा उनके पास जमीन का मालिकाना हक नहीं था।
लघुउत्तरीय प्रश्न (लगभग 60 शब्दों में उत्तर दें)
तार्किक और बिंदुवार 60 शब्दों के मानक उत्तर:
1. रूसी क्रांति के किन्हीं दो कारणों का वर्णन करें।
उत्तर: रूसी क्रांति के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:
- ज़ार की निरंकुशता एवं अयोग्य शासन: ज़ार निकोलस द्वितीय एक स्वेच्छाचारी, भ्रष्ट और अयोग्य शासक था, जो जनता की समस्याओं से अनभिज्ञ था और अपनी भ्रष्ट पत्नी ज़ारिना व ढोंगी साधु रासपुतिन के प्रभाव में था।
- मजदूरों एवं किसानों की दयनीय दशा: मजदूरों से 12 से 16 घंटे तक काम लिया जाता था और मजदूरी बहुत कम दी जाती थी। वहीं किसान भारी लगान और सामंती बंधनों से त्रस्त होकर क्रांति के लिए तैयार थे।
2. रूसीकरण की नीति क्रांति हेतु कहाँ तक उत्तरदायी थी?
उत्तर: ज़ार निकोलस द्वितीय द्वारा लागू "एक ज़ार, एक चर्च और एक रूस" की नीति के तहत साम्राज्य में रहने वाले गैर-रूसी अल्पसंख्यकों (जैसे पोल, फिन, यहूदी, तातार आदि) पर रूसी भाषा, शिक्षा और संस्कृति जबरन थोपी गई। इससे इन जातियों में ज़ारशाही के खिलाफ गहरा आक्रोश भर गया और वे रूसी क्रांति में ज़ार का तख्तापलट करने के लिए बोल्शेविकों के साथ खुलकर आ गईं।
3. साम्यवाद एक नई आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था थी, कैसे?
उत्तर: साम्यवाद ने पुरानी पूंजीवादी और सामंती व्यवस्था को जड़ से उखाड़ दिया:
- आर्थिक स्तर पर: उत्पादन के सभी साधनों (भूमि, कारखाने, बैंक) का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया और निजी संपत्ति व मुनाफे की जगह सामाजिक समानता और राज्य नियंत्रण लागू किया गया।
- सामाजिक स्तर पर: जन्म और धन आधारित विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए, वर्गविहीन समाज की स्थापना हुई और "काम के अधिकार" को प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार बनाया गया।
4. नई आर्थिक नीति मार्क्सवादी सिद्धांतों के साथ समझौता था, कैसे?
उत्तर: 1921 में लेनिन द्वारा लागू 'नई आर्थिक नीति' (NEP) शुद्ध मार्क्सवाद से एक व्यावहारिक समझौता थी। शुद्ध मार्क्सवादी सिद्धांत में निजी संपत्ति और पूंजीवाद का पूर्ण खात्मा होता है, परंतु देश को भुखमरी और आर्थिक तबाही से बचाने के लिए लेनिन ने किसानों को अनाज का अतिरिक्त हिस्सा बाज़ार में बेचने की छूट दी, 20 से कम मजदूरों वाले उद्योगों में निजी स्वामित्व की अनुमति दी और विदेशी पूंजी का सीमित स्वागत किया। लेनिन के अनुसार, यह "एक कदम पीछे हटकर दो कदम आगे बढ़ने" की रणनीति थी।
5. प्रथम विश्वयुद्ध में रूस की पराजय क्रांति हेतु मार्ग प्रशस्त किया, कैसे?
उत्तर: प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) में रूसी सेनाओं की सभी मोर्चों पर लगातार शर्मनाक हार हुई। हथियार, गोला-बारूद, भोजन और कपड़ों की कमी के कारण 60 लाख से अधिक रूसी सैनिक हताहत हुए। युद्ध के भारी खर्च से देश में खाद्यान्न संकट और भीषण महंगाई फैल गई। इस पराजय ने जारशाही की प्रशासनिक अयोग्यता और खोखलेपन को जनता और सेना के सामने पूरी तरह उजागर कर दिया, जिससे सैनिकों ने भी विद्रोह कर क्रांति का रास्ता साफ किया।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (लगभग 150 शब्दों में उत्तर दें)
विस्तृत और विश्लेषणात्मक बोर्ड-स्तरीय समाधान:
1. रूसी क्रांति के कारणों की विवेचना करें।
उत्तर: 1917 की रूसी क्रांति विश्व इतिहास की युगांतरकारी घटना थी। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:
- ज़ार निकोलस द्वितीय का निरंकुश शासन: ज़ार जनता के अधिकारों का विरोधी था। वह दैवीय अधिकारों में विश्वास रखता था और संसद (ड्यूमा) को कोई वास्तविक शक्ति नहीं दी गई थी।
- किसानों की दयनीय स्थिति: 1861 में कृषक दासता समाप्त होने के बाद भी किसानों को बहुत छोटे खेत मिले थे, जिसके लिए उन्हें भारी मुक्ति कर (Redemption dues) देना पड़ता था। अधिकांश जमीनें अभी भी कुलीनों और ज़मींदारों के पास थीं।
- औद्योगिक मजदूरों का शोषण: रूस में विदेशी पूंजी के बल पर बड़े कारखाने खुले थे जहाँ मजदूरों की सुरक्षा का कोई कानून नहीं था। उन्हें कम वेतन और अमानवीय परिस्थितियों में लंबे समय तक काम करना पड़ता था।
- रूसीकरण की दमनकारी नीति: गैर-रूसी जातियों पर रूसी भाषा व संस्कृति थोपने से अल्पसंख्यकों में भारी अलगाव और विद्रोह की भावना पनपी।
- बौद्धिक जागरण: टॉलस्टाय, तुर्गनेव, दोस्तोवस्की और गोर्की जैसे विचारकों के साहित्य तथा कार्ल मार्क्स के विचारों ने जनता में वैचारिक चेतना जगाई।
- तात्कालिक कारण (प्रथम विश्वयुद्ध): युद्ध में लाखों सैनिकों की मौत, भोजन की कमी और भुखमरी ने ज़ारशाही के अंत की अंतिम चिंगारी सुलगा दी।
2. नई आर्थिक नीति क्या है?
उत्तर: 1917 की क्रांति और उसके बाद चले तीन साल के गृहयुद्ध के कारण रूस की अर्थव्यवस्था पूर्णतः नष्ट हो चुकी थी। 1920-21 के भीषण अकाल और किसानों व नाविकों (क्रोनस्टाट विद्रोह) के असंतोष को देखते हुए लेनिन ने 1921 में 'युद्धकालीन साम्यवाद' को हटाकर नई आर्थिक नीति (New Economic Policy - NEP) लागू की:
- किसानों को राहत: अनिवार्य अनाज वसूली बंद कर दी गई। किसानों पर एक निश्चित अनाज कर लगाया गया और बचे हुए अतिरिक्त अनाज को उन्हें खुले बाज़ार में बेचने की पूरी छूट दी गई।
- सीमित निजी स्वामित्व: 20 से कम मजदूरों वाले छोटे उद्योगों को निजी व्यक्तियों को चलाने की अनुमति दी गई।
- विदेशी पूंजी व तकनीकी आमंत्रण: देश के औद्योगिकीकरण को गति देने के लिए सीमित शर्तों पर विदेशी पूंजीपतियों को रियायतें दी गईं।
- मुद्रा और बैंकिंग सुधार: स्थिर मुद्रा के रूप में नया 'रूबल' जारी किया गया और सरकारी बैंकों का पुनर्गठन हुआ।
- व्यापारिक छूट: देश के भीतर खुदरा व्यापार की स्वतंत्रता बहाल की गई।
परिणाम: इस नीति ने रूस की जर्जर अर्थव्यवस्था को संजीवनी दी, कृषि और औद्योगिक उत्पादन युद्ध-पूर्व स्तर पर पहुँचा और सोवियत संघ के तीव्र आर्थिक विकास की ठोस नींव पड़ी।
3. रूसी क्रांति के प्रभाव की विवेचना करें।
उत्तर: 1917 की बोल्शेविक क्रांति ने न केवल रूस बल्कि पूरे विश्व के राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य को बदल दिया:
- सर्वहारा वर्ग की पहली सरकार: इतिहास में पहली बार शोषित और मजदूर वर्ग का शासन स्थापित हुआ। सामंती व्यवस्था और पूंजीवादी वर्चस्व का अंत हुआ।
- सोवियत संघ का महाशक्ति के रूप में उभार: केंद्रीय नियोजन (पंचवर्षीय योजनाएँ) के माध्यम से सोवियत संघ कुछ ही दशकों में कृषि और उद्योग के क्षेत्र में अमेरिका के समकक्ष विश्व की दूसरी महाशक्ति बन गया।
- विश्व का वैचारिक विभाजन: विश्व दो विरोधी गुटों में बंट गया—एक तरफ अमेरिका के नेतृत्व वाला पूंजीवादी लोकतांत्रिक गुट और दूसरी तरफ सोवियत संघ के नेतृत्व वाला साम्यवादी गुट, जिसने आगे चलकर शीतयुद्ध (Cold War) को जन्म दिया।
- उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों को प्रेरणा: एशिया और अफ्रीका के गुलाम देशों (भारत, चीन, वियतनाम) के स्वतंत्रता सेनानियों को इस क्रांति से आत्मबल मिला। लेनिन ने 'कॉमिन्टर्न' (कम्युनिस्ट इंटरनेशनल) की स्थापना कर औपनिवेशिक मुक्ति संग्रामों को सीधा समर्थन दिया।
- कल्याणकारी राज्य की अवधारणा: साम्यवाद के प्रसार के डर से पश्चिमी पूंजीवादी देशों को भी अपने यहाँ मजदूरों के कार्य घंटे तय करने, न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा जैसे जनकल्याणकारी कानून लागू करने पड़े।
4. कार्ल मार्क्स की जीवनी एवं सिद्धांतों का वर्णन करें।
जीवन परिचय:
वैज्ञानिक समाजवाद के प्रणेता कार्ल मार्क्स का जन्म 5 मई 1818 को जर्मनी के ट्रियर नगर में एक यहूदी परिवार में हुआ था। उनके पिता हेनरिख मार्क्स एक प्रसिद्ध वकील थे। मार्क्स ने बॉन और बर्लिन विश्वविद्यालय से विधि और दर्शनशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की और हीगेल के विचारों से गहरे प्रभावित हुए। 1843 में उन्होंने जेनी से विवाह किया। पेरिस में उनकी भेंट फ्रेडरिक एंजेल्स से हुई, जो जीवन भर उनके परम मित्र और वैचारिक सहयोगी रहे। 1848 में उन्होंने एंजेल्स के साथ प्रसिद्ध 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो' (साम्यवादी घोषणापत्र) प्रकाशित किया और 1867 में अपनी कालजयी पुस्तक 'दास कैपिटल' की रचना की, जिसे "समाजवादियों की बाइबिल" कहा जाता है। 1883 में लंदन में उनका निधन हुआ।
मार्क्सवादी सिद्धांत:
- द्वंद्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism): हीगेल के विचारवाद के विपरीत मार्क्स ने माना कि सृष्टि का मूल तत्व चेतना या विचार नहीं बल्कि भौतिक पदार्थ है।
- ऐतिहासिक भौतिकवाद: इतिहास की सभी युगान्तकारी घटनाओं और सामाजिक परिवर्तनों की जड़ में आर्थिक परिस्थितियाँ और उत्पादन के साधन होते हैं।
- वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत: मार्क्स के अनुसार "अब तक का संपूर्ण मानव समाज का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास रहा है" (शोषक बनाम शोषित)।
- अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत: मजदूर जो श्रम करता है और उसे जो मजदूरी मिलती है, उसके बीच का अंतर 'अतिरिक्त मूल्य' है, जिसे पूंजीपति मुनाफे के रूप में हड़प लेते हैं।
- राज्यविहीन एवं वर्गविहीन समाज: क्रांति के जरिए पूंजीवाद को समाप्त कर सर्वहारा की तानाशाही स्थापित होगी, जो अंततः एक वर्गविहीन व शोषणमुक्त साम्यवादी समाज का निर्माण करेगी।
5. यूटोपियन समाजवादियों के विचारों का वर्णन करें।
19वीं सदी के आरंभिक समाजवादियों को 'यूटोपियन' (स्वप्नदर्शी) समाजवादी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने शोषणमुक्त समाज की सुंदर कल्पना तो की, लेकिन उसे धरातल पर प्राप्त करने का कोई ठोस वैज्ञानिक या क्रांतिकारी मार्ग नहीं बताया। उनके प्रमुख विचार निम्नलिखित थे:
- सेंट साइमन (फ्रांस): उनका मानना था कि समाज में सभी को अपनी क्षमता के अनुसार काम करना चाहिए और कार्य के अनुसार पारिश्रमिक मिलना चाहिए। वे राज्य और समाज को बुद्धिजीवियों व उद्योगपतियों के नैतिक सहयोग से चलाना चाहते थे।
- चार्ल्स फूरियर (फ्रांस): वे आधुनिक औद्योगिक शहरों और प्रतिस्पर्धा के विरोधी थे। उन्होंने छोटे-छोटे सहकारिता आधारित समुदायों ('फालान्क्स') के निर्माण का विचार दिया, जहाँ सभी लोग मिल-जुलकर स्वेच्छा से काम करें।
- लुई ब्लां (फ्रांस): उनका विचार था कि सुधार केवल नैतिक उपदेशों से नहीं, बल्कि राज्य के माध्यम से हो सकते हैं। वे कारखानों पर सरकारी नियंत्रण और सभी को 'काम के अधिकार' की कानूनी गारंटी के समर्थक थे।
- रॉबर्ट ओवन (ब्रिटेन): एक परोपकारी उद्योगपति के रूप में उन्होंने स्कॉटलैंड के न्यू लानार्क में अपनी सूती मिल में मजदूरों के कार्य के घंटे घटाए, मजदूरी बढ़ाई, अच्छे आवास दिए और बाल-श्रम बंद किया। परिणामस्वरूप उनका मुनाफा घटा नहीं बल्कि बढ़ गया। बाद में उन्होंने अमेरिका के इंडियाना में 'न्यू हार्मनी' नामक समाजवादी बस्ती बसाई।
निष्कर्ष: ये सभी विचारक शांतिपूर्ण, नैतिक और हृदय-परिवर्तन के जरिए समाजवाद लाना चाहते थे। वे वर्ग-संघर्ष के विरोधी थे, यही कारण है कि कार्ल मार्क्स ने इन्हें अव्यावहारिक व स्वप्नदर्शी माना।
सुमेलित करें (Match the Following)
पुस्तकों, संस्थाओं, नीतियों और ऐतिहासिक तिथियों का सही मिलान:
| स्तम्भ 1 | स्तम्भ 2 (सही मिलान) |
|---|---|
| (i) दास कैपिटल | (ख) कार्ल मार्क्स (1867 ई०) |
| (ii) चेका | (घ) गुप्त पुलिस संगठन |
| (iii) नई आर्थिक नीति | (ङ) लेनिन (1921 ई०) |
| (iv) कार्ल मार्क्स की मृत्यु | (ग) 1883 |
| (v) स्टालिन की मृत्यु | (क) 1953 |
वर्ग परिचर्चा (Class Discussion Guide)
कक्षा में शिक्षक और विद्यार्थियों के विमर्श हेतु मुख्य बिंदु:
आज के संदर्भ में समाजवाद एवं साम्यवाद की आवश्यकता:
- आर्थिक असमानता पर नियंत्रण: 21वीं सदी में अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई को पाटने के लिए समाजवादी नीतियों का होना आवश्यक है।
- बुनियादी अधिकारों की गारंटी: शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल और रोज़गार को बाज़ार के मुनाफे पर न छोड़कर प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार बनाने के लिए समाजवादी दृष्टिकोण प्रासंगिक है।
- संसाधनों का न्यायसंगत वितरण: प्राकृतिक संपदा और राष्ट्रीय संसाधनों पर किसी एकाधिकारवादी पूंजीपति का कब्जा न होकर पूरे समाज का साझा हित सुनिश्चित होना चाहिए।
भारतीय शासन प्रणाली में समाजवाद का प्रभाव:
- संवैधानिक प्रावधान: भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 42वें संशोधन (1976) द्वारा भारत को एक "समाजवादी गणराज्य" घोषित किया गया है।
- नीति निर्देशक तत्व (भाग 4): अनुच्छेद 38 और 39 में स्पष्ट निर्देश है कि राज्य धन के संकेंद्रण को रोकेगा और सभी नागरिकों को आजीविका के समान अवसर उपलब्ध कराएगा।
- मिश्रित अर्थव्यवस्था: भारत ने आजादी के बाद न तो पूर्ण पूंजीवाद चुना और न ही पूर्ण साम्यवाद, बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र (PSUs) और निजी क्षेत्र के सह-अस्तित्व वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया।
- जनकल्याणकारी योजनाएँ: मनरेगा (काम का अधिकार), सार्वजनिक वितरण प्रणाली (मुफ्त राशन), सरकारी अस्पताल और मुफ्त अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा (RTE) भारतीय शासन पर समाजवादी प्रभाव के जीवंत उदाहरण हैं।
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